एक भारतीय के नाते, और अब एक राजनीतिज्ञ और भारत सरकार में मंत्री के नाते मैं चिंतित हु, उस प्रचार से जो हम हमारे देश के बारे में सुन रहे है, भारत के विश्व-अग्रणी होने की बातें, यहाँ तक की अगले महाशक्ति होने की बातें भी. यहाँ तक की, मेरी किताब के अमरीकन प्रकाशकों ने, "द एलिफंट , द टाइगर एंड द सेलफोन," ( शशि थरूर की किताब का नाम "The Elephant, The Tiger and the Cellphone,") को एक एच्छिक उपशीर्षक दे दिया की- "भारत: इक्कीसवी सदी की महाशक्ति." और मुझे नहीं लगता की भारत इन सभी के बारे में है, या फिर इन सभी के बारे में होना चाहिए.
दरअसल, मुझे चिंता दुनिया के नेतृत्व वाली धारणा के बारे में हैं, यह बात मुझे बहुत ही प्राचीन प्रतीत होती है. इन बातो में मुझे जेम्स बोंड की फिल्म और किपलिंग के गीतों की सुगंध आती है. आखिर, ये "विश्व का नेता" बना कैसे जाता है? अगर जनसँख्या से, हम शीर्ष पर पहुचने के मार्ग पर ही है. हम चीन की २०३४ तक पीछे छोड़ देंगे. क्या सेन्य शक्ति से? फिर हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेना है. क्या परमाणु क्षमता से? हमे मालुम है की वह हमारे पास है. अमरीका ने इसे मान्यता भी दी है, एक समझोते में. क्या अर्थव्यवस्था से? अब हम दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, 'क्रय शक्ति समानता' के संदर्भ में. और हम आगे बढ़ते जा रहे है. जब पूरी दुनिया पिछले साल मात खा गयी थी, हार गयी थी, हम ६.७ प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ रहे थे.
लेकिन, फिर भी, यह सब बातें मुझे कुछ समझ में नहीं आई, की क्या वास्तव में भारत, दुनिया को यह सब योगदान देने का लक्ष्य रखेगा, इक्कीसवी सदी के इस भाग में. और मैं आश्चर्य करता हु की, भारत के लिए भविष्य में क्या कुछ है, इन सभी का एक संयोजन, साथ में और भी बहुत सारी बातो का मेल, जैसे की, भारतीय संस्कृति का आकर्षण, दूसरे शब्दों में, " नर्म शक्ति".
नर्म शक्ति की संकल्पना 'हार्वर्ड' के एक पंडित जोसेफ न्ये, जो की मेरे मित्र भी है, ने करी थी. और, बड़ी ही सरलता से, मैं उसे सारांशित कर रहा हु क्योकि, समय की थोड़ी पाबंदी है, यह एक देश की क्षमता होती है, दूसरो को अपनी ओर आकर्षित करने की, अपनी संस्कृति से, अपने राजनीतिक मूल्यों से, अपनी विदेश नीतियों से. और, जैसा की आप जानते ही है की काफी देश ऐसा करते है. वे पहले अमरीका के बारे में लिख रहे थे, लेकिन हमे फ़्रांसिसी गठबंधन ("Alliance Francais") के बारे में पता है की वह सिर्फ फ़्रांसिसी 'नर्म शक्ति' और अंग्रेजी परिषद् के बारे में है, 'बीजिंग ओलिम्पिक्स' चीनि 'नर्म शक्ति' के बारे में था. अमरीकनों के पास 'अमरीका की आवाज़'(Voice of America) और 'फुल्ब्राईट छात्रवृत्ति'(Fulbright Scholarships) है. लेकिन, वास्तव में जो तथ्य है, वह यह है की, हौलीवूड (Hollywood ) और एमटीवि (MTV) और मक्दोनाल्ड (McDonalds) अमरीकी 'नर्म शक्ति' के लिए, सरकार के दुनिया भर में किये गए किसी भी कार्य से बहुत ज्यादा ही किया है.
इसलिए 'नर्म शक्ति' उभरती है, आंशिक रूप से सरकार की वजह से, लेकिन बाकी आंशिक तौर से बिना सरकार के. और इस सूचना के युग में जिसमे हम रहते है, हम इसे टेड(TED) युग भी कह सकते है. मैं कहना चाहता हु की देशो को आंका जा रहा है, एक वैश्विक जनता के द्वारा जिन्हें निरंतर खुराक दी जा रही है, इन्टरनेट से समाचार की, दूरदर्शन से चित्रों की, मोबाईल से विडियो की, ईमेल से बातचीत की, दुसरे शब्दों में, सभी तरह के सन्देश वाहक yantra, हमे दुनिया भर के देशो की कहानिया बता रहे है, सम्बंधित देश उन कहानियो को बताना चाहे या न चाहे तो भी.
अब, इस युग में, जिन देशो के पास विभिन्न सूचना के संसाधनों तक पहुच है, उन्हें एक विशेष लाभ है. और अवश्य ही उनका ज्यादा प्रभाव है, और जैसा की देखा गया है की भारत में समाचार चैनल बाकि सभी देशो से ज्यादा है, यहाँ तक की विश्व के इस हिस्से के सभी देशो के समाचार चनेलो को जोड़ कर भी उनसे ज्यादा.
लेकिन, तथ्य यह है की सिर्फ यह ही नहीं है. 'नर्म शक्ति' के लिए चाहिए की आप सभी से जुड़े रहे. कुछ लोग यह दावा कर सकते है की भारत आश्चर्यजनक रूप से एक जुदा हुआ देश बन रहा है. मुझे लगता है की आपने सभी आंकड़े सुन ही लिए होंगे. हमारे यहाँ एक महीने में १.५ करोड़ मोबाईल बिक रहे है. फिलहाल ५०.९ करोड़ मोबाईल है, भातियो के हाथो में, भारत में. और यह हमें अमेरिका से बड़ा मोबाईल का बाज़ार बनती है. और एक बात, यह १.५ करोड़ मोबाईल सबसे ज्यादा है, किसी भी देश में, अमेरिका और चीन को मिला के, संचार के इतिहास में.
लेकिन आप में से कुछ लोगो यह एहसास नहीं होगा की में यहाँ आने के लिए कितनी दूर से आया हु. क्या आप जानते है, की जब में भारत में पल-भड रहा था, तब फोन भी दुर्लभ था. यहाँ तक की इतना दुर्लभ था की सांसदों को यह अधिकार था की वे १५ फोन की लाइन बाँट सकते थे, जिन्हें वे योग्य समझते थे. अगर आप भाग्यशाली होते की आप एक अमीर व्यवसायी है, या एक प्रभावशाली पत्रकार है, या एक चिकित्सक है, तो शायद आपके पास एक फोन होता. लेकिन वो भी एक जगह पड़ा रहता था.
में कलकत्ता के एक उच्च माध्यमिक विद्यालय में पढता था. और हम उस यन्त्र को देखते थे जो आगे पड़ा रहता था. और जब भी हम उसे उठाते, आधी बार, एक आशा भरी आँखे लिए, उसमे डायल टोन ही नहीं होती थी. अगर होती और आप नंबर डायल करते, तो तीन में से दो बार तो नंबर मिलता ही नहीं. यहाँ तक की "यह गलत नंबर है" ज्यादा सुनने को मिलता बजाये "हेल्लो" के. (हंसी) और अगर आप को किसी दुसरे शहर में बात करनी हो, मान लीजिये, कलकत्ता से दिल्ली, तो आपको "ट्रंक काल" आरक्षित करवानी पड़ती थी, और फिर फोन के आगे पुरे दिन आस लगे के बैठते की कब फोन आ जाये. या फिर आप आठ गुना दाम दे सकते थे, ' लाइटनिंग काल' के लिए. हमारे देश में तब बिजली(ligthning) भी धीरे ही गिरती थी. उस ' लाइटनिंग काल' के लिए भी हमे आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ता था.
यह इनती खस्ताहाल थी की, एक सांसद ने १९८४ में संसद में शिकायत भी कर थी. और तब के हमारे संचार मंत्री ने गर्वित लहजे में उत्तर दिया, की हमारे जैसे विकासशील देश में, संचार एक विलासिता है न की अधिकार, और यह की सरकार बेहतर सेवा देने का कोई दायित्व नहीं है, और अगर माननीय मंत्री महोदय अपने फोन से संतुष्ट नहीं है, तो वे अपना फोन लौटा दे, क्योकि वैसे ही यहाँ पे आठ साल की प्रतीक्षा सूची है भारत में फोन के लिए.
अब वापस आज में आते हुए आप देखते है की, देश में एक महीने में १.५ करोड़ मोबाईल. परन्तु, जो सबसे ज्यादा चोकाने वाली बात है, वह यह है की उन मोबाईल को कोन इस्तेमाल कर रहे है. क्या आप जानते है की अगर आप दिल्ली के किसी उपनगर में अपने मित्र से मिलने जाते है, तो सड़क के किनारे आप एक ठेले वाले को पाएंगे, जिसे देखने पर ऐसा लगेगा की वह सोहल्वी सदी के लिए बना है, वह एक कोयले की इस्त्री चलाता है, जिसका शायद अट्ठार्वी सदी में आविष्कार हुआ होगा, उसे इस्त्रिवाला पुकारा जाता है. लेकिन वह एक इक्कीसवी सदी का यन्त्र रखता है. उसके पास मोबाईल है, क्योकि आने वाली कॉल मुफ्त है, और इसी तरह वो अडोस-पड़ोस से कार्य लेता है, की कहा से कपडे इस्त्री के लिए उठाने है.
कुछ दिनों पहले मैं केरल गया हुआ था, मेरे गाँव, एक दोस्त के खेतों me, जिसके २० किलोमीटर तक आस पास कोई शहर जैसा कुछ नहीं है, और उस दिन काफी गर्मी थी, मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा, "क्या तुम ताज़ा नारियल पानी पीना चाहोगे?" वह सबसे अच्छी चीज़ है और सबसे ज्यादा पौष्टिक और तरोताज़ा करने वाली चीज़ जो आप पी सकते है जर्मी के उन दिनों में, इसलिए मैंने हाँ कर di. और उसने बिना देर किये अपना मोबाइल निकाला, और नंबर मिलाया, और आवाज़ आई,"मैं यहाँ ऊपर हूँ." और एक पास के नारियल पेड़ के ऊपर, एक हाथ में दरांती और दुसरे में मोबाईल पकडे हुए , एक स्थानीय ताड़ी था, जो हमें नारियल देने के लिए नीचे आने लगा.
मछुँरे समुद्र में जा रहे है और अपने मोबाईल भी साथ लिए जा रहे है. जब वे मछलिया पकड़ लेते है तो वे तटीय बाजारों में फोन कर लेते है, पता करने के लिए की किधर उन्हें सबसे सही कीमत मिलेगी. किसान , जो की आधा दिन कड़ी कमर तोड़ मेहनत में निकाल देते थे, यह जानने में की कस्बे का बाज़ार खुला है की नहीं, की बाज़ार चालु है या नहीं, की जो फसल उन्होंने काटी है वह बिकेगी या नहीं, उनकी कीमत क्या होगी. वे कई बार एक आठ साल के बच्चे को ऊबड़-खाबड़ रस्ते पर बाज़ार भेज देते थे, यही सब जानकारी के लिए, उसके बाद ही वो अपनी गाडी में सामान रखते थे. आज वे यही आधे दिन का काम दो मिनट में ही मोबाईल से कर लेते है.
यह नीचली वर्गों का सशक्तिकरण भारत के संपर्क में रहने की वजह से हुआ है. और यह परिवर्तन केवल उसका हिस्सा है जहाँ भारत जा रहा है. लेकिन, बेशक भारत में सिर्फ एक यही चीज़ नहीं है जो तेज़ी से फल-फूल रही है. आपके पास फिर बॉलीवुड है. मेरा बॉलीवुड की तरफ दृष्टिकोण बहुत सारांशित है दो बकरियों की एक कहानी बॉलीवुड के कचरे के ढेर में, शेखर कपूर को यह मालूम है, माफ़ करिएगा, और वे बॉलीवुड की किसी भवन से फेंके हुए सल्लुलोइड के डिब्बे खा रहे थे, और पहली बकरी खाते हुए बोलती है,"तुम्हे पता है, ये फिल्म उतनी बुरी नहीं है." और इस पर दूसरी बकरी जवाब देती है, " नहीं, किताब ज्यादा अच्छी थी." (हंसी)
मैं ज्यादातर यही सोचता हु की किताब ही बेहतर होती है, लेकिन, यह कहने के बाद, यथार्थ यही है की बॉलीवुड अब अपने साथ एक भारतीयता और भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में ले जा रहा है, सिर्फ अमेरिका और ब्रिटेन के प्रवासी भारतीयों मैं ही नहीं, बल्कि अरब और अफ्रीका के पर्दों पर भी, सेनेगल और सीरिया के भी. में एक युवा लड़के से न्यू योर्क में मिला, जिनकी अनपढ़ माँ सेनेगल के एक जांव में रहती थी, वे महीने में एक बार बस लेती थी, डकर शहर जाने के लिए, एक ओल्ल्य्वूद की फिल्म देखने के लिए. वें संवाद नहीं समझ पाती थी. और वें अनपढ़ थी, तो फ़्रांसिसी उपशीर्षक भी नहीं पढ़ सकती थी. परन्तु, यह फ़िल्में ऐसी बाधाओं के बावजूद भी समझी जा सकती है, और उन्हें गाने, नृत्य एवं लड़ाई देख कर बहुत मज़ा आता tha, और वे अपनी आँखों में भारत की चकाचोंध ले कर वापस जाती थी.
यह सब और भी ज्यादा हो रहा है. अफगानिस्तान में हमे पता है की सुरक्षा एक बहुत बड़ा मसला है. अफगानिस्तान हम में से बहुत लोगो के लिए है. भारत का वह कोई सेन्य अभियान चालु नहीं है. क्या आप जानते है की अफगानिस्तान में पिछले सां सालों में भारत की सबसे बड़ी संपत्ति क्या थी? एक बहुत ही छोटा सा तथ्य: आप अफगान में शाम ८:३० बजे फोन नहीं कर सकते the. क्यों? क्योकि यह वो समय था जब एक भारतीय दूरदर्शन नाटक, " क्योकि सास भी कभी बहु थी", का "धुर्री" रूपांतर, "तोदो टी.वि." पर प्रस्तुत किया जाता था. और वह अफगान के इतिहास का सबसे लोकप्रिय नाटक था. अफगान का हर एक परिवार इसे देखना चाहता था. उन्हें ८:३० के कार्यक्रम स्थगित करने पड़ते थे. शादियाँ भी बाधित हो जाती थी ताकि मेहमान टी.वि. के सामने इकठ्ठा हो कर उसे देख सके, और ताकि बाद में फिरसे अपना ध्यान दुल्हे दुल्हन पर केन्द्रित कर सकें. ८:३० बजे अपराध बढ़ गए. मेने एक 'रयूटर' की एक समाचार पढ़ा था-- यह एक भारत का प्रचार नहीं है, एक ब्रिटिश समाचार संसाधन-- की कैसे "मुससरी शरीफ" में चोरो ने एक गाडी को पूरा उघड दिया था, उसकी विंडशील्ड वाइपर, उसके पहिये के ढक्कन, उसके दर्पण, और जो कुछ भी हिलता हुआ उन्हें मिला, ८:३० बजे क्योकि चौकीदार वह नाटक देखने में व्यस्था थे नाकि अपने काम में. और उन्होंने विंडशील्ड पर लिख दिया, उस नाटक की नायिका के संधर्भ में, "तुलसी जिंदाबाद","तुलसी अमर रहे" (हंसी)
यह है "नर्म" शक्ति. और यही भारत विकसित कर रहा है "टेड"(TED) के "इ"(E) से: इनकी खुद की मनोरंजन उद्योग से. और यही सच है -- और उदहारण बताने के लिए समाया थोडा कम है, लेकिन यही सच है हमारे और हमारी नृत्यकला, हमारे कला, योग, और भारतीय खान-पान के बारे में भी. मतलब की, भारतीय भोजनालयों के प्रसार , जब मैं पहले बार विद्यार्थी के तौर पर विदेश गया था, सत्तर के दशक में, और मैं आज क्या देखता हु, आप यूरोप और अमेरिका के किसी माध्यम आकर के शहर में नहीं जाए, और वहा कोई भारतीय भोजनालय नहीं मिले. यह ज्यादा अच्छा है ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन आज ब्रिटेन में, एक उधाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में भारतीय भोजनालयों में, ज्यादा लोग काम करते है बजाये कोयलों की कादानो में, जहाज निर्माण और लोहे और इस्पात उद्योगों को मिलाकर भी. तो अब साम्राज्य जवाबी हमला कर सकता है. (तालियाँ)
लेकिन, भारत की भड़ती जागरूकता, आपके साथ और मेरे साथ और बाकी सबके साथ ऐसे ही, अफगानिस्तान की कहानियो के साथ, इस सूचना युग में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण आ रहा है, वह भावना की आज की यह दुनिया वह नहीं है जहाँ बड़ी सेना जीतती है, यह वो देश है जो एक प्रचलित बेहतर कहानी बताती है. और भारत है और रहेगा, मेरे विचार से, बेहतर कहानियो की धरती. छवियाँ बदल रही है. मेरा मतलब है की, फिरसे, अमेरिका जा कर, एक विद्यार्थी के तौर पर, सत्तर के दशक में, मुझे मालुम था की भारत की क्या तस्वीर है वहां, अगर कोई तस्वीर थी भी तो.
आज "सिलिकॉन वैली" के और दूरसे जगहों के लोग आई.आई.टी., भारतीय तकनिकी संसथान, के बारे में बात करते है, उसी तरह जिस तरह की वे एम्.आई.टी. के बारे में करते थे. इसके कई बार अनापेक्षित परिणाम होते है. ठीक है. मेरा एक दोस्त है, इतिहास पढ़ा हुआ, मेरी तरह, उसे स्कैफोल हवाईअड्डे पर रोका गया , एक हाँफते हुए यूरोपियन द्वारा, यह कह कर, "आप एक भारतीय हो, आप एक भारतीय हो! क्या आप मेरा लैपटॉप ठीक कर सकते है?" (हंसी )
हम उस छवि से आगे निकल चुके है जहा भारत को कीलों के बिस्तर पर सोये हुए फकीरों की धरती कहा जाता था, और सपेरो की रस्सी वाले जादू की, से उस छवि तक जहा भारत को गणितज्ञों की धरती, कंप्यूटर के जादूगरों की धरती, सोफ्टवेयरों के गुरुओं की धरती तक. लेकिन यह भी भारतीय कहानी को बदल रहा है. लेकिन, वहा और भी कुछ ठोस है. यह कहानी एक आधारभूत ढांचे पर खड़ी हैं, राजनितिक बहुवाद के. यह एक सभ्यता की कहानी है. क्योकि भारत सदियों एक खुला समाज रहा है. भारत ने सबको पनाह दी है, यहूदी, जो अपने मंदिरों के तबाह होने पर भाग खड़े हुए थे, पहले कसदियों द्वारा फिर रोमनों द्वारा.
यहाँ तक की यह भी कहा जाता है की देवदूत के शक करने पर, संत थोमस केरल के ही तट पर आये थे, मेरे जन्म भूमि, यही कही सन ५२ में, और उनका स्वागत एक यहूदी लड़की ने बांसूरी बजाते हुए किया था. और आज तक वे ही केवल एकमात्र यहूदी समुदाय है, यहूदियों के इतिहास में, जिन्होंने कभी, विरोध की एक घटना का भी सामना किया हो. (तालियाँ) यह है भारतीय कहानी. मुसलमान भी शांति से दक्षिण में आये, उत्तर के इतिहास से थोडा अलग. लेकिन, इन सभी धर्मो को भारत में अपनी जगह मिली है और भारत में इनका स्वागत किया गया है.
जैसा की आप को पता है, हमने इसी साल जश्न मनाया है, हमारे राष्ट्रीय आम चुनाव, मानव के इतिहास में लोकतान्त्रिक मताधिकार का सबसे बड़ा आयोजन. और अगला इससे भी बड़ा होगा, क्योकि हमारी जनसँख्या २ करोड़ सालन की रफ़्तार से भड रही है. लेकिन, यह भी सच है की पिछले चुनावो ने, पांच साल पहले, दुनियां के सामने एक अशाधारण धटना हुई, एक महिला के चुनाव जितने की, इटालियन मूल की और रोमन कैथोलिक में विश्वास वाली, सोनिया गाँधी, और उन्होंने एक सिख के अपनी जगह दे दी, मन मोहन सिंह, ताकि वे प्रधान मंत्री बन सके, एक मुस्लमान के हाथो से, राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, एक ऐसे देश में जहा ८१ प्रतिशत हिन्दू है. (तालिया)
यह है भारत, और बेशक इससे भी ज्यादा अचंभित करने वाला है क्योकि चार साल बाद हमने सरहना करी अमेरिका की, आधुनिक विश्व की सबसे प्राचीन लोकतंत्र की, जहा २२० सालो से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव होते रहे है, जिसने पिछले साल तक इतना समय लगा दिया, एक राष्ट्रपति या एक उप राष्ट्रपति चुनने में, जो गोरा नहीं था, न ही पुरुष था, और न ही isaai. तो शायद, -- माफ़ करिएगा, वो इसाई है, क्षमा चाहता हु-- और वह पुरुष है, परन्तु गोरे नहीं है. बाकी सभी ये तीनो थे. (हंसी) इनसे पहले के बाकी सभी ये तीनो थे, और यही बात मैं बताना चाहता हु. (हंसी)
लेकिन, मुद्दा यह है की जब लोग इस उदहारण की बात करते है, वे सिर्फ भारत के बारे में बात नहीं करते है, यह कोई मुद्दा नहीं है. क्योकि अंत में, उस चुनाव के परिणाम से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता. भारत स्वयं भारत ही बन रहा था. और अंत में, जैसा की मैं देख रहा हु, यह एक मुद्दे से ज्यादा बेहतर ही काम करता है. सरकार कहानिया सुननाने में अव्वल नहीं है. लेकिन, लोग समाज को उसी नज़र से देखते है जो की वह समाज है, और यह, जैसा की मैं सोचता हु, अंत में, अंतर लाएगा, आज के इस सूचना के युग में, इस "टेड" युग में.
तो भारत अब, जाती, धर्म और भाषा के राष्ट्रवाद से परे है, क्योकि हमारे यहाँ सभी जातिया, जो की मानव को ज्ञात है, है, वास्तव में, हमारे यहाँ वे सभी धर्म है जो जो की मानव को ज्ञात है, शिन्तो धर्म को छोड़ कर. यद्यपि उसमे में कही हिन्दू तत्त्व है. हमारे संविधान में २३ अधिकारिक भाषाओ को मान्यता प्राप्त है. और जिन लोगो ने यहाँ अपने पैसे दिए है, वे यह जान कर आश्चर्यचकित हो जायेंगे यह देख कर की, एक रूपए के नोट पर कितनी भाषाओ से उसका मूल्य लिखा गया है. हमारे पास यह सब कुछ है. हमारी भोगोलिक स्तिथि भी एक भांति की नहीं है. क्योकि यहाँ उपमहाद्वीप का प्राकृतिक भूगोल, पहाड़ो और समुद्र से तराशा हुआ, खंडित कर दिया गया, १९४७ के पाकिस्तान के बंटवारे की वजह से. वास्तविकता में, आप इस देश का नाम भी सिर्फ बोलने के इए नहीं बोल सकते. क्योकि यह नाम "इंडिया", इंडस नदी से लिया गया है, जोकि अब पाकिस्तान से होकर गुज़रती है.
लेकिन पूरा मुद्दा यह है की भारत एक कल्पना का राष्ट्रवाद है. यह एक कल्पना है सदा-सर्वदा-भूमि की, एक प्राचीन सभ्यता से उभरती हुई, इतिहास के योगदान से संगठित हुई वि, और इन सबसे ऊपर, बहुवाद लोकतंत्र से निरंतर स्थिर बनी रही. यह एक इक्कीसवी सदी की कहानी है, और एक प्राचीन कहानी भी हैं. और यह उस कल्पना का राष्ट्रीयकरण है जो कहता है की आप भिन्न भिन्न प्रकार की जाती, पंथ, रंग, संस्कृति, खान-पान, प्रथा एवं पहनावे को मानते है, औए फिर भी एक आम सहमति बना लेते है. और यह सहमती एक बहुत ही सरल सिद्धांत पर है, की भारत जैसे इस अनेकता के लोकतंत्र में आपको हमेशा एक ही बात पर सहमती नहीं बनानी पड़ती, जब तक आप उस नियम कायदे क़ानून मानते रहे की आप कैसे असहमति जताते है. यह भारत की सफलता की कहानी है, एक देश जिसके बारे में पंडित विद्वानों और पत्रकारों ने यह सोच लिया था की वह खंडित हो जायेगा, ५० व ६० के दशक में, लेकिन इन्होने इस बात पर सहमती बना ली की असहमति में भी कैसे जिया जाये.
अब यही वो भारत है जो इक्कीसवी सदी में उभर रहा है. और मैं यही कहना छह रहा था की, अगर भारत के बारे में कुछ उल्लासपूर्ण hai, तो वह ना तो सेन्य शक्ति है, न ही आर्थिक ताकत. और वो जो कुछ भी आवश्यक है, लेकिन हमारे पास अभी भी बहुत सारी समस्याएं है सुलझाने के लिए. किसी ने कहा था की हम अति दरिद्र है और अति शक्तिशाली भी. हम वास्तव में ये दोनों साथ में नहीं हो सकते. हमे अपनी दरिद्रता को हराना है. हमे अभी समाधान करने है विकास के हार्डवेयर का, बंदरगाहों का, सडकों का, हवाईअड्डो का, और सभी बुनियादी ढांचों एवं सुविधायों का, और विकास के सोफ्टवेयर का, मानव संसाधन का,एक आम आदमी की जरूरत का की वह दो वक्त की रोटी खा सके, अपने बच्चो को भेज सके एक अच्छे विद्यालय में, और एक ऐसी नौकरी की khwaish जो उन्हें जिंदगी में ऐसे अवसर दे सके की वे अपने आप को परिवर्तित कर सकें.
लेकिन, यह सब हो रहा है, यह एक महान रोमांचक यात्रा है इन सभी चुनौतियों पर काबू पाने की, उन वास्तविक चुनौतियों पर जिनका हम सभी दिखावा करते है की वे हैं ही नहीं. लेकिन, ये सब एक खुले समाज में हो रहा है, एक संपन्न और विविध और अनेकाताओ से भरी सभ्यता में, उसमे जिसने ढृढ़ निश्चय कर लिया है स्वतन्त्र होने का और लोगो की रचनात्मक बल को पूरा करने का. और इसलिए भारत 'टेड'(TED) में है, और इसीलिए 'टेड'(TED) भारत में है. बहुत बहुत धन्यवाद. (तालिया)
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शशि थरूर कहते है की- भारत तेज़ी से 'महाशक्ति' बनते जा रहा है, केवल व्यापार एवं राजनीती में ही नहीं, बल्कि "नर्म" शक्ति से, अपनी संस्कृति को विश्व से सम्मलित करने की क्षमता से, अपने खान-पान, संगीत, तकनीक एवं बॉलीवुड के द्वारा. वे तर्क देते है की लम्बे समय में सेन्य शक्ति उतनी मायने नहीं रखेंगी जितना उस देश की वह क्षमता जिससे वह दुनिया के दिल और दिमाग को प्रभावित कर सकें.
After a long career at the UN, and a parallel life as a novelist, Shashi Tharoor became a member of India's Parliament. He spent 10 months as India's Minister for External Affairs, building connections between India and the world. Full bio »
Translated into Hindi by aayush gadia
Reviewed by Anshul Tyagi
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05:37 Posted: Nov 2009
Views 248,880 | Comments 69
15:50 Posted: Nov 2009
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