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अक्टूबर २०१० की बात है, अमरीकी न्यायपालिका जुडेगी 'द ९९' से। तमाम सुपरहीरो जैसे कि बैटमैन, सुपरमैन, वंडर वुमन, और उनके बाकी साथी दूसरे सुपरहीरो जैसे कि जब्बर, नूरा, जामी और बाकी साथियों से जुडेंगे। ये कहानी है अंतर्सांस्कृतिक आदान-प्रदान की। और उन से बेहतर लोग क्या मिलेंगे इस बारे में बात करने के लिये, जो कि खुद फ़ासिस्टों से लडाई कर के आगे आये हैं अपने अपने इतिहासों और भूगोलों में। १९३० के दशक में जब यूरोप में फ़ासिज़्म का बोलबाला हुआ, उत्तरी अमेरिका से एक अप्रत्याशित प्रतिक्रिया आयी। जैसे क्रिश्चन चिन्हों में बदलाव आया, और स्वास्तिक की परिकल्पना क्रूस से निकली, बैटमैन और सुपरमैन भी यहूदी युवाओं ने गढे अमरीका और कनाडा में वापस बाइबल तक।
ये सोचिये: पैगम्बर साहब की तरह ही, सारे के सारे सुपरहीरो अपने अभिभावकों को खो चुके हैं। सुपरमैन के माता-पिता क्रिप्टान पर खत्म हो गये थी जब वो एक साल का भी नहीं था। ब्रूस वेन, जो कि बैटमैन बन जाता है, ने अपने माँ-बाप को छः साल की उम्र में गोथम शहर में खो दिया था। स्पाइडरमैन का पालन-पोषण उसके चाचा-चाची ने किया। और उन सब को, वैसे ही जैसे मुहम्मद पैगम्बर को संदेश मिलते हैं ईश्वर से गेब्रियल के ज़रिये, अपने संदेश ऊपर से ही मिलते हैं। पीटर पार्कर मैनहैटन की लाइब्रेरी में है जब एक मकडी ऊपर से आती है और अपना संदेश उसे डंक मार कर देती है। ब्रूस वेन अपने बेडरूम में है जब एक विशालकाय चमगादड उसके सर के ऊपर से उडता है, और ये उसे बैटमैन बनने के लिये प्रेरित करता चिन्ह लगता है। सुपरमैन को सिर्फ़ पृथ्वी पर स्वर्ग या क्रिप्टान से भेजा ही नहीं गया, बल्कि उसे एक पत्ते में भेजा गया, जैसे नील नदी पर मोजेस को। (हँसी) और आप उस के पिता, जोर-अल की आवाज़ सुनते हैं, पृथ्वी से कहते हुए, "मैने अपना इकलौता बेटा तुम्हें सौंप दिया है।"
साफ़ तौर पर ये बाइबिल से सीधी उठाये किरदार हैं, और उस के पीछे मकसद ये था कि रचना हो कुछ सकारात्मक, विश्व भर को बाँधने वाली कहानियों की, जिन्हें उन चीज़ों से जोडा जा सके जिन से कि बाकी लोग गलत संदेश निकाल रहे थे। क्योंकि ऐसा करने से धर्म का गलत इस्तेमाल करते लोग, सिर्फ़ बुराई के संदेशवाहक बुरे लोग बन कर रह जायेंगे। और ये सिर्फ़ सकारात्मक सोच से ही संभव है कि नकारात्मक सोच को हटाया जा सके। ऐसी ही कुछ सोच पर आधारित है 'द ९९'। द ९९ कुरान में दिये गये अल्लाह के ९९ गुणों की ओर इशारा करती है, जैसे कि उदारता, दया, दूरदृष्टि, और अक्लमंदी और दर्ज़नों बाकी गुण जिन्हें दुनिया में कोई भी अस्वीकार नहीं करेगा, चाहे उसका कोई भी धर्म क्यों न हो। यदि आप नास्तिक भी हैं, तो भी आप अपने बच्चे को ये नहीं सिखाते कि, देखो, दिन में तीन बार झूठ ज़रूर बोलना। ये तो मूलभूत इंसानी अच्छाइयाँ हैं।
तो 'द ९९' की कहानी है सन १२५८ की, जब इतिहास के हिसाब से मंगोलों ने बग़दाद को मटियामेट कर दिया था। बैत-अल-हिक्मा पुस्तकालय की सारी किताबें, उस ज़माने की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकालय को, टिग्रिस नदी में फेंक दिया गया, और टिग्रिस का रंग स्याही जैसा हो गया था। ये कहानी पीढी दर पीढी चली आ रही है। मैने वो कहानी फ़िर से लिखी। मेरे विवरण में, पुस्तकालय वालों को पता लग गया कि ऐसा होने वाला है -- और यहीं एक नोट भी है: अगर आप चाहते हैं कि कोई कॉमिक प्रसिद्ध हो, तो लाइब्रेरी वालों को हीरो बनाइये। सही रहेगा। (हँसी) (अभिवादन) तो पुस्तकालय वालों को पता लग गया और उन्होंने एक ख़ास रसायन तैयार किया, जिसे किंग्स वाटर (या राजसी जल) कह गया, जिसे कि ९९ पत्थरों से मिलाने पर, किताबों में निहित संस्कृति और इतिहास बच जायेगा। मगर मंगोल वहाँ पहले पहुँच गये। और किताबें और वो रसायन भी टिग्रिस नदी में फ़ेंक दिया गया। कुछ पुस्तकालय वाले बच निकले, और कई दिनों और हफ़्तों के बाद, उन्होंने टिग्रिस नदी में वो पत्थर डाल कर, वो सारी जानकारी और अक्ल हासिल कर ली जिसे हम सब ने खोया हुआ मान लिया था।
उन पत्थरों को प्रार्थना की तीन मालाओ के दानों के रूप में छुपा कर तीन माला - हर एक में ३३ दाने अरब से अन्दूलेसिया से स्पेन तक तस्करी के ज़रिये लाया गया, और २०० साल तक छुपाया गया। मगर १४९२ में, दो महत्वपूर्ण घटनायें हुईं। पहली तो ग्रानादा का ध्वस्त होना, जो कि यूरोप में मुस्लिमों का आखिरी ठिकाना था। दूसरी ये कि कोलम्बस को भारत जाने के निकला, मगर खो गया। (हँसी) तो ३३ पत्थर तो तस्करी से नीना, पिन्टा, और संता मारिया तक लाये गये, और नयी दुनिया में फ़ैल गये। ३३ सिल्क रूट के ज़रिये चीन, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में फ़ैल गये। और बाकी ३३ यूरोप और मध्य-पूर्व और अफ़्रीका में फ़ैल गये।
और अब २०१० है, और ९९ सुपरहीरो हैं जो कि ९९ अलग देशों से हैं। और ये सोचना बडा आसान है कि क्योंकि वो किताबें अल-हिक्मा पुस्तकालय से थी, तो इस्लामिक होंगी मगर ऐसा नहीं है क्योंकि जिस खलीफ़ा ने उसे बनवाया था, उसका नाम था अल-मामून -- वो हारुन अल-रशीद का बेटा था। उसने अपने सलाहकारों से कहा, ""मुझे वो सारे विद्वान चाहिये जो सारी किताबों का अरबी में अनुवाद कर दें, और मैं उन्हें उनकी किताबों के वज़न के बराबर सोना दूँगा।" कुछ दिन बाद, सलाहकारों ने शिकायत की। उन्होंने कहा, "महाराज, ये विद्वान धोखा कर रहे हैं वो बडे अक्षरों में लिख रहे हैं, ज्यादा सोने के लालच में।" तो खलीफ़ा बोला, "करने दो, क्योंकि वो हमें वो दे रहे हैं जिसकी कीमत सोने से कहीं ज्यादा है।" तो खुले स्थापत्य का, खुली जानकारी का विचार रेगिस्तानी इलाकों में नया नहीं है।
ये परिकल्पना आधारित है नूर पत्थरों पर। अरबी में नूर का अर्थ है रोशनी। तो इन पत्थरों के, कुछ नियम वगैरह हैं: पहला, आप पत्थर तक नहीं पहुँचते, वो आप तक पहुँच जाते हैं। कुछ कुछ किंग आर्थर की कहानी की तरह, ठीक है। दूसरा, सारे के सारे ९९ हीरो, जब उनके पास पत्थर आता है, तो उसका गलत इस्तेमाल करते हैं; अपनी खुदगर्ज़ी के लिये। और उसमें एक शक्तिशाली संदेश निहित है कि जब आप पत्थर का गलत इस्तेमाल करते हैं आपका फ़ायदा उठाया जाता है उन लोगों के द्वारा जो आपकी शक्ति को गलत इस्तेमाल करते हैं। तीसरा कायदा, इन ९९ पत्थरों में सब कुछ है एक ऐसा तरीका जिससे इन्हें ताज़ा जानकारी मिलती रहती है।
अब इस्लाम में दो तरह के लोग हैं सब लोग मानते हैं कि कुरान शाश्वत सत्य है - समय और स्थल से परे। कुछ लोग ये मानते हैं कि इसका मतलब वो कुरान है जिसे कई हज़ार साल पहले लिखा गया था। मेरा इस पर विश्वास नहीं है। एक और दल है जो मानता है कि कुरान जीवित, साँस लेता दस्तावेज़ है। और इसी बात को मैने इन पत्थरों के खुद ताज़ा होने में शामिल किया। अब जो मुख्य खलनायक है, रुघल, वो चाहता नहीं कि ये पत्थर ताज़ा जानकारी रखें। तो वो इन्हें नयी जानकारी तालीम लेने से रोकता है। वो ख़ुद इन पत्थरों का इस्तेमाल तो नहीं कर सकता है, मगर वो इन्हें रोक सकता है। और इन्हें रोक कर, वो अपना फ़ासिस्टनुमा अजेंडा चलाता है, और कुछ एक ९९ सुपरहीरो लोगों से अपने लिये काम करवाता है। वो सब एक तरह की वर्दी में है, एक ही रंग की। उन्हें इज़ाजत नहीं है खुद को अभिव्यक्त करने की, वो कौन है, क्या हैं बताने की। और वो उन पर ख़ासा शासन करता है। जबकि जब वो दूसरी तरफ़ से काम करते हैं, उन्हें पता लगता है कि वो गलत आदमी के लिये काम करते हैं, उन्हें इस्तेमाल किया गया है, और वहाँ तो कोई वर्दी वगैरह भी नहीं है, सबके अपने कपडॆ हैं।
और आखिरी बात इन ९९ नूर पत्थरों के बारे में ये थी। तो ९९ हीरो तीन तीन की टीम में काम करते हैं। तीन ही क्यों? कुछ वजहे हैं। पहली ये कि इस्लाम में कभी भी आप एक लडके और एक लडकी को अकेला नहीं छोडते, क्योंकि तीसरा व्यक्ति लालच या फ़िर शैतान होता है, है न? ऐसा ही है न सारी अवधारणाओं में, है न? मगर ये धर्म के लिये नहीं है, ये तो पुराने मतों को तोडने जैसा है। यहाँ बहुत बडा सामाजिक संदेश है जिसका पहुँचना ज़रूरी है असहनीयता की गहराइयों तक. और इस का एक ही तरीका है कि कुछ खेल खेले जायें। और मैने इसका ये तरीका निकाला। वो तीन लोगों की टीम में काम करेंगे, दो लडके और एक लडकी, तीन लडकी, तीन लडके, समस्या ही खत्म। और स्विस मानसवेत्ता, कार्ल जंग, ने भी कहा है तीन के अंक के महत्व के बारे में, सारी संस्कृतियों मे, तो मुझे लगा कि मैं ठीक हूँ। ख़ैर... मुझे कुछ ब्लागों मे कहा गया कि मुझे पोप द्वारा कैथोलिक धर्म फ़ैलाने के लिये मध्य-पूर्व में भेजा गया है, तो आप -- (हँसी) आप जो चाहे माने -- मैं आपको अपनी कहानी सुना चुका हूँ।
और ये कुछ किरदार हैं। मुजीबा, मलेशिया से, उसकी ताकत है कि सारे प्रश्नों के उत्तर जानती है। इसे बकवासकोष की अध्यक्ष कह सकते हैं। मगर जब उसे अपनी ताकत मिली थी, उसने कौन बनेगा करोडपति जैसे शो से पैसा कमाना शुरु कर दिया था। जब्बर है, साउदी अरब से, जिसने तोड फ़ोड शुरु कर दी थी ताकत मिलते ही। मुमिता भी मज़ेदार है। ये कुछ भी नष्ट कर सकती है। तो अल्लाह के ९९ गुणों में भी यिन और यांग हैं। वहाँ शक्ति है, ताकत है, आधिपत्य है। मगर वहाँ उदारता है, और दया भी है। मुझे लगा, कि क्या सारी लडकियाँ दयालु और उदार और सारे लडके ताकतवर होंगे? तो मैने सोचा, मैं कुछ एक विध्वंसक लडकियों से मिला तो हूँ अपने जीवन में... (हँसी) ये जामी है हंगरी से, जिसने ताकत मिलते ही हथियार बनाने शुरु कर दिये। ये तकनीक की विशेषज्ञ है। मुसव्विरा है घाना से, हायदा है पाकिस्तान से, जलील है ईरान से जो आग का इस्तेमाल करता है। और ये मेरी मन पसंद, अल-बतिना यमन से। अल-बतिना छुपी रुस्तम है। वो छुपी रहती है, और वो सुपरहीरो है। मैनें घर लौट कर अपनी पत्नी से कहा, "मैने तुम्हारे आधार पर एक किरदार बनाया है।" मेरी पत्नी साउदी की है, और यमन से रिश्ता रखती है। और उसने कहा, "दिखाओ मुझे।" तो मैने उसे ये दिखाया। और उसने कहा, "ये तो मैं नहीं हूँ।" मैने कहा, "आँखें देखो, तुम्हारी ही तो हैं।"
तो मैनें अपने निवेशकों से वादा किया कि ये एक और घटिया सडल काम नहीं होगा। ये तो सुपरमैन जैसा कुछ होगा, वरना ये मेरे समय और आपके पैसे के लायक नहीं है। तो पहले ही दिन से, शीर्ष लोगों को इस प्रोजेक्ट में जोडा गया, नीचे बाईं ओर हैं फ़ाबियन निसिएज़ा, एक्स-मेक और पॉवर रेंज़र की लेखिका। उनके बगल में हैं डैल पानोसियन, नये एक्स-मैन के रचयिताओं में से एक। शीर्ष लेखक, स्टुअर्ट मूर, आयरन मैन के लेखकों में से एक। उनके बाजू में जॉन मक्क्रेआ, जो स्पाइडरमैन की इंकिग कर चुके हैं। और हमने पाश्चात्य मानस में प्रवेश किया इस लाइन से: "अगले रमज़ान तक, दुनिया में नये सुपर हीरो होंगे।" २००५ में।
फ़िर मैं दुबई गया, एक अरब वैचारिक फ़ाउंडेशन कॉंफ़्रेंस में, और मैं कॉफ़ी पीते हुए किसी ठीक ठाक पत्रकार से टकराने का इंतज़ार कर रहा था। मेरे पास दिखाने को अपने जुनून के अलावा कुछ था नहीं। और मुझे न्यूयार्क टाइम्स से एक सज्जन मिले। मैनें उन्हें दबोच लिया, और उन्हे ये सब बताया। और शायद मैनें उन्हें डरा दिया था -- (हँसी) क्योंकि उन्होंने कुल मिला कर मुझसे वादा किया कि -- और मेरे पास तैयार सामग्री नहीं थी -- मगर वो बोले, "आर्ट सेक्शन में एक पैराग्राफ़ दें देंगे यदि आप मेरा पीछा छोड दें।" (हँसी) तो मैने कहा, "बढिया।" फ़िर उन्हें कुछ हफ़्तों बाद फ़ोन किया। मैने कहा, "हाय हेसा!" तो उन्होंने कहा, "हाय।" मैने कहा, "नया साल मुबारक हो।" उन्होंने कहा, "शुक्रिया, हमारे घर संतान हुई है।" मैने कहा, "बधाइयाँ।" जैसे मुझे बहुत फ़र्क पडा हो। "तो अगला आलेख कब आ रहा है?" उन्होंने कहा, "नईफ़, इस्लाम और कार्टून? इसका समय नहीं आया है। देखो, शायद अगले हफ़्ते, या अगले महीने, अगले साल, मगर ये आयेगा ज़रूर।" तो कुछ दिन और बीत गये, और क्या हुआ? डैनिश कार्टून विवाद ने सारे विश्व को हिला दिया। बस मेरा समय आ गया था। (हँसी) फ़िर तो न्यूयार्क टाइम्स से फ़ोन और ईमेल की बाढ ही आ गयी। और पलक झपकते ही, हमें पूरे पेज की बढिया कवरेज मिली थी, जनवरी २२, २००६ में, और इसने हमारा जीवन सदा के लिये बदल दिया। क्योंकि कोई भी इस्लाम और कार्टून और कॉमिक पर गूगल करता, तो सोचिये उसे क्या दिखता; उसे मेरा काम दिखता।
और 'द ९९' तो सुपरहीरो बन गये मानो दुनिया के काम धाम से अलग उडे जा रहे हों। और उस से बहुत तरह की चीजें हुईं, कई विद्यालयों और यूनिवर्सिटियों के पाठ्यक्रम में शामिल होना -- मेरी पसंदीदा तस्वीर है दक्षिणी एशिया से, कुछ आदमी थी लंबी दाढी वाले और तमाम सारी लडकिया नकाब पहने हुए -- स्कूल जैसा लगता है। अच्छी खबर ये है कि ये सब 'द ९९' की कॉपी हाथ में ले कर मुस्करा रही हैं, और उन्होंने मुझे ढूंढ कर मेरे साइन करवाये। बुरी खबर ये है कि ये सब फ़ोटोकापियाँ थी, तो हमने इस से एक भी पैसा नहीं कमाया। (हँसी) हम 'द ९९' का लाइसेंसे देने में कामयाब हुए हैं, अब तक आठ भाषाओं में, चीनी, इन्डोनीशियन, हिंदी, उर्दू, तुर्की। एक लाइसेंस के अंतर्गत कुवैत में डेढ साल पहले थीम पार्क भी खुला है जिसे 'द ९९' विलेज थीम पार्क कहते हैं, ३००,००० वर्ग फ़ुट, २० झूले, हमारे किरदारों के साथ। स्पेन और तुर्की में कुछ लाइसेंस स्कूलों में इस्तेमाल के लिये।
मगर अभी तक का सबसे बडा काम, जो कि बहुत मज़ेदार है, ये है कि हमने २६ कडियों का एनीमेशन धारावाहिक बनाया है, जो कि विश्व भर के दर्शकों के लिये है, और तो और, अब हम अमरीका और तुर्की में इसे पहुँचाने वाले हैं। ये थ्री-डी, सी.जी.आई है, जो बहुत उम्दा क्वालिटी का है, इसे हॉलीवुड में लिखा गया है, बेन १० के लेखकों द्वारा और स्पाइडरमेन, और स्टार वार्स के लेखकों के द्वारा। इस विडियो में मैं आपको दिखाऊँगा वो जो कभी सार्वजनिक नहीं किया गया, ये एक ज़ोर-आजमाइश चल रही है। दो किरदारों, जब्बर, जिसके पास तमाम डोले शोले हैं, और नूरा, जो कि रोशनी का इस्तेमाल जानती है, ने वही नौकरों वाली स्लेटी वर्दी पहनी हुई है क्योंकि उनका इस्तेमाल हो रहा है। उन्हें पता भी नही है, है न। और ये कोशिश कर रहे है कि 'द ९९' में से एक और उनसे जुड जाये। तो पूरी टीम में एक मतभेद है। तो ज़रा लाइट्स.....
जब्बर: दाना, समझ नही आता कहाँ से पकडूँ। मुझे और रोशनी चाहिये।
रुघल: कुछ तो ज़रूर कर सकते होंगे हम।
आदमी: मैं एक भी और कमांडो नहीं भेजूँगा बिना सुरक्षा के वादे के।
डॉ. रज़ेम: मिकोलोस, जाने का वक्त आ गया है।
मिकोलोस: फ़ाइल तो डाउनलोड पूरी करनी ही है। मैं आंटी को भूल नहीं सका।
जब्बर: मैं तुम्हारे बिना ये नहीं कर सकता।
दाना: मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकती।
जब्बर: तुम कर सकती हो, अगर तुम्हें स्वयं पर विश्वास नहीं, तब भी। मुझे तुम पर भरोसा हो। तुम नूरा हो - खुद रोशनी।
दाना: नहीं। मैं इसके लायक नहीं। मैं किसी चीज के लायक नहीं।
जब्बर: तो फ़िर हम सब का क्या होगा? क्या हम बचाए जाने के लायक नही? क्या मैं भी? बताओ मुझे, किस तरफ़ जाना है।
जब्बर: हम तुम्हारी मदद करने आये हैं।
दाना: मिकोलोस, वो आदमी तुम्हारा दोस्त नहीं है।
मिकोलोस: नहीं, उसने मुझे पासवर्ड दिया, और तुम {०००} को रीबूट करना चाहते हो। नहीं होगा ऐसा।
तो 'द ९९' तकनीक है; मनोरंजन है; डिजाइन है, रूपरेखा है। मगर ये सिर्फ़ आधी ही कहानी है। पाँच बेटों के पिता के रूप मे, मुझे चिंता होती है कि उनके आदर्श कौन लोग बनेंगे। मुझे चिंता होती है,क्योंकि मेरे आसपास, परिवार कुनबे में, मैं धर्म को गलत तरीके से इस्तेमाल होते देखता हूँ। एक मनोवैज्ञानी के तौर पर, मैं चिंतित सारे विश्व को ले कर और इस बारे में कि लोग खुद को कैसे देखते हैं, मेरे इलाके में। देखिये, मैं एक मनोवैज्ञानिक हूँ, और न्यूयार्क में प्रेक्टिस के लिये लाइसेंसधारी हूँ। मैने बेलेवु हस्पताल में राजनैतिक यातना भुगते लोगों के साथ काम किया है। और मैनें तमाम कहानियाँ सुनी लोगों की जो बडे हुए अपने नेताओं को अपना आदर्श मानते हुए, और अंततः उन्होंने अपने हीरो द्वारा ही यंत्रणा दी गयी। और यंत्रणा तो वैसी ही प्रचंड चीज़ है, मगर जब आपके आदर्श हीरो के हाथों हो, तो ये आपको कई तरीके से तोड डालती है। मैने बलुवे छोडा, बिज़नस स्कूल गया, और ये शुरु किया।
एक और बात जो मैं कहता हूँ जब मैं -- इस संदेश के महत्व के बारे में -- वो ये है कि मैं कुवैत विश्वविद्यालय के मेडिकल स्कूल में लेक्चर देता हूँ जहाँ मैं व्यवहार के जीव-विज्ञानी कारणों को पढाता हूँ, और मैने अपने विद्यार्थियों को दो आलेख दिये, एक न्यूयार्क टाइम्स का, और एक न्यूयार्क मैगज़ीन का। और मैने उनके लेखकों के नाम छुपा दिय -- सब कुछ गायब कर दिया सिवा तथ्यों के। और पहला आलेख 'पार्टी ऑफ़ द गॉड' नामक एक ग्रुप पर था, जो कि वैलेन्टाइन डे पर रोक लगाना चाहते थे। और लडके लडकियों को मज़ाक करते पकडने पर उनकी तुरंत शादी करवा देना चाहते थे, ठीक? और दूसरा था एक औरत के बारे में जो शिकायत कर रही थी क्योंकि तीन गाडियों से छः दढियल मर्द उतरे, उसे पकडा और वहीं पर पूछताछ शुरु कर दी ऐसे आदमी से बतियाने के लिये जो उसका रिश्तेदार न था।
मैने कुवैत में अपने विद्यार्थियों से पूछा कि उनके हिसाब से ये घटनायें कहाँ हुई होंगी। पहला वाला, उन्होंने कहा, साउदी अरब - और वो बिलकुल निश्चित थे। और दूसरे वाले में, अलग अलग विचार थे कि साउदी या फ़िर अफ़्गानिस्तान। जिस बात ने उनके होश उडा दिये वो ये थी कि पहला वाला भारत से था, और ये एक हिंदू भगवान की पार्टी थी। और दूसरा न्यूयार्क के ठीक बीच में हुआ था। एक रूढिवादी यहूदी समुदाय में। मगर जो बात मेरा दिल दुखाती है, और खतरनाक है वो ये कि इन दो बातचीतों मे, जो आसपास के लोग थे, जिनका साक्षात्कार भी लिया गया था, इस व्यवहार को तालिबानगिरी कहते हैं। दूसरे शब्दों में, अच्छे हिन्दू और अच्छी यहूदी ऐसा बर्ताव नहीं करते। ये हिन्दू धर्म पर और यहूदी धर्म पर इस्लाम का असर है। मगर कुवैत के विद्यार्थियों ने क्या कहा? उन्होंने कहा - ये तो हम ही हैं। और ये खतरनाक है। ये खतरनाक है जब कोई समुदाय इस व्यवहार को अपने व्यवहार सा पाने लगे।
ये मेरा बेटा है रायन, और इसे स्कूबी डू की लत लग चुकी है। इसके चश्मे से साफ़ ज़ाहिर है। एक दिन इसने मुझे परेशान करने वाल बच्चा कहा। (हँसी) मगर मैने इस से कुछ सीखा है। पिछली गर्मी में जब हम अपने न्यूयार्क के घर में थे, ये बाहर लान में खेल रहा था। और मैं अपने ऑफ़िस में काम कर रहा था। और ये आया, "बाबा, अभी मेरे साथ चलो। मुझे खिलौना दिलवाओ।" "हाँ, रायन, अभी तुम जाओ।" उसने अपना स्कूबी डू अपने घर में छोड दिया था, मैने कह, "अभी तुम जाओ। मैं कुछ कर रहा हूँ।" और रायन ने क्या किया। वहीं बैठ गया, अपने पैर से फ़र्श पर ताल लगाई, साढे तीन मात्रा में, और मेरी तरफ़ देख कर बोला, "बाबा, मैं चाहता हूँ कि आप मेरे साथ मेरे घर में मेरे ऑफ़िस में चलें। मुझे कुछ काम करना है।" (हँसी) (अभिवादन) रायन ने स्थिति को पलट दिया था, और खुद को मेरे स्तर पर ला खडा किया था।
और 'द ९९' का इस्तेमाल कर के, यही हम भी करना चाहते हैं। मुझे लगता है कि बडा भारी संबंध है क्रूस को मरोडने में, और स्वास्तिक बनाने में। और जब मै अभिभावकों और अंकलों की ऐसी तस्वीर देखता हूं जिन्हें लगता है कि ये प्यारा बात है कि बच्चे हाथ में कुरान और कमर पर आत्मघाती बम बाँध कर घूमें किसी बात के विरोध में, मेरी आशा बचती है ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक चीज़ों को कुरान से जोडने में, कि एक दिन हम इस बच्चे को उन बातों पर गर्व करने से रोक सकेंगे जिन पर वो अभी करता है, और दूसरी बात पर गर्वांवित देखेंगे। और मुझे लगता है -- मुझे लगता है कि 'द ९९' में शक्ति है, और वो ऐसा कर सकेगा।
तुफ़्त विश्वविद्यालय के स्नातक विद्यार्थी के रूप में, एक दिन हम मुफ़्त फ़लाफ़ल बाँट रहे थी, और शायद उस दिन, मध्य-पूर्व दिवस था। और लोग आ रहे थे, और ले रहे थे, फ़लाफ़ल की सांस्कृतिक छवि को, खा रहे थी, और बातचीत कर के लौट रहे थे। और कोई भी दो लोग इस बात पर अलग नहीं थे कि मुफ़्त शब्द क्या होता है और फ़लफ़ल शब्द क्या होता है, हमारे पीछे लिखा था - मुफ़्त फ़लाफ़ल। समझे आप। (हँसी) या हम शायद ऐसा सोच रहे थे, जब तक हमारे पास एक औरत नही आयी और अपना बैग जमीन पर पलट कर, और उस बैनर की तरफ़ इशारा कर के बोली, "फ़लाफ़ल कौन है?" (हँसी) सच घटना है ये। (हँसी) वो अभी अभी अमनेस्टी इंटरनेशनल की मीटिंग से लौटी थी।
आज ही, डी.सी. कॉमिक ने घोषणा की है हमारे नये कॉमिक के कवर की। उस पर आपको बैटमैन दिखेगा, सुपरमैन दिखेगा और पूरी तरह से ढकी हुई वंडर वुमन दिखेगी हमारे 'द ९९' के साउदी सदस्य के साथ, हमारे अमीरात के सदस्य और , हमारे लिब्या के सदस्य के साथ। अप्रैल २६ २०१० को, राष्ट्रपति बैरक ओबामा ने कहाकि उनके प्रसिद्ध काइरो भाषण से ले कर अब तक हुये प्रयासों में -- जिन में उन्होंने मुस्लिम दुनिया से जुडना चाहा है -- सबसे जबरदस्त है 'द ९९' का जुडना जस्टिस लीग ऑफ़ अमेरिका के साथ। हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ मासूम से मासूम सांस्कृतिक चिन्हों जैसे कि फ़लाफ़ल, का गलत अर्थ लगाया जा सकता है संकीर्ण विचारधारा के चलते, और जहाँ धर्म को तोड-मरोड कर परोसा जा सकता है और वैसा बनाया जा सकता है जैसा वो नहीं है। ऐसी दुनिया में, सुपरमैन और 'द ९९; के लिये हमेशा ही काम बाकी रहेगा।
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नईफ़ अल-मुतावा की 'द ९९', कॉमिक किताबों की नई नस्ल है जहाँ सुपरहीरो मात्र अपराध से ही नहीं लडते --- वो रुढिवादिता और अतिवाद से भी लडाई करते हैं। अल्लाह के ९९ गुणों पर नामित, उनके किरदार इस्लाम का सकारात्मक संदेश सुदृढ करते हुये, अंतर्सांस्कॄतिक आदान प्रदान के ज़रिये नये मूल्यों का ढाँचा गढते हैं बुराई से लडाई के लिये, यहाँ तक कि वो जस्टिस लीग ऑफ़ अमेरिका के साथ पार्टनर भी बन जाते हैं।
Naif Al-Mutawa has created a group of comic superheroes based on Islamic culture and religion. They derive their superpowers from the 99 attributes of Allah. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Vatsala Shrivastava
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04:28 Posted: Dec 2009
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18:26 Posted: Nov 2009
Views 701,317 | Comments 396
19:45 Posted: Jul 2010
Views 610,747 | Comments 1195
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