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मैं यहाँ आ कर बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ, और जैसा क्रिस ने कहा, मुझे अफ़्रीका में काम करते हुए करीब २० वर्ष हो गये हैं। अफ़्रीका से मेरा परिचय अबिदजान हवाई-अड्डे पर आइवरी-कोस्ट की एक उमस भरी सुबह हुआ था। मैनें वॉल-स्ट्रीट हाल ही में छोडा था, अपने बाल मार्गरेट मीआड जैसे कटवाए थे, अपना लगभग सब कुछ दान कर चुकी थी, और सिर्फ़ आवश्यक चीज़ों के साथ आयी थी -- कुछ कविताएँ, थोडे कपडे, और ज़ाहिर है - एक गिटार -- क्योंकि उसके बिना मैं दुनिया को कैसे बचाती, और मैने सोचा कि मैं बस अब अफ़्रीक में काम शुरु कर दूँगी।
पर आने के कुछ ही दिनों की भीतर मुझे बताया गया, वो भी सीधे मेरे मुँह पर, कई पश्चिमी अफ़्रीकन औरतों द्वारा, कि अफ्रीका को किसी की ज़रूरत नहीं है, बहुत बहुत धन्यवाद, मगर आपकी तो बिलकुल भा नहीं है। मैं बहुत छोटी थी, शादी भी नहीं हुई थी, न ही कोई बच्चे थे, और मुझे अफ़्रीक के बारे में खास नहीं पता थी, मेरी फ़्रेंच एकदम बेकार थी। और इसलिए, वो मेरे जीवन का बहुत ही दर्द-भरा और दुःखदायी समय था। और तब भी वो समय मुझमें ये बडप्पन ला पाया कि मैं दूसरे को सुन सकूँ।
मुझे लगता है कि असफ़लता प्रोत्साहन की बहुत ही बडी ताकत बन कर उभर सकती है, और इसलिये मै कीन्या चली गयी, और युगान्डा में काम करने लगी, और वहाँ मुझे रवान्डा की औरतों का एक समूह मिला, जिन्होंने मुझसे कहा, १९८६ में, कि मैं किगालि आ कर उनके लिये एक लघु-ऋण की संस्था शुरु करूँ। तो मैने वही किया, और हमने उसका नाम रखा ड्यूटेरिम्बरे, जिसका अर्थ होता है ''उत्साह से आगे बढना"। और जब हम इसे बना रहे थे, मुझे महसूस हुआ कि एसी बहुत सी व्यावसायिक इकायियाँ नहीं थीं जो कि औरतों द्वारा शुरु की गयी हो, और इसलिये शायद मुझे एक व्यावसायिक इकाई चलानी चाहिये। और खोज़बीन से पता लगा कि एक बेकरी है, जिसे २० वेश्याएँ मिल कर चलाती हैं। और क्योंकि मुझे ये अजीब लगा था, मैं उनसे मिलने चली गयी, और वहाँ मुझे २० गैर-शादीशुदा माँएं मिली जो कि किसी तरह जीवन चला रही थीं।
और ये मेरे लिये भाषा की ताकत को समझने की शुरुवात थी, और हम सिर्फ़ एक गलत शब्द (वेश्या) का प्रयोग करके लोगों को स्वयं से दूर कर देते हैं, और उन्हें छोटा बना देते हैं। मैने ये भी पाय कि वो बेकरी बिल्कुल भी व्यवसाय की तरह नहीं चलायी जाती थी, बल्कि, वो एक पारंम्परिक धर्माथ संस्था की तरह एक अच्छी नियत वाले व्यक्ति द्वार चलायी जाती थी जो कि हर महीने करीब ६०० डॉलर का खर्चा इस पर करता था जिससे कि इन २० महिलाओं को हस्तशिल्प और बेकरी का सामान बनाने के बहाने रोज़गार मिलता रहे, और ये वही २० रुपैये प्रतिदिन पर जीवित रहें, गरीब की गरीब । तो मैने इन औरतो के साथ एक सौदा किया। मैनें कहा, "देखो, हमें ये धर्माथ संस्था के तरह काम करना बंद करना होगा और इसे एक व्यवसाय की तरह चलाना होगा, और इसमें मैं तुम्हारी मदद करूँगी।" वो लोग थोडी घबराहट के साथ मान गये, और हमने घबराते हुए शुरुवात कर दी, ज़ाहिर है कि काम करना सिर्फ़ कह देने से ज्याद मुश्किला होता है।
हमने सोचा कि सबसे पहले हमें एक बिकी करने वाला दल बनान होगा, और हमें ये नहीं आता है, तो ऐसा करते हैं कि --- मैने ये सारा प्रशिक्षण दिया, और उसका सार ये था कि जब मैं गलियों मे निकली, न्यामिराम्बो की, जो कि किगाली की एक प्रसिद्ध जगह है, एक बाल्टी के साथ, और जब मैनें लोगों को सामान बेचा, और वापस आयी, और मैनें कहा, "देखा, ऐसे बेचते हैं!" तो उन औरतों ने कहा, "देखो, जकलिन, न्यामिरम्बों में कौन ऐसा होगा जो कि एक नारंगी बाल्टी ले कर चलती हुई लम्बी अमरीकी औरत के हाथ से सामान खरीदना नहीं चाहेगा?" (हँसी) ये बात सोलह आने सही थी ।
तो फ़िर मैने वही अमरीकी तरीका अपनाया, कि हमारे प्रतिद्वन्दी कौन है, कार्यदल कौन है, अकेले क्या करना होगा। और वो पूरी तरह असफ़ल हुआ, मगर धीरे धीरे इन औरतों ने अपने हिसाब से बेचना सीख लिया। और उन्होंने बाज़ार की माँग को भी सुनना शुरु किया, और फ़िर उन्होंने फ़ैसला किया कि केले और कसावा के चिप्स बना कर बेचेंगे और ज्वार की रोटी भी, और पलक झपकते ही हमने किगालि की बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया था, और ये औरतें राष्ट्रीय औसत आय से तीन से चार गुना अधिक कमा रही थीं। और इस नये विश्वास के साथ, मैने सोचा, कि वक्त आ गया है एक असली बेकरी बनाने का, तो चलो पेन्ट करते हैं। और औरतों ने कहा, "ये बढिया रहेगा।" और मैनें पूछा, "अरे, हम कौन से रँग से रगेंगे?" उन्होंने कहा, "आप ही बता दीजिये।" और मैने कहा, "नहीं,नहीं, मै आपकी बात सुनना सीख रही हू -- आप ही बताइये। ये आपकी बेकरी है, आपकी गली है, आपका देश है, मेरा नहीं।" मगर उन्होंने कोई जवाब ही नहीं दिया। तो एक हफ़्ता बीत, फ़िर दो हफ़्ते, और फ़िर तीन हफ़्ते निकल गये, और हार कर मैने कहा, "नीला रँग कैसा रहेगा?" और उन सब ने कहा, "हाँ हाँ, नीला बहुत सुन्दर होग, चलो नीला ही रँग देते हैं।" तो मै दुकान पर गयी, और गौडेन्स नाम की औरत को साथ ले गयी, क्योंकि वो सबसे नटखट थी और हम ढेर सारा पेंट और परदे बनानेके लिये कपडा ले कर आये, और निर्धारित दिन पर हम सभी न्यामिरम्बो में इकट्ठे हुए, और ये सोचा कि हम उसे सफ़ेद पेंट करेंगे नीली पट्टियों के साथ, बिलकुल किसी फ़्रेन्च बेकरी की तरह. मगर वो उतना मस्ती भरा नहीं था जितना कि पूरी दीवार को नीले रँग से रँग डालना।
तो फ़िर सब नीला नीला हो गया। एकदम नीला; दीवारें भी नीली, खिडकियाँ भी नीली, और बाहर का गलियारा भी नीला। और अरीथा फ़्रेंकलिन चीख रही थी " आर ई एस पी ई सी टी - रेस्पेक्ट"" (आत्म-सम्मान) और औरतें कमर मटका रही थीं और छोटे बच्चे पेंट के ब्रश को छीनने की कोशिश कर रहे थे, मगर वो दिन उनक अपना दिन था। और उसके अंत में, हम गली के दूसरे तरफ़ खडे हो कर देख रहे थे, कि हमने क्या किया है, और मैने कहा, "य तो बहुत खूबसूरत है," और सारी औरतों ने कहा, "हाँ, सच में खूबसूरत है।" और मैने कहा, "और ये रँग भी एकदम ठीक चुना गया है," और उन सब ने हामी भरी, सिवाय गाडेन्स के, तो मैनें पूछा, "क्या हुआ?" और उसने कहा, "कुछ नहीं," और मैने फ़िर पूछा, "क्या?" तो उसने कहा, "देखिये, रँग सुन्दर है, मगर हमारा (यूनीफ़ार्म का) रँग तो हरा है।" और -- (हँसी).
और मुझे ये पता लगा कि दूसरों को सुनने में सिर्फ़ धैर्य ही काम नहीं आता है, क्योंकि जब आप सारी ज़िन्दगी दूसरों की दी गयी सहायता पर काटते है, तो कुछ भी फ़ैसला ले पाना मुश्किल होता है। और क्योंकि कभी किसी ने आपसे कुछ पूछा ही नहीं होता है, जब वो ऐसा करते हैं, तो आपको विश्वास ही नहीं होता है कि वो वाकई सच जानना चाहते हैं। और मैने ये सीखा कि सुनने के लिये सिर्फ़ इंतज़ार करना ही काफ़ी नहीं होता है,, बल्कि ये भी ज़रूरी है कि आप सही प्रश्न पूछें ।
तो, मैने किगालि में करीब दो वर्ष बिताये, यही सब करते हुए, और वो मेरे जीवन का असाधारण समय था। और उसने मुझे कुछ चीज़े सिखायी जो मुझे लगता है हमारे लिये आज जाननी ज़रूरी हैं, और जो काम मैं करती हूँ, उसमे तो बेहद ज़रूरी । सबसे पहली बात ये कि आत्म-सम्मान मानव के लिये धन से ज्यादा महत्वपूर्ण है। जैसा कि एलेनी ने कहा, जब लोगों के पस आय होती है, तब ही उनकी पास विकल्प होते हैं, और ये आत्म-सम्मान के लिये मूल आवश्यकता है। पर इंसान होने के नाते, हम एक दूसरे को देखना चाहते हैं, और एक दूसरी द्वारा सुने जाने के इच्छुक होते हैं, और हमें ये कभी भी नहीं भूलना चाहिये। दूसरी बात ये कि पारंपरिक पर्माथ और धर्माथ और सहायता राशि से कभी भी गरीबी के समस्याये ख्त्म नहीं होंगी।
और क्योंकि एन्ड्रीयू ने इसके बारे में विस्तार से बताया है, मैं तीसरी बात पर आती हूँ, जो कि ये है कि केवल बाज़ार भी गरीबी की समस्या को सुलझा नहीं पायेगा। हाँ, हम इसे व्यवसाय की तरह ही चलाते थे, मगर कहीं ने कहीं से निःस्वार्थ सहायता भी चाहिये थी जो कि ट्रेनिंग और प्रबंधन के रूप में मिली, योजना बनाने में मदद करने के लिये मिली और शायद सबसे ज़रूरी रूप में, नये लोगों से जान-पहचान, परिचितों के ताने-बाने, और नई बाज़ारों तक पहुँचने में मिली। तो इसलिये, इकाई के स्तर पर, ये आवश्यक है कि बाज़ार-निहित निवेश और परोपकार के बीच संधि स्थापित हो। और बडे स्तर पर, कुछ वक्ताओं ने सुझाव दिया है कि स्वास्थ सेवाओं का भी निजीकरण करा जाना चाहिये। ऐसे पिता की बेटी होने के नाते जिन्हें दिल की बीमारी थी और ये पता लगने पर कि हमारे परिवार की वो हैसियत नहीं थी, जो उन्हें आवश्यक इलाज दे सके, और एक दोस्त के द्वारा मदद किये जाने पर, मुझे पक्का विश्वास है कि सभी लोगों को अच्छे इलाज का अधिकार है उस कीमत पर जो वो दे सकें। मुझे लगता है कि बाज़ार हमें इस का जवाब दे सकता है, मगर साथ ही उसका एक परोपकारी कोण भी होना चाहिये नहीं तो मुझे नहीं लगता कि हमारा समाज वैसा होगा जैसा कि हम चाहते हैं।
और इसलिये, अफ़ीका में मिले अनुभव के आधार पर ही मैनें ये फ़ैसला लिया कि मैं अक्यूमन फ़ंद बनाउँगी, करीब छः साल पहले। ये गरीबों केलिये एक गैर-मुनाफ़ाकारी उपक्रम पूँजी निधि है, और ये वाक्य विरोधाभास से भरा है। मूलतः ये पर्माथ हेतु दान जुटाता है लोगोम से, निगमों से, और संस्थानों से, और फ़िर उसे ऋण देने के लिये या फ़िर पूँजी निवेश के लिये इस्तेमाल करता है मुनाफ़े के लिये या बिना मुनाफ़े के काम करने वाली संस्थाओं में जो कि वहन करने योग्य स्वास्थ सेवा, घर, बिजली, या साफ़ पानी मुहैया करवाता है दक्षिणी अफ़्रीका और एशिया के गरीब लोगों को, जिससे कि वो लोग अपनी इच्छानुसार जीवन यापन करे सकें। हमने अब तक करीब २० मिलियन डॉलर (८० करोड रुपैये) लगभर २० उपक्रमों में लगाये हैं। और ऐसा करके, करीब २०,००० रोजगार के मौके पैदा किये हैं, और करोडों सेवायें लोगो तक पहुँचायी हैं जो कि इसके बिना कभी उन्हें नहीं पा पाते।
मैं आपको दो कहानियाँ सुनाना चाहती हूँ। दोनो ही अफ़्रीका से हैं। दोनो में ही उन उद्यमियों की योजनाओं में पैसा निवेश करने के बारे में हैं जो कि सेवा के लिये वचनबद्ध हैं, और जिन्हें बाजार की जानकारी है। दोनो ही कहानियाँ स्वास्थय-सेवाओं और उद्यमिता के जुडाव की कहानियाँ हैं, और दोनो ही, क्योंकि वे उत्पादन से संबंधित हैं, सीधे रोज़गार पैदा करती हैं, और आय बढाती हैं, और क्योंकि वो मलेरिया से जुडी है, और अफ़्रीका करीब १३ मिलियन डॉलर हर साल मलेरिय के चलते गँवाता है। लोग जैसे जैसे स्वस्थ होते जाते है, वो धनी भी होते जाते हैं।
पहली कहानी है 'एड्वान्सड बायो-एक्स्ट्रेक्टस लिमिटिड' की। ये केन्या की एक लगभग सात साल पुरानी कंपनी है, जिसे एक महान उद्यमी पैट्रिक हेन्फ़्री और उनके तीन साथियों ने शुरु किया था। ये पुराने किसान हैं जिन्होंने कृषि से जुडे उतार-चढाव को देखा है केन्या में लगभग पिछले ३० सालों से। देखिये, ये आर्टमीसिया का पौधा है, और ये आर्टमीसिया का मुख्य अवयव है, जो कि मलेरिया का सबसे बेहतरीन इलाज है। ये चीन और पूर्वी विश्व का मूल पौधा है, परन्तु क्योंकि अफ़्रीका में मलेरिया की बहुतायत है, पैट्रिक और उनके साथियों ने कहा, "चलो,इसे अफ़्रीका लाते हैं, क्योंके ये बहुत फ़ायदेमंद उत्पाद है।" किसानों को इससे मक्के के मुकाबले तीन से चार गुना बेहतर पैदावार मिलती है।
इसलिये, धैर्यवान पूँजी को इस्तेमाल करके, यानि वो पूँजी जो कि वो आसानी से जुटा सके, जिसे बाजार से कम फ़ायदा मिला, और जो कि लम्बे समय तक निवेशित रहने को तत्पर थी, और प्रबंधन, और योजना के हिसाब से निवेशित रहने को तत्पर थी, उन्होंने एक कंपनी बनायी जो कि ७५०० किसानों से उत्पाद खरीदती है। तो कम से कम ५०,००० लोगों का जीवन बदलता है। और मेरे ख्याल से आप में कुछ यहाँ गये होंगे-- इन किसानों को किक-स्टार्ट और टेक्नोसर्व से मदद मिलती है, जो उन्हें और भी स्वाबलम्बी बनाती है। ये उसे खरीदते है, सुखाते है, और इस फ़ैक्ट्री तक लाते है जो कि कुछ भाग में, नोवार्टिस द्वारा दी गयी धैर्यवान पूँजी द्वारा खरीदी गयी थी, जिसकी उस पाउडर में वाणिज्यिक रुचि थी. जिससे कि वो कोआर्टम बना सकें। अक्यूमन इस कंपनी के साथ पिछले करीब साल-डेड साल से काम कर रहा है, एक नयी व्यवसाय-योजना पर, और इस कंपनी को और आगे बढाने पर, प्रबंधन में मदद करके, और उन्हें टर्म-शीट बनाने और पूँजी जुटाने में मदद करके। और मुझे समझ आया कि धैर्यवान पूँजी की भावात्मक महत्ता क्या है, पिछले महीने के आसपास। क्योंकि ये कंपनी केवल दस दिन दूर थी ये साबित करने से कि जो उत्पाद उन्होंने बनाया है, वो विश्व-स्तर का है कोआर्टम बनाने के लिये, जबकि वो अपने इतिहास की सबसे बडी नकदी से जुडी समस्या से भी जूझ रहे थे।
और हमने, हम जितने भी सामाजिक निवेशकर्ताओं को जानते थे, सबसे बात की। देखिये, इनमें से कुछ सामाजिक निवेशकर्ता वाकई अफ़्रीका में रुचि रखते हैं और खेती-बाडी का महत्व समझते हैं, और उन्होंने कई किसानों की मदद भी की है। लेकिन हमारे ये बताने पर भी, कि इस कंपनी के बंद होने का मतलब होगा, सारे के सारे ७५०० लोगों का बेरोज़गार हो जाना, कभी कभी व्यावसायिक और सामाजिक सोच में बहुत फ़र्क आ जाता है। और अब समय आ गया है कि हम और रचनात्मक हो कर सोचें कि उन दोनो का मिलन कैसे हो सकता है। तो अक्यूमल ने, एक नहीं बल्कि दो, ब्रिज लोन दिये, और अच्छी खबर ये है कि न सिर्फ़ उन्होंने अपने उत्पाद के विश्व-स्तर को साबित ही किया, वो आजकल २० मिलियन डॉलर के एक निवेश के अंतिम चरण में हैं, और मुझे लगता है कि ये पूर्वी अफ़्रीका की महत्वपूर्ण कंपनियों में से एक होगी।
ये सैमुअल हैं। ये एक किसान हैं। ये असल में किबेरा झुग्गी में रहते थे जब इनके पिता ने इन्हें आर्टमीसिया के बारे में, और उससे जुडी संभावनाओं के बारे में बताया। तो वो वापस खेती-बाडी में लग गये, और संक्षेप में, अब उनके पास करीब सात एकड का खेत है। सैमुअल के बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढते हैं, और अब वो और भी किसानों को इस धंधे के बारे में बता रहे हैं -- आत्म-सम्मान धन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
और अब दूसरी कहानी, जो कि आप में से कई को पता भी होगी। मैनें इसके बारे में ऑक्सफ़ार्ड में बात की थी, करीब दो साल पहले, और आप में से कुछ लोग ए टू ज़ेड उत्पादन में गये भी हैं, ये भी पूर्वी अफ़्रीका की कुछ महान कंपनियों में से एक है। ये भी स्वास्थय और उद्यमिता के जोड पर खडी है। और ये कहानी निजी और सरकारी प्रयासों के साथ आनी की एक सफ़ल कहानी है। ये कहाने जापान में शुरु हुई। सुमितोमो ने एक ऐसे तकनीक अविष्कार किया जो कि पोलिथीन के धागे में एक कीटनाशक दवाई भर सकने में सक्षम थी, लिहाजा आप ऐसा मच्छरदानी बना सकते थे, जो कि पाँच साल चले, और जिसे बार-बार कीटनाशक में डुबोना भी न पडे।
ये बदलाव ला सकती थी, पर आर्टमीसिया की ही तरह, इसे भी केवल पूर्वी अफ़्रीका में ही बनाया गया, और सामजिक जिम्मेदारी के तहत सुमिटोमो ने कहा, "क्यों न हम ये प्रयोग करें कि इसे क्या हम अफ़्रीक में अफ़्रीकनों के लिये बना सकते हैं?" यूनिसेफ़ ने आगे बढ कर कहा, "हम ज्यादातर मच्छरदानियों को खरीद लेंगे और फ़िर उन्हें हम ग्लोबल फ़न्ड और यू.एन. की गर्भवती महिलाओं और बच्चों को दी जाने वाली मदद के रूप में मुफ़्त बाँटेंगे।" अक्यूमन इसमें अपनी धैर्यवान पूँजी ले कर आया, और हमने इसके लिये उपयुक्त उद्यमी को ढूँढने में भी मदद की, जिसके साथ हम सब साझेदारी करेंगे अफ़्रीका में, और एक्सोन ने इसके लिये प्रारंभिक गोंद मुहैया करवायी।
और उद्यमी को ढूँढ्ने में, हमें सारी धरती पर अनुज शाह से बेहतर कोई नहीं मिल सकता था, ए टू जेड उत्पादन कंपनी में। ये चालीस साल पुरानी कंपनी है, इसे उत्पादन की समझ है। और इसने समाजवादी तनज़ानिया से पूँजीवादी तनज़ानिया, के बदलाव को झेला है। इसमें करीब १,००० कर्मचारी थे जब इसे हमने शुरु किया। और फ़िर, अनुज ने अफ़्रीका में इसमे एक उद्यमी की तरह खतरा मोल लिया। और एक सामाजिक उत्पाद बनाया जो कि एक मददगार संगठन ने खरीद लिया मलेरिया के खिलाफ़।
और फ़िर संक्षेप में, वो बहुत सफ़ल हैं। पहले साल ही में, पहली मच्छरदानी अक्टूबर २००३ में बनी। हमने सोचा था कि हम स्वयं को सफ़ल मानेंगे यदि हम १५०,००० मच्छरदानियाँ हर साल बना सके। इस साल हम ८ मिलियन मच्छरदानियाँ प्रतिवर्ष की दर परा बना रहे हैं। और करीब पाँच हज़ार लोगों को रोज़गार दे रहे हैं, जिसमें से ९० प्रतिशत औरतें है, और ज्यादातर अप्रशिक्षित। ये सुमोटोमो के साथ मिला-झुला उपक्रम है। और इसलिये, उद्यमिता की नज़र से अफ़्रीका में, और समाज के स्वास्थय की नज़र से, ये असली सफ़लता है।
लेकिन ये अधूरी कहानी है अगर हम गरीबी की समस्या सुलझाने की बात करते हैं, क्योंकि ये दीर्घकालिक रूप से कायम रहने वाली नहीं है। ये ऐसी कंपनी है जिसका कि सिर्फ़ एक ही बडा ग्राहक है। और मान लीजिये कि एवियन फ़्लू, या ऐसे ही किसी और कारण से यदि ये फ़ैसला हो गया कि मलेरिया पर काम करना उतना ज़रूरी नहीं है, तो सब चौपट। और इसलिये, अनुज और अक्यूमन इसका निजी क्षेत्र में प्रयोगात्मक तौर पर परीक्षण करना चाहते हैं, क्योंकि मददगार संगठन द्वारा ये माना गया है कि, देखो, तनज़ानिय जैसे देश में, करीब ८० प्रतिशत आबादी प्रतिदिन दो डॉलर से भी कम कमाती है। जबकि इसे बनाने की ही कीमत करीब छः डॉलर आती है, और इसे उपयोगकर्ता तक पहुँचाने में और छः डॉलर लगते है, तो बाज़ार में इसकी कीमत करीब १२ डॉलर प्रति मच्छरदानी होगी। ज्यादातर लोग इसे खरीद नहीं सकते, इसलिये चलिये इसे मुफ़्त बाँट देते हैं। और हमने कहा, "रुकिये, एक और तरीका हो सकता है।" बाज़ार को एक श्रवण-यंत्र की तरह इस्तेमाल करते है, और ये समझने की कोशिश करते है कि लोग इसके लिये कितना दे सकते है, जिससे कि लोगों को अपने मन-मुताबिक फ़ैसला लेने का अधिकार मिले। और फ़िर हम स्थानीय स्तर पर आवंटन शुरु कर सकते हैं, और असल में, सरकारी क्षेत्र में ये कम कीमत में मिलेगा।"
और हम धैर्यवान पूँजी के निवेश के दूसरे दौर में आये, एक ऋण और एक मदद दोनों के रूप में, जिस से कि ए टू जेड कीमत के साथ खेल सके और बाजार को सुन सके, और हमें कई सारी बातें पता चली। पहली ये कि अलग अलग लोग अलग अलग कीमतें देंगे, पर यदि कीमत एक डॉलर हो तो, कई एक लोग आगे आयेंगे और खरीदने का निर्णय करेंगे। और जब आप सुनने को तैयार होते है, तो लोगों के पास कहने के लिये बहुत कुछ होता है कि उन्हें क्या पसंद है, और क्या नहीं, और ये कि कुछ माध्यम जो हमने सोचे थे कि काम करेंगे, सफ़ल नहीं हुए। पर क्योंकि बाज़ार के साथ प्रयोग करने और भूलें करने की अनुमति थी, क्योंकि पूँजी का स्वभाव धैर्यवान था, हम पता लगा पाये कि निजी क्षेत्र में एक डॉलर लगेगा इसे बाँटने में, और एक डॉलर लगेगा इसे खरीदने में। और इसलिये, योजना के नज़रिये से, जब आप बाज़ार से शुरुवात करते हैं, तो आपके पास विकल्प होता है। आप १२ डॉलर लगेगा ये सोच कर बैठे रह सकते है, और ग्राहक को मुफ़्त बाँट सकते हैं, या फ़िर कम से कम प्रयोग तो कर ही सकते है कुछ लोगों से एक डॉलर ले कर, जिससे कि सरकारी क्षेत्र को छः डालर कीमत आये, लोगों को विकल्प का आत्म-सम्मान मिले, और एक आवंटन तंत्र बने जो कि समय के साथ, आत्म-निर्भर हो जाये।
हमें इस प्रकार सोचना आरंभ करना होगा, और मुझे नहीं लगता कि बाजार का उपयोग करने का इससे बेहतर रास्ता हो सकता है, और लोगों को उसके हिसाब से रह पाने में मदद करने का। जब भी मैं ए टू जेड जाती हूँ, मै अपनी दादी स्टेला के बारे में सोचती हूँ। वो काफ़ी हद तक इन औरतों जैसी ही थीं, जो कि इन सिलाई-मशीनों पर काम कर रही हैं। वो ऑस्ट्रिया के एक फ़ार्म पर पली बढी थीं, बेहद गरीबी में, कुछ खास शिक्षा भी नहीं हुई थी। वो अमरीका आ गयीं जब वो मेरे दादा से मिलीं, जो कि सीमेंट पीसने का काम करते थे, और उनके नौ बच्चे हुए, जिसमें से तीन बचपन में ही मर गये। मेरी दादी को टीबी की बीमारी थी, और वो एक सिलाई-कारखाने में काम करती थीं करीब १० सेंट प्रति घन्टे के हिसाब से कमीजें बनाती थीं। वो, ए टू जेड में काम करने वाली तमाम औरतों की तरह ही, हर दिन बहुत मेहनत करती थी, और समझती थीं कि दर्द क्या होता है, भगवान में विश्वास रखती थीं, और अपने बच्चों से प्यार करती थीं और कभी भी दया का दिया एक भी पैसा नहीं स्वीकार करती थीं। पर क्योंकि उनके पास बाजार की पहुँच था, और वो ऐसे समाज में रहती थीं जो कि सुरक्षा देता था स्वास्थय और शिक्षा की, उनके बच्चे और नाती-पोते ऐसी ज़िन्दगी जी सके जिसमें एक साधना थी, और जो कि सच्चे सपने साध सकते थे।
मैं अपने बहन-भाइयों को देखती हूँ - और मैं कहती हूँ, हमारे जैसे कई और लोग हैं-- और मैं शिक्षकों, संगीतज्ञों, डिजाइनरों, और फ़ंड-मैनेजरों को देखती हूँ। एक बहन जो कि दूसरों की इच्छाओं को सच कर देती हैं। और मेरी इच्छा, जब मैं इन औरतों को देखती हूँ, और उन किसानों से मिलती हूँ, और मैं इस महाद्वीप पर रहने वाले तमाम लोगों के बारे में सोचती हूँ जो रोज़ाना बहुत मेहनत करते हैं, ये है कि उनके पास विकल्प हों और संभावनाएँ हों, और उन्हें विश्वास हो, और सेवाओं तक उनकी पहुँच हो जिससे कि उनके बच्चे भी किसी उद्देश्य या प्रयोजन से भरा जीवन जी सकें। ये इतना मुश्किल काम नहीं है। पर इसमें हम सब को वचनबद्ध होना होगा बेकार की पूर्वधारणाओं से आगे सोचने के लिये, अपने विचारों की कैद से बाहर आने के लिये। इसमें उन उद्यमियों पर निवेश करना होगा जो कि प्रतिज्ञाबद्ध हैं सेवा के लिये, और सफ़ल होने के लिये। हमें अपनी दोनो बाहों को विस्तार से फ़ैलाना होगा, और बदले में बहुत कम अपेक्षा करनी होगी, पर जवाबदेही पर ज़ोर देना होगा, और काम करने वालों में जिम्मेदारी की आदत डालनी होगी। और सबसे ज्यादा, हर चीज़ से ज्यादा ज़रूरी है कि हम सब में हिम्मत और धैर्य हो, चाहे हम गरीब हों या अमीर, अफ़्रीकन हों या गैर-अफ़्रीकन, स्थानीय हों या प्रवासी, वामपंथी हों या पूँजीवादी, एक दूसरे की बात सुन सकने का। धन्यवाद। (तालियों सहित अभिवादन)
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जैकलिन नोवोग्रात्ज़ कुछ कहानियों के सहारे बताती हैं कि कैसे धैर्यवान पूँजी द्वारा विश्व के अत्यधिक गरीब लोगों तक स्थायी रूप से नौकरियाँ, सुविधायें -- और आत्म-सम्मान पहुँचाया जा सकता है।
Jacqueline Novogratz founded and leads Acumen Fund, a nonprofit that takes a businesslike approach to improving the lives of the poor. In her new book, The Blue Sweater, she tells stories from the new philanthropy, which emphasizes sustainable bottom-up solutions over traditional top-down aid. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Anshul Tyagi
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Failure can be an incredibly motivating force.” (Jacqueline Novogratz)
16:51 Posted: May 2008
Views 342,504 | Comments 100
20:13 Posted: May 2007
Views 241,207 | Comments 95
18:00 Posted: Oct 2006
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