मैं चाहता हूँ आप सभी की दुनिया के बारे में सोच को थोड़ा बदलने के लिए, मैं आपको हमारी प्रकृति में निहित कुछ संरचनाएँ दिखाऊं. तो, ये मेरी पहली स्लाईड है जिसमें हम बात करेंगे ब्रह्माण्ड कि उत्पत्ति के बारे में और उस विषय पर भी, जिसे मैं 'महाविश्व का घटनाचक्र अन्वेषण' कहूँगा, जिसमें हम सृ्ष्टि के अवशेषों के माध्यम से यह अनुमान लगाने का प्रयास करेंगे कि आरंभ में क्या हुआ था, फिर उसे अच्छे से समझने की कोशिश करेंगे.
तो एक प्रश्न मैंने आपसे पूछा था, कि जब आप चारों ओर नज़र घुमाते हैं तो क्या पाते हें? आप इस पूरे जगह को देख रहे हैं जिसे डिज़ाईनरों ने बनाया है और लोगों की मेहनत से बना, पर आप जो देख रहे हैं उसमें लगाई गई बहुत सी सामग्री ऎसी है जो पहले से ही मौजूद थी, केवल उसे एक सुनिश्चित आकार दिया गया है. अब प्रश्न यह है कि ये सामग्री यहाँ पहुँची कैसे? नए रूप में ढलने से पहले वाली अवस्था में वो कैसे पहुँची, और उसके पहले वो क्या थी? तो अब सवाल ये है कि इन तारतम्यों का आपस में क्या संबंध है? देखने वाली बातों में ये भी है, कि ब्रह्माण्ड का प्रारंभ कैसे हुआ और यह इस आकार में कैसे आया? ब्रह्माण्ड की सृष्टि और उसके विकास की वो प्रक्रिया कैसी थी जिससे गुज़र कर हमें इस प्रकार की सामग्री मिली?
तो ये आज के विषय का एक अंश होगा, और अब आगे मैं आपको हबल अल्ट्रा डीप फील्ड चित्र दिखाना चाहूँगा. अगर आप इस तस्वीर को देखें, तो आप इसके अधिकांश भाग में अंधकार के बीच में कुछ चमकीले बिंदु पाएँगे. चमकीले वस्तुओं में चार सितारे हैं, और आप उन्हें वहाँ देख सकते हैं -- छोटे प्लस के आकार के. ये सितारा है, ये सितारा है, बाकी सब कुछ आकाशगंगा हैं, ठीक है? तो यहाँ आप हजारों आकाशगंगाओं को अपनी आंखों से आसानी से देख सकते हैं. और जब मैं विशेषकर इस आकाशगंगा को देखता हूँ, जो हमारी आकाशगंगा जैसी लगती है, तो मुझे यह जानने की उत्सुकता होती है कि क्या वहाँ भी किसी आर्ट डिज़ाईन कॉलेज का सम्मेलन चल रहा है, जहाँ बुद्धिमान जीव यह सोचविचार कर रहे हैं कि किस तरह के डिज़ाईन बनाए जाएँ, और वहाँ कुछ ब्रह्माण्डविद भी बैठकर सोच रहे हों कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कहाँ से हुई, और ये भी हो सकता है कि उस आकाशगंगा से कोई हमारी ओर देख रहा हो, और अनुमान लगा रहा हो कि यहाँ क्या होता होगा.
मगर दूसरी और बहुत सारी आकाशगंगाएँ हैं, जिनमें से कुछ पास हैं, और कुछ-कुछ सूर्य के रंग की ही हैं, जबकि कुछ दूर हैं और इसलिए तुलनात्मक रूप से ज़्यादा नीले प्रतीत होते हैं. पर अब आपके मन में ये सवाल आएगा -- कि इतनी सारी आकाशगंगाएँ क्यों हैं? चूँकि ये आकाश के एक साफ-सुथरे भाग का चित्र है, इसमें केवल 1,000 आकाशगंगाएँ हैं. हमारा अनुमान है कि -- हबल स्पेस टेलिस्कोप से दिख जाने वाले, मतलब यदि आप समय निकालकर चारों तरफ स्कैन करके देखें तो -- क़रीब 100 अरब आकाशगंगाएँ देखी जा सकती हैं. ठीक है? आकाशगंगाओं की यह बहुत बड़ी संख्या है. हमारी आकाशगंगा में तारो की संख्या भी लगभग इतनी ही है.
पर जब आप इस तरह की जगहों को देखेंगे, तो पाएँगे कि यहाँ तारों से अधिक आकाशगंगाएँ हैं, जो अपने आप में एक पहेली है. आपके मन में ये सवाल उठना चाहिए कि, वो कैसी डिजाइन थी, और किस तरह की सृजन प्रक्रिया, व किस तरह की संरचनाएँ जिसने संसार को ऐसा बनाया? और अब मैं आपको जो दिखाने जा रहा हूँ, वह वास्तव में और भी जटिल है. हम उसे समझने-बूझने की कोशिश करेंगे. हमारे पास एक साधन है जो इस अध्ययन में हमारी सहायता करता है, और वो यह कि ब्रह्माण्ड का इतना अकल्पनीय विशाल होना उसे कुछ मायनों में टाईम मशीन जैसा बना देता है. हमने इन गोलाकृति पिंण्डों का समूह जैसा मॉडल बनाया है जिसे आप देख रहे हैं. हम पृ्थ्वी को इन पिण्डों का केन्द्र मान लेते हैं, इसलिए क्योंकि हम इसी स्थान से प्रेक्षण कर रहे हैं. चाँद हमसे बस दो सेकण्ड की दूरी पर है, तो अगर आप साधारण रोशनी में चाँद का चित्र लें तो ये चाँद की अब से दो सेकण्ड पहले की अवस्था है, जिससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. दो सेकण्ड मतलब हाल की ही बात है. सूरज को हम आठ मिनिट बाद देखते हैं. ये भी कोई बड़ी बात नहीं है, यदि कोई सौर तूफ़ान हमारी ओर नहीं आ रहा हो, और हमें उससे बचना ज़रूरी हो. ऐसे में आप पूर्वचेतावनी रखना चाहेंगे.
पर अगर आप बृ्हस्पति तक जाएं जो कि 40 मिनिट दूर है. तब समस्या आती है. आपने मंगल के बारे में सुना होगा कि वहाँ संपर्क साधना मुश्किल है क्योंकि प्रकाश को वहाँ तक पँहुचने में काफी समय लगता है. पर अब यदि आप सबसे निकटतम तारों को देखें, सबसे पास के 40 या 50 तारों को, वे लगभग 10 प्रकाशवर्ष की दूरी पर हैं. याने अगर आप अभी उनका चित्र खींचे, तो वो दरअसल उनके 10 साल पहले की अवस्था है. अब अगर आप आकाशगंगा के केन्द्र को देखें, तो वो उनकी हज़ारों साल पहले की अवस्था है. अगर आप एन्ड्रोमिडा को देखें, जो हमारी सबसे क़रीबी बड़ी आकाशगंगा है, वो हमसे बीस लाख प्रकाशवर्ष की दूरी पर है. अगर आप बीस लाख साल पहले की पृ्थ्वी का चित्र खींचें, तो वहाँ मनुष्य का नामोनिशान भी नहीं होगा, क्योंकि हमें नहीं लगता कि उस समय तक मनुष्य आए होंगे. ये उदाहरण आपको समय के अंतराल से दूरी का आभास भर देता है. हबल स्पेस टेलिस्कोप के ज़रीए हम कई सौ करोड़ों, अरबों वर्षों को देख रहे हैं.
पर अगर हम इतने सक्षम हो जाएँ और ऐसा कुछ कर पाएँ जिससे हम और पीछे देख सकें -- ऐसी घटनाएँ जो और पहले घटी हो, मैंने अपने बहुत सारे शोधकार्य में यही किया, ऐसी तकनीकों के विकास पर काम किया -- जिससे हम तारों और आकाशगंगाओं के बनने के युगों पहले की घटनाएँ देख सकें, उस समय की, जब ब्रह्माण्ड गरम और सघन और बहुत ही अलग था. तो घटनाक्रम कुछ ऐसा ही था, और मेरे पास इसकी एक काल्पनिक प्रस्तुति भी है. इसमें बीच में स्थित आकाशगंगा हमारी है, जिसे 'मिल्की वे' कहते हैं, और उसके चारों ओर हबल से दिखने वाली करीबी आकाशगंगाएँ हैं, और यहाँ एक गोलक पिण्ड है, जिससे अलग-अलग समय को चिन्हित किया गया है. और उसके पीछे नई आकाशगंगाएँ हैं.
क्या आप इस पूरे परिदृश्य को समझ पा रहे हैं? समय की उत्पत्ति कुछ अजीब है -- ये बाहर की ओर है, ठीक? और ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा ऐसा भी है जिसे हम देख नहीं सकते क्योंकि वो इतना सघन और गरम है, कि उससे प्रकाश भी बाहर नहीं निकल पाता. कुछ वैसे ही जैसे आप सूर्य के केन्द्र तक देख नहीं सकते, उसके लिए उन तकनीकों का प्रयोग करना होगा जो बताएं कि सूर्य के अंदर क्या घट रहा है. लेकिन आप सूर्य की सतह को देख सकते हैं, और कुछ इसी तरह से ब्रह्माण्ड को भी हम देख पाते हैं. अब बाहरी भाग के इस मॉडल जैसी जगह को देखिए, ये बिग बैंग से निकला विकिरण (रेडियेशन) है, जो कि अद्भुत एकरूपता से बिखरा हुआ है. ब्रह्माण्ड लगभग एक सटीक गोले की भांति है, पर उसमें कुछ बहुत ही छोटी अनियमितताएं हैं जिन्हें हम यहाँ बहुत बढ़ाकर दिखा कर रहे हैं. और उनमें से कालानुक्रम में बढ़ते हुए इन छोटी अनियमितताओं से इन बेडौल आकाशगंगाओ, और फिर प्रारंभिक तारों से विकसित आकाशगंगाओं की ओर से अंततः सौरमंडल में हम यहां तक आते हैं.
संरचना की दृष्टि से ये बहुत बड़ी बात है, पर अब हम देखेंगे कि इस समय क्या चल रहा है. इन परिमापनों (मेज़रमेंट्स) के लिए उपग्रह समूहों का उपयोग किया गया, जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं. यहाँ आप कोबे (COBE) उपग्रह को देख सकते हैं, जिसे 1989 में छोड़ा गया था, और जिससे इन अनियमितताओं की खोज हुई. फिर 2000 में, मैप (MAP) उपग्रह - फिर WMAP -- जिससे और अच्छी तस्वीरें मिली. और उसके बाद इस साल (2008) के अंत -- ये शानदार स्टेल्थ वर्ज़न है, जिसमें बहुत अच्छी डिज़ाईन क्षमताएँ हैं, अब देखिए -- प्लैंक उपग्रह को प्रक्षेपित किया जाएगा, जो बहुत अधिक रिज़ोल्यूशन के मानचित्र उपलब्ध कराएगा. और इस तारतम्य से ब्रह्माण्ड के आरंभ की समझ विकसित होगी.
हमने इन तस्वीरों में अनियमितताओं को देखा, जिनसे अंतरिक्ष में समय के गठन, और ब्रह्माण्ड में निहित अवयवों के रहस्य उजागर होने लगे, साथ ही सृष्टि के प्रारंभ में उसकी उत्पत्ति के बारे में भी पता चलने लगा. तो हमारे पास ये बहुत ही अनूठी तस्वीर है, और अब मैं वापस शुरु से शुरु करता हूँ, जहाँ किसी रहस्यमयी प्रक्रिया से ब्रह्माण्ड की रचना होती है. फिर एक समय ऐसा आता है, जब त्वरित गति से विस्तार होता है, और ये ब्रह्माण्ड फैलने लगता है, फिर ये ठंडा होकर उस अवस्था तक पहुँच जाता है, जब ये पारदर्शी बन जाता है, फिर अंधकार युग का आरंभ होता है, जिसके बाद सर्वप्रथम तारों का जन्म होता है, जो आकाशगंगाएँ बनाते हैं, फिर उनसे और अधिक विस्तृ्त आकाशगंगाओं का विकास होता है. कुछ इसी दौरान हमारा सौर मण्डल अस्तित्व में आने लगता है. और ये आज भी विकसित हो रहा है. और भी कुछ अद्भुत चीज़ें हैं. ये जो चोगे जैसा आकार है, ये दर्शाता है कि इस दौरान अंतरिक्ष में समय का ढाँचा क्या कर रहा है. ये बहुत ही विचित्र मॉडल है, है ना? तो फिर किस आधार पर हम इसे सही मान रहे हैं?
चलिए मैं आपको प्रकृ्ति में निहित कुछ संरचनाएँ दिखाता हूँ जो इसी का परिणाम है. मेरा मानना है कि स्पेसटाइम अंतरिक्ष की मुख्य सारवस्तु है, जबकि ये आकाशगंगाएँ और तारे सिर्फ समुद्र की झाग की तरह है. ये सब संकेत हैं कि हमें कहां रोचक तरंगें मिलेंगी और वहाँ क्या हुआ होगा. ये है स्लोअन डिजिटल स्काई सर्वे जिससे इस समय हम लाखों आकाशगंगाएँ देख रहे हैं. यहाँ का हर बिन्दु एक आकाशगंगा है. इसमें टेलिस्कोप के ज़रिए आकाश की तस्वीरें ली जाती हैं, उनमें से तारों को छांटकर अलग करके आकाशगंगाओं का अध्ययन किया जाता है, उनकी दूरी का अनुमान लगाकर उन्हे अंतरि़क्ष के मानचित्र में डाल दिया जाता है, और फैलते हुए अर्द्ध-व्यास में उनके स्थिति की दिशा के अनुसार लगा दिया जाता है. आप इन संरचनाओं को देख रहे हैं, इसे हम ग्रेट वॉल कहते है, पर इसके साथ ही शून्य स्थान और वे पदार्थ भी हैं जो बहुत हल्के नज़र आते हैं क्योंकि हमारे टेलिस्कोप इतने उन्नत नहीं हैं कि उन्हें देख पाएं.
अब मैं आपको यही चित्र 3D में दिखाता हूँ. इन तस्वीरों को धरती की अपनी धुरी पर घूमने के दौरान लिया जाता है, इसलिए ये आपको विस्तृत आकाश में फैले हुए पंखे के आकार में दिखते हैं. अंतरिक्ष के कुछ भाग हम अपनी आकाशगंगा के कारण नहीं देख पाते, या फिर इसलिए क्योंकि उन्हे दिखा सकनेवाले टेलिस्कोप अभी बने नहीं हैं. अगली तस्वीर में हम इस घूमने की प्रक्रिया का त्रि-आयामी (3D) रूपांतरण देखेंगे. क्या आप आसमान में फैले पंखे के आकार के इन स्कैन को देख रहे हैं? ध्यान दें, यहाँ हर एक बिन्दु एक आकाशगंगा है, आप उन आकाशगंगाओं को भी देख पा रहे हैं जो एक तरह से हमारे पड़ोसी हैं, और आप उनकी संरचना को भी देख पा रहे हैं. आप अब उस आकार को देख रहे हैं जिसे हम ग्रेट वॉल कहते हैं, आप इसकी जटिल बनावट को देख सकते हैं, और इन शून्य स्थानों को भी. अंतरिक्ष में कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ एक भी आकाशगंगा नहीं है, और कुछ ऐसे जहाँ हज़ारों आकाशगंगाएँ एक साथ ठंसी हुई हैं. ये एक अद्भुत आकृति है, लेकिन हमारे पास उतने आंकड़े उपलब्द्ध नहीं है कि हम इसका वास्तविक स्वरूप देख सकें. हमारे पास दस लाख आकाशगंगाएँ हैं, ठीक? जैसे हवा में दस लाख गेंदें एकसाथ लटकी हुई हैं. पर इसके पीछे क्या चल रहा है? इससे मिलता-जुलता एक और सर्वे किया गया था, जिसे 'टू-डिग्री फील्ड ऑफ व्यू गैलेक्सी रेडशिफ्ट सर्वे' कहा जाता है.
अब हम इसके बीच से पलक झपकते ही गुज़र जाएंगे. यहां जब भी हमें कोई आकाशगंगा मिलती है -- तो हम उस आकाशगंगा के बारे में हमारी उपलब्द्ध जानकारी रेडशिफ्ट परिमापन और इसी तरह के तरीकों से जुटा लेते हैं और उसके आधार पर आकाशगंगा का प्रकार और रंग दर्ज कर देते हैं, जिससे यह वास्तविक प्रतिरूप बन गया है. आप जब आकाशगंगाओं के बीचोंबीच हों, तो वहाँ से उनकी आकृ्ति को समझना कठिन है, ये जीवन के बीच फंसे रहने जैसा ही कुछ है. दृश्य के बीच में स्थित होकर उसका समूचा विवरण जान लेना बहुत मुश्किल है, इसलिए हम इसकी आकृति का अनुमान नहीं लगा पाएंगे. तो इसलिए हम बाहर निकलकर इसे वापस पलटकर देखेंगे. फिर पहले हमें इस सर्वे से निर्मित विन्यास दिखेगा, और फिर हम वहाँ दिखने वाली आकाशगंगाओं की संरचना दिखने लगेंगीं. फिर से, पहले हमें आकाशगंगाओं की ग्रेट वॉल का यह विस्तार दिख रहा है.
लेकिन आप शून्य स्थानों को भी देख पा रहे हैं, और इस जटिल बनावट को देख कर शायद आप सोच रहे होंगे, कि ये कैसे बना? मान लीजिए कि आप ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं, आप आकाशगंगाओं को इस प्रकार के विन्यास में कैसे लगाएंगे? आखिर इन्हें बिना किसी उद्द्देश्य के यूँ ही तो नहीं फैला दिया गया होगा. इसमें कोई बहुत ही पेचीदा प्रक्रिया सम्मिलित है. आखिर ऐसी रचना हम कैसे बना सकते हैं? अब हमारे सामने मामला गंभीर हो चला है. हमें पूरी गम्भीरता के साथ ईश्वर की भूमिका अदा करनी है, सिर्फ लोगों का जीवन ही नहीं, बल्कि हमें दुनिया भी बनानी है. अगर ये आपकी ज़िम्मेदारी हो, तो आप इसे कैसे निभाएँगे? कौनसी तकनीक का इस्तेमाल करेंगे? उसकी प्रक्रिया के चरण क्या होंगे?
अब मैं आपको हमारे द्वारा बहुत ही विशाल पैमाने पर किए सिम्युलेशन के परिणाम दिखाऊँगा, जो इस पर आधारित है कि हमारी समझ से ब्रह्माण्ड कैसा हो सकता है, इसमें हमने मुख्य रूप से कार्य और रचना के कुछ ऐसे सिद्धान्तों को अपनाया है, जिन्हें मनुष्य को तो सीखने में बड़ी मशक्कत लगी, पर प्रकृ्ति उनसे आदिकाल से ही परिचित थी. और वो बस यह है कि आप एकदम सरलतम उपादानों को साधारण नियमों से इस्तेमाल करें, पर आपके पास पर्याप्त उपादान होने चाहिए ताकि इसे आगे जटिल बनाया जा सके. अब इस प्रारूप में कुछ बेतरतीबियां सम्मिलित कीजिए, कुछ अनिश्चितता और बेतरतीब अनियमितता, फिर आप पाएँगे कि अलग-अलग निरूपणों का अंबार लग गया है.
अब मैं आपको पैमानों के फलन के रूप में पदार्थ का वितरण दिखाना चाहूँगा. ये उसी का नक्शा है, और अब हमे अंदर की ओर ज़ूम करेंगे. ब्रह्माण्ड के सही निरूपण के लिए हमें इसमें एक और चीज़ जोड़्नी पड़ेगी. जिसे हम डार्क मैटर कहते हैं. ये ऐसा पदार्थ है जो प्रकाश से वैसी प्रतिक्रिया नहीं करता जैसी सामान्य पदार्थ करते हैं, याने जैसे ये रोशनी मुझपर या मंचपर पड़ रही है. ये पदार्थ प्रकाश के लिए पारदर्शी है, पर आप इसे यहाँ देख सकें, इसलिए हमने उसे सफेद रंग में दर्शाया है, ठीक है? तो इस तस्वीर में जो कुछ सफेद रंग में है वह डार्क मैटर है. हमें इसे अदृश्य पदार्थ कहना चाहिए, लेकिन अभी हमने इसे यहाँ दृश्यमान कर लिया है. पीले रंग में दिखने वाला पदार्थ, वह सामान्य पदार्थ है जो तारों और आकाशगंगाओं में परिवर्तित हो जाता है.
मैं आपको अगली फिल्म दिखाता हूँ. यहां पर हम फिर ज़ूम करते हैं. इन आकृ्तियों को ध्यान से देखिए. हम अब और ज़्यादा ज़ूम कर रहे हैं. आप अब इन तंतु जैसे आकारों को, संरचनाओं को और शून्य स्थानों को देख रहे हैं. और जब ऐसे बहुत सारे तंतु एक साथ किसी गांठ की जुड़ जाते हैं, तो आकाशगंगाओं का महागुच्छ बन जाता है. ये जगह जिस पर अभी हम ज़ूम कर रहे हैं इस छोटे से क्षेत्र में क़रीब 1 लाख से 10 लाख आकाशगंगाएँ हैं. हम तो बहुत ही उजाड़ सी जगह में रहते हैं. न तो वह सौरमण्डल का केन्द्र है, न ही हमारी आकाशगंगा का केन्द्र और हमारी आकाशगंगा भी अपने आकाशगंगा समूह के केन्द्र में नहीं है.
हम फिर ज़ूम करते हैं. इस क्षेत्र में लगभग 1 लाख से 10 लाख के बीच आकाशगंगाएँ मिल सकती हैं. हम ज़ूम करते रहेंगे. ठीक है? मैं आपको इसका पैमाना बताना भूल गया था. एक पारसेक 3.26 प्रकाशवर्ष के समान है. तो एक गीगा-पारसेक 3 अरब प्रकाश वर्ष है -- और यही हमारा पैमाना है. मतलब प्रकाश को इस दूरी को तय करने में 3 अरब साल लगेंगे. अब हम इस बिन्दु से उस बिन्दु की दूरी पर हैं. ये दूरी हमारे और हमसे निकटतम एन्ड्रोमिडा आकाशगंगा के बीच की दूरी है. ये छोटे धब्बे जैसी चीज़ें आकाशगंगाएँ हैं.
अब हम बाहर की तरफ ज़ूम करेंगे, और आप इस संरचना को देख रहे हैं, जो कि बहुत दूर से नियमित आकृति जैसी दिखती है, पर ये बहुत सारी अनियमितताओं से मिलकर बनी हैं. ये संरचना के सरल सारभूत उपादान हैं. इसमें पहले तो एक सरल तरल द्रव है. इसमें डार्क मैटर है, सामान्य पदार्थ है, उसमें फोटोन और न्युट्रिनो हैं, जिनकी ब्रह्माण्ड के उत्तरार्द्ध में ज़्यादा उपयोगिता नहीं है. द्रव बहुत ही सरल है, जो समय के साथ साथ जटिल संरचना में परिवर्तित हो जाता है. जब आपने पहले इस तस्वीर को देखा, तो शायद ही ये उतना महत्वपूर्ण लगा हो. यहाँ आप समूचे दृश्यमान ब्रह्माण्ड का एक प्रतिशत हिस्सा देख रहे हैं और उसमें आप अरबों आकाशगंगाएँ और उनके समूह देख रहे हैं, लेकिन, आप जान चुके हैं कि ये प्रमुख संरचना नहीं है. इस ढाँचे का आधार डार्क मैटर, याने अदृश्य पदार्थ है, जिसने पूरी संरचना को एक सूत्र में बांधे रखा है.
हम अब फिर इसके बीच से गुज़रते हैं, और आप देख सकते हैं कि दृश्य के बीच में बैठकर उसकी संपूर्ण अवधारणा बनाना कितना कठिन है. तो यहाँ भी हमें वही नतीजा मिलता है. आप ये तंतु देख पा रहे हैं, ये प्रकाश अदृश्य पदार्थ है, और ये पीला रंग तारों या आकाशगंगाओं को दर्शाता है. अब हम इसके चारों ओर का चक्कर लगाएंगे, यहाँ आप बीच-बीच में तंतुओं को एक दूसरे में उलझते देख सकते हैं, जिससे आकाशगंगाओं का एक बड़ा समूह बन जाता है. अब हम वहाँ जाएंगे जहाँ आकाशगंगाओं का बहुत बड़ा समूह है, आप देख सकते हैं कि वो कैसा दिखता है. तो अंदर से ये उतना पेचीदा नहीं लगता है, है ना? पर जब आप इसे बहुत बड़े पैमाने पर देखें, और इसका अध्ययन करें, तो आप पाएंगे कि ये बहुत ही उलझी हुई, महीन, और जटिल रचना है. ये किसी विशेष पद्धति से पनपी है.
तो सवाल ये है, कि ऐसी संरचना का बनना कितना मुश्किल होगा? कामगारों की कितनी बड़ी फौज लगी होगी इस ब्रह्माण्ड को बनाने में? मुद्दा यही है, है ना? तो शुरु करते हैं. आप देख सकते हैं कि कैसे ये तंतु -- देखिए कैसे बहुत सारे तंतु एक साथ मिलकर आकाशगंगाओं का महागुच्छ बना रहे हैं. यहाँ आपको ये समझना होगा कि वास्तविकता में ये ऐसा नहीं दिखेगा यदि -- पहले तो, आप इतनी तेज़ यात्रा नहीं कर सकते, उससे सब कुछ विकृ्त हो जाएगा, लेकिन अभी हम जो देख रहे हैं, वो साधारण ग्रैफिक आर्ट के ज़रिए किया निरूपण है. यूँ कह लीजिए कि अगर आप अरबों साल ब्रह्माण्ड के चारों ओर सफर करते, तो दृश्य आपको कुछ ऐसा दिखता. और वो भी तब, जब आप अदृश्य पदार्थ को देख पाते.
तो सवाल ये है कि, ऐसा कौनसा तरीक़ा हो सकता है, जिससे इस पूरे ब्रह्माण्ड को सरलता से बनाया जा सके? तो शुरू करते हैं इस समझ के साथ कि ये समूचा दृश्यमान ब्रह्मांड, वो पूरा विस्तार जो हम हबल स्पेस टेलिस्कोप और दूसरे उपकरणों के ज़रिए हर दिशा में फैला देखते हैं, एक समय किसी अणु से भी छोटा क्षेत्र था. इसकी शुरुआत कुछ बहुत ही सूक्ष्म क्वान्टम यांत्रिक उथलपुथल के ज़रिए हुई, जो बहुत ही प्रचंड गति से बढ़ने लगी. फिर ये अस्थिरताएँ महाकाशीय परिमाणों में फैलने लगी, और हमें यही अनियमितताएँ ब्रह्माण्ड में व्याप्त माइक्रोवेव तरंगों के आधार पर दिखती हैं. अब हमें कोई ऐसा तरीका चाहिए जिससे ये अस्थिरताएँ आकाशगंगाओं और आकाशगंगाओं के समूह में विकसित हो सके, और ये प्रक्रिया सतत चलती रहे.
मैं अब आपको एक छोटा प्रारूपण (simulation) दिखाऊँगा. इस प्रारूपण को 1,000 कम्प्युटर प्रोसेसरों पर एक महीना चलाया गया था ताकि इसे देखने योग्य प्रस्तुति जैसा बनाया जा सके. अब मैं अगली तस्वीर में आपको एक और प्रारूपण दिखाता हूँ जिसे चलाने में किसी डेस्कटॉप कम्प्युटर को दो दिन लगते हैं. तो हम बहुत छोटी अस्थिरताओं से शुरु करते हैं जब ब्रह्माण्ड इस बिन्दु पर था, अब चार गुना छोटा, और इसी तरह आगे बढ़ते हैं. अब आप ये जालसदृश आकृतियां देख पा रहे हैं, और खगौलिक आकृतियों को भी बनते देख रहे हैं. ये बहुत ही सरल संरचना है, क्योंकि इसमें साधारण पदार्थ नहीं, केवल डार्क मैटर है. अब देखिए कैसे डार्क मैटर पदार्थ के रूप में इकट्ठा होने लगता है, और कैसे साधारण पदार्थ उसका अनुसरण करता है. यहाँ देखिए. शुरुआत में ये बहुत नियमित है. अस्थिरताएँ केवल 1,00,000 का एक अंश हैं. और कहीं-कहीं 10,000 के एक अंश तक पहुँच रहीं हैं, फिर अरबों सालों में गुरुत्वाकर्षण अपना काम करने लगता है.
यहाँ घनत्व बढ़ रहा है, जिससे आसपास का पदार्थ इसकी ओर खिंचने लगता है. इससे ये और पदार्थ को खींचने लगता है, फिर और ज़्यादा. पर ब्रह्मांड में दूरियाँ इतनी विशाल हैं और समय के पैमाने इतने बड़े कि इसे आकार लेने में बहुत समय लग जाता है. यह तब तक होता रहता है जबतक विस्तार की दृष्टि से ब्रह्माण्ड आज की अवस्था के लगभग आधे तक ना पहुँच जाए. वहाँ पहुँचने के बाद, ब्रह्माण्ड रहस्यमय रूप से बहुत तेज़ी से फैलने लगता है और अपनी वृ्हदाकार संरचनाएँ रोक देता है. तो हम उतने ही बड़े आकार की बनावट देख पा रहे हैं, जितना इस समय तक संभव है, उसके बाद केवल वही चीज़ें आकार लेती रहेंगी जिनका आकार लेना पहले ही शुरू हो चुका है और वही आगे भी विकसित होती रहेंगी.
तो हम प्रारूपण में सफल हैं, लेकिन इसके लिए डेस्कटॉप कम्प्युटर पर दो दिन लगेंगे. हमें 1,000 कम्प्युटर प्रोसेसर पर क़रीब 30 दिन लगेंगे इसके पहले दिखाये प्रारुपण को देखने के लिए. तो अब हमें कुछ-कुछा पता चला है कि ये ब्रह्माण्ड कैसे बनाया जा सकता है, एक बूंद से भी कम सामग्री लगाकर हर दिशा में दिखने वाली हर चीज़ बनाई जा सकती है, लगभग कुछ नहीं से -- क्योंकि मूलतत्व इतना सूक्ष्म है, इतना सूक्ष्म -- और ये लगभग परिपूर्ण ही है, सिवाय इस बात के कि इसमें बहुत छोटी अस्थिरताएँ हैं, 1,00,000 में एक अंश के बराबर, जिनसे ये अद्भुत नक्शे और आकृ्तियाँ बनीं जो हम रहे हैं, आकाशगंगाओं और तारों जैसे रूपों में.
अब हमारे पास एक प्रारूप है, जिसकी हम गणना कर सकते हैं और उपयोग भी, ब्रह्माण्ड दरअसल दिखता कैसा होगा उसकी रुपरेखा बनाने के लिए. ये रूपरेखा हमारे पहले की कल्पनाओं के बिल्कुल विपरीत है. 15 साल पहले हमने कॉसमिक बैकग्राउन्ड एक्सप्लोरर से शुरुआत की थी -- जिससे ऊपर दाएं ओर वाले चित्र बनाए, जो मूलतः ये बताते हैं कि बहुत बड़ी मात्रा के कुछ उतार-चढ़ाव हुए थे, ओर ये उतार-चढ़ाव कई पैमानों में थे. आप उसे यहाँ कुछ हद तक देख सकते हैं. उसके बाद हमारे पास WMAP आया, जिसने हमें बस बेहतर कोणीय विश्लेषण दिया. हम वही विशाल पैमाने की आकृ्तियाँ देख पा रहे हैं, पर साथ में कुछ छोटे पैमाने की भी. नीचे दाएं ओर की तस्वीर दर्शाती है कि अगर उपग्रह ने पलटकर पृ्थ्वी का चित्र लिया होता तो हमें कैसा चित्र मिलता. जैसा कि आप देख सकते हैं, आप सारे बड़े महाद्वीपों को देख सकते हैं, लेकिन उससे ज़्यादा नहीं.
पर हम उम्मीद कर रहे हैं कि जब हमें प्लैंक उपग्रह मिलेगा, तो चित्रों में स्पष्टता लगभग वैसी होगी जैसा कि आप पृ्थ्वी के उस चित्र में देख पा रहे हैं, जिसमें आप पृ्थ्वी की जटिल संरचना को स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं. साथ ही, किनारों की स्पष्टता ये भी दिखा रही है कि महाद्वीपों को सटाने पर वे एक-दूसरे में अटक सकते हैं, जिससे पृ्थ्वी पर कुछ अरेखिय प्रक्रियाओं के चलने का भी आभास मिलता है. भूगर्भ में कुछ प्रभाव हैं, पृ्थ्वी की सतह के प्लेट्स के सरकने का. इसका पता आपको इस चित्र से ही मिल जाएगा. हम ब्रह्माण्ड के आदिकाल के चित्रों को इतना अच्छा बनाना चाहते हैं कि उन्हें देखते साथ ही हमें पता चले कि क्या किन्ही अरेखीय प्रभावों के चलते कोई हलचल, या परिवर्तन रूप ले रहा है, और साथ ही हमें कुछ भी सुराग मिल सके कि उत्पत्ति के समय अंतरिक्ष में स्पेसटाइम का सृजन कैसे हुआ होगा. तो आज हम इसी पर काम कर रहे हैं, और मैं आपको इसका छोटा सा स्वाद चखाना चाहता था. एक अलग सोच देना चाहता था कि ब्रह्माण्ड का नक्शा और बाकी सब कुछ कैसा होता होगा. धन्यवाद. (तालियाँ)
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'सीरियस प्ले 2008' में एस्ट्रोफ़िज़िसिस्ट (तारा-भौतिकविद्) जॉर्ज स्मूट गहन-अंतरिक्ष के अध्ययन से मिले चौंका देने वाले नए चित्र दिखाते हैं, और हमें ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि ब्रह्माण्ड की संरचना -- अदृश्य पदार्थ (डार्क मैटर) के विशाल जालों और रहस्यमय शून्य स्थानों के साथ कैसे हुई होगी.
Astrophysicist, cosmologist and Nobel Prize winner George Smoot studies the cosmic microwave background radiation -- the afterglow of the Big Bang. His pioneering research into deep space and time is uncovering the structure of the universe itself. Full bio »
Translated into Hindi by Arpita Bhattacharjee
Reviewed by Nishant Mishra
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14:59 Posted: Apr 2008
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