मैं एक कहानी से शुरुवात करना चाहती हूँ, सेठ गोदिन की तरह, उन दिनों की कहानी जब मैं १२ साल की थी । मेरे अंकल एड ने मुझे एक खूबसूरत नीला स्वेटर दिया था -- कम से कम मुझे तो वो सुंदर ही लगता था। और उसमें पेट वाले हिस्से पर चलते हुए ज़ेबराओं का धुँधला डिज़ाइन बना था, और किलिमंज़ारो पर्वत और मेरु पर्वत सीने के आसपास थे, मगर वो भी धुंधले से। और मैं उसे पहनने को आतुर रहती थी, मुझे अपनी सारी चीज़ों में वो सबसे कमाल का लगता था।
नवीं कक्षा के उस दिन तक, जब मैं बहुत सारे फ़ुट्बाल खिलाडियों के साथ खडी थी। और ज़ाहिर है कि मेरा शरीर बदल रहा था, और मैट मुसोलिना, जिस से हाई-स्कूल में मेरी हमेशा स्पर्धा रहती थी, ने गूँजती हुई आवाज़ में कहा कि अब हमें स्किंग के लिये दूर जाने की ज़रूरत नहीं पडेगी, क्योंकि हम सब नोवाग्रात्ज़ पर्वत पर स्कींग कर सकेंगे। (हँसी) और मुझे इतना अपमान और शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैं सीधे भाग कर अपनी माँ के पास गयी और उनसे झगडा किया कि उन्होनें मुझे ये घटिया स्वेटर क्यों पहनने दिया। हम गुड्विल गये और हमने उस स्वेटर को फ़ेंक दिया काफ़ी आयोजित से तरीके से, मैने सोचा था कि अब मुझे ना तो उस स्वेटर के बारे में कभी सोचना है न ही उसे कभी देखना है।
ठीक ग्यारह साल बाद, मैं २५ साल की हो चुकी थी। मैं किगाली, रवांडा में काम कर रही थी, और ढलान पर दौडते हुए मैने देखा कि मुझसे सिर्फ़ दस फ़ीट की दूरी पर, एक छोटा सा ११ साल का लडका -- मेरी तरफ़ भाग रहा था, मेरा ही स्वेटर पहने हुए। और मैने सोचा, नहीं, ये तो हो ही नहीं सकता। पर उत्सुक्तावश, मैं उस लडके के पास गयी - और बिल्कुल उस बेचारे बच्चे के होश उडाते हुए - उसका कॉलर पकड कर उलट कर देखा, और वहाँ मेरा नाम था उस स्वेटर के कॉलर पर लिखा हुआ।
मैं ये कहानी हमेशा बताती हूँ, क्योंकि इसने हमेशा ही मुझे एक उदाहरण दिया है इस बात का कि हम किस हद तक जुडे हुए हैं अपनी धरती पर रहने वाले सब लोगों से। हम अक्सर नज़रअंदाज़ करते है कि हमारे शामिल होने, और हमारी तटस्थता से उन लोगों पर क्या असर पडेगा जिन्हें हमें लगता है कि हम कभी नहीं देखेंगे, न जानेंगे। मैं इस कहानी को इसलिये भी कहती हूँ क्योंकि ये एक बडी संदर्भीय कहानी है इस बात की, कि अनुदान आखिर क्या है, और क्या हो सकता है। कि कैसे ये स्वेटर वर्जिनिया के गुड्विल तक पहुँचा, और वहाँ से और बडी इकाई में, जो कि उस समय दसियों लाख टन पुराने कपडे अफ़्रीका और एशिया में पहुँचा रही थी। जो कि एक बहुत ही सार्थक काम था, सस्ते वस्त्र उपलब्ध करवाना। और ठीक उसी समय, रवांडा में तो निश्चय ही, उसने स्थानीय कपडा बाज़ार का क्रिया-कर्म कर डाला। मैं ये नहीं कह रही कि कपडे नहीं बँटने चाहिये थे, मगर ये कि हमें उन प्रश्नों के बेहतर उत्तर देने होंगे जो कि उस समय उठते हैं जब हम सोचते हैं निष्कर्शों और प्रतिक्रियाओं के बारे में।
तो, मैं रवांडा में बिताये अपने १९८५ और १९८६ साल पर ही रहूँगी, जहाँ कि मैं दो काम कर रही थी। मैनें २० अविवाहित माओं के साथ मिल कर एक बेकरी शुरु की थी। हमें "बेड न्यूज़ बियर्स" कहा जाता था, और हमारा ध्येय थी कि हम किगाली के चाट-पकोडे के धंधे के उस्ताद बन जायें, जो कि इतना कठिन नहीं था क्योंकि हम से पहले कोई बाज़ार में था ही नहीं । और क्योंकि हम एक अच्छी योजना पर काम कर रहे थे, हम उस्ताद हो भी गये, और मैनें, छोटे स्तर पर ही सही, इन औरतों का रूपांतरण होते देखा। पर उसी समय, मैने एक लखु-वित्त बैंक (micro-finance bank) भी शुरु किया था, और कल इकबाल क़ादिर "ग्रामीण" के बारे में बात करेंगे, जो कि सारे लघु-वित्त बैंको के पिता हैं, जो कि अब एक अखल विश्व में होती क्रांति है - हर गली कूचे में - मगर तब ये एक नयी चीज़ थी, ख़ासकर ऐसी वित्त-व्यवस्था में जो कि वस्तु-विनिमय से व्यवसाय की ओर बढना ही शुरु कर रही थी।
हम बहुत सी चीज़ें सही कर पा रहे थे। हमने एक विधिवत व्यवसाय योजना पर ध्यान केंद्रित किया, और जान की बाज़ी लगा कर काम किया। औरतें ही ये तय करती थीं कि अंततः उन्हें कैसे इस ऋण की सुविधा का इस्तेमाल करना है अपना व्यापार बढाने में, और अपनी कमाई बढाने में जिससे कि वो अपने परिवारों का बेहतर ख्याल रख सकें।
हमें जो समझ नहीं आया, और जो हमारे आसपास हो रहा था, जाति-आधारित विवादों, फ़ैलते डर के माहौल और अनुदान के खेल की मिलीभगत को, अगर आप ध्यान से देखें, जो कि धीरे-धीरे फ़ैल रही थी= ज्यादातर अदृश्य रूप में मगर निश्चय ही रवांडा में वास्तविक रूप में, और ये कि उस समय, रवांडा के पूरे बजट का ३० प्रतिशत विदेशी अनुदान था। रवांडा में नरसंहार १९९४ में हुआ, उस पल के सात साल बाद जब ये औरतें एकजुट हुईं इस सपने को पूरा करने के लिये। और बढिया ख़बर ये है कि हमारी संस्था, हमारा बैंक, उसके बाद भी जीवित रह सका। और तो और, वो बहाली के लिये ऋण देने वाला रवांडा का सबसे बडा संस्थान बना। हाँ, बेकरी ज़रूर जड से ख्त्म हो गयी थी, पर मैनें उस से सीखा कि जवाबदेही काम करती है -- मुझे जमीन पर लोगों के साथ मिल कर कुछ बनाने का मौका मिला, व्यावासायिक योजनाओं के चलते, जहाँ, जैसा कि स्टीवन लेविट कहेंगे, "बेहतर काम, बेहतर फ़ायदा" का सिद्धांत काम करता है। समझिये, कि हम चाहे कितने भी पेचीदा क्यों न हों, प्रेरित होने पर आगे बढेंगे ही।
तो जब क्रिस ने मुझे दिखाया कि कितना बढिया काम इस दुनिया में हो रहा है, और ये कि हम सामाजिक चेतना को जागृत कर रहे हैं, मैं एक तरफ़ तो उस से सहमत हुई, और बहुत उत्साहित हुई जो भी जी-८ के साथ हुआ, उसे देख कर -- कि ये संसार, टोनी ब्लेयर और बोनो और बॉब गेडोल्फ़ जैसे लोगों के कारण -- संसार वैश्विक गरीबी की बात कर रहा है, और दुनिया भर में अफ़्रीका की बात हो रही है उस अंदाज़ में, जिसमें आज तक नहीं हुई। ये बिलकुल रोमांचकारी अनुभव है। पर ठीक इसी समय, मुझे जो चिंता रातों को जगाए रहती है वो ये है कि हम जी-८ की उपलब्धियों को देखेंगे -- अफ़्रीका के अनुदान में ५० बिलियन डॉलर का इज़ाफ़ा, माफ़ किये ऋण के रूप में ४० बिलियन डॉलर -- उन जीतों की तरह जो सिर्फ़ पहले अध्याय पर ही अंत होंगी, और हमारी नैतिक जिम्मेदारी से छुटकार दिलाएँगी।
और सच ये है कि, हमें इसे सिर्फ़ पहले अध्याय के रूप में ही देखना होगा, उसकी खुशी मनानी होगी, फ़िर उसे बंद कर के दूसरे अध्याय की तरफ़ बढना होगा जो कि गरजने के बजाय बरसने का अध्याय है - कि कैसे वो करें जिसका आश्वासन दिया है। और यदि आप आज की मेरी बातचीत से सिर्फ़ एक बात याद रखना चाहें, तो वो ये होगी कि गरीबी को जड से ख्त्म करने का एक ही रास्ता है, कि ज़मीनी सच्चाई से जुडी ऐसी प्रणालियाँ बनायीं जाएँ जो ज़रूरी उत्पाद और सेवाओं को गरीबों तक वहनीय दामों में पहुँचायें, वित्तीय रूप से पोषक और तरक्कीशुदा तरीकों से। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हम सच में गरीबी को इतिहास में बदल सकेंगे।
और इसी परिकल्पना ने ही मुझे अपनी उस कोशिश को शुरु करने के लिये प्रेरित किया जिसे अक्यूमन फ़ंड नाम से जाना जाता है, जो कि ऐसी छोटी-छोटी योजनाएँ बना रहा है कि कैसे हम जल, स्वास्थ, और आवास की समस्याओं का पाकिस्तान, भारत, कीन्या, तन्ज़ानिया और मिश्र में निदान करें। और मैं इस बारे में उदाहरणबद्ध तरीके से कुछ और बातें कहूँगी जिससे कि आप समझ सकें कि हम क्या कर रहे हैं। पर इस से पहले कि मैं ये करूँ - और ये भी मेरा चहेता विषय है -- मैं इस बारे में बात करूँगी कि वास्तव में गरीब का क्या अर्थ है। क्योंकि हम अक्सर उनके बारे में ऐसे बात करते हैं मानो वो कोई मजबूत, विशाल जनसमूह है जो कि आज़ादी चाहता है, जबकि सच्चाई बहुत ही अलग और आँखें खोलने वाली है। बडे स्तर पर, पृथ्वी पर करीब चार बिलियन (चार सौ करोड) लोग प्रतिदिन चार डॉलर से कम कमाते हैं।
हम उन सबको गरीब मानते हैं। यदि आप हिसाब लगायें, तो ये संसार की तीसरी सबसे बडी अर्थ-व्यवस्था होगी, और तब भी इन में अधिकांश लोग अदृश्य हैं। जहाँ हम काम करते हैं, वहाँ सामान्यतः लोग करीब एक से तीन डॉलर प्रतिदिन कमाते हैं। लेकिन ये लोग हैं कौन? ये किसान हैं, और कारखाने के कारीगर हैं। ये सरकारी नौकर हैं। ये ड्राइवर हैं। ये घर पर रहने वाले लोग हैं। और इन्हें भी ज़रूरी उत्पाद और सेवाएँ जैसे कि पानी और स्वास्थ-सेवा, या आवास खरीदना पडता है, और ये करीब ३० से ४० गुना ज्यादा कीमत अदा करते है, मध्यवर्गीय लोगों की अपेक्षा -- कम से कम कराँची और नैरोबी के लिये तो ये आँकडा सच है। गरीब भी बढिया फ़ैसले लेना चाहते हैं, यदि आप उन्हें ये मौका दें तो।
देखिये, दो उदाहरण हैं। एक तो भारत से, जहाँ कि करीब चौबीस करोड किसान हैं, जो कि प्रतिदिन दो डॉलर से भी कम कमाते हैं। हम जहाँ औरंगाबाद में काम करते है, ज़मीन असाधारण रूप से सूख चुकी है। वहाँ ऐसे लोग भी है जो कि आधे डॉलर से एक डॉलर के बीच कमाते है। ये गुलाबी कपडों में अमी तबर नाम के सामाजिक उद्यमी हैं। उन्होंने देखा कि कैसे इज़रायल में बडे स्तर पर योजना बना कर काम हो रहा था, और ये सीखा कि ड्रिप-सिंचाई कैसे करें, जो कि पानी को सीधे पौधे की जड में पहुँचाने का एक तरीका है। पर पहले ये सिर्फ़ बडे पैमाने के खेतों में ही संभव था, तो अमी तबर ने इसे एक एकड के आठवें भाग जितने बडे खेत में लगाने लायक बनाया। कुछ एक मूल सिद्धांत हैं -- लघु बनाइये। उसे गरीबों के लिये वहनीय और, असाधारण रूप से बढत लायक बनाइये।
सरिता और उसके पति के इस परिवार ने १५ डॉलर की एक इकाई खरीदी जब वो तीन दीवारों के कमरे में टीन के छत डाल कर बसर कर रहे थे। और एक ही फ़सल के बाद, उन्होंने अपनी कमाई इतनी बढा ली है कि वो अब एक और इकाई खरीद कर चौथाई एकड के दो टुकडों में काम कर सकते हैं। कुछ साल बाद मैं उनसे मिली। और अब वो करीब चार डॉलर प्रतिदिन की कमाई करते हैं, जो कि भारत के मध्यवर्ग के बराबर है, और उन्होंने मुझे पक्की नींव दिखायी जो उन्होंने अभी डाली है अपन घर बनाने के लिये। और मैं गवाह खडी हूँ, उस औरत की आँखों मे बुनते हुए भविष्य की। ये ऐसा कुछ है जिसमें मैं सच में विश्वास रखती हूँ।
आज आप गरीबी की बात मलेरिया-रोधक मच्छरदानियों को अनदेखा कर के नहीं कर सकते, और मैं फ़िर से हार्वाड के जैफ़्री साक्स को इसे बनाने के लिये तहेदिल से शुक्रिया देती हूँ - इसके इस पागलपन से भरे ध्येय के लिये - कि आप पाँच डॉलर में एक जीवन बचा सकते हैं। मलेरिया हर साल कम से कम १० से ३० लाख लोगों की जान लेता है। ३० से ५० करोड लोगों को ये बीमारी हर साल होती है। अंदाजन सिर्फ़ अफ़्रीका में ही करीब १३ बिलियन डॉलर हर वर्ष इस बीमारी की बलि चढता है। पाँच डॉलर से एक जीवन बच सकता है। जब हम लोगों को चाँद पर भेज सकते है, और ये जानना चाहते है मंगल ग्रह पर जीवन है या नहीं -- तो हम ५० करोड लोगों तक पाँच डॉलर में बनी मच्छरदानी क्यों नहीं दे सकते?
प्रश्न ये नहीं है कि हम क्यों नहीं दे सकते, प्रश्न ये है कि हम अफ़्रीकी लोगों को ही स्वयं ये करने में मदद कैसे करें? बहुत सारी बाधायें हैं। पहली: उत्पादन क्षमता बहुत कम है। दूसरी: दाम बहुत ज्यादा है। तीसरी: ये हमारी फ़ैक्ट्री के पास की एक अपेक्षाकृत बेहतर सडक है। आवंटन किसी बुरे सपने जितना भयानक है, मगर असंभव नहीं है। हमने शुरुवात की ३५० हज़ार डॉलर का ऋण दे कर अफ़्रीका के सबसे बडे मच्छरदानी निर्माता को जिसके कि वो जापान से तकनीक खरीद सकें और पाँच साल तक चलने वाली मच्छरदानियाँ बना सकें। ये फ़ैक्ट्री की कुछ तस्वीरें हैं ।
आज, तीन साल बाद, इस कंपनी में हजार और महिलाएँ काम करती हैं। ये करीब ६०० हज़ार डॉलर तन्ख्वाहों के रूप में तनज़ानिया की वित्त-व्यवस्था में देती है। ये तन्ज़ानिया की सबसे बडी कंपनी है। और १५ लाख मच्छरदानियाँ प्रतिवर्ष की दर पर उत्पादन हो रहा है, जो कि इस साल के अंत तक ३० लाख तक पहुँच जाएगा। और अगले साल के अंत तक ये ७० लाख तक पहुँच जायेगा। तो उत्पादन की समस्या पर काम हो रहा है। आवंटन की समस्या पर, अभी भी, एकजुट हो कर, हमें बहुत काम करना है। इस समय, इन मच्छरदानियों का ९५% यू.एन. द्वारा खरीदा जाता है, और फ़िर अफ़्रीका में लोगों को बाँट दिया जाता है। और हम चाहते है निर्माण करना अफ़्रीका के सबसे कीमती संसाधन - लोगों का - उपयोग करके। वहाँ की औरतों की शक्ति का उपयोग करके।
और इसलिये मैं आपको जैकलीन से मिलवाना चाहती हूँ, मेरे ही नाम की हैं, २१ साल उम्र की। अगर इसका जन्म तनजानिया के अलावा कहीं भी हुआ होता, तो मैं साक्षी हूँ, ये लडकी वॉल स्ट्रीट को नचा रही होती। ये दो लाइन चलाती है, और इसने इतना पैसा बचा लिया है कि ये अपनी घर के लिये अग्रणी जमाराशि का भुगतान कर सके। ये करीब दो डॉलर प्रतिदिन कमाती है, एक शिक्षा-निधि तैयार कर रही है, और इसने मुझे बताया कि न तो ये शादी करेगी न ही बच्चे जब तक कि ये इन चीज़ों को पूरा न कर ले। और इसलिये, जब मैने उसे अपनी योजना बतायी -- कि हो सकता है कि हम अमरीका की तरह ही एक समूह में औरतों को बाहर भेज कर ये मच्छरदानियाँ बेच सकें -- उसने तुरंत हिसाब लगाया कि उस से वो कितने पैसे कमायेगी और हमसे जुड गयी।
हमने आई.डि.ई.ओ. (आइडियो), जो कि हमारी चहेती कंपनियों में से हैं, से सीखा और तुरंत इस का एक प्रारूप बनाय, और जैकलीन के पास ले गये, जहाँ वो रहती है। वो अपने साथ दस औरतों को तैयार कर के लाई जिनके साथ वो इन मच्छरदानियों को पाँच डॉलर में बेच कर देखना चाहती थी, लोगों के यह कहने के बावजूद कि कोई इन्हें नहीं खरीदेगा, और हमने बिक्री करना सीखा। ये अजीब ही लगेगा लेकिन, उसने एकदम अंत तक मलेरिया के बारे में बात ही नहीं की। पहले, उसने आराम, रुतबे और सुंदरता के बारे में बात की। उसने कहा, कि इन्हें चाहो तो फ़र्श पर लगा दो, तो घर से कीडे भाग जाते हैं। बच्चे सारी रात आराम से सो सकते है, घर सुंदर दिखता है, अगर आप उन्हें खिडकियों में लगा दें। और अब तो हमने ऐसे पर्दे भी बनाना शुरु कर दिये, और न सिर्फ़ ये सुंदर ही हैं, बल्कि लोग उसे सामाजिक रुतबे से जोड कर भी देखते हैं - कि आप अपने बच्चों की ठीक देखभाल करते हैं। और फ़िर आखिर में उसने अपने बच्चों की जान बचाने के बारे में बात की। ये इस बात की बेहतरीन शिक्षा है कि कैसे हम गरीबों को उत्पाद और सेवायें बेचें।
आखिर में, मैं यह ही कहना चाहूँगी कि हमारे पास गज़ब का मौका है गरीबी को जड-मूल सहित नष्ट कर डालने का। ऐसा करने के लिये, हमें ऐसी व्यावसायिक योजनाओं को अंजाम देना होगा जिनमें बढत का माद्दा हो, और जो अफ़्रीकी और भारतीय लोगों के साथ, और विकासशील देशों के लोगों के साथ काम कर सके, जो कि खुद ये सब करने में सक्षम हैं। क्योंकि अंततः ये उन्हें साथ ले कर चलने की बात है। और ये इस बात को समझने की बात है कि लोगों को भीख नहीं चाहिये. बल्कि वो खुद अपने फ़ैसले लेने की ताकत चाहते हैं, और अपनी समस्याओं का निदान खुद करना चाहते हैं, और उन्हें साथ ले कर चलने से न सिर्फ़ हम उनके लिये ही स्वाभिमान पैदा करेंगे, बल्कि अपने लिये भी। और इसलिये मैं आप सब से विनती करती हूँ कि अगली बार ये ज़रूर सोचें कि इस योजना और मौके का इस्तेमाल जो हमारे पास है - गरीबी को नष्ट कर देने का -- इस प्रक्रिय का हिस्सा बन कर और हम-ऐसे-और-वो-वैसे वाली दुनिया से अलग हट कर और ये समझ कर कि ये हम सब के बारे में है, और हमारे अपने संसार के बारे में है, जिसमें हम रहना चाहते हैं। धन्यवाद। (अभिवादन)
You can share this video by copying this HTML to your clipboard and pasting into your blog or web page. This video will play with subtitles.
You either have JavaScript turned off or have an old version of the Adobe Flash Player. To view this rating widget you
need to get the latest Flash player.
If your browser allows only "trusted sites" to execute Javascript, you should add the "googleapis.com" domain to your whitelist to allow our Flash detection to work properly.
Got an idea, question, or debate inspired by this talk? Start a TED Conversation.
जैकलीन नोवाग्रात्ज़ दुनिया भर के लोगों के अफ़्रीका और गरीबी की समस्या की ओर बढते ध्यान का अभिनंदन करती हैं, पर साथ ही एक नये नज़रिये को अपनाने के लिये बलपूर्वक आग्रह करती हैं।
Jacqueline Novogratz founded and leads Acumen Fund, a nonprofit that takes a businesslike approach to improving the lives of the poor. In her new book, The Blue Sweater, she tells stories from the new philanthropy, which emphasizes sustainable bottom-up solutions over traditional top-down aid. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Vatsala Shrivastava
Comments? Please email the translators above.
18:23 Posted: Aug 2007
Views 330,993 | Comments 90
16:51 Posted: May 2008
Views 435,787 | Comments 118
18:57 Posted: Jun 2007
Views 2,184,642 | Comments 221
Just follow the guidelines outlined under our Creative Commons license.
This comment will be attributed to . Not ? Sign Out.