दो हफ्ते पहले मैं पैरिस के अपने स्टूडियो में था, और फ़ोन बजा और मैंने सुना, "अरे, जे आर, तुम्हें २०११ का टेड प्राइज़ मिल गया है. तुम्हें दुनिया को बचाने के लिए एक कामना करनी है." मैं हैरान हो गया. मैं दुनिया को कहाँ बचाऊँगा; कोई भी नहीं बचा सकता. दुनिया के तो बुरे हाल हैं. देखो न, तानाशाह दुनिया भर में राज कर रहे हैं, आबादी लाखों में बढती जा रही है, समुद्र में कोई मछली नहीं बची, उत्तरी ध्रुव पिघल रहा है, और जैसा कि पिछले टेड प्राइज़ विजेता ने कहा, हम सब मोटे होते जा रहे हैं. (हंसी) शायद फ्रेंच लोगों को छोड़ कर. खैर जो भी हो. तो मैंने फ़ोन वापस घुमाया और उनसे कहा, " देखो एमी, टेड वालों से बोल दो मैं आऊँगा ही नहीं. मैं दुनिया को बचाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकता." उसने कहा, " अरे, जे आर, तुम्हारी कामना दुनिया को बचाने के लिए नहीं, उसे बदलने के लिए है." "ओह, फिर ठीक है." (हंसी) "यह तो मजेदार है." मेरा मतलब टेक्नोलोजी, राजनीति, उद्योग दुनिया को बदलते तो हैं -- हमेशा सही ढंग से नहीं, पर बदलते तो हैं. तो कला का क्या? क्या कला दुनिया को बदल सकती है?
मैंने उसे १५ साल की उम्र से शुरू किया. और उस समय मैं दुनिया को बदलने के बारे में नहीं सोच रहा था. मैं तो ग्राफिटी कर रहा था...दीवारों पर हर जगह अपना नाम लिखते हुए, पूरे शहर को अपना कैनवस बना रहा था. मैं पैरिस की सुरंगों में जा रहा था, उसकी छतों पर भी, अपने दोस्तों के साथ. हर अवसर एक सैर जैसा था, एक दुस्साहसी अनुभव. वो समाज पर अपनी छाप छोड़ने जैसा काम था, जैसे किसी इमारत के ऊपर कहना हो, "मैं यहाँ था".
तो जब मुझे एक दिन ट्रेन में एक सस्ता कैमरा पड़ा मिला, तब मैंने अपने मित्रों के साथ हुए इन अनुभवों को उस पर उतारना शुरू किया और उन्हें फोटो-कॉपी बना कर वापस देना भी -- वाकई छोटे फोटो, बस इतने बड़े. और इसी तरह, १७ साल की उम्र में, ने उन्हें चिपकाना शुरू किया. और मैंने अपना पहला 'एक्सपो-दे-रू' किया, जिसका मतलब है फुटपाथ की प्रदर्शनी. और मैंने उसे रंगीन फ्रेम दिया ताकि लोग उसे विज्ञापन समझने की भूल न करें. मेरा मतलब है, शहर मेरी निगाह में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन-स्थल है. मुझे कभी भी किताब बना कर किसी प्रदर्शन-स्थल को देने की ज़रुरत नहीं पड़ी कि वो निश्चय करें कि मेरा काम लोगों को दिखाने लायक था कि नहीं. मैं तो सीधे जनता के साथ उसे परखता गलियों में.
तो यह है पैरिस. मैं बदल देता था -- हम जहाँ जा रहे हों, उसके हिसाब से -- अपनी प्रदर्शनी का नाम. यह है शौं एलिज़ी पर. इस पर मुझे काफी गर्व था. क्योंकि मैं सिर्फ १८ बरस का था और मैं शौं एलिज़ी के ठीक ऊपर लगा था. फिर जब फोटो निकल गया, तब भी फ्रेम वहीँ लगा रहा.
नवम्बर २००५: सड़कों पर आग लगी हुई है. दंगे-फसाद की एक लहर पैरिस के पहले प्रोजेक्ट्स में फ़ैल गयी थी. हरेक व्यक्ति टीवी पर जमा हुआ था, वो दुखद, भयावनी तसवीरें देखते हुए जो मोहल्लों की सीमाओं से ली गयी थीं. मेरा मतलब है, ये जवान बच्चे, काबू से बाहर, पेट्रोल बम फ़ेंक रहे थे, पुलिस और दमकल वालों पर, और दुकानों से जो भी लूट सकते थे, लूट रहे थे. यह थे अपराधी, उचक्के, खतरनाक लोग अपने वातावरण को फैलाते हुए लोग.
और अचानक मैंने देखा -- क्या यह मुमकिन था? -- एक दीवार पर मेरा लगाया फोटो एक जलती हुई कार से प्रकाशित -- जो मैंने करीब एक साल पहले लगाया था -- गैर कानूनी -- मगर वहीँ लगा हुआ. मेरा मतलब, यह मेरे दोस्तों के चेहरे थे. मैं इन लोगों को जानता था. यह सब फ़रिश्ते नहीं हैं, मगर राक्षस भी नहीं हैं. तो बड़ा अजीब सा लग रहा था उन तस्वीरों और उन आँखों का टीवी से मेरी तरफ देखना.
तो मैं वापस वहाँ गया एक २८ मिमी लेंस के साथ. उस वक़्त मेरे पास वही लेंस था. मगर उस लेंस के साथ, चेहरे से सिर्फ १० इंच की दूरी रखनी पड़ती है. इसलिए यह फोटो सिर्फ उनके भरोसे से ही लिया जा सकता है. तो मैंने ला बस्क्वे के लोगों की चार तस्वीरें लीं. वो डरावने चेहरे बना रहे थे अपने आप को हास्यास्पद दिखने के लिए. और फिर मैंने उनके बड़े बड़े पोस्टर हर जगह लगाए पैरिस के मध्यवर्गी इलाकों में उनके नाम, उम्र, बिल्डिंग नंबर तक के साथ हर व्यक्ति के. एक साल बाद, वो प्रदर्शनी पैरिस के सिटी हॉल के ठीक सामने लगाई गयी. और हम उन तस्वीरों से आगे बढ़ते हैं, जिन्हें मीडिया ने चुरा कर उनका रूप विकृत कर दिया है, और पाते हैं कि वो लोग अब गर्व से अपनी तस्वीरों के अधिकारी बन रहे हैं. उस वक़्त मैंने समझा कागज़ और गोंद का महत्व. तो क्या कला दुनिया को बदल सकती है?
एक साल बाद, मैं सारा शोर सुन रहा था मध्य-पूर्वी क्षेत्र के संघर्ष के बारे में. मेरा मतलब, उस समय, सही मानिए, सब लोग सिर्फ इजराइल और फिलिस्तीन के संघर्ष की बात ही कर रहे थे. तो अपने दोस्त मार्को के साथ मैंने वहाँ जाने का निर्णय लिया ताकि हम देख सकें कि कौन असली फिलिस्तीनी हैं और कौन असली इजराइली. क्या वो इतने अलग हैं? जब हम वहाँ पहुंचे, तो गलियों में निकल गए, और हर जगह लोगों के साथ बात करने लगे, और हमने जाना कि असली स्थिति काफी फ़र्क थी उस प्रचार से जो हमने मीडिया में सुना था. तो हमने निश्चय किया कि हम तसवीरें लेंगे फिलिस्तीनी और इजराइली -- दोनों लोगों की -- जो एक ही धंधे में हैं -- टैक्सी-चालक, वकील, बावर्ची. और हमने उनसे एक ख़ास तरह का चेहरा बनाने को कहा, वायदे के तौर पर. मुस्कान नहीं -- उससे वाकई नहीं पता चलता कि आप कौन हैं और कैसा महसूस कर रहे हैं. सबने मंज़ूर कर लिया कि एक दूसरे के साथ उनकी तस्वीर लगाई जाए. मैंने उन तस्वीरों को चिपकाने का निर्णय लिया आठ इजराइली और फिलिस्तीनी शहरों में और सरहद के दोनों तरफ. इस तरह हमने सबसे बड़ी गैरकानूनी कला- प्रदर्शनी शुरू कर दी. हमने उसे नाम दिया -- प्रोजेक्ट आमने-सामने.
विशेषज्ञों ने कहा, "कभी नहीं. लोग कभी नहीं स्वीकार करेंगे. फ़ौज तुम पर गोली चलाएगी, और हमस वाले तुम्हारा अपहरण कर लेंगे." हमने कहा, "चलो, कर के तो देख ही लेते हैं कि कहाँ तक पहुँचते हैं." मुझे बहुत अच्छा लगता है जब लोग पूछते हैं, "मेरा फोटो कितना बड़ा होगा?" तुम्हारे घर जितना बड़ा होगा भई." जब हमने सरहद की दीवार पर काम शुरू किया, तो पहले फिलिस्तीनी ओर से. तो हम बस अपनी सीढ़ियाँ ले कर पहुँच गए और फिर हमने देखा कि उनकी ऊँचाई कम पड़ रही थी. तो फिलिस्तीनी लोग कहते हैं, "शांत रहो. नहीं, रुको. हम तरीका ढूँढ निकालेंगे." और एक आदमी बाल यीशु के चर्च तक गया और एक पुरानी सीढ़ी ले कर आया जो इतनी पुरानी थी कि शायद यीशु के जन्म के समय भी वहीँ रही होगी. (हंसी) हमने पूरा प्रोजेक्ट आमने-सामने समाप्त किया, और हमारे पास थे सिर्फ ६ दोस्त, दो सीढ़ियाँ, दो ब्रश, एक किराए की कार, एक कैमरा और २०००० वर्गफुट कागज़. हमें तरह-तरह की मदद मिली तरह-तरह के लोगों से.
जैसे देखिये, उदाहरण के तौर पर, ये फिलिस्तीन है. हम इस समय रमल्लाह में हैं. हम तसवीरें चिपका रहे हैं -- ताकि दोनों चित्र सड़कों पर दिखाई दें, इस भीड़-भाड़ वाले बाज़ार में. लोग हमें घेर कर पूछने लगते हैं, "तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?" "ओह, हम लोग एक कला-परियोजना कर रहे हैं और हम एक ही धंधा कर रहे एक इजराइली और एक फिलिस्तीनी को यहाँ लगा रहे हैं. जैसे ये दोनों लोग दो टैक्सी-चालक हैं." इन शब्दों के बाद हमेशा एक सन्नाटा होता था. "तुम्हारा मतलब तुम एक इजराइली चेहरा चिपका रहे हो -- ठीक यहाँ पर?" "जी हाँ, बराबर, बराबर, यह इस परियोजना का हिस्सा है." और मैं हमेशा एक पल ठहरता था, और फिर हम उन लोगों से पूछते थे, "तो क्या आप बता सकते हैं कि कौन कहाँ से है?" और अधिकतर लोग नहीं बता पाते थे.
हमने इजराइल की फौजी मीनारों पर भी तसवीरें चिपका दीं, और कुछ नहीं हुआ. जब आप एक तस्वीर चिपकाते हैं, तो वो सिर्फ कागज़ और गोंद होती है. लोग उसे फाड़ सकते हैं, उस के ऊपर कुछ और लगा सकते हैं, या उस पर पेशाब भी कर सकते हैं -- हाँलाकि कुछ ज़रा ऊंची लगी होती हैं इसके लिए, मगर सड़क पर चलते लोग, वही असली संरक्षक होते हैं. बारिश और हवा वैसे भी उन्हें नष्ट कर देगी. वो हमेशा के लिए तो लगी नहीं रहने वाली. पर ठीक चार साल बाद भी, वो तस्वीरें, अधिकतर अभी भी वहीं हैं. आमने-सामने ने प्रमाणित कर दिया, कि जो हम नामुमकिन समझते थे वो मुमकिन था -- और पता है आपको, आसान भी. हमने कोई सीमा नहीं तोड़ी, हमने बस यह दिखा दिया कि हम लोगों की उम्मीदों से कहीं आगे हैं.
मध्य-पूर्वी क्षेत्र में मैंने अपने काम का तजुर्बा किया ऐसी जगहों पर जहाँ (ज्यादा) संग्रहालय नहीं थे. इसीलिये सड़कों से मिली यह जानकारी मेरे लिए बहुत दिलचस्प थी. तो मैंने इस दिशा में आगे जाने का निर्णय ले लिया और उन जगहों में जाने का, जहाँ कोई भी संग्रहालय नहीं है. जब आप इन विकासशील इलाकों में जाते हैं, तो वहाँ औरतें अपने समुदायों की बुनियाद होती हैं, पर आदमी अभी भी सड़कों के मालिक होते हैं. तो हमें एक ऐसा प्रोजेक्ट करने की इच्छा हुई जहां सब आदमी औरतों के लिए अपना आभार प्रकट करेंगे उनकी तस्वीरें लगा कर. मैंने इस प्रोजेक्ट को नाम दिया 'नारियाँ हैं सर्वोत्तम'. जब मैंने वो सारी कहानियाँ सुनीं, सारे महादेशों में घूमते हुए, तब मैं अक्सर नहीं समझ पाता था उनके संघर्ष के पेचीदा हालात, मैं सिर्फ ध्यान से देखता था. कभी कभी कोई शब्द नहीं होते थे, कोई वाक्य नहीं, सिर्फ आंसू. मैं सिर्फ उनकी तसवीरें उतारता और चिपका देता था.
'नारियाँ हैं सर्वोत्तम' मुझे सारे विश्व में ले गया. अधिकतर उन जगहों पर जहाँ मैं गया मैंने इसलिए जाने का निर्णय लिया क्योंकि मैंने मीडिया के द्वारा उनके बारे में सुना था. जैसे कि, जून २००८ में मैं पैरिस में बैठा टीवी देख रहा था, जब मैंने वो भयानक खबर सुनी जो रिओ द जनिरो में हुई थी. ब्राजील के प्रोविदेंसिया नामक पहले मोहल्ले में. तीन बच्चे -- वो तीनों छात्र थे -- फ़ौज के द्वारा रोक लिए गए क्योंकि उनके पास अपने कागजात नहीं थे. और फ़ौजी उन्हें पकड़ कर, उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाने के बजाय, एक विरोधी मोहल्ले में ले गए जहां उन्हें छोटे छोटे टुकड़ों में काट दिया गया. इस खबर ने मुझे दहला दिया. सारे ब्राज़ील को दहला दिया. मुझे पता लगा कि वह सबसे ज्यादा हिंसापूर्ण मोहल्लों में से एक था, क्योंकि नशीले पदार्थों के व्यापारियों का सबसे बड़ा समूह उस को चलाता है. तो मैंने वहाँ जानेका निश्चय किया.
जब मैं पहुंचा -- अब मैं किसी गैर सरकारी संस्था के माध्यम से तो गया नहीं था. वहाँ कुछ था भी नहीं -- न टूरिस्ट एजेंट, न कोई गैर सरकारी संस्था, कुछ भी नहीं -- कोई चश्मदीद गवाह नहीं. तो हम बस घूमते रहे, फिर एक औरत से मिले और मैंने उसे अपनी किताब दिखाई. और उसने कहा, "क्या आप जानते हैं? हम संस्कृति के भूखे हैं. हमें यहाँ संस्कृति चाहिए." तो मैं वहाँ गया और मैंने बच्चों के साथ काम शुरू किया. मैंने सिर्फ बच्चों की कुछ तसवीरें लीं, और अगले दिन मैं पोस्टर बना कर लाया और हमने उन्हें चिपका दिया. एक दिन बाद, मैं वापस आया और देखा कि वो खरोंचे जा चुके थे. पर यह चलता है. मैं उन्हें यह अनुभव कराना चाहता था कि यह कला उनकी अपनी धरोहर है.
फिर अगले दिन, मैंने मुख्य चौक पर एक मीटिंग की और कुछ औरतें आ गयीं. वो सब उन तीन बच्चों से जुड़ी थीं जो मारे गए. उनमें से एक माँ थी, एक नानी, और एक दोस्त. वो सब उस कहानी को चीख-चीख कर सुनाना चाहती थीं. उस दिन के बाद से, उस मोहल्ले के सब लोगों ने मुझे हरी झंडी दिखा दी. मैंने और तसवीरें खींचीं, और हमने प्रोजेक्ट शुरू कर दिया. नशीले पदार्थों के व्यापारी कुछ परेशान थे कि हम वहाँ तस्वीरें क्यों खींच रहे हैं, तो मैंने उनसे कहा, "आप जानते हैं? मैं यहाँ की हिंसा और हथियारों की तसवीरें खींचने में दिलचस्पी नहीं रखता. वो तो मीडिया में बहुत बार दिख जाते हैं. मैं तो यहाँ की आश्चर्यजनक ज़िन्दगी को दिखाना चाहता हूँ. और वाकई मैं पिछले कुछ दिनों से उसे अपने चारों ओर देख रहा हूँ." तो यह वाकई एक प्रतीकात्मक प्रदर्शनी है क्योंकि यह हमारी पहली ऐसी प्रदर्शनी है जो शहर से नहीं दिखाई देती. और यह वो जगह है जहाँ वो तीन बच्चे पकड़े गए थे, और यह उनमें से एक की नानी हैं. और उन सीढ़ियों पर, वहाँ अवैध व्यापारी हमेशा खड़े होते हैं और हमेशा गोलाबारी होती है. वहाँ का हर निवासी इस प्रोजेक्ट को समझ गया. और हमने हर जगह तसवीरें चिपका दीं -- पूरी पहाड़ी पर.
दिलचस्प बात यह थी कि मीडिया वहाँ बिलकुल नहीं घुस पाया. मतलब, आप ज़रा देखिये. वो हमें काफी दूर से हेलिकोप्टर के अन्दर से फिल्माते थे काफी लम्बे कैमरा लेंस के साथ, और हम अपने आपको टीवी पर देखते, तसवीरें चिपकाते हुए. और फिर वो एक नंबर दिखाते. "कृपया इस नंबर पर फ़ोन करिए अगर आपको कुछ भी जानकारी हो कि प्रौविदेंसिया में क्या हो रहा है." हम सिर्फ एक प्रोजेक्ट कर के आ गए ताकि मीडिया को पता न लगे. तो हम प्रोजेक्ट के बारे में पता कैसे लगा सकते हैं? तो उन्हें जा कर औरतों से मिलना पड़ा ताकि कुछ पता चल सके कि क्या हो रहा था. इस तरह से एक सम्बन्ध शुरू हो गया -- मीडिया और गुमनाम औरतों के बीच.
हम सफ़र करते रहे. हम गए अफ्रीका, सूडान, सिएरा लियों, लाइबेरिया, कीन्या. मोनरोविया जैसे युद्ध-ग्रस्त इलाकों में, लोग सीधे आपके पास आते हैं. मेरा मतलब है, वो जानना चाहते हैं कि आप क्या कर रहे हैं. उन्होंने बार-बार मेरे से पूछा, "आपके प्रोजेक्ट का प्रयोजन क्या है? क्या आप गैर सरकारी संस्था से हैं? क्या आप मीडिया से हैं?" कला. सिर्फ कला दिखा रहे हैं. कुछ लोग पूछते हैं, "यह तस्वीरें रंगीन क्यों नहीं हैं? क्या फ़्रांस में रंग नहीं होते?" (हंसी) या फिर पूछते हैं, "क्या यह सब मृत व्यक्ति हैं?" कुछ लोग जो प्रोजेक्ट को समझ जाते हैं, वो औरों को समझा देते हैं. और एक बार एक ऐसे व्यक्ति से जो समझ नहीं पाया था, मैंने किसी को कहते सुना, "जानते हो, तुम यहाँ कुछ घंटों से हो समझने की कोशिश में, अपने लोगों से बात-चीत करते हुए. इस समय में, तुमने इस बारे में नहीं सोचा है कि कल क्या खाने वाले हो. यही कला है." मैं सोचता हूँ यह लोगों की जिज्ञासा ही है जो उन्हें प्रेरित करती है एक प्रोजेक्ट में आने के लिए. और फिर वो कुछ और बढ़ जाती है. और वो बन जाती है एक कामना, एक ज़रुरत, एक (अस्पष्ट). इस पुल पर, जो मोराविया में है, एक पूर्व-विद्रोही फौजी ने हमारी तसवीरें चिपकाने में मदद की एक ऐसी औरत की जिसका शायद युद्ध के दौरान बलात्कार हुआ था. औरतों के साथ हमेशा सबसे पहले अत्याचार होता है किसी भी संघर्ष में.
यह है किबेरा, कीन्या में, अफ्रीका की सबसे बड़ी गंदी बस्तियों में से एक. आपने शायद यहाँ हुई चुनावों के बाद की हिंसा के चित्र देखे होंगे जो २००८ में हुई थी. इस बार हमने घरों की छतें ढक दीं, पर कागज़ नहीं इस्तेमाल किया, क्योंकि कागज़ बारिश नहीं रोकता घर के अन्दर टपकने से -- विनाइल रोकता है. तब कला काम में भी आती है. तो लोगों ने उसे रखा. आपको पता है मुझे क्या बहुत पसंद है, जैसे, जब आप वहाँ उस सबसे बड़ी आँख को देखते हैं, वहाँ (कितने) सारे घर हैं उसके अन्दर. और मैं वहाँ कुछ महीने पहले गया -- तसवीरें अभी भी वहीँ थीं -- और उनमें से आँख का एक हिस्सा गायब था. तो मैंने लोगों से पूछा कि ऐसा कैसे हुआ. "ओह, वो परिवार यहाँ से चला गया." (हंसी) जब छतें ढक गयीं, तो एक औरत ने मजाक में कहा, "अब भगवान मुझे देख सकते हैं." आज जब आप किबेरा को देखते हैं, तो वो आप को देखता है.
अच्छा, भारत. यह शुरू करने से पहले, आप यह जान लें, हर बार जब हम एक नयी जगह जाते हैं, तब हमारे पास कोई टूरिस्ट एजेंट नहीं होता, तो हम छापामारों की तरह काम करते हैं -- हम कुछ दोस्त हैं जो वहाँ पहुँचते हैं, और हम दीवारों पर चिपकाने की कोशिश करते हैं. पर कई जगहें हैं जहाँ आप दीवारों पर कतई नहीं चिपका सकते. भारत में चिपकाना एकदम नामुमकिन था. मैंने सुना सांस्कृतिक तौर से और कानूनन भी, पहली बार चिपकाने पर ही हम गिरफ्तार हो जाते. तो हमने सफ़ेद तसवीरें चिपकाने का निर्णय लिया, दीवारों पर सफेदी. तो कल्पना कीजिये गोरे लोग सफ़ेद कागज़ चिपका रहे हैं. तो लोग हमारे पास आते और पूछते, "अरे, आप भला क्या कर रहे हैं?" "ओह, देखिये, हम तो बस कला दिखा रहे हैं." "कला?" बेशक, वो चकरा जाते. पर आप जानते हैं भारत की सड़कों पर कितनी धूल होती है, और जितनी अधिक धूल उड़ती जाती हवा के साथ, उस सफ़ेद कागज़ पर जो मुश्किल से दिख रहा था, पर यहाँ है वह चिपचिपा भाग ठीक स्टिकर के पीछे वाले भाग जैसा. तो जितनी ज्यादा धूल उड़ेगी, उतनी ही ज्यादा तस्वीर दिखेगी. तो अगले कुछ दिन हम सिर्फ सड़क पर टहलते रहे और तसवीरें अपने आप दिखती गयीं. (तालियाँ) धन्यवाद. तो इस बार हम नहीं पकड़े गए.
हर प्रोजेक्ट, यह एक फिल्म है 'नारियाँ हैं सर्वोत्तम' से. (संगीत) अच्छा. हर प्रोजेक्ट के लिए हम बनाते हैं एक फिल्म. और जो आप देख रहे हैं, उस में से अधिकतर भाग 'नारियाँ हैं सर्वोत्तम" का ट्रेलर है -- उसकी तसवीरें, फोटोग्राफी, एक के बाद एक ली हुईं. और तस्वीर हमारे बाद भी चलती रही. (हंसी) (तालियाँ) उम्मीद है, आप फिल्म देखेंगे, और इस प्रोजेक्ट का प्रयोजन समझ सकेंगे और यह भी कि लोगों को कैसा लगा जब उन्होंने यह तसवीरें देखीं. क्योंकि यह उसका एक बड़ा हिस्सा है. हर तस्वीर के पीछे कई परतें हैं. हर छवि के पीछे एक कहानी है.
'नारियाँ सर्वोत्तम हैं' ने एक नयी सक्रियता शुरू की हर एक समुदाय में, और हमारे जाने के बाद औरतों ने वो सक्रियता कायम रखी. उदाहरण के तौर पर, हमने किताबें लिखी थीं -- बिक्री के लिए नहीं -- जो सारे समुदाय को मिलतीं. पर उन्हें पाने के लिए, उन्हें किसी भी एक स्त्री से हस्ताक्षर (करवाने) ज़रूरी थे. हमने अधिकतर जगहों पर यही किया. हम नियमित रूप से वापस जाते हैं. तो जैसे प्रौविदेंसिया के मोहल्ले में, उदाहरणार्थ, हमने एक नियंत्रित सेंटर चला रखा है. किबेरा में हर साल हम और ज्यादा छतें ढकते हैं. क्योंकि असलियत में, जब हम जाने लगे, तो प्रोजेक्ट की सीमा पर रह रहे लोगों ने पूछा, "अरे, मेरी छत का क्या होगा?" तो हमने अगले साल दोबारा आने का निर्णय लिया ताकि प्रोजेक्ट चलाते रहें.
मेरे लिए एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मैं किसी भी ब्रैंड या कॉर्पोरेट प्रायोजक का इस्तेमाल नहीं करता. इसलिए मैं बिलकुल उत्तरदायी नहीं हूँ किसी के लिए भी नहीं, बस अपने लिए और अपने पात्रों के लिए. (तालियाँ) और यह मेरे लिए इस काम की सबसे महत्वपूर्ण वस्तुओं में से एक है. मेरे विचार से आजकल, परिणाम जितना ही महत्वपूर्ण है आप के काम करने का तरीका. और यह हमेशा मेरे काम का एक खास भाग रहा है. और दिलचस्प चीज़ है वह सूक्ष्म रेखा जो हमेशा मैंने रखी है तस्वीर और विज्ञापन के बीच. हमने अभी लॉस एंजिलीस में तसवीरें चिपकायीं पिछले हफ़्तों में, एक और प्रोजेक्ट के लिए. और मुझे मोका (MOCA) संग्रहालय को ढकने के लिए भी बुलाया गया था. पर कल शहर के अधिकारियों ने उन्हें बुलाया और कहा, "देखिये, हमें इसे गिराना तो ज़रूर पड़ेगा. क्योंकि इसे विज्ञापन कहा जा सकता है, और कानून के अनुसार, इसे नीचे ही गिराना होगा." अब आप बताइए, किस चीज़ का विज्ञापन है यह?
जिन लोगों की तस्वीर मैं खींचता हूँ उन्होनें इस प्रोजेक्ट में गर्व से हिस्सा लिया ताकि समुदाय में उनकी तस्वीर लग सके. पर उन्होनें मुझसे एक वादा लिया. उन्होनें कहा, "कृपया हमारी कहानी को अपने साथ घूमने दीजिये." तो मैंने वही किया. यह पैरिस है. यह रियो है. हर जगह में हमने एक कहानी के साथ प्रदर्शनी लगाई, और कहानी फैलती गयी. तो आप इस प्रोजेक्ट का पूरा प्रयोजन समझ रहे हैं. यह लन्दन है, न्यूयॉर्क. और आज, आपके साथ लौंग बीच में.
अच्छा, हाल ही में मैंने एक सार्वजनिक कलात्मक प्रोजेक्ट शुरू किया. जहाँ मैं अपना काम बिलकुल नहीं इस्तेमाल करता. मैं इस्तेमाल करता हूँ मैन रे, हेलेन लेविट, गियाकोमेली, और लोगों की कला. इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो आपकी कला है या नहीं. महत्वपूर्ण बात यह है कि आप क्या करते हैं उन छवियों के साथ, जहाँ चिपकाते हैं वहाँ क्या बयान होता है. तो जैसे उदाहरण के लिए, मैंने मीनार की छवि चिपकाई स्विट्ज़रलैंड में ठीक उस वक़्त जब उन्होनें हाल ही में मीनारों पर रोक लगा दी थी. (तालियाँ) यह गैस मास्क पहने तीन आदमियों की तस्वीर पहले चेर्नोबिल में ली गयी थी, और फिर मैंने इसे दक्षिण इटली में लगाया, जहाँ माफिया कभी कभी कूड़े को ज़मीन के नीचे दबा देता है.
कुछ हद तक, कला दुनिया को बदल सकती है. कला का काम दुनिया को बदलना नहीं है, या व्यावहारिक चीज़ों को बदलना भी नहीं, वो तो सिर्फ विचारधारा को बदल सकती है. कला बदल सकती है उस नज़रिए को जिससे हम दुनिया देखते हैं. कला एक उपमा को रच सकती है. असलियत में यह सचाई कि कला दुनिया को नहीं बदल सकती, उसे एक ऐसा निष्पक्ष स्थान बना देती है जहाँ आदान-प्रदान और वाद-विवाद हो सकें, और इस तरह से वो आप को दुनिया बदल डालने के योग्य बना देती है. जब मैं अपना काम करता हूँ, तो मुझे दो तरह की प्रतिक्रियाएं मिलती हैं. लोग कहते हैं, "अरे, आप ईराक या अफगानिस्तान क्यों नहीं जाते? वो बहुत काम आयेंगे." या फिर, "हम कैसे मदद कर सकते हैं?" मैं आशा करता हूँ कि आप सब दूसरी श्रेणी में आते हैं, और यह अच्छी बात है, क्योंकि उस प्रोजेक्ट के लिए, मैं आप सबसे पूछूंगा कि आप तसवीरें लें और उन्हें चिपकायें.
तो अब मेरी कामना है कि: (बनावटी ढोल की आवाज़) (हंसी) मेरी कामना है कि आप सब उठ खड़े हों उस बात के लिए जिस की आप परवाह करते हों, और एक विश्वव्यापी कलात्मक प्रोजेक्ट में भाग लें, और इस तरह एक साथ मिल कर हम दुनिया को उलट-पुलट कर डालेंगे. और यह अभी शुरू होता है. हाँ, कमरे में बैठा हर व्यक्ति. हर दर्शक. मैं चाहता था कि यह कामना वास्तव में अभी से शुरू हो. तो कोई भी विषय जिस के बारे में आप भावुक हों, कोई व्यक्ति जिस की कहानी आप सुनना चाहते हों, या फिर अपनी खुद की तसवीरें -- मुझे बताइए कि आप किस बात के लिए खड़े होते हैं. तसवीरें लीजिये, छवियाँ लीजिये, उन्हें अपलोड कीजिये -- मैं सारी जानकारी भेज दूंगा -- और मैं आपके पोस्टर आपको वापस भेज दूंगा. इकट्ठे आइये और दुनिया को चीज़ें दिखाइए. वेबसाईट पर पूरी जानकारी है. इन्साइडआउटप्रोजेक्ट.नेट (insideoutproject.net) जो आज से शुरू हो रहा है.
जो हम देखते हैं, वो हमें बदल डालता है. जब हम एक साथ काम करते हैं, तो उसका पूरा असर अलग अलग भागों के जोड़ से कहीं ज्यादा होता है. तो मैं उम्मीद करता हूँ कि एक साथ, हम सब कुछ ऐसा रचेंगे जिसे दुनिया याद रखेगी. और यह अभी शुरू होता है और आप पर निर्भर करता है.
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जे आर, एक अनजाना-सा फ्रेंच सड़कछाप कलाकार, अपने कैमरे के प्रयोग से दुनिया को उसका असली चेहरा दिखाता है -- मानवीय चेहरों के फोटो बड़ी विशाल सतहों पर चिपका कर. टेड २०११ में, वो अपनी दुस्साहसी टेड प्राइज़ अभिलाषा बयान करता है -- दुनिया को भीतर से बदल डालने के लिए कला का उपयोग. उसकी कला के बारे में जानिये और समझिये कि आप कैसे इनसाइडआउटप्रोजेक्ट.नेट (insideoutproject.net) का हिस्सा बन सकते हैं
With a camera, a dedicated wheatpasting crew and the help of whole villages and favelas, 2011 TED Prize winner JR shows the world its true face. Full bio »
Translated into Hindi by alka puri
Reviewed by Anshul Tyagi
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