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तो अब मैं जा रहा हूँ आपको नवीनतम प्रकरण दिखलाने, भारत के शायद विश्व के सबसे लम्बे समय तक चलने वाले धारावाहिक का जो है क्रिकेट . और ये हमेशा चलता रहे , क्योंकि ये मुझ जैसे लोगों को जीविका देती है. इसमें हर वो चीज़ है जो आप चाहते हैं की एक धारावाहिक में चाहिए . इसमें प्यार है, आनंद है, ख़ुशी है . दुःख , आंसू , ठहाके , बहुत सारा छल और प्रपंच . और हर अच्छे धारावाहिक की तरह ये २० साल आगे भी जाता है . जब दर्शको की रूचि बदलती है. और वास्तव में जो क्रिकेट ने किया है. यह बीस साल आगे पहुँच गया है एक बीस ओवर के खेल में. और इसी के बारे में मैं अभी बात करने जा रहा हूँ, कैसे एक छोटा बदलाब, बहुत बड़ी क्रांति को जन्म देता है.
लेकिन यह हमेशा ऐसा नहीं था. क्रिकेट हमेशा ऐसा नहीं था तेज रफ़्तार वाली पीढ़ी का खेल. एक ऐसा समय था जब आप क्रिकेट खेलते थे, आप असामयिक टेस्ट मुकाबला खेला करते थे, आप तब तक खेलते थे जब तक मुकाबला खत्म न हो जाये. और एक ऐसा मुकाबला हुआ था मार्च १९३९ में वो तीन मार्च को शुरू हुआ था और चौदह मार्च को समाप्त हुआ था. और वो केवल इसलिए समाप्त हुआ क्योंकि अंग्रेजी खिलाडिओं को डरबन से केपटाउन जाना था, जो कि दो घंटे की रेल यात्रा थी, उस जलयान को पकड़ने के लिए जो सत्रह तारीख को जा रही थी, क्योंकि अगला जलयान लम्बे समय तक उपलब्ध नहीं था. इसलिए, वो मुकाबाला बीच में समाप्त हो गया. और एक अँगरेज़ बल्लेबाज़ ने कहा," आप जानते हैं ? और आधा घंटा और हम जीत जाते." (हँसी) आधा घंटा १२ दिनों के बाद. इस बीच में दो रविवार थे. परन्तु वस्तुतः रविवार के दिन गिरिजाघर के दिन होते हैं. इसीलिए आप रविवार को नहीं खेला करते और एक दिन बारिश हो गयी. इसलिए सभी एक साथ बैठे और दोस्त बने.
लेकिन भारत का क्रिकेट से लगाव का एक कारण था. क्योंकि हमारी ज़िन्दगी की गति भी लगभग इसके बराबर है. (हँसी) महाभारत भी बिलकुल ऐसा ही था, था न? आप दिन में लड़ते थे. फिर सूर्यास्त होता था, इसलिए सभी वापस घर चले जाते थे. और तब आप अपनी रणनीति बनाते थे. और आप अगले दिन फिर लड़ने आते थे, और शाम में फिर वापस चले जाते थे. महाभारत और हमारी क्रिकेट में एकमात्र भिन्नता थी कि क्रिकेट में हर कोई जीवित वापस जाता था और फिर अगले दिन लड़ता था. राजाओं ने इस खेल को संरक्षण दिया, इसलिए नहीं क्योंकि उन्हें खेल पसंद था, बल्कि इसलिए कि यह खेल उनको आपस में जोड़ने का एक साधन था अंग्रेजी शासको के साथ.
लेकिन एक और कारण था भारत से इस खेल के गहरे लगाव में पड़ने का, वो था, आपको जरूरत होती थी केवल एक लकड़ी के तख्ते की और एक रबड़ के गेंद की, और कितने भी लोग कहीं भी खेल सकते थे. एक निगाह डालें आप एक गड्ढे में खेल सकते हैं जहाँ कुछ पत्थर भी पड़े हों. आप एक छोटी सी गली में खेल सकते हैं. आप स्कवायर नहीं मार सकते क्योंकि बल्ला दिवार से टकरा जायेगा. वातानुकूलन और काल के तारो को मत भूलिए. (हँसी) आप गंगा के किनारों पे खेल सकते हैं. उस समय गंगा लम्बे अरसे तक साफ़-सुथरी थी. या आप जमीं के एक छोटे से हिस्से में कई खेल खेल सकते हैं, यहाँ तक की आपको भी नहीं पता की आप किस खेल में थे. (हँसी) जैसा की आप देख सकते हैं, आप कही भी खेल सकते हैं. मगर धीरे-धीरे खेल आगे बढ़ा, आप जानते हैं, आखिर में.
आपके पास हमेशा पाँच दिन नहीं होते हैं. इसलिए, हम आगे बढ़े, और ५० ओवर का खेल खेलना शुरू किया. और फिर एक बहुत बड़ी और असाधारण घटना घटी. और भारत में हम खेलों में कुछ नहीं करते. कुछ घटनाये घटती है और कभी -कभी हम सही समय पे सही जगह पे होते हैं. और हम १९८३ का विश्व कप जीत गए. और अचानक हमे पचास ओवर के खेल से लगाव हो गया. और असल में हम इसे हर दिन खेलने लगे. पचास ओवर का खेल यहाँ हर जगह से ज्यादा खेला जाने लगा.
मगर एक और बड़ी तारीख थी. १९८३ में हम विश्व कप जीते थे. १९९१-९२ में हमे एक वित् मंत्री मिला और एक प्रधानमंत्री जो चाहते थे की दुनिया भारत को देखे, वजाय कि षड्यंत्रों का देश होने के और रहस्यों से घिरे एक अवरुद्ध देश होने के, और इसलिए हमने बहुदेशी संगठनों को भारत में आने दिया. हमने सीमा-शुल्क कम किया. हमने आयत कर को कम कर दिया. हमने देखा बहुत सारे बहुदेशी संगठनो को भारत आते, बहुदेशी बजट के साथ, जिन्होंने प्रति व्यक्ति आय को देखा और भारत में संभावनाओ से खुश हुए, और हर भारतीय के पास पहुँचने का साधन तलाशने लगे.
और भारत में केवल दो साधन हैं, एक वास्तविक, एक लिखित. लिखित वो है जो आप फिल्मों में देखते हैं. और वास्तविक क्रिकेट है. और इसलिए मेरे एक मित्र ने जो अभी मेरे सामने बैठे हैं, पेप्सी से रवि तारीवल, इन्होने निर्णय लिया इसे ले जाने का पुरे विश्व में. और पेप्सी एक बड़ी क्रांति थी. क्योंकि उन्होंने क्रिकेट को हर जगह पहुँचाना शुरू किया . और इसलिए क्रिकेट बड़ा होने लगा. क्रिकेट ने अमीर लोगों को खेल में लाना शुरू किया. दूरदर्शन ने क्रिकेट को प्रसारित करना शुरू किया. बहुत लम्बे समय तक दूरदर्शन ने कहा, "हम क्रिकेट का प्रसारण नहीं करेंगे. जब तक आप इसके प्रसारण के लिए पैसे नहीं देते." तब उन्होंने कहा," ठीक है, अगला प्रसारण अधिकार ५५० डॉलर में बेचा गया. अगला प्रसारण अधिकार 6120 डॉलर में बेचा गया." तो यह एक तरह का वक्र था.
और फिर हमारे क्रिकेट में एक और बड़ी घटना हुई. इंग्लैंड ने २० ओवर की क्रिकेट की खोज की, और कहा ," सारी दुनिया को यह खेलना चाहिए." ठीक वैसे ही जैसे इंग्लैंड ने क्रिकेट की खोज की थी और बाकि दुनिया ने खेला. भगवान भला करे उनका. (हँसी) और इसलिए भारत को २० -२० क्रिकेट खेलना था. भारत २०-२० विश्व कप नहीं खेलना चाहता था. मगर हमे आठ-एक के बहुमत से खेलने को मजबूर किया गया. और फिर कुछ बहुत ही नाटकीय घटा. हम निर्णायक मुकाबले तक पहुँचे और फिर यह क्षण, जो हमेशा हमारे जेहन में रहेगा, हर किसी के, एक निगाह डालें.
पाकिस्तानी बल्लेबाज ने क्षेत्ररक्षक के ऊपर से मारना चाहा.
उद्घोषक : और श्रीशांत ने इसे पकड़ लिया! भारत जीत गया! क्या मुकाबला था, २०-२० विश्व कप का निर्णायक मुकाबला. भारत, विश्व विजेता. (उल्लास) भारत, २०-२० विजेता. मगर क्या मुकाबला था, एम् एस धोनी हवा में बहुत अच्छा पकड़ा, मिस्बाह उल हक, लाजवाब खिलाडी. एक बहुत बड़ी सफलता. भारत, विश्व टी-टी विजेता
हर्षा भोगले: अचानक भारत ने टी-२० की ताकत को ढूंढ़ लिया. बेशक, एक घटना, बल्लेबाज ने सोचा गेंदबाज तेज गेंद फेंक रहा है. (हँसी) अगर गेंदबाज ने तेज गेंद फेंकी होती तो गेंद वहीँ जाती जहाँ उसे जाना था, लेकिन वो नहीं गया. और अचानक हमने यह महसूस किया कि हम इस खेल में अच्छा कर सकते हैं. और इसने यह भी किया हमे फक्र महसूस हुआ कि भारत विश्व में बेहतरीन बन सकता है. यह समय था जब भारत में निवेश आ रहा था, अब भारत अपने आप में थोडा आश्वस्त महसूस कर रहा था. और एक और भावना थी कि हम गर्व महसूस कर रहे थे उसमे, जो हम कर सकते हैं. और शुक्र से हमसब के लिए, अंग्रेज चीजों को ढूँढने में काफी अच्छे हैं. और जितने भद्र वो लोग हैं, वो पूरी दुनिया को इसमें निपुण बनने देते हैं. (हँसी) और इसलिए इंग्लैंड ने टी-२ओ कि खोज कि और भारत को इसे हड़पने दिया . यह किसी शोध की तरह नहीं था जैसा हम औषधि-शास्त्र में करते हैं . हमने इसे सीधी तरह लिया , जैसा ये है हँसी
और इसीलिए हमने अपना टी-२० गुट आरम्भ किया . छः सप्ताह , नगर बनाम नगर . ये हमारे लिए एक नयी चीज़ थी . हमने आज तक केवल अपने देश का समर्थन किया था. भारत को सिर्फ दो क्षेत्रो मेंगर्व महसूस होता था अपने देश पे , मैदान में अपने आप को दर्शाने पे. एक युद्ध था , भारतीय सेना , जो हम नहीं चाहते की अक्सर हो और दूसरी थी भारतीय क्रिकेट . अब , अचानक हमे अपने शहरों का समर्थन करना था . लेकिन जो लोग इस शहरो के लीग में आ रहे थे उन लोगों ने इसकी झलक पश्चिमी देशों में देखी थी . अमेरिका लीगो का देश है . और उन्होंने कहा , ठीक है, हम लोग यहाँ भारत में चकाचौंध कर देने वाली लीग की रचना करेंगे . पर क्या भारत इसके लिए तैयार था ? क्योंकि क्रिकेट , बहुत लम्बे समय से भारत में व्यवस्थित था लेकिन इसे कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया था . और देखिये उन्होंने क्या किया हमारे सुन्दर से, सभ्य साधारण पारिवारिक खेल के साथ . और अचानक से यह सब कुछ होने लगा
एक प्रारंभिक उत्सव एक दुसरे को मिलाने के लिए . यह वो भारत था जो "कोर्वेत्ते" को खरीद रहा था . यह वो भारत था जो जगुआर को खरीद रहा था . यह वो भारत था जहाँ हर महीने मोबाइल फ़ोन बढ़ रहे थे न्यूजीलैंड की जनसँख्या के दोगुने से ज्यादा तो , ये एक अलग भारत था. लेकिन यह थोडा सा अलग और रूढ़िवादी भारत था जो आधुनिकता से खुश तो था लेकिन लोगो को ये बताना नहीं चाहता था . और इसीलिए , लोग चीयर लीडर्स के आने से भौच्च्कें रह गए . हर किसी ने चुपके से उन्हें देखा , लेकिन सभी ने नहीं देखने का दावा किया
भारतीय क्रिकेट के नए पालनहार पुराने समय के राजा नहीं थे. वो नौकरशाह नहीं थे जिन्हें जबरदस्ती खेल में लाया गया था, क्योंकि ये उन्हें पसंद नहीं था . ये वो लोग थे जो बड़ी-बड़ी कंपनिया चलाते थे इसलिए उन्होंने क्रिकेट का बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार किया . क्लब का बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार शुरू किया और उन्होंने इसके पीछे पैसे का प्रचार किया मेरा मतलब है आई पी एल की कीमत २.३ बिलियन डॉलर का था बिना एक गेंद फेके huye. १.६ बिलियन डॉलर अगले दस वर्षो प्रसारण अधिकार के लिए और बाकी के ७० मिलियन डॉलर से ज्यादा फ्रेंचायीजिज से . वो पैसे लगा रहे थे . और फिर उन्हें अपने शहर के लोगो को आकर्षित भी करना था . लेकिन उन्हें ये सब पाश्चात्य तरीके से करना था , है न ? क्योंकि हम लीग की नीव रख रहे थे . लेकिन वो जो करने में बहुत अछे थे , इसे बिलकुल ही स्थानीय बनाने में . आप लोगो को केवल एक उदहारण दिखाने के लिए , कि उन्होंने ये कैसे किया मानचेस्टर युनायीतेद के तरीके से नहीं बल्कि आमची मुंबई प्रोत्साहन , एक निगाह डालें.
बेशक बहुत लोगो ने कहा कि जितना अच्छा खेलते हैं उससे कहीं अच्छा नाचते हैं. हँसी लेकिन ये सब ठीक था . इसने एक और काम किया , हमारा क्रिकेट को देखने का नजरिया बदल दिया . इन सब के साथ , अगर आपको एक युवा क्रिकेटर चाहिए आप अपने मोहल्ले कि गलियों से चुन सकते हैं. अपने शहर से, और आप को गर्व महसूस होता है उस प्रणाली पे जो ऐसे क्रिकेटर पैदा करती है अब अचानक अगर आपके पास एक गेंदबाज़ कम है उदहारण के लिए अगर मुंबई के दल को एक गेंदबाज़ की जरूरत है, उन्हें कालबादेवी जाने कि जरूरत नहीं है या शिवाजी पार्क या कही और , उसे ढूँढने के लिए . वो त्रिनिदाद जा सकते हैं . ये एक नया भारत था , था न ? यह एक नयी दुनिया थी . जहाँ आप कही से भी कुछ भी खरीद सकते हैं, जब तक आप को बेहतर कीमत पर बेहतर चीज़ मिल रही हो . और एकाएक भारतीय क्रिकेट को इस सच्चाई का पता चल गया कि आप बेहतर कीमत पर बेहतर चीज़ पा सकते हैं . पूरी दुनिया में कहीं भी .
इसलिए मुंबई इंडियंस ने ड्वायने ब्रावो को रातो रात त्रिनिदाद और टोवैगो से बुला लिया . और जब उन्हें वापस जाना था प्रतिनिधित्व करने वेस्ट इंडीज का , इन्होने पुछा ," आपको वहाँ कब पहुँचना है." उसने कहा ," मुझे वहाँ फलाने समय पे पहुँचना है . इसलिए मुझे आज यहाँ से निकलना होगा ." हमने कहा ," नहीं-नहीं. यह इसके बारे में नहीं है कि आपको कब जाना है ." महत्वपूर्ण यह है कि आपको वहाँ कब पहुँचना है . और तब उन्होंने कहा ," मुझे क्ष तारीख को वहाँ पहुँचना है. और इन्होने कहा ," ठीक है . आप x तारीख से एक दिन पहले तक यहाँ खेलिए . इसलिए ब्रावो ने हैदराबाद में खेला, खेल के बाद सीधे गए खेल के मैदान से हवाई अड्डे . एक निजी कॉर्पोरेट विमान में बैठे . पहली बार पुर्तगाल में ईंधन भरा गया दूसरी बार ब्राज़ील में और वो निश्चित समय पे वेस्ट इंडीज में थे . हँसी भारत ने इस पैमाने पे पहले कभी नहीं सोचा था . इससे पहले भारत ने कभी नहीं सोचा था ," मुझे एक खिलाडी चाहिए जो मेरे लिए एक मुकाबला खेले , और हम उसे एक कॉर्पोरेट विमान से उसे वापस किंग्स्टन , जमैका भेजेंगे . एक मुकाबले में खेलने के लिए . और मैंने अपने आप में सोचा वाह , हम दुनिया में कहीं तो पहुँच गए है , है न ? हमने कुछ हासिल किया है . हमारी सोच बेहतर हुई है .
लेकिन इसने कुछ और भी किया और वो ये कि इसने शुरू किया भारतीय खेल में दो महत्वपूर्ण चीजों को जोड़ना . जो कि क्रिकेट और सिनेमा थी भारतीय मनोरंजन जगत में . क्रिकेट और सिनेमा और ये एक साथ आये क्योंकि जो लोग सिनेमा में थे उन्होंने क्लब खरीदना शुरु किया . और इसलिए लोगों ने क्रिकेट के मैदान में जाना शुरु किया प्रीति जिंटा को देखने के लिए . वो जाने लगे शाहरुख़ खान को देखने के लिए . और कुछ बहुत ही दिलचस्प हुआ . भारतीय क्रिकेट में हमे गीत और नृत्य देखने को मिला . और भारतीय क्रिकेट सिनेमा कि तरह प्रतीत होने लगा . और बेशक , अगर आप प्रीति जिंटा के दल में हैं जैसा कि आप देखेंगे अगले हिस्से में , अगर आप अच्छा करते हैं आपको प्रीति जिंटा के गले लगने का मौका मिलेगा . इसलिए यह एक बुनियादी कारण था अच्छा खेलने का . एक निगाह डालें. सभी प्रीति जिंटा कि ओर देख रहे हैं .
और फिर नि:संदेह वहाँ शाहरुख़ खान भी थे कोलकाता के लोगों के साथ झूमते हुए . हम में से सभी कोलकाता में खेल देखा था , लेकिन हमने ऐसा कुछ कभी नहीं देखा था . शाहरुख़ , बंगाली संगीत के साथ, सभी दर्शको को उत्साहित करते हुए कोलकाता के लिए. भारत के लिए नहीं बल्कि कोलकाता के लिए . लेकिन इसपे एक निगाह डालें.
एक भारतीय सिने अभिनेता एक पाकिस्तानी खिलाडी को गले लगा रहा है क्योंकि उन्होंने कोलकाता में जीत हासिल की थी . क्या आप कल्पना कर सकते हैं ? और क्या आप जानते हैं उन पाकिस्तानी खिलाडी ने क्या कहा ? तालियाँ काश मैं प्रीति जिंटा के दल के लिए खेल रहा होता .
लेकिन मैंने सोचा मैं इस मौके का फायदा उठाऊंगा यहाँ कुछ लोग पाकिस्तान से भी आये हैं . मैं बहुत खुश हूँ की आप यहाँ आये . क्योंकि मुझे लगता है कि हम ये दिखा सकते हैं कि एक साथ रह सकते हैं और दोस्त बन सकते हैं . हम लोग साथ-साथ क्रिकेट खेल सकते हैं और दोस्त बन सकते हैं. इसलिए बहुत बहुत धन्यवाद् आप सब पाकिस्तानी लोगों का ,यहाँ आने के लिए .
यहाँ पर आलोचनाएँ भी हुई थी क्योंकि लोगो ने कहा " खिलाडी ख़रीदे और बेचे जा रहे हैं ." क्या वो अनाज हैं ? क्या वे मवेशी हैं ? क्योंकि वहाँ नीलामी हुई थी, आप देख सकते हैं. आप एक खिलाडी कि कीमत कैसे निर्धारित करते हैं ? और इसलिए जो नीलामी हुई, उसमे लोग शाब्दिक तौर पे कह रहे थे धडाम ! फलाने और फलाने खिलाडी के इतने मिलियन डॉलर. ये यहाँ है .
नीलामीकर्ता : १,५००,००० डॉलर के लिए , चेन्नई . शेन वार्ने बेचे गए ४५०,००० डॉलर के लिए .
हर्षा भोगले : अचानक , एक खेल जिसमे एक खिलाडी एक दिन के पचास रूपये कमाता था अत: एक टेस्ट मुकाबले के लिए २५० रूपये , लेकिन अगर खेल चार दिन में खत्म हो जाता है तो केवल २०० रूपये . श्रेष्ठ भारतीय खिलाडी जिन्होंने हर एक टेस्ट मुकाबला खेला , हर अंतर्राष्ट्रीय एकदिवसीय मुकाबला , उच्च कोटि के खिलाडी , केंद्रीय अनुबंध होते थे २२०,००० डॉलर प्रतिवर्ष . और अब उन्हें छः दिन के ५००,००० डॉलर मिल रहे थे . एंड्रयू फ़्लिंटॉफ़ इंग्लैंड से आये उन्हें डेढ़ मिलियन डॉलर मिले , वो वापस गए और बोले , " चार सप्ताह में , मैं फ्रांक लम्पर्द और स्टीवेन गेर्राड से ज्यादा पैसे कम रहा हूँ. और मैं फूटबाल खिलाडियों से ज्यादा कम रहा हूँ, वाह ! और ये कहाँ से कमा रहे थे ? भारत में एक छोटे से क्लब से क्या आपने कल्पना की थी कि ऐसा भी दिन आएगा ? छः सप्ताह के काम के लिए डेढ़ मिलियन डॉलर . बुरा नहीं है, है क्या ?
तो , २.३ बिलियन डॉलर बिना एक भी गेंद का खेल हुए . और भारत जो कर रहा था वो था एक मानदंड खड़ा करना पूरे विश्व में बेहतर प्रथाओं के सामने और यह एक बहुत बड़ा ट्रेड-मार्क बन गया . ललित मोती बिज़नस टुडे पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर थे आई पी एल पूरे भारत में सबसे बड़ा ट्रेड-मार्क बन गया . और, हमारे यहाँ आम चुनावो के कारण , हमें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा . और हमें ये श्रृंखला तीन सप्ताह में शुरू करनी थी . एक पूरी श्रृंखला को तीन सप्ताह के अन्दर दक्षिण अफ्रीका ले जाना . लेकिन हमने ये कर दिखाया . और आप जानते हैं , क्यों ? क्योंकि कोई भी देश इतनी धीमी गति से काम नहीं करता जैसे हमने किया एक कार्यक्रम के तीन सप्ताह पहले तक और कोई भी इतना तेज नहीं करता जितना हमने किया आखिर के तीन सप्ताह में .
हमारी जनसँख्या , जो एक लम्बे समय से हमारे लिए एक समस्या थी अचानक से हमारी सबसे बड़ी संपत्ति बन गयी . क्योंकि ज्यादा लोग क्रिकेट देख रहे थे -- बहुत बड़ा उपभोगी वर्ग सभी क्रिकेट को देखने आरहे थे हमने भारत में क्रिकेट को एकमात्र खेल बना दिया जिसपे हमें तरस आती है , लेकिन भारत में हर खेल क्रिकेट को बड़ा बनाने में भागीदार हुआ . जो की हमारे समय की एक बहुत बड़ी त्रासदी है .
अब मेरे खत्म करने से पहले इसके एक दो और प्रभाव भी हैं. एक लम्बे समय तक भारत अभावों का देश था गन्दगी का, भिखारियों का , सपेरों का , कूड़े -करकट का , दिल्ली के ठग - लोगों ने आने से पहले दिल्ली के ठगों की कहानियां सुनी थी और , अचानक से , यह संभावनाओं का देश बन गया . पूरी दुनिया के क्रिकेट खिलाडी कहने लगे , आपको पता है, हमें भारत बहुत पसंद है . हमें भारत में खेलना बहुत अच्छा लगता है ." और आपको पता है ये हमें अच्छा महसूस हुआ . हमने सोचा ," डॉलर वाकई काफी ताकतवर है ." क्या आप कल्पना कर सकते हैं , डॉलर पे एक नज़र पड़ी और दिल्ली में बेईमानी का नामो-निशान नहीं था . कोई गन्दगी नहीं थी, न ही भिखारी थे . सारे सपेरे गायब हो गए . कोई गन्दगी नहीं थी, न ही भिखारी थे . सारे सपेरे गायब हो गए .
ठीक है. और अंत में , एक अंग्रेजी खेल जिसे भारत ने एक हद तक अपनाया , मगर टी-२० पूरी दुनिया में अगला उद्धेश्य बनने जा रहा है अगर आप एक खेल को पूरी दुनिया में फैलाना चाहते हैं , ये खेल का सबसे छोटा रूप ही हो सकता है . आप एक असामयिक मुकाबले को चीन में जाकर १४ दिन तक बिना किसी नतीजे के नहीं खेल सकते , आप इसे पूरी दुनिया में नहीं ले जा सकते . और ठीक यही टी-२० कर रहा है . आशा है , यह हर किसी को और भी आमिर बनाये , खेल को और महान बनाये , और उम्मीद है कि यह क्रिकेट उद्घोषको को और ज्यादा काम दिलाएगा .
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एक वैश्विक सांस्कृतिक घटना की कहानी : क्रिकेट उद्घोषक हर्षा भोगले बतला रहे हैं तेज गति के २०-२० क्रिकेट के शानदार आगमन और आधुनिक भारत के उदय के बारे में जो सामानांतर हैं. उन्होंने पता लगाया है क्रिकेट के अंग्रेजी सुसुप्त जड़ो से लेकर विख्यात मालिकों और मिलियन डॉलर अनुबंधों का .
Harsha Bhogle can talk about the business side of cricket, the technicalities of play and the psychology of the players with equal authority. Full bio »
Translated into Hindi by saket saurav
Reviewed by Anshul Tyagi
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The only two areas in which India was very proud about their country, representing itself on the field: One was war [and] the other was Indian cricket.” (Harsha Bhogle)
19:01 Posted: Jan 2007
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15:50 Posted: Nov 2009
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04:28 Posted: Dec 2009
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