मैं यहाँ आपको उस सेना में भर्ती करने आया हूँ जो मानवों और बाकी प्राणियों की कार्यप्रणालियों को नया आयाम दे रही है। बात पुरानी ही है -- हमने पहले भी थोडी बहुत सुनी है। प्रकृति में सबसे ताकतवर ही ज़िंदा बचता है; कंपनियों और देशों की सफ़लता का आधार है किसी को हराना, बरबाद कर देना, और प्रतिद्वंदी से आगे बढ जाना;
राजनीति का अर्थ है जीत - किसी की कीमत पर। पर मुझे लगता है कि हम एक नयी कहानी की शुरुवात होती देख रहे हैं। और ये किस्सा कई सारे क्षेत्रों में आम होता, फ़ैलता दिख रहा है, जिसमें कि सहयोग, सामूहिक कार्य और परस्पर निर्भरता ज्यादा महत्वपूर्ण रोल अदा करते हैं। और वो केंद्रिय, मगर गैर-ज़रूरी, प्रतिस्पर्था का रोल और जीव-जीवस्य-भोजनम ज़रा कोने में को सिमटे-दुबके बैठे हैं।
मैनें सोचना शुरु किया इस रिश्ते पर - बातचीत-संचार, मीडिया और सामूहिक कार्य के बीच - जब मैनें 'स्मार्ट मॉब्स' लिखी, और मैं उसके बारे में उसे लिखने के बाद भी सोचता रहा। असल में, अगर आप पीछे जायें, मानव का संवाद, मीडिया और सामाजिक ढाँचे की व्यवस्था के बाकी तरीके कुछ समय से परस्पर विकसित होते रहे हैं। मानवों की उम्र तो बहुत ज्यादा है, उस लगभग १०,००० साल से जिसमे व्यवस्थित कृषि-आधारित सभ्यता चली
छोटे परिवारों के रूप में। बंजारे शिकारी के रूप में तो हम खरगोश मारते और खाना बटोरते रहे। उस समय धन-संपत्ति का अर्थ था ज़िंदा रहने भर को खाने का इंतज़ाम। मगर समय के एक बिंदु पर वो एक दल बने बडा शिकार करने के लिये। और हमें ये तो नहीं पता कि ठीक ठीक कैसे ये हुआ, मगर उन्होंने निश्चय ही किसी सामूहिक कार्य-प्रणाली का विकास किया होगा; ज़ाहिर है कि आप हाथी और मैमथ जैसे शिकार नहीं कर सकते यदि आप दल के भीतर ही लडते-भिडते रहें।
सही है कि ठीक से कुछ नहीं कहा जा सकता है, मगर ये तो साफ़ है कि कोई नया रूप धन-संपत्ति का ज़रूर निकला होगा। एक शिकारी परिवार के खाने से बहुत ज्यादा खाना आ चुका था। तो इसने एक सामाजिक प्रश्न खडा किया जिसने मेरे हिसाब से कुछ नये सामाजिक समीकरण रचे। क्या ऐसा हुआ कि जो लोग उस शिकार को खाते थे, वो शिकारी परिवारों के एक प्रकार के देनदार बन जाते थे? यदि हाँ, तो कैसी पद्धति बिठायी गयी होगी? कोई सबूत नहीं है मगर ये तो हुआ ही होगा कि किसी तरह की चिन्ह-आधारित संचार प्रणाली रही होगी।
ज़ाहिर है कि कृषि के साथ ही पहली बडी सभ्यतायें आयीं, पहले शहर मिट्टी और ईंट से बने, पहले साम्राज्य भी। और इन साम्राज्यों के प्रबंधकों ने ही लोगों को नौकरी दी गेहूँ, भेडों, और शराब की देनदारी का हिसाब रखने के लिये, और कर का हिसाब रखने के लिये कुछ चिन्ह बना कर जो उस समय मिट्टी के बने होते थे।
जल्द ही, अक्षर ईज़ाद हुये। और इस महान नुस्खे को, हज़ारों सालों तक, आरक्षित रखा गया उन संभांत आकाओं के लिये (हँसी) जो साम्राज्यों का हिसाब रखते थे। और फ़िर एक नयी संचार तकनीक नें नयी मीडिया का सशक्तीकरण किया: प्रिंटिंग प्रेस आ गयी, और कुछ ही दशकों में, दसियों लाख लोग पढना-लिखना सीख गये। और इस साक्षर जमात से सामूहिक कार्यों के कई नये रूप उभरे - ज्ञान के क्षेत्र में, धर्म और राजनीति के क्षेत्र में। हमनें वैज्ञानिक क्रांतियाँ देखीं, प्रोटेस्टेंट उद्धार देखा, संवैधानिक प्रजातंत्र को वहाँ आते देखा जहाँ पहले वो नामुमकिन थे। प्रिंटिंग प्रेस ने ये नहीं कर डाला, ये हुआ उस सामूहिक कार्य से जो साक्षरता से जन्मा था। और एक बार फ़िर, धन-संपत्ति का नया रूप उभरा।
देखिये, व्यापार तो पुरातन है। बाज़ारें भी इतिहास जितनी पुरानी हैं। मगर पूँजीवद, जिस रूप में हम उसे जानते हैं, केवल कुछ ही साल पुराना है, परस्पर सहयोग और तकनीकों पर टिका, जैसे कि कोई कंपनी जिसके कई हिस्सेदार हों, सामूहिक जोखिम वाले बीमे जैसा, या फ़िर डबल-एंट्री अकाउंटिंग जैसा।
आज तो निश्च्य ही, संबल देने वाली तकनीक इंटरनेट आधारित हैं, और असीमित तंत्रजाल के ज़माने में, हर डेस्क्टॉप कंप्यूटर खुद में एक प्रिंटिंग प्रेस है, एक प्रसारण केंद्र, एक संप्रदाय, या एक बाज़ार। विकास की गति निरंतर बढ रही है। आजकल तो मामला डेस्कटॉप से हट कर आगे बढ गया है, और बहुत ही जल्दी, हम देखेंगे कि ज्यादातर लोग, अगर सब के सब मानव नहीं, घूमते दिखेंगे, किसी सुपर-कंप्यूटर को लिये हुए या पहने हुए जुडे हुए, ज़बरदस्त स्पीड से जिसे हम आजकल ब्रोडबैंड कहते हैं।
जब मैं इस सामूहिक कार्य के विषय पर गहरे गया, मैनें पाया कि ज्यादातर शोध उस चीज पर आधारित है जिसे समाज-विज्ञानी 'सामाजिक कश्मकश' कहते हैं। और इस सामाजिक कश्मकश के कई रोचक उदाहरण हैं मैं उन में से दो को यहाँ संक्षेप में बताऊँगा: कैदी की क्श्मकश (prisoner's dilemma) और सामूहिक त्रासदी (tragedy of the commons).
केविन कैली ने मुझे बताया कि आप में ज्यादातर जानते हैं कि कैदी की कश्मकश किसे कहते हैं, इसलिये मैं फ़टाफ़ट थोडे में ही उस के बारे में बता देता हूँ। अगर आप के कोई प्रश्न हों तो, कृप्या केविन कैली से पूँछें। (हँसी)
कैदी की क्श्मकश असल में एक कहानी है जिसे गेम थियरी से निकली गणित की एक मैट्रिक्स पर रखा गया है। ये थ्योरी परमाणु युद्ध के बारे में प्रारंभिक सोच से निकली थी: दो खिलाडी है जिन्हें एक दूसरे पर विश्वास नहीं है। ऐसे समझिये कि सारे गैर-गारंटी लेन-देन कैदी की कश्मकश के ही उदाहरण हैं। एक व्यक्ति जिसके पास माल है, दूसरा जिसके पास पैसा है। क्योंकि उन्हें परस्पर विश्वास नहीं है, वो सौदा नहीं करेंगे। कोई भी पहला कदम नहीं लेना चाहता है क्योंकि हो सकता है वहाँ धोखा मिले, मगर दोनो ही नुकसान में हैं, ज़ाहिर है, दोनों का ही ध्येय पूरा नहीं हो पाता है। यदि वो मान जायें, और कैदी की कश्मकश को किसी आश्वासन पैदा करने वाले तरीके से जोड दें, तो वो आगे बढ सकते हैं।
बीस साल पहले, राबर्ट एक्सलरोड ने कैदी की कश्मकश को प्राकृतिक विकास के प्रश्न पर लागू किया था: यदि हम भीषण प्रतिस्पर्धियों की संतानें हैं, तो सहयोग नाम की चिडिया होती ही क्यों है? तो उन्होंने एक कंप्यूटर टूर्नामेंट आयोजित किया जहाँ लोग कैदी की कश्मकश की समस्या के हल और योजानायें जमा करते थे, उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि एक बहुत ही साधारण सी युक्ति की जीत हुई -- उसने पहला टूर्नामेंट जीता, और सबके सामने आने के बाद भी, फ़िर से उस ने दूसरा टूर्नामेंट भी जीत लिया -- जस को तस।
एक और अर्थ-शास्त्र से जुडा गेम है जो कैदी की कश्मकश जितना मशहूर नहीं है आख़िरी शर्त का खेल, और ये भी बहुत ही रोचक है ये जानने में कि आखिर लोग कैसे रुपये-पैसे से जुडे फ़ैसले लेते हैं। तो खेल कुछ ऐसा है: दो खिलाडी हैं: उन्होंने ये खेल पहले कभी साथ में नहीं खेला है, वो दुबारा भी साथ कभी नहीं खेलेंगे, वो एक दूसरे को जानते भी नहीं हैं, और असल में, वो अलग अलग कमरों में बैठे हैं। पहले खिलाडी को सौ रुपये दिये जाते हैं और उन्हें दो हिस्सों में बाँटने को कहा जाता है: ५०-५०, या फ़िर ९०-१०, या जो भी वो खिलाडी करना चाहे। दूसरा खिलाडी या तो उस विभाजन को स्वीकार करता है, दोनों खिलाडियों को पैसा मिलता है, खेल खत्म हो जाता है --- या फ़िर वो अस्वीकार कर सकता है - किसी को कुछ नहीं मिलता है और खेल खत्म हो जाता है।
आधुनिक अर्थशास्त्र का मौलिक सिद्दांत आपको बतायेगा कि आता हुआ एक रुपया सिर्फ़ इसलिये अस्वीकार करना गलत है क्योंकि किसी दूसरे अंजान आदमी को तो ९९ रुपये मिल रहे हैं। लेकिन हज़ारों अमरीकी, यूरोपीय, और जापानी विद्यार्थियों के साथ प्रयोगों में एक बडी संख्या में वो सारे विभाजन निरस्त हो गये जो ५०-५० के आसपास नहीं थे। और उन्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया गया था और उन्हें छाँट कर भी नही लाया गया था और वो पहली बार ये खेल खेल रहे थे, विभाजन कर्ताओं को भी ये स्वाभाविक रूप से ये पता था क्योंकि औसत विभाजन आश्चर्यजनक रूप से ५०-५० के करीब ही थे।
सबसे रोचक बात तो तब पता चली जब मानव-विज्ञानी इस खेल को दूसरी संस्कृतियों में ले गये, और उन्हें अचरच हुआ कि अमेज़न के काटो-जलाओ खेतिहर और मध्य एशिया के ख़ानाबदोश चरवाहे और दर्ज़नों और संस्कृतियों में -- सही बँटवारे के अपने अलग ही मापदंड थे। जिस से ये पता लगा कि किसी स्वाभाविक न्याय के मत के बजाय, जो मूल हो हमारी रुपये-पैसे के आदान-प्रदान का, हम अपने सामाजिक पालन-पोषण से प्रभावित हैं, चाहे हमें ये पता हो या न हो।
सामाजिक कश्मकश का एक और उदाहरण है सामूहिक त्रासदी. गैरेट हार्डिन ने साठ के दशक के दूसरे भाग में जनसंख्या विस्फ़ोट पर इसके ज़रिये बात की। उन्होंने उदाहरण दिया एक सामूहिक चारागाह का जिसे हर व्यक्ति ने अपने-अपने जानवर बढा कर अत्यधिक इस्तेमाल के चलते नष्ट कर दिया हो। उनका थोडा दुःख भरा निष्कर्ष था कि मानव निश्चित रूप से उन सभी सामूहिक संसाधनों को न्ष्ट कर देगा जिसके इस्तेमाल की उसे खुली छूट मिलेगी।
एलिनर ओस्ट्रोम, एक राजनीति विज्ञानी नें, १९९० में वो रोचक सवाल उठाया जो किसी भी अचछे साइंसदान को पूछ्ना चाहिये, जो कि ये है: क्या ये सच है कि मानव सामूहिक संसाधनों को नष्ट कर देगा? तो वो गयीं और उन्होंने जानकारी एकत्र की। उन्होंने हज़ारों ऐसे उदाहरण देखे जहाँ साझे जल-स्रोत, वनस्पति संसाधन, मछली के स्रोत आदि थी, और पाया कि हाँ, हर जगह, मानवों ने उन ही साझे संसाधनों को नष्ट किया जिन पर वो आधारित थे। मगर उन्हें ऐसे भी उदाहरण मिले जहाँ लोग कैदी की कश्मकश में नहीं फ़ँसे: असल में, सामूहिक त्रासदी कैदी की कश्मकश का ही बडा स्वरूप है। और उन्होंने कहा कि लोग तब तक कैदी ही रहेंगे, जब तक वो खुद को कैदी मानते रहेंगे। इस से बचने के लिये वो सामूहिक कार्यों के ढाँचे बना सकते हैं। और उन्होंने पाया, और मुझे बहुत रोचक लगा, कि उन सभी संरचनाओं में, जो कि सफ़ल थीं, बहुत सारे ऐसे सिद्धांत थे जो सामूहिकता पर आधारित थे, और ये सिद्धांत उन जगहों पर गायब थे जो असफ़ल थीं।
मैं तेजी से गुज़र रहा हूँ कई सारे क्षेत्रों से। जीव-विज्ञान में, बहुत सारे उदाहरण हैं परस्पर निर्भरता (symbiosis) के, सामूहिक निर्ण्य के, निश्चय ही पारंपरिक मनोविज्ञान को ख़ारिज़ करते हुए। मगर आज इस तथ्य पर कोई खास संदेह नहीं रह गया है कि सामूहिक व्यवस्थायें सतही भूमिका से केंद्रिय भूमिका की ओर बढ रही हैं जीव-विज्ञान में, सेल के स्तर से पर्यावरण के स्तर की ओर। और हमारा व्यक्तियों को आर्थिक इकाइयों की तरह देखने का नज़रिया ख़ारिज़ हो चुका है। तर्कसंगत, अक्लमंदी भरा स्वार्थ हमेशा हमारे फ़ैसलों को आधार नहीं होता है। असलियत है कि लोग धोखेबाज़ को सज़ा देते हैं, भले ही खुद भी उसकी कीमत चुकानी पडे।
और हाल ही में, तंत्रिका-विज्ञान के आँकडों ने दिखाया है कि जो लोग लेन-देन वाले खेलों में धोखेबाज़ों को सज़ा देते हैं, उनके दिमाग का इनाम वाला भाग सक्रिय हो जाता है। जिसके आधार पर एक वैज्ञानिक ने तो ये कह दिया कि परहित वादी सज़ा ही शायद समाज को बाँध कर रखने वाली कडी है।
मैं भी इस पर बात करता रहा हूँ कि कैसे नये संचार-माध्यम और नयी मीडिया ने इतिहास में नयी अर्थ-व्यवस्थाओं को जन्म दिया है। व्यापार तो पुरातन है। बाज़ारें भी बहुत पुरानी हैं। पूँजीवाद बहुत नया है; समाजवाद उसकी प्रतिक्रिया में जन्मा है। और अब भी हम नयी उभरती अर्थ-व्यवस्था पर बहुत कम विमर्श होता हुआ देखते हैं। जिम सुरोवेकी ने संक्षिप्त में योचायी बेन्कलर के ओपन-सोर्स पर लिखे पेपेर का उल्लेख किया, एक नये प्रकार की रचना प्रणाली - पियर टू पियर - की ओर इशारा करते हुये। मैं बस इतना चाहता हूँ कि आप ये देखें कि यदि इतिहास में, नये प्रकार की कार्य-प्रणालियों और नयी तकनीकों ने नये प्रकार के धन-वैभव को जन्म दिया है, तो हम शायद बढ रहे हैं एक ऐसी नयी अर्थ-व्यवस्था की ओर जो पहले की सभी व्यवस्थाओं से पूर्ण्तः भिन्न होगी।
एकदम संक्षिप्त में, कुछ कंपनियों को देखें, आई.बी.एम, जैसा कि आप जानते हैं, एच.पी, सन -- आई.टी के क्षेत्र के सबसे घातक प्रतिद्वंदी ओपन-सोर्स, मुक्त रचना विधान अपने सॉफ़्ट्वेयर पर लगा रहे हैं, और समूह को पेटेंट दे रहे हैं। एली लिली ने -- ज़बरदस्त प्रतिद्वंदिता वाले औषधि क्षेत्र में -- औषधि क्षेत्र में निदान निकालने का नया बाजार खडा किया है। टोयोटा, अपने आपूर्तिकर्ताओं को बाजार की तरह देखने के बजाय, एक तंत्र की तरह देखती है, और उन्हें बेहतर उत्पादों के लिये प्रशिक्षिति करती है जब कि इस से टोयोटा के प्रतिद्वंदियों का भी फ़ायदा हो रहा है। देखिये ये कंपनियाँ परमार्थ के लिये ऐसा नहीं कर रही हैं: ये ऐसा कर रही हैं क्योंकि वो सीख रही हैं कि एक ख़ास तरह का सहयोग उनके फ़ायदे में है।
ओपन सोर्स रचना प्रणाली नें दिखाया है कि विश्व-स्तरीय सॉफ़्टवेयर जैसे लिनक्स और मोज़िला, न तो कंपनियों के नौकरशाही ढाँचों से बनाये जा सकते हैं, न हि पारंपरिक लाभों से जो बाज़ारों ने हमें अब तक दिये हैं। गूगल खुद को बढावा देता है, हज़ारों ब्लागरों को एड-सेंस के ज़रिये बढावा दे कर। अमेज़न ने अपना प्रोग्राम लिखने का इंटरफ़ेस मुक्त कर दिया है करीब ६०,००० प्रोग्रामरों के लिये, और अनगिनत अमेजन दुकानों के लिये। वो दूसरों को सिर्फ़ परमार्थ के लिये बढावा नहीं देते, बल्कि खुद को आगे बढाने के तरीके पाते हैं। ई-बेय ने कैदियों के कश्मकश में पहला कदम उठा कर एक पूर नया बाज़ार खडा कर दिया, पुराने ग्राहकों के अनुभव को साझा करने का तरीका निकाल कर - कमेंट, जिसने कैदियों को कश्मकश को आश्वासन के खेल में तब्दील कर दिया।
बजाय इसके कि ''हम परस्पर विश्वास नहीं रखते, इसलिये हम दोनों को नुकसान होगा,", बात ये है कि "आप दिखाइये कि आप विश्वास योग्य हैं, और मैं सहयोग करूँगा।" विकीपीडिया ने हज़ारों स्वेच्छा-कर्मियों के ज़रिये एक मुफ़्त विश्वकोष बना डाला जिसमें १५ लाख लेख है, २०० भाषाओं में, महज़ कुछ ही सालों में।
हमने देखा है कि थिंक-साइकिल ने विकासशील देशों की गैर-सरकारी संस्थाओं को संबल दिया है विश्व भर के डिज़ाइन विद्यार्थियों के समक्ष गहन समस्याओं को रखने में, जिनमें से कुछ तो सुनामी राहत कार्य के लिये आज भी इस्तेमाल हो रही हैं: ये एक तरीका है फ़िर से पानी देने का कोलरा के रोगियों को, जो कि आसानी से इस्तेमाल होता है, अनपढ लोग भी इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। बिट-टोरेंट हर उतारू (डाउनलोडर) को चढाऊ (अपलोडर) में बदल देता है, और पूरी प्रणाली को ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।
दसियों लाख लोगों ने अपने डेस्कटॉप कंप्यूटरों को सम्मिलित किया है जोब वो उसे इस्तेमाल नहीं कर रहे होते, इंटरनेट से जोड कर एक सुपर-कंप्यूटर सघन बनाने के लिये जो कि मेडिकल शोधकर्ताओं को प्रोटीन के सिमटने की प्रक्रिया समझने में मदद कर रहा है -- जिसे स्टेन्फ़ोर्ड के फ़ोल्डिंग@होम नामे से जानते हैं-- जटिल कोड को तोडने, और दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने के लिये।
मुझे लगता है कि अभी तो हम नुक्ता भर भी नहीं जानते हैं। अभी तो, मुझे लगता है, कि हमने कुछ मौलिक सिद्दांत तक नहीं ढूँढे हैं, मगर मैं मानता हूँ कि हम इस दिशा में सोचना प्रारंभ कर सकते हैं। मुझे इतना समय नहीं दिया गया है कि मैं सब बात कर सकूँ मगर अपने फ़ायदे के बारे में सोचिये। ये स्वार्थी सोच ही है जो इतना सब बना रही है। एल सालवाडोर मे, जिन दोनो पक्षों ने सिविल-युद्ध से वापसी ली, उन्होंने वही काम किये जो कैदियों की कश्मकश के निदान हैं।
अमरीका में, फ़िलिपींस में, कीन्या में, सारे विश्व में, नागरिकों ने खुद को राजनैतिक विरोधों में आयोजित किया और मोबाइल और एस.एम.एस इस्तेमाल कर के वोट के लिये प्रचार किया। क्या सहयोग की अपोलोनुमा योजना संभव है? सहयोग पर एक अंतरविधा शोध? मुझे विश्वास है कि इससे मोटा फ़ायदा होगा। मैं मानता हूँ कि हमें इस क्षेत्र के नये नक्शे तैयार करने होंगे जिस से कि हम विधाओं के आरपार बतिया सकें। और मेरा ऐसा कोई दावा नहीं है कि सहयोग की समझ हमें बेहतर मनुष्य बनाएगी -- और कई बार लोग बुरे काम के लिये भी सहयोग करते हैं -- मगर मै आपको याद दिलाना चाहूँगा कि कुछ सौ साल पहले, लोगों अपने सगे-संबंधियों को उन बीमारियों से मरते देखते थे जो उन्हें लगता है कि पाप से या फ़िर विदेशियों से, या बुरी आत्माओं से आती हैं।
डेस्कार्टेस ने कहा था कि हमें एक पूरी तरह से नयी सोच की आवश्यकता है। जब विज्ञान ने वो सोच थी, और जीव-विज्ञान ने दिखाया कि कीटाणुओं से बीमारी आती है, कई सारी तकलीफ़ें दूर हुईं। किन तकलीफ़ों को दूर किया जा सकता है, धन-वैभव-रईसी के नये रूप क्या हो सकते हैं यदि हम सहयोग के बारे में कुछ और जान जायें? मुझे नहीं लगता कि ये अंतर्विधा बहस-विमर्ष अपने आप हो जायेगा: इसके लिये प्रयत्न करना होगा। तो आज मैं आपको अपने सहयोग कार्यक्रम में भरती करता हूँ। धन्यवाद। (तालियाँ , अभिनंदन)
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Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Vatsala Shrivastava
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20:46 Posted: Jul 2008
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07:05 Posted: Apr 2011
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