नमस्कार! आज मैं आपके साथ एक प्रयोग के बारे में बातचीत करने आया हूँ । कि कैसे हम मनुष्य की एक गहन समस्या को जड से ख़त्म कर सकते हैं । ये प्रयोग वास्तव में डॉ. वेनकटस्वामी की कहानी है । उनके लक्ष्य और उनके संदेश को आज हम अरविन्द आई केयर के अवतार में साक्षात देख सकते हैं । मेरे हिसाब से सबसे पहले दृष्टिविहीनता को सही मायनों में समझना ज़रूरी है ।
स्त्री: जहाँ भी मैं काम माँगने गयी, लोगों ने मना कर दिया, एक अंधी औरत हमारे किस काम की ? सूई में धागा डालने जैसे काम तो दूर की बात थी, मैं तो अपने बाल की जूँ तक नहीं देख सकती थी । अगर मेरे भात (चावल) में चींटी गिर जाती, तो भी मुझे पता नहीं चल सकता था ।
तुलसीराज रविल्ला: नहीं देख पाना तो एक भीषण समस्या है ही, लेकिन अंधापन व्यक्ति से उसका रोज़गार, और यहाँ तक कि उसका स्वाभिमान तक छीन लेता है, ना उसकी अपनी कोई आज़ादी बचती है और ना ही उसके परिवार में उसका कोई महत्व । तो आपने देखा कि ये स्त्री उन लाखों लोगों में से एक है जो देख नहीं सकते । और विडम्बना ये है कि इसे इस दुःख को झेलने की कतई ज़रूरत नहीं है ।
एक साधारण-सी, कई सालों से चली आ रही शल्य-क्रिया से लाखों लोगों की दृष्टि वापस आ सकती है । और उससे भी साधारण तरीका, एक चश्मा, जाने कितने ही और लोगों को देखने लायक बना सकता है । अगर यहाँ बैठे लोगों के स्तर पर बात की जाय जो कि चश्मे के कारण कार्य-कुशल है, तो लगभग हर पाँच में से एक भारतीय को नेत्र-चिकित्सा की आवश्यकता है, लगभग २० करोड लोगों को । मौजूदा स्थिति ये है कि हम इनमें से १० प्रतिशत तक भी नहीं पहुँच सके हैं ।
अरविन्द की कहानी का यही संदर्भ है करीब ३० साल पहले डॉ. वी ने रिटायरमेंट (अवकाश-प्राप्ति) के बाद एक बीडा उठाया । उन्होनें बिना किसी पूँजी के शुरुवात की । उन्हें अपने जीवन की सारी बचत, सारी संपत्ति गिरवी रखनी पडी थी तब जा कर बैंक से लोन मिल पाया था । और धीरे-धीरे, हम पाँच अस्पतालों के समूह में विकसित हो गये, ज्यादातर, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में, और फिर, हमने विज़न सेंटरों को विकसित करना शुरु किया उप-अस्पतालों के रूप में । और अब हमनें अस्पतालों का प्रबंधन करना भी शुरु किया है, देश के दूसरे भागों में और देश के बाहर भी हमने अस्पतालों की स्थापना शुरु की है
पिछले तीन दशकों में हमने करीब ३५ लाख नेत्र ऑपरेशन किये हैं, उसमें से अधिकतर गरीब लोगों के लिये । आज हम हर साल लगभग ३ लाख ऑपरेशन करते हैं । किसी भी दिन औसतन हम लोग अरविन्द में एक हज़ार ऑपरेशन करते हैं । और लगभग ६ हज़ार मरीज़ देखते हैं, हम अपनी टीमों को गाँव-गाँव भेजते है, वहाँ से ज़रूरतमंद मरीज़ों को लाते हैं, कई बार दूर-संचार के माध्यम से भी इलाज करते हैं, और इस सब को कर पाने के लिये, बडे पैमाने पर प्रशिक्षण भी देते हैं । उन डाक्टरों और तकनीशियनों को, जो कि आगे चल कर अरविन्द के कार्यकर्ता बनते हैं ।
और फिर, हम यही काम दिन-रात, रात-दिन, बारम्बार करते जाते हैं, और बेहतर करते जाते हैं, इसके लिये बहुत तगडे मनोबल और कमरतोड मेहनत करने की ज़रूरत होती है मै ये मानता हूँ कि ये सब संभव है उस नींव की बदौलत जो डॉ. वी ने रखी कुछ अडिग मौलिक सिद्धान्त, एक सुचारु व्यवस्था-क्रम और कुछ नया करने की संस्कृति
डॉ. वी: मैं गाँव-देश के आम लोगों के साथ बहुत उठा-बैठा हूँ क्योंकि मैं ख़ुद भी एक ग्रामीण ही हूँ और अचानक ऐसा लगता है जैसे आप इस व्यक्ति की अंतरात्मा से जुड रहे हों, आप उसके साथ मिल कर एक हो रहे हों। उस आम आदमी की आत्मा में विश्वास की सादगी भरी होती है । डाक्टर, जो भी आप कहेंगे, मैं करने को तैयार हूँ । मैं आप में अपना पूर्ण विश्वास रखता हूँ और आप उस विश्वास को किसी भी हालत में तोड नहीं सकते । मेरे सामने एक बूढी औरत है जिसे मुझमें संपूर्ण विश्वास है, मेरा कर्तव्य है कि मैं पूरी कोशिश करूँ । जब हम आत्मा को चेतन करते हैं, हम सारे संसार को स्वयं का हिस्सा समझने लगते हैं, इसलिये लेन-देन का सवाल ही नहीं उठता । हम तो स्वयं अपनी ही मदद कर रहे होते हैं । हम तो स्वयं अपना ही इलाज कर रहे होते हैं ।
इन विचारधारा से प्रेरित होकर हमें पूर्णतः रोगी-केंद्रित और आदर्श संस्था बनाई और वो सारे प्रबंध किये जिनकी ज़रूरत थी मगर... ऐसी संस्था चलाने के लिये आपको सर्वोत्तम सेवा सुचारु रूप से देनी पडती है, और अजीब लगेगा पर मुझे इसकी प्रेरणा मक्डोनॉल्डस् से मिली ।
डॉ. वी: देखिये, मक्डोनॉल्डस् का सिद्धान्त साधारण सा है । उन्हें लगता है कि वो दुनिया भर के लोगों को प्रशिक्षण दे सकते हैं, अलग-अलग धर्मों, संस्कृतियों वगैरह वगैरह के बावजूद, अपने व्यंजनों को उसी ख़ास तरह से तैयार करने का और उसी ख़ास तरह से प्रस्तुत करने का वो भी सैकडों अलग अलग जगहों पर।
लैरी ब्रिलियन्ट: वो हमेशा मक्डोनल्ड और हैम-बर्गर की बात करते रहते थे, और हमें कुछ भी समझ नहीं आता था । वो उप-संस्थानो का निर्माण करना चाहते थे, आँखों के इलाज को मुहैया करने का प्रबंध मक्डोनॉल्डस् जितनी सुचारू व्यवस्था से ।
डॉ. वी.: मान लीजिये मैं आँखों के इलाज का एक अदद तरीका निकाल लूँ, सारी तकनीकें, सारी कार्यप्रणालियाँ, बिलकुल एक सी, और उसे बंद-डिब्बा रूप में दुनिया के हर कोने में पहुँचा सकूँ । अँधेपन की समस्या हो गयी गायब, चुटकी बजाते ही ।
टी.आर. : यदि आप बारीकी से सोचें, तो आँखों की पुतली एक सी ही होती है, चाहे अमरीकन हो या फिर अफ़्रीकन, समस्या भी एक सी है, इलाज भी एक सा हो सकता है । तो फिरे कोई वजह नहीं कि गुणवत्ता और सेवा में इतना ज्यादा फर्क हो, और हमने यही मूल सिद्धान्त अपनाया जब हमने सेवाओं पद्धति का विकास किया । और सच है कि ये एक बहुत विशाल चुनौती थी, हम करोंडों लोगों की बात कर रहे हैं, बहुत ही कम संसाधनों के ज़रिये, और तंगी व प्रचालन की समस्याओं के एक पूरे पहाड के ख़िलाफ़ ।
और फिर लगातार हमें नई से नई जुगाड लगानी होती थी। हमने शुरु में ही एक ज़बरदस्त युक्ति निकाली, जो कि आज भी प्रयोग में है, हमने समस्या का हल निकालने का ज़िम्मा पूरे समुदाय पर डाल दिया, और उसके बाद उन्हें बाकयदा एक हिस्सेदार के रूप में शामिल किया और ये ऐसा ही एक आयोजन है, ये एक सामुदायिक शिविर है जो सबने मिल कर लगाया है, जहाँ उन्होनें ही जगह ढूँढी, उन्होंने ही स्वयं-सेवियों को बुलाया और फिरे हमने अपना योगदान दिया जो था - उनकी नज़रों की जाँच, फिर डॉक्टर पता लगाते है कि आखिर समस्या क्या है फिर आगे की प्रक्रिया का निर्धारण, और फ़िर उस प्रक्रिया का उन तकनीशियनों द्वारा निर्वाह जो कि चश्में के लिये पडताल करते हैं, या फिर काँचबिन्दु (ग्लूकोमा) के लिये जाँच करते है ।
और अंततः, सारी जाँचों के नतीज़े के आधार पर डॉक्टर निर्णय ले कर इलाज का निर्णायक तरीका सुझाते हैं, यदि किसी को चश्मे की ज़रूरत है, तो उसे शिविर में ही तुरंत चश्मा दिया जाता है, हालांकि ये सब ज्यादातर एक पेड के नीचे ही होता है, तब भी, उन्हें चश्में का ढाँचा उनकी रुचि के अनुसार ही दिया जाता है, ये बहुत ज़रूरी है क्योंकि मुझे लगता है कि चश्मा, लोगों को आँखों की रोशनी देने के अलावा, रोज़मर्रा की सज-धज का महत्वपूर्ण अंग भी है, और लोग इसके लिये खर्च करते हैं । उन्हें करीब बीस मिनट में चश्मा पूरी तरह तैयार हो कर मिल जाता है और जिन्हें शल्य-चिकित्सा की आवश्यकता होती है, उन्हें चिकित्सीय सलाह दी जाती है, बगल में ही बसें लगी होती हैं, जो कि रोगियों को मुख्य अस्पताल तक ले जाने के लिये तैयार होती हैं ।
खरी बात ये है कि यदि इस हद तक सेवा उपलब्ध न हो, तो इनमें से बहुत से लोगों कभी भी चिकित्सा नहीं पा पायेंगे, सही वक्त पर तो बिलकुल भी नहीं । शल्य चिकित्सा भी सलाह देने के ठीक दूसरे दिन ही दी जाती है, उसके बाद उन्हें एक दो दिन तक देखभाल के लिये रोका जाता है, फिर उन्हीं बसों से वापस भेज दिया जाता है, जहाँ से वो आये थे, और जहाँ उनके परिवारजन बेसब्री से उन्हें वापस ले जाने के इन्तज़ार में होते हैं ।
और ये पूरी प्रक्रिया साल मे कई हज़ार बाद होती है । आप सब हर्षित होंगे कि हम बहुत रोगियों का इलाज कर रहें हैं, हमारी कार्यप्रणाली अत्यंत सुचारु है, पर हमने सोचा कि क्या हम वास्तव में समस्या हल कर पा रहे हैं ? हमने एक अध्ययन किया - वैज्ञानिक पद्धति से, और हमें बहुत आश्चर्य हुआ जब हमें ये पता चला कि हम सिर्फ़ सात प्रतिशत ज़रूरतमंदों तक ही पहुँच रहे थे, और लिहाज़ा, हम समस्या को उसकी विशालता के अनुरूप हल नहीं कर रहे थे ।
जाहिर था कि हमें कुछ अलग और नया करना पडा, तो हमने प्राथमिक नेत्र चिकित्सा केन्द्र, दृष्टि केंद्र खोले। ये सच में क़ागज़-रहित कार्यालय हैं पूर्णतः इलैक्ट्रानिक दस्तावेज़ वगैरह । इनके द्वारा व्यापक नेत्र जाँच उपलब्ध होती है । हमने एक तरह से साधारण डिजिटल कैमरे को आँख के अंदर झाँकने के यंत्र में बदल डाला, इस तरह हर रोगी को नेत्र-विशेषज्ञ से सीधे जोडा जा सका।
इसका असर ये हुआ, कि पहले ही साल में, हम सात से चालीस प्रतिशत ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँच पाने में सक्षम हो गये, जो कि पचास हज़ार लोगों से भी ज्यादा का समुदाय है। और दूसरे साल में, हम पचहत्तर प्रतिशत तक पहुँच गये । तो मैं समझता हूँ कि हमने ऐसी प्रक्रिया बना ली है जिससे हम विशाल स्तर पर हर एक ज़रूरतमंद तक पहुँच सकते है, यही नहीं, इस तकनीक के प्रयोग से हम ये भी सुनिश्चित करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को अस्पताल आने के ज़रूरत न पडे ।
और इसके लिये उन्हें कितने पैसे देने होंगे ? हमने एक दाम पक्का किया, ये देखा कि वो शहर ना आने से कितने पैसे बचा रहे है, तो वो हमें देते हैं कुल बीस रुपये, और इसके बदले में तीन बार डॉक्टरों से मिल सकते हैं ।
एक और चुनौती थी, कि कैसे उच्च-तकनीकी सेवा और इलाज़ उपलब्ध करवाया जाय ? हमने एक वीसेट जडी वैन तैयार की, जिसके ज़रिये रोगी की तस्वीरें सीधे मुख्य अस्पताल को भेजी जाती हैं, जहाँ डॉक्टर जाँच करते हैं, और रोगी के देखते ही देखते, उसकी रिपोर्ट भी वापस वैन तक आ जाती है, प्रिंट हो जाती है, और रोगी को मिल भी जाती है, और विशेषज्ञ की सटीक सलाह उन्हें मिलती है, यानि, अभी तुरंत डॉक्टर से मिलिये, या फिर छः महीने बाद जाँच कराइये, और ये सब होता है नवीन तकनीक को आम जनता तक पहुँचा कर ।
इसक एक असर ये भी है कि जरूरतमंदों की संख्या भी बढी है, इस तकनीक ने कई लोगों को चिकित्सा की आवश्यकता के प्रति जागरुक किया है, और यही नहीं, चिकित्सा को उन तक पहुँचाया भी है, इस तरह से हम सार्थक विस्तार भी कर रहे हैं ।
इस सबका दूसरा पहलू ये है कि ये सब सुचारु रूप से कैसे चलाया जाय जबकि आपके पास केवल मुट्ठी भर नेत्र-विशेषज्ञ हैं ? इस वीडियो में आप शल्य-चिकित्सा होते देख रहे हैं और दूसरी तरफ आप देखेंगे कि एक और रोगी तैयार हो रहा है । जैसे ही ये क्रिया समाप्त होगी, सूक्ष्म-दर्शी को उस तरफ घुमा दिया जाएगा, मेज़ों को परस्पर सही दूरी पर टिकाया गया है, हमें इस हद तक सोचना होता है क्योंकि केवल इस तरह से सोच कर ही, हम एक शल्य-चिकित्सक की औसत क्षमता को चौगुने से भी ज्यादा बढा सकते हैं ।
लेकिन इस रफ़्तार पर काम कर रहे चिकित्सक के लिये एक टीम की ज़रूरत होती है । इसलिये हमनें ग्रामीण लडकियों को प्रशिक्षित किया, और अब वो ही हमारी संस्था की रीढ बन चुकी हैं । वो सारे के सारे कौशल-आधारित नित्य कर्म करने में सक्षम हैं । एक बार में एक कार्य करती हैं, और सर्वोच्च गुणवत्ता के साथ । नतीजा ये होता है कि हमारी उत्पादक्ता बहुत बढ जाती है, सर्वोच्च गुण्वत्ता, सबसे कम लागत पर । तो, कुल मिला कर, होता ये है कि हमारे कर्मचारियों की उत्पादक्ता विश्व-स्तर पर सर्वोच्च है ।
ये बहुत ही व्यस्त मेज़ है, मगर इसका संदेश ये है कि जब बात गुणवत्ता की आती है, हम बहुत ही उच्च-स्तर की गारंटी देते हैं । इसलिये, हम यूनाइटेड किन्गडम् जैसे देशों के मुकाबले भी बहुत कम ही केसों में पेचीदा स्थितियों का सामना करते है, ऐसे नतीज़े आपको बहुत कम देखने को मिलेंगे ।
अब आते हैं पहेली के आखिरी हिस्से पर, इस सब को आर्थिक रूप से संभव कैसे बनाया जाय, ख़ासतौर पर तब, जब कि लोग पैसे देने में सक्षम हैं ही नहीं ? तो हमने अपनी सुविधाओ मे से ज्यादातर को मुफ़्त ही बाँटा, और जिन्होंने हमें पैसे दिये भी, उन्होंने बाजार के दामों पर ही दिये, न ज्यादा, और न ही कम, और बाज़ार कभी भी हमसे उत्पादक्ता में मुकाबला नहीं कर पाये । शायद हमारी सफ़लता की कुंची यही है, आज भी । असल में, आपके पास जो फालतू पडा है, उसे बाँटने के लिये एक खास मानसिकता की ज़रूरत होती है ।
परिणाम ये है कि साल दर साल, जहाँ हमारा खर्च दिन दूना रात चौगुना बढा है, वहीं हमारी आमदनी उससे भी ज्यादा रफ़तार से बढी है, जिससे हमें एक अच्छा मुआवज़ा मिला है जबकि हम तमाम लोगों का मुफ़्त इलाज़ भी कर रहे हैं । मैं मोटा मोटा हिसाब बताता हूँ, पिछ्ले साल, हमने करीब दो करोड डॉलर की आमदनी की, और खर्च करीब डेढ करोड का, मतलब चालीस प्रतिशत मुनाफ़ा
मगर असली मुद्दा इस सब के आगे है कि हमने क्या करते हैं, या हमने अब तक क्या किया है, यदि हमें इस अंधेपन की समस्या को जड से उखाड फेंकना है । हमने जो किया वो सामन्य समझदारी भरी सोच से बिल्कुल परे है । हमने खुद अपने लिये चुनौतियाँ खडी कीं, और नेत्र-चिकित्सा को सबकी पहुँच के भीतर लाये कम-खर्च में पाये जा सकने वाली तकनीक ईज़ाद कर के हमने ज़ोर-शोर से पर एक व्यवस्थित अंदाज में इन तकनीकों को भारत के कई एक अस्पतालों में लागू किया और भारत के बाहर भी । तकनीक को सबके साथ बाँटने से हुआ ये कि हमारे साथ काम करने के दूसरे ही साल में, अस्पतालों की क्षमता दुगुनी हो गयी, और आर्थिक रूप से भी वो सक्षम हो गये ।
अलावा इसके, एक समस्या है तकनीक की कीमत में वृद्धि की? एक समय था कि हम लाख चाहने पर भी कृत्रिम लेंस को कम कीमत पर उपलब्ध नहीं करवा पाये, तो हमने उन्हें खुद ही बनाने की ठान ली । और फिर, धीरे-धीरे, हम उनकी कीमत को कम करने में समर्थ हो गये हम ने उसकी कीमत को पहले के मुकाबले पचास गुना कम कर डाला । आज हम विश्व भर की माँग के सात प्रतिशत की आपूर्ति अकेले ही करते हैं, और हमारे लेंस एक सौ बीस से ज्यादा देशों में इस्तेमाल होते हैं ।
पर जो हम करते हैं, उसका कोई स्तर भी है, या केवल विकासशील देशों या भारत में ही हम तीसमारखाँ बने फिरते हैं ? तो हमने अरविन्द और यूके का एक तुलनात्मक अध्ययन किया । हमें ये पता लगा कि हम यूके का लगभग साठ प्रतिशत काम अकेले ही कर लेते हैं, पूरा यूके लगभग पाँच लाख शल्य-क्रियाएँ करता है । और हम करीब तीन लाख । इसके ऊपर हम हर साल करीब पचास नेत्र-विशेषज्ञों को प्रशिक्षित भी करते हैं जबकि पूरे यूके में सत्तर ऐसे विशेषज्ञ प्रशिक्षित होते हैं, और हमारी गुणवत्ता कहीं से भी कम नहीं है - न ही प्रशिक्षण में, न ही सेवा में । तो हम ठीक ही तुलना कर रहे हैं । फिर हमने लागत की तुलना की । खिलखिलाहट
इस हिसाब से मेरा मत है कि ये कहना कि ये सब भारत में है, इसलिये सँभव है, गलत है । बात इस से आगे भी है । कई पहलुओ पर विमर्श की ज़रूरत है । हो सकता है कि -- बढती कीमतों का जवाब उच्चतम उत्पादक्ता में हो सकता है, या कि सुचारु कार्यप्रणाली में, या फ़िर पद्धति के पालन में, या फिर रोगी लेंस के लिये या और सुविधाओं के लिये कितना दाम दे रहे हैं, या फिर, बेहतर कानूनों मे, या रक्षात्मक कार्यप्रणालियों में इस समस्या को यदि सुलझा लिया जाय तो विकसित देशों को भी कई हल मिल सकते हैं यू.एस, और शायद ओबामा को लोग दोबारा चाहने लगें ।
मैं आपको मंथन के लिये एक और विचार देना चाहता हूँ , जब समस्या गहन और विशाल हो, और सारे आर्थिक स्तरों के लोग उससे जूझ रहे हों, तो एक हल मिल सकता है, मेरे ख्याल से जो पद्धति मैनें बताई है, जैसे कि, उत्पादक्ता, गुणवत्ता, रोगी-केन्द्रित सेवा, वो इसका हल बन सकती है, और कई समस्याएँ हैं जिन पर ये पद्धति लागू हो सकती है । दँत चिकित्सा या श्रवण समस्या, या फिर जच्चा-बच्चा इत्यादि अनेकों समस्याओं का हल इस पद्धति में छुपा बैठा है, पर मुझे लगता है कि इस पद्धति की सबसे बडी कठिनाई है भावनाओं से जुडी हुई
आप करुणा की भावना कैसे पैदा करेंगे ? कैसे आप लोगों से दूसरों की समस्याओं को अपनाने की बात कहेंगे, कैसे आप उन्हें कुछ करने के लिये प्रेरित करेंगे ? ये बहुत गहन मसले हैं । और मुझे विश्वास है कि यहाँ बैठे लोगों में हल निकालने की काबलियत है ।
मैं अपनी बातचीत का अंत इसी विचार के साथ करता हूँ और आपको चुनौती देता हूँ ।
डॉ. वी. : जब आप आत्म चेतना के रास्ते पर बढते है, आप पूरे संसार को अपना परिवार मानने लगते है इसलिये लेन-देन का सवाल ही नहीं उठता । हम तो स्वयं अपनी ही मदद कर रहे होते हैं । हम तो स्वयं अपना ही इलाज कर रहे होते हैं ।
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भारत के अरविन्द आई केयर सिस्टम ने नेत्र चिकित्सा की दुनिया में क्रान्ति का संचार किया है - अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नेत्र चिकित्सा को आम आदमी की जेब की पहुँच के भीतर ला पाना एक ऐसी मुहिम है जिसने न सिर्फ़ लाखों को दृष्टि का उपहार ही दिया है बल्कि हमें सेवा के प्रति अपने दृष्टिकोण पर दोबारा विमर्श करने पर मज़बूर भी कर दिया है ।
Thulasiraj Ravilla is the executive director of the Lions Aravind Institute of Community Ophthalmology, helping eye-care hospitals around the world build capacity to prevent blindness. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Anshul Tyagi
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25:50 Posted: Jul 2006
Views 223,998 | Comments 43
03:18 Posted: Dec 2006
Views 683,720 | Comments 122
22:18 Posted: Oct 2007
Views 522,031 | Comments 198
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