मेरा विषय है भारत और चीन का अर्थिक विकास। और मैं आपके साथ इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने क प्रयास करूँगा कि ये सही है या गलत कि प्रजातंत्र ने भारत का रोका या बढाया आर्थिक विकास के पथ पर। हो सकता है आप कहें कि ये ठीक नहीं, क्योंकि मैं सिर्फ़ दो देशों की कहानी से प्रजातंत्र के खिलाफ़ तर्क तैयार कर रहा हूँ। असल में, ठीक इसका विपरीत है जो मैं करने जा रहा हूँ। मैं इन दों देशों की तुलना के ज़रिये आर्थिक विकास में प्रजातंत्र के महत्व के पक्ष में अपने तर्क रखूँगा, न कि प्रजातंत्र के ख़िलाफ़।
यहाँ पहला सवाल है कि आखिर चीन ने इतनी तेज तरक्की क्यों की भारत की तुलना में। पिछले तीस सालों में, जी.डी.पी. की बढत के दर के हिसाब से, चीन नें भारत से दुगुनी गति से तरक्की की है। पिछले पाँच सालों मे, कुछ कुछ दोनों देश करीब आये हैं आर्थिक विकास में। मगर पिछले तीस सालों में, ये सच है कि चीन ने भारत के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। एक सीधा सरल उत्तर है कि चीन के पास शंघाई है, और भारत के पास है मुंबई। शंघाई के क्षितिज पर एक नज़र डालिये। ये पुडोंग नाम का इलाका है। अब भारत की एक तस्वीर धारावी झुग्गी का इलाका, मुंबई में, भारत में। जो विचार इन तस्वीरों में छुपा है वो ये है कि चीनी सरकार कानून के बाहर भी अमल कर सकती है। वो योजना बना सकती है देश के दीर्घकालिक फ़ायदे के लिये और इस प्रक्रिया में, दसियों लाख लोगों का विस्थापन -- मात्र एक तकनीकी मसला है। जबकि भारत में, आप ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि आपको जनता की आवाज सुननी ही होगी। आप जनाग्रह से बँधे हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस बात को मानते हैं। एक साक्षातकार में, जो कि फ़िनानशियल प्रेस ऑफ़ इंडिया में छपा था, उन्होंने कहा कि वो मुंबई को दूसरा शंघाई बनाना चाहते हैं। ये एक ऑक्सफ़ोर्ड-प्रशिक्षित अर्थशास्त्री है, जो कि मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत है, और फ़िर भी वो सहमत है शंघाई के दबंगई-आधारित तौर-तरीकों से।
तो, इसे मैं नाम देता हूँ 'आर्थिक विकास का शंघाई मॉडल', जो कि इन बातों पर ज़ोर देता है आर्थिक बढत हासिल करने के लिये: आधारभूत संरचनायें (इन्फ़्रास्टर्कचर), हवाई-अड्डे, सडकें, पुल, और इस तरह की चीजें। और इसके लिये आपको एक ताकतवर सरकार की ज़रूरत है, क्योंकि इस तरीके में निजी संपत्ति के अधिकारों का महत्व नहीं है। आपको जनाग्रह, और लोगों के विचारों को कोई अहमियत नहीं दे सकते हैं। इसमें राष्ट्र की मिलकियत की आवश्यकता है, ख़ासतौर पर, भूमि-संपत्ति की मिलकियत, जिससे कि बडे निर्माण-कार्य कर सकें, और तेजी के साथ। उस मॉडल का नतीज़ा ये है कि प्रजातंत्र आर्थिक-विकास की रह का रोडा बन जाता है, उसके विकास का सहयोगी बनने के बजाय। यही मुख्य सवाल है। कि कितना ज़रूरी है इन आधारभूत संरचनाओं का सकल निर्माण आर्थिक विकास के लिये? यही मुख्य मुद्दा है। यदि आप मानते है कि ये निर्माण कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है आर्थिक विकास के लिये, तो आप ताकतवर शासन को ज़रूरी मानेंगे विकास के लिये। यदि आप मान्ते हैं कि आधारभूत संरचनायें इतनी ज़रूरी नहीं हैं जितना लोग सोचते हैं, तो आप कम ज़ोर डालेंगे एक ताकतवर शासन के लिये।
तो इस प्रश्न को दिखाने के लिये, मैं आपको दो देशों का उदाहरण देता हूँ। और सरलता के लिये, मैं पहले देश को कहूँगा देश नं० १ और दूसरे देश को देश नं० २। देश १ के पास देश दो के मुकाबले सुव्यवस्थित श्रेष्ठता है आधारभूत संरचनाओं में। देश १ के पास ज्यादा टेलीफ़ोन हैं, और देश १ के पास ज्यादा बडा रेल्वे सिस्टम है। तो यदि मैं आपसे पूँछूं, "इनमें से कौन सा चीन है और कौन सा भारत, और किस देश ने ज्यादा तेज तरक्की की है?" अगर आप संरचना-वादी दृष्टिकोण रखते हैं, तो आप कहेंगे, "देश नं ०१ है चीन। निश्चय ही उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया होगा, आर्थिक विकास में। और देश नं० २ पक्क भारत ही है।"
असल में ज्यादा टेलीफ़ोन वाला देश है सोवियत संघ, और ये आँकडे हैं १९८९ के। टेलीफ़ोन के इतने बेहतरीन आँकडे देने के ठीक बाद ये देश ही मटियामेट हो गया। और ये तो अच्छी बात नहीं है। ये तस्वीर है ख्रुशचेव की । मुझे पता है कि १९८९ में वो सोवियत संघ पर शासन नहीं कर रहे थे, मगर मैं उनकी इस से बेहतर तस्वीर नहीं ढूँढ पाया। (हँसी) टेलीफ़ोन और सडकों जैसी संरचनायें आर्थिक विकास की गारंटी नहीं देती हैं। देश नं० २, जिसके पास कम टेलीफ़ोन हैं, चीन है। १९८९ से लगातार, चीन ने दस-प्रतिशत विकास दर से ऊपर का प्रदर्शन किया है हर साल, पिछले पूरे २० साल से। अगर आप चीन और सोवियत-संघ के बारे में सिर्फ़ उनके टेलीफ़ोन के आँकडे जानते हों, तो आप गलत अनुमान लगायेंगे उनके विकास के बारे में, जो वो अगले दो दशकों में करेंगे।
देश १, जिसके पास ज्यादा विस्तृत रेलवे प्रणाली है, असल में भारत है। और देश २ चीन है। ये बात बहुत कम लोग जानते हैं इन दो देशों के बारे में। हाँ, ये सच है कि आज चीन की पास बेहतर आधारभूत-संरचनायें हैं भारत के मुकाबले। मगर कई सालों तक, ९० के दशक कें अंत तक, चीन इस मामले में भारत से पीछे था। विकासशील देशों में, यातायात का सबसे प्रचलित साधन रेलवे होता है, और अँग्रेजों नें भारत में मीलों लम्बी प्रणाली बनाये थी। भारत क्षेत्रफ़ल में चीन से छोटा है, और फ़िर भी उसका रेलवे चीन के रेलवे से बडा था ९० के दशक के अंत तक। तो ये भी साफ़ है, कि सिर्फ़ आधारभूत-ढाँचा ही कारण नहीं है चीन के बेहतर प्रदर्शन का, ९० के दशक के पहले, भारत के मुकाबले।
बल्कि, यदि आप विश्व-भर के आँकडों पर नज़र डालें, तो ये दृष्टिकोण उजागर होगा कि ढाँचे का विकास असल में आर्थिक विकास का कारण नहीं, नतीज़ा है। अर्थ-व्यवस्था विकसित होती है, सरकारों के पास ज्यादा संसाधन आते हैं, और सरकार तब जा कर ढाँचे में निवेश कर पाती है -- ऐसा नहीं कि ढाँचा बनाते ही आर्थिक विकास आ जाता है। और ज़ाहिर है कि ये ही कहानी है चीन के आर्थिक विकास की। चलिये सीधे इस प्रश्न पर ही आता हूँ। क्या प्रजातंत्र आर्थिक-विकास के लिये खराब है? अब फ़िर से एक नज़र दो देशों पर, देश अ और देश ब। १९९० में, देश अ की प्रति व्यक्ति जीडीपी थी करीब ३०० डॉलर और देश ब में प्रति व्यक्ति जीडीपी थी ४६० डॉलर। २००८ आते आते, देश अ ने देश ब को पीछे छोड दिया था, और उस की प्रति व्यक्ति जीडीपी थी ७०० डॉलर प्रतिद्वंदी देश के ६५० डॉलर प्रति व्यक्ति जीडीपी की तुलना में। दोनों देश एशिया में है।
यदि मैं आप से पूँछूं, "ये दो देश कौन से एशियाई देश हैं? और इनमें से किस में प्रजातांत्रिक राज है?" आप शायद कहें, "ह्म्म्म, हो सकता है कि देश अ चीन है और देश ब है भारत।" असल में, देश अ है प्रजातांत्रिक भारत, और देश ब है पाकिस्तान -- वो देश जो बहुत लंबे समय तक फ़ौज़ी शासन में था। और अक्सर हम भारत और चीन की तुलना करते हैं। ये इसलिये कि दोनों देशों की जनसंख्या लगभग बराबर है। मगर सचे में तुलना तो भारत और पाकिस्तान की होनी चाहिये। इन दोनों देशों का भूगोल एक सा है। उनका जटिल पर साझा इतिहास है। इस नज़रिये से तो, प्रजातंत्र बहुत ही ज्यादा पोषक लगता है आर्थिक विकास के लिये।
तो फ़िर सारे आर्थ-शास्त्री क्यों सत्तावादी सरकारों के इश्क में पागल रहते हैं? एक कारण ये है कि ये पूर्व-एशियाई मॉडल है। पूर्व एशिया में, हमारे पास कुछ उदाहरण हैं अत्यधिक सफ़ल आर्थिक विकास के जैसे कि कोरिया, ताइवान, हांग-कांग और सिंगापुर। इन में से कुछ अर्थ-व्यवस्थायें सत्तावादी सरकारों द्वारा शासित थी ६० और ७० के दशक तक, और ८० के दशक तक भी। इस दृष्टिकोण का कुछ वैसा हाल है कि आप लाटरी जीतने वाले सारे लोगों से पूछें, "क्या आपने लाटरी जीती?" और वो सब आपसे कहें, "हाँ, हमने लाटरी जीते ली।" और फ़िर आप निषकर्ष निकाल लें कि लाटरी जीतने की संभावना है पूरी सौ प्रतिशत। आप ने तो कभी जा कर हारने वालों से ये पूछने की ज़हमत ही नहीं उठायी, जिन्होंने जतन से लाटरी खरीदी थी और कभी कुछ नहीं जीते।
हर एक सत्तावादी आर्थिक सफ़ल सरकार के उदाहरण के लिये, पूर्वी एशिया में, भीषण असफ़लता का कम से कम एक उदाहरण मौजूद है। कोरिया सफ़ल हुआ। उत्तरी कोरिया नहीं हुआ। ताइवान सफ़ल हुआ, माओ जेडोंग शासित चीन नहीं हुआ बर्मा सफ़ल नहीं है। फ़िलिपींस सफ़ल नहीं हो सका। सारे विश्व के सांख्यिकीय आँकडे आपको दिखा देंगे, कि इस विचार का कोई प्रमाण नहीं है कि सत्तावादी ताकतवर सरकारों के पास प्रजातांत्रिक सरकारों के मुकाबले कोई श्रेष्ठता होती है, आर्थिक विकास के मसले में। लिहाज़ा पूर्व एशियाई मॉडल में ये तगडा पक्षपात दिखता है, क्योंकि आप पूरी कहानी पर नज़र ही नहीं डालते -- और हम हमेशा अपने विद्यार्थियों से इस गल्ती से बचने की हिदायत देते हैं।
लेकिन फ़िर चीन की इतनी ज़बर्दस्त तरक्की हुई क्यों? चलिये मैं आपको सांस्कृतिक-क्रांति के दौर में ले चलता हूँ, जब चीन पागल हो गया था, और उसकी अर्थ-व्यवस्था की भारत से तुलना करता हूँ, इंदिरा गाँधी के समय के भारत से। अब सवाल ये है: कौन सा देश बेहतर प्रदर्शन कर रहा था, चीन या भारत? चीन बेहतर था, सांस्कृतिक क्रांति के दौरान। उस समय भी ऐसा ही हुआ कि चीन ने भारत से बेहतर विकास किया जीडीपी विकास के हिसाब से करीब प्रति वर्ष २.२ .प्रतिशत ज्यादा तेजी से प्रति व्यक्ति जीडीपी के हिसाब से। और ये तब जब कि सारा चीन पगला गया था। पूरा देश ही उथल-पुथल में था। इस का मतलब है कि चीन में कुछ ऐसा है जो कि आर्थिक विकास को इतना पोषण देता है कि विकास को रोकने वाली चीजों को निष्क्रिय कर देता है जैसे कि सांस्कृतिक क्रांति। और चीन के पास जो सबसे बडी ताकत थी, तो थी मानव-संसाधन की पूँजी -- और कुछ नहीं - केवल मानव-संसाधन-पूँजी।
ये आँकडे हैं विश्व विकास सूचक के ९० के दशक के पूर्वार्ध के। और उस से पुराने आँकडॆ मुझे मिले ही नहीं। चीन में व्यस्क साक्षरता दर है ७७ प्रतिशत भारत के ४८ प्रतिशत के मुकाबले। साक्षरता दर में विरोधाभास खासतौर पर ज़ोरदार है चीनी और भारतीय महिलाओं के बीच। मैनें आपको साक्षरता की परिभाषा तो बताई ही नहीं। चीन में, साक्षर उसे मानते हैं जो लिख और पढ सके कम से कम १५०० चीनी चिन्ह। भारत में, साक्षरता की परिभाषा, जो कि गिनती के लिये इस्तेमाल होती है, है काबलियत, मतलब मोटे तौर पर काबलियत, अपना नाम लिख सकने की जो भी आपकी मातृभाषा हो, उसमें। इन दो देशों की साक्षरता दरों में फ़र्क उस से भी गहरा है जितना कि ये आँकडे यहाँ दिखा रहे हैं। यदि आप दूसरे आँकडे देखें जैसे कि मानव विकास सूचकांक, इन आंकडों की कडी, जो कि ७० के दशक के शुरुवात तक जाती है, आप ठीक यही विरोधाभास देखेंगे। चीन के पास बहुत बडा फ़ायदा था मानव संसाधन की गुणवत्ता का, भारत की तुलना में।
नागरिकों की आयु: १९६५ में, चीन मे नागरिक-आयु का भी फ़ायदा रहा है। औसतन, चीनी लोग १९६५ में, कम से कम दस साल ज्यादा जीते थे भारतीयों के मुकाबले। तो यदि आपको चुनना हो चीनी और भारतीय होने के बीच, आप चीनी हो जायेंगे जिस से कि आप दस साल ज्यादा जियें। हाँ, यदि आप ये फ़ैसला १९६५ में लेते, तो उसका नुकसान ये होता कि अगले ही साल आप सांस्कृतिक क्रांति की उथल-पुथल में फ़ँस जाते। तो आपको हमेशा बहुत सावधानी से सोचना होता है इन फ़ैसलों के बारे में।
यदि आप अपनी नागरिकता नहीं चुन सकते, तो आप भारतीय पुरुष होना पसंद करते। क्योंकि, एक भारतीय पुरुष, करीब दो साल अधिक जीता था, एक भारतीय महिला की तुलना में। ये बहुत ही ज्यादा अजीब तथ्य है। ऐसा बिरला ही कोई देश होगा जहाँ ऐसा नमूना देखा गया हो। ये उजागर करता है विधिवत पक्षपात और शोषण भारतीय समाज में, महिलाओं के खिलाफ़। अच्छी ख़बर ये है कि २००६ तक आते आते, भारत ने खत्म कर दिया इस फ़र्क को आदमी और औरत के बीच, आयु-औसत के आँकडों के हिसाब से। आज, भारतीय महिलाओं की औसत आयु कहीं ज्यादा है भारतीय पुरुषों के मुकाबले। तो भारत बाकी दुनिया सरीका हो रहा है। मगर भारत को अभी भी बहुत काम करना है औरत-मर्द की बराबरी के लिये।
ये दो तस्वीरें गुआनडोंग राज्य की गारमेंट फ़ैक्ट्रियों की, और भारत की गारमेंट फ़ैक्ट्रियों में ली गयी हैं। चीन में, महिला कारीगर भरे हैं। ६० से ८० प्रतिशत चीनी श्रमिक महिलायें हैं देश के तटीय इलाकों में, जबकि भारत में, ज्यादातर श्रमिक मर्द हैं। फ़िनान्शियल टाइम्स ने इस तस्वीर को छापा था, जो कि एक भारतीय टेक्सटाइल फ़ैक्ट्री की है, इस शीर्षक के साथ, "भारत चीन को टेक्सटाइल में पीछे छोडने के लिये तैयार।" इन दोनों तस्वीरों को देख कर, मै कह सकता हूँ, नहीं, अभी काफ़ी समय है चीन के पिछडने में। अगर आप बाकी पूर्व एशियाई देशों को देखें, औरतें वहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं आर्थिक विकास में -- उत्पादन क्षमता के विस्फ़ोटक विकास में, जिसे पूर्व एशिया में देखा गया है। भारत को अभी बहुत सफ़र तय करना है चीन तक पहुँचने के लिये।
फ़िर, मसला आता है कि, चीनी राजनैतिक प्रणाली को कैसे देखें? आपने मानव-संसाधन-पूँजी की बात की, आपने शिक्षा, और जन-स्वास्थ की बात की। लेकिन राजनैतिक प्रणाली का क्या? क्या ये सच नहीं है कि एकदलीय राजनैतिक प्रणाली ने चीन का आर्थिक विकास किया है? असल में, इस का जवाब इतना सीधा-साधा नहीं है, जटिल है। ये निर्भर करता है कि आप कहाँ फ़र्क करते हैं राजनैतिक प्रणाली की स्थिर विशेषताओं और चलायमान विशेषताओं के बीच। स्थिरता है कि चीन एकदलीय है, सत्तावादी है -- इस पर तो कोई सवाल ही नहीं है। चलायमान क्या है -- कि ये समय के साथ बदल रहा है, और कम सत्तावादी और ज्यादा लोकतांत्रिक हो रहा है। जब आप किसी बदलाव का कारण खोजते हैं -- जैसे कि, आर्थिक विकास; आर्थिक विकास बदलाव से जुडा होता है -- जब आप बदलाव के कारणॊं की खोज करते हैं, आप बाकी बदलती हुई चीजों का इस्तेमाल करते हैं, न कि रुकी हुई चीजों का। कभी कभी रुकी हुई चीजें भी बदलाव का कारण हो सकती है, मगर वो सिर्फ़ इसलिये कि उस स्थिर चीज के अलावा बाकी चीजें बदल रही होती हैं।
राजनैतिक बदलाव के अंतर्गत, चीन में ग्राम-चुनाव शुरु हो गये हैं। संपत्त्ति के अधिकार बेहतर हुये हैं। और उन्होंने सुरक्षा बढा दी है, दीर्घकालिक भूमि-लीज़ की। ग्रामीण चीन में आर्थिक नवीनीकरण हुये हैं। चीन में ग्रामीण उद्यमिता की क्रांति भी आ रही है। मेरे हिसाब से राजनैतिक बदलाव की गति अत्यधिक धीमी है, बहुत ही शिथिल। और मेरा निजी विचार ये है कि चीन को भविष्य में कुछ गंभीर चुनौतियों का सामना करना पडेगा, क्योंकि उन्होंने राजनैतिक बदलाव तेजी से नहीं किये हैं। मगर इस के बावजूद भी, प्रणाली के बदलाव की दिशा उदारपंथी ही है, लोकतांत्रिक दिशा की ओर।
आप यही सिद्दांत भारत पर ही लागू कर सकते हैं। और तथ्य ये है कि जब भारत का विकास धीरे हो रहा था -- करीब एक प्रतिशत, दो प्रतिशत प्रति वर्ष -- उस समय भारत सबसे कम लोकतांत्रिक था। इंदिरा गाँधी ने १९७५ में आपातकाल की घोषणा कर डाली थी। भारतीय सरकार का सर्वाधिकार था, सारे के सारे टी.वी. स्टेशनों पर। ९० के दशक के भारत के बारे में कम ही लोग ये जानते है कि इस देश ने न सिर्फ़ आर्थिक दुरुस्ती की, बल्कि राजनैतिक सुधार भी किया ग्रामों मे स्व-शासन लागू कर के, मीडिया का निजीकरण कर के और सूचना अधिकार लागू कर के। तो बदलाव से होने वाले विकास का सिद्धांत चीन और भारत दोनों पर ही लागू होता है कि किस दिशा में उन्हें जाना है।
क्यों इतने लोग ये मानते हैं कि भारत में विकास नहीं हो रहा है ? एक कारण ये है कि वो हमेशा भारत की तुलना चीन से करते हैं। मगर चीन तो अपवाद है आर्थिक विकास के मामले में। यदि आप क्रिकेट के खिलाडी है, और आपकी तुलना हमेशा सचिन तेंदुलकर से की जाये, तो लगेगा कि आप कुछ ख़ास नहीं है। पर इसका मतलब ये तो नहीं है कि आप एक खराब क्रिकेट खिलाडी हैं। सर्वश्रेष्ठ अपवाद से तुलना गलत आंकलन है। सच ये है कि यदि आप भारत की तुलना औसत विकसित देश से करें, और आज ही नहीं, और पहले भी, तो भारत में विकास की दर की -- आज भारत आज ८ से ९ प्रतिशत की दर से विकसित हो रहा था -- आज से पहली भी, भारत आर्थिक विकास में विश्व में चौथे स्थान पर था, विकासशील अर्थ-व्यवस्थाओं में। ये साधारण बात नहीं है।
चलिये भविष्य पर एक नज़र डालें। चीनी ड्रेगन और हिन्दुस्तानी हाथी का मुकाबला। किस देश के पास विकास का बेहतर आवेग है? चीन, मेरे हिसाब से, अभी भी कुछ मूल बातों में बहुत तगडा है -- जैसे कि सामाजिक व्यवस्था, जन-स्वास्थ, समानता की भावना जो कि आपको भारत में नहीं मिलती। मगर मेरा विश्वास है कि भारत के पास भी आवेग है। उसकी मूल विशेषतायें बेहतर हो रही हैं। सरकार ने प्राथमिक शिक्षा में निवेश किया है, प्राथमिक चिकित्सा में निवेश किया है । मेरा मानना है कि सरकार को और भी करना होगा, मगर कुछ भी हो, जिस दिशा में वो जा रही है, वो सही दिशा है। भारत में संसथान हैं जो आर्थिक विकास को बढावा देते हैं, जबकि चीन अभी भी प्रयत्न कर रहा है राजनैतिक सुधार लाने का।
मेरा मानना है कि राजनैतिक व्यवस्था कि दुरुस्ती चीन के लिये अनिवार्य है यदि उसे विकास करते रहना है। और ये राजनैतिक बदलाव अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, आर्थिक विकास के फ़ायदे को बराबर सबमें बाँटने के लिये। मैं नहीं जानता कि ऐसा होगा या नहीं, मगर मैं आशावादी हूँ। मेरी आशा है, कि पाँच साल बाद मैं, टेड ग्लोबल सेमिनार में कहूँगा कि चीन में राजनैतिक बदलाव ज़रूर आयेगा।
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अर्थशास्त्री याशेंग हुआंग चीन और भारत की तुलना करते हैं, और पूछते हैं कि चीन के सत्तावादी अधिकारपूर्ण शासन ने उनकी अद्वितीय आर्थिक बढत में कैसे योगदान दिया --- और फ़िर एक बडे सवाल तक आते हैं : क्या प्रजातंत्र भारत का अभिशाप है? हुआंग का जवाब आपको चौंका सकता है।
Yasheng Huang asks us to rethink our ideas about China and other large emerging economies. Lately he’s been asking, Does democracy hinder or promote economic growth? Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Vatsala Shrivastava
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15:19 Posted: May 2009
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21:30 Posted: Jan 2011
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18:15 Posted: Oct 2010
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