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तो भई हाँ, मैं अख़बारों के लिए कार्टून बनाने वाला कार्टूनिस्ट हूँ. राजनैतिक विषयों पर कार्टून बनाने वाला कार्टूनिस्ट. मुझे पता नहीं, क्या आप लोगों ने इस चीज़ के बारे में सुना है - अख़बार? ये काग़ज़ पर लिखी हुई पढ़ने की चीज़ होती है. (ठहाका) ये आई-पौड से हल्की होती है. उससे कुछ सस्ती भी. जानते है लोग क्या कह रहे हैं? यही कि प्रिंट मीडिया मर रही है. कौन हैं जो ऎसा कह रहे हैं? भई, मीडिया. पर ये आप लोगों के लिए कोई नई ख़ब्रर नहीं है, है ना? आप तो यह ख़बर पहले ही पढ़ चुके हैं.
देवियों और सज्जनों, दुनिया आज छोटी हो गयी है. मानता हूँ, ये काफी घिसी पिटी बात है, पर ज़रा देखिए, देखिए कितनी छोटी, कितनी क्षुद्र हो गई है दुनिया. और आप को इसकी वजह तो पता ही है. इस सब का कारण है टेक्नोलाजी. जी हाँ. (हँसी) क्या इस कमरे में कोई कंप्युटर डिज़ाईनर है? हाँ तो, आप लोगों ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है. क्योंकि ट्रेक-पैड पहले गोल हुआ करते थे, एक सुंदर गोल सा आकार. जिसका कार्टून अच्छा बनता है. पर आप चप्टे, सपाट ट्रेक-पैडों का क्या बना पाएंगे, उन चौकोन सी चीज़ों का? एक कार्टूनिस्ट के तहत वो मेरे काम की नहीं. हाँ मैं जानता हूँ कि आज दुनिया सपाट हो गई है. सच्ची बात है. और ईंटरनेट दुनिया के हर कोने में पहुँच चुकि है, सबसे ग़रीब, सबसे बीह्ड़ इलाकों में भी. आज अफ़्रिका के हर जंगल में साईबर कैफे मिलेंगे. (ठहाका) वहाँ जाकर फ्रैप्पुचिनो (कॉफी) की माँग मत कर डालिएगा. तो हम डिजिटल विश्व के विभेद मिटाने में जुटे हैं. तृतीय विश्व बाकी जगत से जुड़ चुका है. हम जुड़ चुके हैं. अब आगे क्या होगा? तो, आपके पास ई-मेल है. हाँ. इंटरनेट ने हमें ताक़तवर बनाया है. इसने आपको ताक़त दी है, मुझे ताक़त दी है, और इसने कुछ और बंदों को भी ताक़त दे डाली है.
आपको पता है, ये आख़री दो कार्टून, इन्हे मैंनै हैनोई के एक कान्फेरेन्स में लाईव बनाया था. उन्हे इसकी आदत नहीं थी, कम्युनिस्ट 2.0 वियेतनाम में. (ठहाका) तो मैं एक बड़े से स्क्रीन पर लाईव कार्टून बना रहा था- जो अपने आप में एक सनसनी थी- और तभी ये शख़्स मेरे पास आया. वो मेरे और मेरी बनाई चित्रों की तस्वीरें खींच रहा था. मैंने सोचा,' वाह, ये कोई वियेतनामी फैन है.' और जब वो दूसरे दिन भी आया, मैंने सोचा, 'भई वाह, ये तो सच में कार्टून प्रेमी है.' तीसरे दिन आखिरकार मेरी समझ में आया, कि वो शख़्स दरअसल ड्युटि पर था. तो अब तक वियेतनामी पुलिस की फ़ाईलों में अपने स्केचों के साथ मुस्कुराते हुए मेरी कम से कम सौ तस्वीरें होंगी.
ये सच है, ईंटरनेट ने दुनिया बदल दी है. इसने संगीत उद्योग को हिला कर रख दिया है. इसने हमारे संगीत आस्वदन के तरीक़े भी बदल दिए हैं. जिन्होने वो समय देखा है, उन्हे याद होगा, कि एक समय हमें दुकानों तक जाना पड़ता था संगीत चुराने के लिए. (ठहाका) इंटरनेट ने ये भी बदल दिया है कि आपका भावी नियोक्ता आपके नौकरी के आवेदन को कैसे परखेगा. तो सतर्क रहिए अपने फेसबुक अकाउंट को लेकर. आपकी माँ भी आपसे यही कहती है, सावधान रहो. टेक्नोलोजी ने हमें आज़ाद कर दिया है. ये फ्री वाई-फाई है. हाँ, सचमुच में इसने हमें मुक्ति दिला दी है आफिस डेस्क से. ये आपकी ज़िन्दगी है. इसका लुत्फ उठाईए. (हंसी) संक्षेप में, टेक्नोलोजी ने, इंटरनेट ने, हमारी जीवन शैली बदल दी है. टेक-गुरु, जैसे कि ये व्यक्ति -- जिन्हे एक जर्मन मैगाज़ीन ने इक्कीसवी शताब्दी का दार्शनिक कहा है -- ये हमारे काम करने के तरीक़े तय कर दे रहे हैं. वो ये तय कर दे रहे हैं कि हम किस तरह चीज़ों का इस्तेमाल करेंगे. यहाँ तक कि ये हमारी इच्छाओं को भी तय कर दे रहे हैं. (हँसी) (तालियाँ) आपको अच्छा नहीं लगेगा. टेक्नोलोजी ने यँहा तक कि हमारे भगवान से संबंध भी बदल दिए हैं.
मुझे इसमें नहीं पड़्ना चाहिए. धर्म और राजनैतिक कार्टून, जैसा कि आपने सुना हि होगा, एक मुश्किल जोड़ी है, 2005 के उस दिन के बाद से, जब डेनमार्क के कुछ कार्टूनिस्टों ने ऎसे कार्टून बनाए, जिन पर प्रतिक्रिया पूरे विश्व भर में दिखी, विरोध प्रदर्शन, फतवा. इन चित्रों ने हिंसा भड़का दी. लोग मारे गए. कितनी दर्दनाक बात है. लोग कार्टूनों की वजह से मारे गए. मतलब- उस समय मुझे ऎसा लगा कि असल में कार्टूनों का इस्तेमाल दोनों ही पक्षों ने किया. सबसे पहले एक डैनिश अख़बार ने इनका इस्तेमाल किया, इस्लाम पर एक मुद्दा बनाने के लिए. एक डैनिश कार्टूनिस्ट ने मुझे बताया कि वो उन 24 लोगों में से था जिन्हे पयगम्बर का चित्र बनाने का काम मिला था. उनमें से 12 लोगों ने ये काम करने से मना कर दिया. ये बात आपको पता थी? उसने मुझसे कहा, ' मुझे क्या बनाना है, ये किसी और को मुझे बता देने की ज़रूरत नहीं. इस काम का यही नियम है.' इसके बाद उन कार्टूनों को दूसरी तरफ से उग्रवादियों और राजनीतिज्ञों ने इस्तेमाल किया. उनका इरादा विवाद खड़ा करने का था. बाकी किस्सा तो आप जानते ही हैं. हम जानते हैं कि कार्टूनों को हथियार भी बनाया जा सकता है. इतिहास गवाह है, कि नात्ज़ीयों ने भी यहूदियों के ख़िलाफ इनका इस्तेमाल किया. और अब हम यहाँ आ पहुँचे हैं. संयुक्त राष्ट्र में लगभग आधा विश्व जुटा पड़ा है धार्मिक आस्थाओं पर आक्रमण को दण्डनिय बनाने में -- वे इसे धर्म का अपमान कहते हैं-- वहीं बाकी विश्व ने इस मुद्दे पर बोलने की आज़ादी के पक्ष में मुहीम छेड़ रखी है. तो सभ्यताओं की जंग छिड़ चुकि है, कार्टूनों को लेकर? इस बात ने मुझे सोच में डाल दिया. अब आप मुझे सोचता हुआ देख सकते हैं मेरी किचन टेबिल पर. और चूंकि आप मेरे किचन में हैं, मेरी बीवी से मिलिए.
इसके कुछ महीनों बाद, 2006 में मैं आईवरी कोस्ट गया -- पश्चिमी अफ्रिका. किसी विभक्त जगह कि कल्पना कीजिए. ये देश दो टुकड़ों में बंट चुका था. उत्तर के इलाकों में बगावत चल रही थी, सरकार दक्षिण में -- राजधानी अबिदजान -- और बीच में फ्रांसीसी सेना. ये एक बड़े हैमबर्गर की तरह है. और आप बीच का हैम नहीं बनना चाहेंगे. मैं वहाँ उस कहानी पर रिपोर्ट करने गया था कार्टूनों के माध्य्म से. मैं पिछ्ले 15 सालों से ये काम करता आया हूँ. चाहें तो इसे मेरा साईड-जॉब कह सकते हैं. जैसा कि आप देख सकते हैं, इस काम की शैली अलग है. सम्पादकियों के लिए बनने वाले कार्टूनों से ये कहीं ज़्यादा संजीदा मसला है. मैँ ग़ाज़ा जैसी जगहों पर भी गया वहाँ के 2009 के युद्ध के दौरान. असल में ये कार्टूनों के ज़रिए पत्रकारिता है. आपको इसके बारे में और पता चलने लगेगा. मुझे लगता है, यही पत्रकारिता का भविष्य भी है.
ज़ाहिरी तौर पर, मैं उत्तर के विद्रोहियों से मिलने गया. ये अपने हक़ के लिए लड़ने वाले ग़रीब लोग थे. इस लड़ाई का एक जातीगत पक्ष भी था जैसा कि अफ्रिका में अक़्सर होता है. मैं डोज़ो लोगों से भी मिलने गया. डोज़ो परंपरागत शिकारी हैं पश्चिम अफ्रिका में रहने वाले. लोग उनसे डरते हैं. ये विद्रोह की बड़ी मदद करते हैं. लोग मानते हैं कि इनके पास जादुई शक्ति है. जैसे कि ये ग़ायब होकर गोलियों से बच सकते है. मैं एक डोज़ो प्रमुख से मिलने गया. उसने मुझे अपनी जादुई ताक़तों के बारे में बताया. उसने कहा, ' मैं अभी आपका सिर काटकर आपको फिर से ज़िन्दा कर सकता हूँ.' मैँने कहा, 'इसके लिए हमारे पास शायद अभी समय नहीं है.' (ठहाका) ' कभी और.'
अबिदजान लौटने पर मुझे एक कार्यशाला का नेतृत्व करने दिया गया, जिसमें स्थानीय कार्टूनिस्ट थे. मैंने सोचा कि हाँ, एसे समय पर कार्टूनों को सच में दूसरे पक्ष के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. मेरा मतलब है, आईवरी कोस्ट का अख़बार जगत बुरी तरह से बंटा हुआ था. उसकी तुलना गणहत्या के पहले की रवांडा के मीडिया से की जा रही थी. बस अंदाज़ा लगाईए. तो इसमें एक कार्टूनिस्ट क्या कर सकता है? कभी-कभी संपादक कार्टूनिस्टों को वही बनाने को कहते हें जो वो ख़ुद देखना चाहते हैं, और बिचारे कार्टूनिस्ट को तो अपना परिवार चलाना होता है, ना. तो हमने बहुत ही आसान सी योजना बनाई. हमने कार्टूनिस्टों को आईवरी कोस्ट के हर कोने से इकट्ठा किया. हमने उन्हे उनके अख़बारों से तीन दिन के लिए ले लिया. मैंने उन्हे एक प्रोजेक्ट में साथ काम करने कहा, जिसमें उन्हें उनके देश की समस्याओं का समाधान कार्टूनों के ज़रीए बताना था. कार्टून के सकरात्मक शक्ति को दिखाना था. कार्टून संदेश संचार का ज़बरद्स्त तरीक़ा है अच्छे और बुरे दोनों उद्देश्यों के लिए. कार्टून सीमाँए लांघ सकते हैं, जैसा कि आप देख ही चुके हैं. मुझे लगता है, हास्य-विनोद एक बेहतरीन उपाय है गंभीर विषयों से जूझने का. बहरहाल, इन कार्टूनिस्टों के किए काम पर मुझे बड़ा गर्व है. भले ही, वे एक दूसरे से सहमत नहीं थे -- पर ये असल मुद्दा नहीं था. और मैने उन्हें सिर्फ़ ख़ुशगवार कार्टून बनाने को नहीं कहा था. पहले ही दिन, वे एक दूसरे से झगड़ पड़े. पर उन्होने मिलकर एक क़िताब बनाई, पिछले 13 साल से आईवरी कोस्ट में चल रहे राजनैतिक उथल-पुथल को लेकर.
उद्देश्य यही था. मैंने इस तरह के और भी प्रोजेक्ट किए हैं, 2009 में लेबानान में, इसी साल, जनवरी में कीनिया में भी. लेबानान में हमने क़िताब नहीं बनाई. हम चाहते थे कि -- विभाजित देश के विषय पर ही -- अलग-अलग जगह से कार्टूनिस्ट लेकर उन्हे कुछ एक साथ मिलकर करने दिया जाए. तो लेबानान में हमने अख़बारों के संपादकों को काम पे लगाया, और उनसे अलग-अलग जगहों के आठ कार्टूनिस्टों का काम एक साथ एक ही पन्ने पर छपवाया, जिनमें लेबानान को प्रभावित करने वाले विषय उठाए गए थे, जैसे कि धर्म, राजनीति और दैनिक जीवन. ये कारगर साबित हुई. तीन दिनों तक, बैरूट के लगभग हर अख़बार ने इन सारे कार्टूनिस्टों का काम एक साथ छापा -- सरकार-विरोधी, सरकार के पक्ष में, ईसाई, मुस्लिम, ज़ाहिर है, अंग्रेज़ी-बोलने वाले, हर तरह के कार्टूनिस्ट. तो ये एक बढ़िया प्रोजेक्ट था. और फिर हमने कीनिया में जाति के मुद्दों पर काम किया, जो कि अफ्रिका के बहुत से इलाकों में ज़हर की तरह फैला है. हमने विडीयो क्लिप भी बनाए. आप उन्हे YouTube/KenyaTunes में देख सकते हैं.
तो, बोलने की स्वाधीनता पर यहाँ खड़े होकर भाषण देना आसान है, पर जैसा कि आपने देखा कि जब दमन और विभेद का वातावरण हो, तो भला एक कार्टूनिस्ट भी क्या कर सकता है? उसे भी अपनी नौकरी बचानी होती है. पर मैं ये मानता हूँ कि माहौल चाहे कहीं कुछ भी रहे, उसके पास कम से कम ये चुनाव हमेशा रहता है कि वो ऎसे कार्टून ना बनाए जिनसे हिंसा को बढ़ावा मिलता हो. और यही संदेश मैं उन्हें देना चाहता हूँ. मुझे लगता है कि हमारे पास आखिर तक ये चुनाव रहता है कि हम ग़लत काम न करें. पर हमें समर्थन देना होगा इन [अस्पष्ट], विवेचक, ज़िम्मेदार आवाज़ों को जो अफ्रिका, लेबानान, आपके स्थानीय अख़बार या एपल के स्टोर से उठ रहे हैं. आज टेक्नोलाजी कंपनियाँ दुनिया के सबसे बड़े संपादक हैं. वही ये तय कर देते हैं कि आपको क्या नागवार गुज़्रेगा, या क्या भड़काऊ लग सकता है. तो दरअसल ये केवल कार्टूनिस्टों की स्वाधीनता का मसला नहीं है; ये आपकी स्वाधीनता का मसला भी है. दुनिया के सारे तानाशाहों के लिए बहुत अच्छी ख़बर होगी अगर सारे कार्टूनिस्ट, पत्रकार और समाजसेवी चुप पड़ जाएं.
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कुछ मज़ेदार चुटकियां लेते हुए पैट्रिक चप्पाट्टे आम लगने वाले कार्टूनों के पक्ष मे पुरज़ोर द्लील रखते हैं. उनके लेबानान, पश्चिम अफ़्रिका और ग़ाज़ा के प्रोजेक्ट दर्शाते हैं, कि सही हाथों में पेन्सिल न केवल गंभीर विषयों को उजागर करती है, बल्कि साथ होने की कोई गुंजाइश नहीं रखने वालों को भी एकसाथ ले आती है.
Using clean, simple pencil strokes, editorial cartoonist Patrick Chappatte wields globally literate and to-the-point humor on world events -- the tragic, the farcical and the absurd. Full bio »
Translated into Hindi by Arpita Bhattacharjee
Reviewed by Anshul Tyagi
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17:55 Posted: Feb 2010
Views 292,977 | Comments 163
06:04 Posted: Mar 2009
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11:11 Posted: Apr 2009
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