मुझे भारत के बारे में बात करनी है विचारों के विकास के माध्यम से. अब मुझे विश्वास है कि यह इसे देखने का एक दिलचस्प तरीका है क्योंकि, हर समाज में, विशेष रूप से एक खुले लोकतान्त्रिक समाज में, केवल जब विचार जड़ लेते हैं कि चीज़े बदलती हैं. धीरे धीरे विचार विचारधारा में बदलते हैं, लाते हैं नीतियां जो लाती हैं कार्यवाही.
1930 में इस देश के एक महान अवसाद आया, जो राज्य और सामाजिक सुरक्षा के सभी विचारों को लाया, और अन्य सभी चीजें जो रूजवेल्ट के समय में हुई. 1980 के दशक में रीगन क्रांति आई, जिससे अविनियम आया. और आज, वैश्विक आर्थिक संकट के बाद, नियमों का एक नया ढांचा था कि राज्य को कैसे हस्तक्षेप करना चाहिए. तो विचार स्थिति बदलते हैं.
और मैंने भारत को देखा और कहा, वहाँ वास्तव में चार प्रकार के विचार हैं जो वास्तव में भारत पर एक प्रभाव डालते हैं. पहले, मेरे मन में, हैं "विचार जो कि आ चुके हैं." ये विचार जिन्होंने एक साथ कुछ लाया है वह जिसने भारत को आज का रूप दिया. दूसरा समूह "प्रगति में विचार" वह विचार जो हमने स्वीकार किये हैं लेकिन अभी तक लागु नहीं किये. तीसरा समूह हैं विचार जिनके बारे में हम बहस करते हैं यह वह विचार हैं जिनके बारे में हम लड़ते हैं, वैचारिक लड़ाई, तरीकों को ले कर. और चौथी बात, जो मुझे विश्वास है कि सबसे महत्वपूर्ण है, विचार जिनकी हमें आशा करनी चाहिए. क्योंकि जब आप एक विकासशील देश हैं दुनिया में जहाँ आप अन्य देशो की समस्याएं देख सकते हैं , वास्तव में आप अंदाजा लगा सकते हैं उन्होंने क्या किया अलग तरीके से.
अब मैं भारत के मामले में मानता हूँ कि वहाँ छह विचार हैं जो आज के लिए जिम्मेदार हैं. पहले वास्तव में लोगों का दृष्टिकोण है. '६० और '७०के दशक में हम लोगों को एक बोझ के रूप में देखते थे. एक दायित्व के रूप में जानते थे. आज हम एक परिसंपत्ति के रूप में लोगों की बात करते हैं. हम मानवीय पूंजी के रूप में लोगों की बात करते हैं. और मैं मानसिकता में इस परिवर्तन को, लोगो को बोझ की तरह जानने से मानवीय पूंजी, भारतीय मानसिकता में मौलिक परिवर्तन है. और मानवीय पूंजी की यह सोच में परिवर्तन तथ्य से जुड़ा है कि भारत एक जनसांख्यिकीय लाभांश के माध्यम से जा रहा है. स्वस्थ्य-देखबाल में जैसे सुधार होता है, शिशु मृत्यु दर नीचे जाती है, प्रजनन दर गिरना शुरू होता हैं. और भारत यह देख रहा है. भारत के पास होगा एक जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ कई युवा लोग अगले 30 वर्षों के लिए. इस जनसांख्यिकीय लाभांश के बारे में अद्वितीय है कि भारत दुनिया में अकेला देश होगा इस जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ. दूसरे शब्दों में, यह एक बूढी दुनिया में अकेला जवान देश होगा. और यह बहुत महत्वपूर्ण है. उसी समय अगर आप भारत में जनसांख्यिकीय लाभांश को हटा दे, वहाँ वास्तव में दो जनसांख्यिकीय श्रेणी है. एक दक्षिण और पश्चिम में है, जो पहले से ही पूरी तरह से २०१५ तक व्यय किया जा रहा है, क्योंकि देश के इस भाग में, प्रजनन दर पश्चिम यूरोपीय देश के लगभग बराबर है. तो फिर वहाँ पूरा उत्तरी भारत है, जो भविष्य के जनसांख्यिकीय लाभांश का बड़ा हिस्सा होगा. लेकिन एक जनसांख्यिकीय लाभांश उतना ही अच्छा है जितना आपका मानवीय पूंजी में निवेश. सिर्फ अगर लोग शिक्षित हैं, उनके पास अच्छा स्वास्थ्य है, बुनियादी ढांचा है, काम पर जाने के लिए सड़के हैं , अध्ययन करने के लिए रात में रोशनी है - केवल उन मामलों में आप वास्तव में लाभ पा सकते है एक जनसांख्यिकीय लाभांश का. दूसरे शब्दों में, अगर आप वास्तव में एक जनसांख्यिकीय पूंजी में निवेश नहीं कर रहे हैं, वही जनसांख्यिकीय लाभांश एक जनसांख्यिकीय आपदा हो सकती है. इसलिए भारत एक महत्वपूर्ण बिंदु पर है या तो यह लाभ उठा सकता है इस जनसांख्यिकीय लाभांश का या यह एक जनसांख्यिकीय आपदा की ओर जा सकता है.
भारत में दूसरी बात परिवर्तन है उद्यमियों की भूमिका का. जब भारत स्वतंत्र हुआ उद्यमियों को देखा गया एक बुरे रूप में, वह लोग जो फायदा उठाएँगे. लेकिन आज, ६० वर्ष से उद्यमशीलता की वृद्धि की वजह से, उद्यमि भूमिका ढ़ाचा बन गए हैं, और वे समाज को बड़ा योगदान दे रहे हैं. यह परिवर्तन योगदान दे रहा है जीवन शक्ति और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए.
तीसरी बड़ी बात, मुझे विश्वास है, जिसने भारत को बदल दिया है अंग्रेजी भाषा की ओर हमारा रवैया है. अंग्रेजी भाषा साम्राज्यवाद की भाषा के रूप में देखी गयी थी. लेकिन आज वैश्वीकरण के साथ, आउटसोर्सिंग के साथ, अंग्रेजी आकांक्षा की भाषा बन गई है. इसने इससे वह बना दिया जिससे सब सीखना चाहते हैं. और अब तथ्य यह है कि हमारा अंग्रेजी होना एक बड़ी सामरिक सम्पन्ति बन गया है.
अगली बात प्रौद्योगिकी है. चालीस साल पहले, कंप्यूटर देखा गया निषिद्ध रूप में, उससे हम डरते थे, वह नौकरियों कम करता था. आज हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो अस्सी लाख मोबाइल फोन एक महीने में बेचता है, उन मोबाइल फोन का ९० प्रतिशत प्रीपेड फोन है क्योंकि लोगों के पास क्रेडिट इतिहास नहीं है. उन प्रीपेड फोन के चालीस प्रतिशत प्रत्येक पुनर्भरण पर १० रूपये से कम डालते हैं. यह पैमाना है जिस पर प्रौद्योगिकी ने आज़ाद किया और सुलभ बना दिया. और इसलिए प्रौद्योगिकी चली गयी है निषिद्ध रूप से डरावनी से, सशक्तिकरण करने वाली चीज़ पर. बीस साल पहले, जब वहाँ बैंक कंप्यूटरीकरण पर एक रिपोर्ट थी उन्होंने रिपोर्ट को नाम नहीं दिया था कंप्यूटर पर एक रिपोर्ट, वे उन्हें कहते थे "लेजर की पोस्टिंग मशीनें. वे वास्तव में संघ को नहीं बताना चाहते थे कि वह कंप्यूटर हैं. और जब वे और अधिक उन्नत, अधिक शक्तिशाली कंप्यूटर चाहते थे वे उन्हें "उन्नत लेजर पोस्टिंग मशीनें" बुलाते थे. तो हम उन दिनों से एक लंबा सफर तय कर चुके हैं टेलीफोन सशक्तिकरण का एक साधन है, और वास्तव में भारतीयों की प्रौद्योगिकी के बारे में सोच बदल गई है.
और फिर मुझे लगता है कि अन्य बिंदु है कि भारतीयों आज बहोत अधिक वैश्वीकरण के साथ आरामदायक हैं. २०० से अधिक वर्षों के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्यवादी शासन के अधीन रहने के बाद, भारतीयों का वैश्वीकरण की ओर एक बहुत ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी कि यह साम्राज्यवाद का एक रूप थी. लेकिन आज, जैसे भारतीय कंपनियों विदेश जाती हैं, और दुनिया भर में भारतीय कार्य करते हैं, भारतीयों को बहुत अधिक विश्वास आया है और वह महसूस करते हैं कि वैश्वीकरण में वह भाग ले सकते हैं. और तथ्य यह है कि जनसांख्यिकी हमारे पक्ष में हैं, क्योंकि हम बूढी हो रही दुनिया में अकेले युवा देश हैं, भूमंडलीकरण सभी भारतीयों के लिए और अधिक आकर्षक बना देती है.
और अंत में, भारत में लोकतंत्र गहन हुआ है. जब लोकतंत्र भारत ६० साल पहले आया यह एक विशिष्ट अवधारणा थी. यह कुछ लोग थे जो लोकतंत्र लाना चाहते थे क्योंकि वे विचार लाना चाहते थे यूनिवर्सल मतदान और संसद और संविधान वगेहरा. लेकिन आज लोकतंत्र एक नीचे से ऊपर की प्रक्रिया बन गयी है जहां हर कोई एहसास करता है एक आवाज होने के लाभ का एक खुले समाज में होने का लाभ. और इसलिए लोकतंत्र गुथा हुआ बन गया है .
मैं इन छह कारकों को मानता हूँ - जनसांख्यिकीय पूंजी के रूप में जनसंख्या को देखने के कारण, भारतीय उद्यमियों की वृद्धि, आकांक्षा की भाषा के रूप में अंग्रेजी की वृद्धि, सशक्त बनाने में प्रौद्योगिकी की भूमिका, सकारात्मक कारक के रूप में वैश्वीकरण, और लोकतंत्र का गहन होना, इन्होने योगदान दिया है कि भारत आज आगे बढ़ रहा है उन दरों पर जो कभी नहीं देखे गए.
लेकिन, फिर हम आते हैं उन विचारों पर जो प्रगति में हैं. यह वो विचार हैं जिनके लिए समाज में कोई तर्क नहीं है, लेकिन आप उन चीजों को लागू करने में सक्षम नहीं हैं. और वास्तव में यहाँ चार चीजें हैं. एक शिक्षा का सवाल है. किसी कारण से, शायद पैसे की कमी, प्राथमिकताओं की कमी, एक बड़ी धार्मिक संस्कृति होने की वजह से, प्राथमिक शिक्षा को कभी आवश्यक ध्यान नहीं दिया गया था. लेकिन अब मुझे विश्वास है कि यह एक बिंदु तक पहुँच चूका है जहाँ यह बहुत महत्वपूर्ण बन गया है. दुर्भाग्य से सरकारी स्कूल कार्य नहीं करते, तो बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं. यहां तक कि भारत की मलिन बस्तियों में 50 प्रतिशत से अधिक शहरी बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं. तो वहाँ स्कूलों से कार्य करना एक बड़ा चैलेंज है. लेकिन, वहाँ एक विशाल इच्छा है गरीब सहित सब लोग में, अपने बच्चों को शिक्षित करने की. तो मेरा मानना है कि प्राथमिक शिक्षा एक विचार है जो आ गया है लेकिन अभी लागू नहीं हुआ है.
इसी तरह, बुनियादी सुविधाएँ, एक लंबे समय तक, बुनियादी सुविधाएँ प्राथमिकता नहीं थीं. आप में से जो भारत गए हैं उन्होंने देखा है. निश्चित रूप से यह चीन की तरह नहीं है. लेकिन आज मुझे विश्वास है कि बुनियादी सुविधाओं में है कुछ जिस पर सहमति है और जो लोग लागू करना चाहते हैं. यह राजनीतिक बयानों में परिलक्षित होता है. २० साल पहले राजनीतिक नारा था, "रोटी, कपड़ा, और मकान," जिसका मतलब था, "रोटी, कपड़ा और मकान". और आज का राजनीतिक नारा है, "बिजली, सड़क, पानी," जिसका मतलब है "बिजली, सड़क और पानी." और यह मानसिकता में बदलाव है जहां बुनियादी सुविधाएँ अब स्वीकार कर ली गयी हैं. तो मुझे विश्वास है कि यह एक विचार है जो आ गया है, लेकिन लागू नहीं हुआ.
तीसरी बात फिर शहरों में है. क्योंकि गांधी गांवों में विश्वास करते थे और क्योंकि ब्रिटिश शहरों से राज करते थे, इसलिए नेहरू नई दिल्ली को एक अभारतीय शहर के रूप में देखते थे. हम एक लंबे समय तक हमारे शहरों की उपेक्षा करते रहे हैं. और उसका नतीजा आप देख सकते हैं. लेकिन आज, अंत में, आर्थिक सुधारों के बाद, और आर्थिक विकास, यह प्रस्ताव कि शहर इंजन है आर्थिक विकास के, शहर रचनात्मकता के इंजन हैं, शहर नवविचार के इंजन हैं, अंत में स्वीकार कर लिया गया है. और मुझे लगता है कि अब आप हमारे शहरों में सुधार लाने की ओर कदम देख रहे हैं. फिर से, एक विचार जो आ गया है मगर लागु नहीं हुआ है.
अंतिम बात, एकल बाजार के रूप में भारत को देखना है - क्योंकि जब आप भारत को एक बाजार के रूप में नहीं देखते, तुम आप एक एकल बाजार के बारे में परेशान नहीं थे, क्योंकि इससे फर्क नहीं पड़ता था. और इसलिए आप एक स्थिति में थे जहां हर राज्य के पास अपने उत्पादों के लिए अपने बाजार थे. हर प्रांत का कृषि के लिए अपना बाजार था. अब तेजी से नीतियां कराधान और बुनियादी ढाचे की, एक एकल बाजार के रूप में भारत बनाने की ओर बढ़ रही हैं. तो वहाँ आंतरिक वैश्वीकरण हो रहा है, जो बाहरी वैश्वीकरण के बराबर महत्वपूर्ण है. मेरा मानना है कि इन चार कारकों प्राथमिक शिक्षा, बुनियादी ढांचा, शहरीकरण, और एक एकल बाजार भारत में वह विचार हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया गया है, लेकिन लागू नहीं किया गया है.
फिर है वह विचार जो विचार संघर्ष में हैं. विचार जिन पर हम बहस करते हैं. तर्क है जो गतिरोध हैं. क्या है वोह विचार? एक मुझे लगता है, वैचारिक मुद्दे हैं. ऐतिहासिक भारतीय पृष्ठभूमि की वजह से, जाति व्यवस्था में, और इस वजह से की कई लोगों को जो बाहर छोड़ दिए गए , राजनीति का बड़ा हिस्सा इस बारे में हैं कि कैसे सुनिश्चित करें कि हम उन की पूर्ती करें. और यह आरक्षण और अन्य तकनीक का कारण हैं. यह कारण है कि हम अनुवृत्ति देते हैं, और सभी लेफ्ट और राईट तर्क जो हैं. भारतीय समस्याएँ विचारधाराओं से जुड़ी हैं जाति और अन्य बातों की. यह नीति गतिरोध पैदा कर रही है. यह कारक हैं जो हमें हल करना है.
दूसरा है श्रम नीति, जो मुश्किल बना रही है उद्यमियों के लिए कंपनियों में नौकरियों बनाने में कि भारतीय श्रमिक का ९३ प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में है. उनके पास कोई लाभ नहीं है: सामाजिक सुरक्षा नहीं है; पेंशन नहीं है, हेल्थ, उन चीजों में से कोई भी नहीं है. यह ठीक होना ज़रूरी है, क्योंकि जब तक आप इन लोगों को औपचारिक कर्मचारियों में नहीं लाते हैं, आप बहोत लोगों को बेदखल कर रहे हैं. इसलिए हमें नए श्रम कानून बनाने की जरूरत है, जो आज जैसे कठिन नहीं हैं. साथ ही बहुत अधिक लोगों के औपचारिक क्षेत्र होने की नीति बनाये, और लाखों लोगों के लिए नौकरियों बनाएँ जो हमें करने की जरूरत है.
तीसरी बात हमारी उच्च शिक्षा है. भारतीय उच्च शिक्षा पूरी तरह नियंत्रित है. बहुत मुश्किल है एक निजी विश्वविद्यालय शुरू करना. बहुत मुश्किल है एक विदेशी विश्वविद्यालय के लिए भारत में आना. परिणाम स्वरुप हमारी उच्च शिक्षा भारत की मांगों के साथ तालमेल नहीं रख रही है. इससे बहोत परेशानिया उत्तपन हो रही हैं.
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वह विचार हैं जिनका हमें अंदाजा होना चाहिए. यहाँ भारत पश्चिम की ओर देख सकता है और कहीं और, और देख सकते है कि क्या किया जाना चाहिए. पहली बात है, हम बहुत भाग्यशाली हैं कि प्रौद्योगिकी ऐसे बिंदु पर है जहां यह और अधिक उन्नत है अन्य देशों की तुलना में जब उनका विकास हुआ. तो हम शासन के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकते हैं. हम प्रत्यक्ष लाभ के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकते हैं. हम पारदर्शिता, और कई अन्य चीजों के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकते हैं.
दूसरी बात है, स्वास्थ्य के मुद्दे. भारत में उतना ही भयानक है हृदीय मुद्दे की स्वास्थ्य समस्याएँ, मधुमेह की, मोटापे की. तो कोई फायदा नहीं है वहाँ गरीब देश के रोगों को बदल अमीर देश के रोगों को लाने का. इसलिए हमें पूरी तरह से स्वास्थ्य पर पुनर्विचार करना है. हमें वास्तव में एक रणनीति बनाने की आवश्यकता है ताकि हम स्वास्थ्य की अन्य चरम की और न जाये.
इसी प्रकार पश्चिम में आज आप देख रहे हैं पात्रता की समस्या - सामाजिक सुरक्षा, चिकित्सा, चिकित्सा-सहायता की लागत. इसलिए जब आप एक युवा देश हैं, आप के पास मौका है एक आधुनिक पेंशन प्रणाली बनाने का ताकि आप पात्रता समस्याएं नहीं बनाएँ आने वाले समय के लिए.
और फिर, भारत के पास आसान विकल्प नहीं है अपने वातावरण को गन्दा बनाने का, क्योंकि यहाँ पर्यावरण और विकास को साथ चलाना है. सिर्फ एक विचार देने के लिए, दुनिया को स्थिर होना है प्रति वर्ष २० गिगाटन पर. नौ अरब की आबादी पर हमारी औसत कार्बन उत्सर्जन प्रति वर्ष दो टन होनी चाहिए. भारत प्रति वर्ष दो टन पर आ चूका है. लेकिन अगर भारत आठ प्रतिशत पर बढ़ता है, प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति आय २०५० तक १६ गुना बाद जाएगी. तो हम कह रहे हैं: १६ गुना आय और कार्बन में कोई विकास नहीं. इसलिए हम मौलिक रूप से पर्यावरण पर पुनर्विचार करेंगे, जिस तरह से हम ऊर्जा को देखते हैं, जिस तरह से हम विकास के पूरे नए मापदंड बनाते हैं.
अब यह आप के लिए महत्वपूर्ण क्यों है? क्यों १० हजार मील दूर से आपको फर्क पड़ता है? सबसे पहले, इस वजह से यह एक अरब से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. एक अरब लोग, विश्व की जनसंख्या का १/६. यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक लोकतंत्र है. और यह साबित करना महत्वपूर्ण है कि विकास और लोकतंत्र असंगत नहीं हैं, कि आप एक लोकतंत्र में, एक खुले समाज में, विकास कर सकते हैं. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर आप इन समस्याओं को सुलझा पाते हैं, आप दुनिया में गरीबी की समस्याओं को हल कर सकते हैं. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया की पर्यावरण समस्याओं को हल करने के लिए इसकी जरूरत है.
यदि हम वास्तव में एक बिंदु पर आना चाहते हैं, हम वास्तव में अपने कार्बन उत्सर्जन पर रोक लगाना चाहते हैं, हम वास्तव में ऊर्जा का उपयोग कम करना चाहते हैं - यह भारत जैसे देशो में हल किया जाना है. आप अगर विकास को देखो पश्चिम में २०० से अधिक वर्ष, औसत विकास दर दो प्रतिशत के बराबर रही होगी. यहाँ हम आठ से नौ प्रतिशत पर बढ़ रहे देश के बारे में बात कर रहे हैं. और वह एक बड़ा फर्क है. जब भारत ३-३.५ प्रतिशत पर बढ़ रहा था और जनसंख्या दो प्रतिशत से, इसकी प्रति व्यक्ति आय हर ४५ साल में दोगुनी हो रही थी. जब आर्थिक विकास आठ प्रतिशत चला जाता है और जनसंख्या वृद्धि १.५ प्रतिशत पर गिरता है, तो प्रति व्यक्ति आय हर नौ साल में दोगुनी होती है. दूसरे शब्दों में, आप निश्चित रूप से तेजी से अग्रेषण कर रहे हैं पूरी प्रक्रिया को एक अरब लोगों की समृद्धि में जाने की. और आप के पास एक स्पष्ट रणनीति होनी चाहिए जो दुनिया के लिए और भारत के लिए महत्वपूर्ण है. यही कारण है कि मुझे लगता है कि आप सभी को इसके साथ समान रूप से चिंतित होना चाहिए, जैसे मैं हूँ. बहुत बहुत धन्यवाद. (अभिवादन)
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नंदन नीलेकणि, आउटसोर्सिंग विजेता इन्फोसिस के सीईओ, कहते हैं कि दूरदर्शी विचारों के चार तरीके तय करेंगे कि क्या भारत अपनी ज़बरदस्त प्रगति जारी रख सकता है.
Nandan Nilekani is the author of "Imagining India," a radical re-thinking of one of the world’s great economies. The co-founder of Infosys, he helped move India into the age of IT. Full bio »
Translated into Hindi by Gaurav Gupta
Reviewed by Omprakash Bisen
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18:45 Posted: Oct 2006
Views 226,903 | Comments 50
20:34 Posted: Oct 2007
Views 240,210 | Comments 56
19:50 Posted: Jun 2006
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