बात साफ़ है कि हम कठिनाई के दौर में हैं । ये कहा जा सकता है कि वित्त-बाजार असफ़ल रहे हैं और अनुदान-पद्धति ने भी असफ़लता ही दी है। और इसके बावज़ूद, मै दृढता से आशावादियों के साथ खडी हूँ जो ये मानते है कि जीवित होने का आज से बेहतर समय कभी था ही नहीं । कुछ नयी तकनीकों के कारण कुछ नये साधनों के कारण, नये हुनरों के कारण, और ज़ाहिर है कि पूरी दुनिया में दिखती नई प्रतिभा के कारण, जो बदलाव लाने के लिये मानसिक रूप से प्रतिबद्ध हैं। और हमारे राष्ट्रपति भी 'वसुधैव कुटुंबकम' में विश्वास रखते हैं, और ये मानते है कि अब कोई एक देश महाशक्ति नहीं बन सकता है, बल्कि हमें अपनी दुनिया को नये नज़रिये से देखने की ज़रूरत है।
और पारिभाषिक रूप से, इस कमरे में बैठे हर शख्श को खुद को विश्व-आत्मा ही मानना चाहिये, वैश्विक-नागरिक। आप सामने से नेतृत्व करने वाले लोग हैं। और आपने बढिया से बढिया और बुरे से बुरा कृत्य देखा है जो मानवों ने दूसरों के लिये, और दूसरों के साथ किया है। और चाहे आप किसी भी देश में रहते या काम करते हों, आप गवाह होंगे मानवो द्वारा किये गये इन असाधारण कृत्यों के, साधारण आम इंसानों द्वारा किये गये कृत्यों के।
आजकल एक ज़ोरदार बहस चल रही है कि कैसे लोगों को गरीबी से निज़ात दिलाया जाये, कैसे उन में दबी आत्म-शक्ति को प्रवाहित किया जाये। एक तरफ़ ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि अनुदान-प्रणाली इतनी टूट चुकी है कि उसे उखाड फ़ेंकना चाहिये. दूसरी तरक वो हैं जो कहते हैं कि समस्या ये है कि भरपूर अनुदान कभी दिया ही नहीं गया। और मैं ऐसी चीज़ के बारे में बात करना चाहती हूँ जो बाज़ार और अनुदान दोनो है। इसे हम धैर्यवान पूँजी कहते हैं।
आलोचक उँगली उठाते हैं कि ५०० बिलियन डॉलर (बीस हज़ार करोड रुपये) खर्च हो चुके हैं अफ़्रीका पर १९७० से अब तक और पूछते हैं कि हमने क्या पाया सिवाय पर्यावरण के ह्रास के, और अमानवीय स्तर की गरीबी और महामारी जैसे भ्रष्टाचार के? वो मोबोटू का उदाहरण देते हैं। और से नीती बनाने की बात कहते हैं जिससे कि सरकार को जवाबदेह बनाया जाये, पूँजी बाजारों को केंद्र में रख जाये, और दान के बजाय निवेश किया जाये।
दूसरी तरफ़, जैसा कि मैनें कहा, वो हैं जो कहते हैं कि समस्या है कि हमें और पैसा अनुदान में चाहिये। कि रईसों को बचाने के लिये हम राहत-अनुदान देने को तैयार हैं अर बहुत ज्यादा खर्च करते हैं। पर जब बात गरीबों पर आती है, वो हम अपना पल्लू झाड लेते हैं। वो अनुदान की सफ़लता के ओर इशारा करते हैं: बडी चेचक (स्मालपोक्स) के खात्मे की ओर, और कई करोड मच्छरदानियों के वितरण की ओर। दोनों ही सही हैं। और समस्या ये है कि दोनो ही पक्ष दूसरे की बात सुनने को राज़ी नहीं हैं। और इससे भी बडी समस्या ये कि वो उन्हें सुनने को भी तैयार नहीं जिन गरीबों के लिये वो काम करना चाहते हैं।
२५ साल तक काम करने के बाद गरीबी और नवपरिवर्तन के मसलों से जुडे रहने पर, मुझे लगता है कि बाज़ार से जुडे लोगों की संखया इस धरती पर उतनी ही है जितनी कि गरीबों की। गरीबों को भी रोज़ बाज़ारों से रूबरू होना पडता है, छोटे छोटे दर्ज़नों फ़ैसले लेने होते हैं, समाज में अपनी राह बनाते के लिये। और इतनी कडी मेहनत के बावजूद भी सिर्फ़ एक छोटी स्वास्थय समस्या जो उनके परिवार को झेलनी पड जाये, उन्हें वापस गरीबी में धकेल सकती है, कई बार तो कई पीढियों के लिये। और इसलिये हमें बाज़ारों की उतनी ही ज़रूरत है जितनी कि अनुदानों की।
धैर्यवान पूँजी इन दोनों के बीच अपने लिये एक ख़ास जगह बनाती है, और दोनो की बेहतर बातों को स्वयं में समाहित करती है। ये पूँजी वो धन है जिसे उन उद्यमियों को सौंपा गया है जिन्हें अपने समाज की पहचान है और जो हल निकाल रहे हैं समस्याओं का जैसे कि स्वास्थ सेवाएँ, जल-आपूर्ति, आवास, वैकल्पिक ऊर्जा का, गरीबों को सिर्फ़ दया का प्राप्त मानते हुये नहीं, बल्कि उन्हें ग्राहक, मुवक्किल, और उप्भोक्ता का दर्ज़ा देते हुए, गरीबो को अपने जीवन के फ़ैसले लेने की गरिमा देते हुए।
धैर्यवान पूँजी का निवेश चाहता है कि हम में जोखिम उठाने की अविश्वसनीय काबलियत हो, और असाधारण दूरदर्शिता हो जो हमें इन उद्यमियों को समय देने दे, कि वो बाजार में प्रयोग कर के सीख सकें, और ये स्वीकार करें कि हमें बाज़ार-भाव से कम मुनाफ़ा होगा, मगर हम बेहतरीन सामाजिक असर डाल पाएँगे। धैर्यवान पूँजी निवेश ये मान कर ही किया जायेगा कि बाज़ार की अपनी मियादें हैं। और इसलिये धैर्यवान पूँजी कुछ हद तक अनुदान का भी प्रयोग करती है जिस से कि वैश्विक अर्थव्यवसथा के फ़ायदे सब लोगों तक पहुँचें।
देखिये, उद्यमियों को धैर्यवान पूँजी की आवश्यकता तीन कारणों से होती है। पहला ये कि वो ऐसी बाज़ारों में हैं जहाँ लोगों की दैनिक कमाई एक से तीन डॉलरों के बीच है और उन्हें अपने सारे फ़ैसले उसी कमाई के स्तर पर लेने होते हैं। दूसरा ये कि जिन जगहों पर वो काम करते हैं वहाँ बुनियादी सुविधाएँ भी खस्ताहाल हैं। सडकें गायब ही हैं, बिजली कभी आई, कभी नहीं, और जबरदस्त भ्रष्टाचार है। तीसरा ये कि अक्सर वो लोग पूर्णतः नयी बाज़ार बना रहे होते हैं।
यदि आप साफ़ पानी भी पहली बार किसी गाँव में ले जा रहे हैं, वो बिलकुल नयी चीज़ है। और बहुत सारे गरीब लोगों ने बहुत सारे झूठे वादे सुने और झेले हैं, और तमाम ठगों और नकली दवाओं से उनका पाला पड चुका है, कि उनका विश्वास ग्रहण करने में बहुत वक्त लगता है, और धैर्य भी आजमाइश भी होती है। उन्हें ढेरों मदद चाहिये होती है प्रबंधन में भी, न सिर्फ़ नयी प्रणाली बिठाने के लिये, और ऐसे व्यावसायिक ढाँचों को बनाने के लिये जो कि गरीबों तक चिरस्थायी रूप से पहुँचे, पर इन व्यवसायों की पहुँच को दूसरे बाज़ारों तक, सरकारों तक, और बडे निगमों तक विकसित करने में-- सच्ची साझेदारियाँ जो कि काम के पैमाने को विशालता दें।
मैं आपसे एक कहानी बाँटना चाहती हूँ ड्रिप-सिंचाई नाम की एक नवीन तकनीक की कहानी। सन २००२ में मेरी मुलाकात एक महान उद्यमी से हुई भारत के अमिताभ सडाँगी, जो लगभग २० सालों से धरती के शायद सबसे गरीब किसानों के साथ काम कर रहे हैं। और उन्होंने अपनी निराशा ज़ाहिर की कि अनुदान व्यवस्था ने इन गरीब किसानों बिलकुल ही अनदेखा कर दिया था, जबकि ये सत्य है कि करीब २० करोड किसान केवल भारत में ही प्रतिदिन एक डॉलर से नीचे कमाते हैं। और अनुदान या आर्थिक मदद या तो बडे खेतों को मिल रही थी, या फ़िर छोटे किसानों को सिर्फ़ सलाह मिल रही थी वो भी वो जो देने वाली ठीक समझते थे, और किसान उन्हें लागू नहीं करना चाहते थे।
उसी समय अमिताभ भी ड्रिप-सिंचाई की तकनीक में आकंठ डूबे हुये थे जिसका ईज़ाद इज़राइल में हुआ था। ये पानी की थोडी थोडी मात्रा को सीधे पौधे तक पहुँचाने की तकनीक है। और इस तकनीक ने रेगिस्तानों तक को हरे भरे खेतों में तब्दील कर डाला था। और साथ ही बाज़ार-व्यवस्था ने भी गरीब किसानों को अनदेखा कर दिया था। क्योंकि ये तकनीक बहुत महँगी थी, और केवल बडे खेतों में इस्तेमाल के लिये ही बनायी गयी थी। आम छोटे गाँव का किसान ज्यादा से ज्यादा एक या दो एकड खेत में काम करता है।
और इसलिये अमिताभ ने फ़ैसला किया कि वो इस तकनीक को दुबारा विकसित करेंगे उसे गरीब किसानों के लिये उपयोगी बनाने के लिये। क्योंकि उन्होंने किसानों को समझते हुए कई साल बिताये थे, न कि अपनी सोच उन पर थोपते हुए। तो उन्होनें तीन मौलिक सिद्धान्तों का प्रयोग किया।
पहला था लघुकरण, चीज़ को छोटा बनाना। ड्रिप-सिंचाई व्यवसथा को इतना छोटा होना होगा कि एक किसान को केवल चौथाई एकड ज़मीन में ही जोखिम उठाना पडे, चाहे उसके पास दो एकड खेत ही क्यों न हो, क्योंकि असफ़लता का मतलब किसान के लिये भयंकर होता है। दूसरा, उसे बहुत ही सस्ता होना होगा। दूसरे शब्दों मे, चौथाई एकड पर उठाया गया जोखिम एक बार की फ़सल से ही चुकाया जा सके। नहीं तो किसान तकनीक के इस्तेमाल का जोखिम उठाएँगे ही नहीं। और तीसरा, जिसे अमिताभ कहते है बेहद विस्तार के काबिल हो। मेरा मतलब है कि पहले चौथाई एकड के मुनाफ़े से किसान दूसरे के लिये खरीद सकें, और फ़िर तीसरे, और फ़िर चौथे के लिये।
आज, अमिताभ की संस्था, आई.डी.ई., ३०० से ज्यादा किसानों को ये तकनीक बेच चुकी है और उनकी पैदावार और कमाई को औसतन दोगुना या तिगुना कर चुकी है। पर ये अचानक हुआ चमत्कार नहीं है। जब आप शुरुवात पर नज़र डालेंगे, तो पायेंगे कि निजी निवेशक इस नयी तकनीक को बनाने में जोखिम नहीं ले रहे थे वो भी ऐसी बाज़ार के लिये जहाँ लोग प्रतिदिन एक डॉलर से कम कमाते थे, और जोखिम नहीं उठाने के लिये जाने जाते थे, और जो दुनिया के सबसे जोखिम भरे कामों में से एक था, खेतीबाडी।
तो हमने अनुदान दिया। और उन्होने इन अनुदानों का इस्तेमाल शोध, प्रयोग करने, असफ़ल होने, और फ़िर से कोशिश करने में किय। और जब हमारे पास एक नमूना तैयार हो गया और बाज़ार और किसानों के रिश्ते की समझ भी बढ गयी, तब हम धैर्यवान पूँजी तक पहुँचे। और हमने उनकी मदद की, एक कंपनी बनाने में, मुनाफ़े के लिये काम करने वाली, जो कि आई.डी.ई. के ज्ञान को आगे ले जाएगी और निर्यात एवं बिक्री पर केंद्रित होगी, और दूसरी प्रकार के निवेशकों को आकर्षित कर सकेगी।
वहीं, हम ये भी देखना चाहते थे कि क्या हम इस तकनीक को दूसरे देशों को निर्यात कर सकते हैं। तो हम डॉ. सोनो ख़ानघरानी से पाकिस्तान में मिले। और देखिये, हालांकि बहुत धैर्य चाहिये होता है भारत में बनी तकनीक को पाकिस्तान ले जाने में, केवल परमिट लेने में ही, फ़िर भी, हम एक कंपनी शुरु कर पाये डॉ. सोनो के साथ, जो कि एक विशाल समाज विकास संस्था चलाते हैं थार रेगिस्तान में, जो कि उनके देश के सुदूर और सबसे गरीब इलाकों में से एक है। और हालांकि ये कंपनी बस शुरु ही हुई है, हमारा अनुमान है कि यहाँ हम दसियों लाख लोगों पर असर देखेंगे।
और ये केवल ड्रिप-सिंचाई से ही नही है। हम देख रहे है कि सारे संसार में सुखद बदलाव आ रहे हैं। तन्जानिया स्थित अरुशा में, ए टू जेड टेक्सटाइल मन्यूफ़ेक्चरिंग ने हमारे साथ साझेदारी की है, यूनिसेफ़ के साथ, वैश्विक निधियोंके साथ, एक कारखाना लगाने में जिसमें ७००० लोगों को रोज़्गार मिलता है, ज्यादातर स्त्रियों को। और वो २ करोड जीवनदायी मच्छरदानियाँ अफ़्रीका के लिये बनाते हैं।
लाइफ़स्प्रिंग हॉस्पिटल अक्यूमन और भारत सरकार के बीच एक साझा उपक्रम है गुणकारी और सस्ती जच्चा-बच्चा स्वास्थ सेवा को गरीब महिलाओं तक पहुँचवा पाने के लिये। और ये इतना सफ़ल हुआ है कि आजकल हर पैंतीस दिन पर एक नया हॉसपिटल बन रहा है।
और १२९८ अम्बुलेन्स ने ये फ़ैसला किया कि वो दुबारा से एक टूट चुके उद्योग को जीवित करेंगे, बंबई में अम्बुलेंस सेवा को बना कर, जो कि गूगल अर्थ की तकनीक को इस्तेमाल करेगा, और कई एक दामों के स्तर पर काम करेगा जिस से कि सब लोगों को सेवा मुहैया हो सके, और एक कठोर और कडा फ़ैसला किया कि किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में भागी नहीं बनेंगे। यहाँ तक कि नवंबर में हुए आतंकी हमले में सबसे पहले सेवा देने ये ही पहुँचे थे, और अब वो बडे रूप में आ रहे है, सिर्फ़ इस साझेदारी के चलते। हाल ही में उन्हें सरकारी ठेका मिला है करीब सौ नई अम्बुलेन्स बनाने का, और ये ये शायद सबसे बडी और सबसे सुचारु अम्बुलेंस सेवा है भारत में।
बडे पैमाने पर काम करना सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि हम देख रहे हैं कि ये उद्यमी लाखों लोगों तक पहुँच पा रहे हैं। मैने जितने भी उदाहरण दिये हैं, वो सब कम से कम ढाई लाख लोगों तक अपनी सेवाएँ पहुँचा चुके हैं। परंतु सिर्फ़ इतना ही काफ़ी नहीं है। और यहीं पर साझेदारी की बात महत्वपूर्ण हो उठती है। चाहे वो उन नवीन तरीको को ढूँढ कर हो जोकि बाजार की पूँजी तक पहुँच सकते हैं, चाहे सरकार के साथ, या फ़िर निगमों के साथ, आज अविश्वसनीय मौके हैं कुछ नया विकसित करने के।
राष्ट्रपति ओबामा इस बात को बिल्कुल समझते हैं। उन्होंने हाल ही में एक सामाजिक नवप्रवर्तन निधि की घोषणा की है जो इस देश में ढँग से चल रही चीजों पर केंद्रित होगा, और उन्हें बडे पैमाने पर ले जाने के तरीके खोजेगा। और मैं तो ये भी कहूँगी कि समय आ गया है कि कल्पना की जाये ऐसी ही नवप्रवर्तन निधि की जो कि विस्व स्तर पर काम करे, जो कि संसार भर के उद्यमियों को ढूँढे, जिन्होंने कुछ नया किया है, न सिर्फ़ अपने देश के लिये, बल्कि ऐसा कुछ जिसे हम विकसित देशों में भी इस्तेमाल कर सकें। न सिर्फ़ पूँजी ही निवेश कीजिये, बल्कि प्रबंधन सहायता भी दीजिये। और फ़िर उस से हुए फ़ायदे को नापिये, वित्तीय दृष्टिकोण से, और सामाजिक असर के दृष्टिकोण से।
हम जब अनुदान को लेकर अपने नए नज़रिये की बात करते हैं, तो पाकिस्तान पर बात न करना असंभव है। इस देश से हमारी रिश्तेदारी बहुत ऊबड-खाबड रही है और यदि न्यायपूर्ण बात की जाये तो अमरीका बहुत विश्वसनीय साझेदार नहीं रहा है। मगर मैं फ़िर कहूँगी कि वो झण आ गया है जब कि असाधारण चीज़ें होने वाली हैं। और अगर हम वैश्विक नवप्रवर्तन निधि की योजना को लें, तो हम इस समय सीधे सरकार में पैसा सीधे निवेश करने के बजाय, हालांकि हमें उनका सहारा चाहिये होगा, और अंतर्राष्ट्रीय विदों में पैसा लगाने के बजाय, काम कर रहे उद्यमियों में पैसा लगाये, और सामजिक नेताओं में लगायें जो कि पहले से ही गजब के नये तरीके विकसित कर रहे हैं जो कि पूरे देश के लोगों तक पहुँच रहे हैं।
रशानी ज़फ़र जैसे लोग, जिन्होनें देश के सबसे बडे लघुवित्त बैंक को बनाया, और अपने देश की और बाहर की औरतों के लिये आदर्श के रूप में उभरे। और तसनीम सिद्दिक़ि जिन्होनें तरीका निकाला जिसे "बढोत्तरी-आधारित आवास" (incremental housing) कह सकते हैं, जिसके द्वारा उन्होंने चालीस हज़ार झुग्गी निवासियों का सुरक्षित, सस्ते, सामुदायिक आवास योजनाओं में स्थानान्तरण कर पाया है। शैक्षिक क्षेत्र में हुई पहलें जैसे के डी.आई.एल. और सिटिज़न फ़ाउन्डेशन जो कि पूरे देश में स्कूल बना रहे हैं। और ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ये नागरिक संगठन और ये सामाजिक उद्यमी सच में तालिबान के मुकाबले कुछ असली विकल्प पैदा कर रहे हैं।
मुझे पाकिस्तान में निवेश करते हुए सात साल से भी ज्यादा हो चुके हैं और आप में से वो जिन्होंने वहाँ काम किया है ये गवाही दे सकते हैं कि पाकिस्तानी लोग बहुत मेहनती होते हैं। और आगे बढना और तरक्की उनके खून में हैं।
राष्ट्रपति कैनेडी ने कहा था कि जो लोग अहिंसक आंदोलनों को असंभव बना देते हैं, वो साथ ही हिंसक आंदोलनों को ज़रूरी बना देते हैं। मेरे हिसाब से सत्य उसका ठीक उल्टा है। ये कि सामाजिक अगुआ जो कि सच में नवप्रवर्तन की ओर देख रहे हैं और अवसर मुहैया करवा रहे हैं उन सत्तर प्रतिशत पाकिस्तानियों को जो कि प्रतिदिन दो डॉलर से कम कमाते हैं, सच में आशा की ओर असली रास्ते पैदा कर रहे हैं। और हम सोच रहे हैं कि कैसे हम पाकिस्तान के लिये अनुदान का इन्तज़ाम करें, जहाँ न्यायपालिका को मज़बूत बनाने की ज़रूरत है, ज्यादा मज़बूत स्थिरता पैदा करने की ज़रूरत है, वहीं हमें उन नेतृत्व करने वालों को आगे बढाने की भी ज़रूरत है जो कि सारे विश्व के लिये आदर्श बन सकते हैं।
हाल ही में मेरी एक पाकिस्तान यात्रा में मैने डॉ. सोनो से पूछा कि क्या वो मुझे थार रेगिस्तान में ड्रिप सिंचाई का काम दिखाने ले जाएँगे। तो हम एक सुबह कराँची से सूर्योदय के पहले ही निकल गये। करीब ११५ डिग्री फार्हेन्हाइट (४६ डिग्री सेल्सियस) का तापमान था। और हमने करीब आठ घन्टे तक ड्राइव किया ऐसे इलाके में जहाँ लग रहा था कि चाँद पर पहुँच गये हैं बहुत ही कम रँग, बहुत ज्यादा गर्मी, बहुत कम बातचीत क्योंकि हम एकदम ही थके हुए थे।
और अंततः हमारी यात्रा खत्म हुई मुझे दूर क्षितिज पर एक पतली पीली रेखा दिख रही थी। और जब हम नज़दीक आये, तो पूरा माज़रा समझ आया। कि वहाँ रेगिस्तान में बीचोंबीच सूरजमुखी का एक खेत था, जहाँ सात-सात फ़ीट लम्बे पौधे थे। क्योंकि दुनिया के सबसे गरीब किसानों मे से एक को एक ऐसी तकनीक तक पहुँच मिली थी जिसने उसे अपने जीवन को बदल देने में सक्षम बनाय था। उसका नाम था राजा। और उसकी भूरी आँखों में उदारता और चमक थी, और उसके स्नेही बोलते-से हाथों ने मुझे अपने पिता की याद दिलाई।
और उसने कहा कि ये पहली गर्मी है उसकी सारे जीवन में जब कि वो नहीं ले गया है अपने १२ बच्चों और पचास पोते-पोतियों को दो दिन लम्बी रेगिस्तानी यात्रा पर मज़दूरी करने के लिये, एक व्यापारिक खेत पर करीब आधा डॉलर प्रतिदिन पर (रुपये बीस प्रतिदिन) क्योंकि वो इस सूरजमुखी की इस फ़सल को पैदा कर रहा था। और अपने कमाये पैसे की वजह से उसे इस साल ये सफ़र नहीं करना पडा था। और उसके परिवार की तीन पीढियों में, पहली बार उसके बच्चे स्कूल जायेंगे।
हमने उससे पूछा कि क्या वो अपनी बेटियों को भी बेटों के साथ पढने भेजेगा। और उसने कहा, "बिलकुल, मैं भेजूँगा। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि बेटियों के साथ पक्षपात हो।" जब हम गरीबी की समस्या के उपाय सोचते हैं, हम लोगों को उनकी मौलिक गरिमा से अलग न करें। क्योंकि अंततः गरिमा इंसानों की आत्मा के लिये दौलत से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। और ये रोमांचक है कि इतने सारे उद्यमी अलग अलग क्षेत्रों में ऐसे नये प्रयोग कर रहे हैं जो ये समझते हैं कि लोग सच में जो चाहते हैं, वो है आज़ादी और विकल्प और मौके। क्योंकि यहीं से गरिमा की शुरुवात होती है।
मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि बिना बदलाव लाने के ताकत के सिर्फ़ प्रेम केवल भावनात्मक और जोशरहित होता है। और ताकत मगर बिना प्रेम के उजड्ड और शोषणकारी होती है। हमारी पीढी ने दोनो ही तरह के तरीकों से कोशिश की है, और अक्सर मात खायी है। मगर मैं समझता हूँ कि हमारी पीढी ने ही शायद पहली बार प्रेम और ताकत दोनों को साथ ले कर चलने की हिम्मत दिखायी है। क्योंकि जैसे जैसे हम आगे बढेंगे, हमें यही चाहिये होगा कि हम सपने देखें और सोचे कि हमें क्या करना होगा एक ऐसी वैश्विक अर्थव्यवस्था बनाने के लिये, जिसमें हम सब निहित हों। और आखिर में एक मौलिक मत को कि सब इंसान बराबर हैं, इस धरती के हर इंसान को समझाने के लिये।
समय आ गया है कि हम सब नव-प्रवर्तन में जुटे, और नये उपाय निकालें। मैं सिर्फ़ अपने अनुभव से ही बोल सकती हूँ। परंतु अक्यूमन फ़ंड को चलाने के पिछले आठ सालों में, मैने धैर्यवान पूँजी की ताकत को देखा है। न केवल नव-प्रवर्तन को आगे बढाने के लिये और जोखिम उठाने के लिये, पर ऐसी व्यवस्थाओं को जन्म देने के लिये जिन्होंने २५ हज़ार से भी ज्यादा रोजगार पैदा किये हैं और करोंडों सेवाओं और उत्पादों को दुनिया के कुछ सबसे गरीब लोगों तक पहुँचाया है। मुझे पता है कि धैर्यवान पूँजी काम करती है। मगर मुझे ये भी पता है कि कई और प्रकार के उपाय भी काम करते हैं।
और इसलिये मैं आपसे अपील करती हूँ, कि जिस भी क्षेत्र में आप काम करते हों, और जिस भी रोज़गार में आप हों, ये सोचना शुरु कीजिये कि कैसे हम ऐसे उपाय निकाले जो कि उनके नज़रिये से सोचना शुरु करें जिनकी हम मदद करना चाहते हैं। इसके बचाय कि हम सोचें कि उन्हें क्या ज़रूरत है इसके लिये हमें सारी दुनिया दोनो हाथों से गले लगाना होगा। और इसके लिये हमें अपना दिल बडा करना होगा, और जिम्मेदारी लेनी होगी, सत्यनिष्ठा और पूरी मेहनत के साथ। और यही वो गुण हैं जिसके लिये इंसानों को पुरस्कृत किया गया है पीढी दर पीढी। और इतना कुछ अच्छा है जो कि हम कर सकते हैं। ज़रा रेगिस्तान में उगते हुए उन सूरजमुखी के सुंदर पौधों के बारे में सोचिये। धन्यवाद। (अभिवादन)
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बहस में तकरार अक्सर अनुदान में विश्वास खो चुके लोगों और बाज़ारों में विश्वास खो चुके लोगों में होती है। जैकलीन नोवाग्रात्ज़ एक बीच का रास्ता सुझाती हैं जिसे वो धैर्यवान पूँजी कहती हैं, और उदाहरण देती हैं सामाजिक बदलावों का जो कि उपक्रमों द्वारा लिये गये नये मार्गों के चलते हो सके।
Jacqueline Novogratz founded and leads Acumen Fund, a nonprofit that takes a businesslike approach to improving the lives of the poor. In her new book, The Blue Sweater, she tells stories from the new philanthropy, which emphasizes sustainable bottom-up solutions over traditional top-down aid. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Anshul Tyagi
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18:23 Posted: Aug 2007
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12:53 Posted: Oct 2006
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20:34 Posted: Oct 2007
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