मैं मीडिया के बदले हुए परिदृश्य के बारे में बात करना चाहता हूँ, और यह उन के लिए क्या मायने रखता है जिन के पास कोई संदेश है जो वे भेजना चाहते हैं दुनिया में कहीं भी. और मैं इसे कुछ कहानियां सुना कर स्पष्ट करना चाहता हूँ उस बदलाव के बारे में.
मैं यहां से शुरू करूँगा. पिछ्ले नवंबर में राष्ट्रपति का चुनाव था. शायद आपने उसके बारे में अखबारों में कुछ पढा होगा. और ये आशंका थी कि देश के कुछ भागो में वोटिंग में गड़बड़ हो सकती है. तो वोटिंग को विडियो करने की योजना बनी. और विचार यह था कि प्रत्येक नागरिक जिन के पास विडियो बनाने वाला या फ़ॊटो लेने वाला फ़ोन था अपने मतदान केंद्रों का ब्योरा रखेंगे, और किसी प्रकार की गड़बड़ के लिए सतर्क रहेंगे. और वो उसे एक केंन्द्रीय जगह पर अपलोड करेंगे. और यह एक प्रकार से नागरिक अवलोकन की तरह काम करेगा. नागरिक वहाँ केवल अपने व्यक्तिगत वोट डालने के लिए नहीं होंगे. बल्कि वोट की समग्र पवित्रता को निश्चित करने के लिए भी.
तो यह एक ख़ाका है जो यह सोच कर चलता है कि हम सब इस में एक साथ हैं. जो यहां मायने रखता है वो तकनीकि धन नहीं है. वो सामाजिक धन है. ये उपकरण सामाजिक तौर पे मज़ेदार नहीं बनते जब तक वो तकनीकी रूप से उबाऊ नहीं बन जाते. एसा नहीं है कि जब चमकीले नए उपकरण आते हैं तो उनका उपयोग समाज में रिसना शुरू हो जाता है. एसा तब होता है जब सब उनको साधारण मानने लगते हैं. क्योंकि अब मीडिया तेज़ी से सामाजिक हो रहा है, नवोन्मेष कहीं भी हो सकता है जहाँ लोग इस बात पर आसानी से यकीन कर सकें कि हम सब इस में एक साथ हैं.
तो हमें एक मीडिया परिदृश्य दिखाई देना शुरू हो रहा है जिस में नवोन्मेष हर जगह हो रहा है. और एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है. यह एक विशाल परिवर्तन है. इस की गहराई में जाए बिना, जिस पल में हम जी रहे हैं, जिस पल में हमारी ऎतिहासिक पीढ़ी जी रही है अपनी भावनाओं को प्रगट करने की क्षमता में सबसे बड़ी वृद्धि वाला है मानव इतिहास में. यह एक बड़ा दावा है. मैं इसे साबित करने की कोशिश करूँगा.
पिछ्ले ५०० सालों में केवल चार काल एसे हैं जहाँ मीडिया का बदलाव इतना रहा है कि उसे क्रांति कहा जा सके. इनमें पहला मशहूर है, छपाई की प्रेस. बदली किए जा सकने वाला टंकण, तेल आधारित श्याही, नवाचारों का वो समूह जिन्होंने मुद्रण को संभव बनाया और १४०० की शताब्दी के मध्य से शुरू होकर यूरोप की काया पलट दी. फ़िर कुछ सौ साल पहले दो तरफ़ा संचार में नवाचार हुआ. संवादी मीडिया, पहले तार, फ़िर दूरभाष. धीमे, लिखित संवाद, फ़िर वास्तविक समय में ध्वनि आधारित संवाद. फ़िर, लगभग १५० साल पहले, छ्पाई के इलावा आलेखित मीडिया में क्राँति हुई. पहले तस्वीरें, फ़िर ध्वनि की रिकार्डिंग, फ़िर चलचित्र, सब भौतिक वस्तुओं पे प्रतिबिंबित. और अंत में लगभग १०० साल पहले, विद्युत चुम्बकीय वर्णक्रम का वशिकर्ण ध्वनि और चित्रॊं को हवा, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से भेजने के लिए. यह मीडिया का परिदृश्य है जैसे हम २०वी सदी में जानते थे. हम मे से वो जो कि एक निश्चित उम्र के हैं इसी के साथ बड़े हुए हैं, और इसी की हमें आदत है.
पर यहाँ पे एक विचित्र सी विशम्ता है. मीडिया जो बातचीत के निर्माण में अच्छी है समूहों के निर्माण में अच्छी नही है. और जो समूहों के निर्माण में अच्छी है बातचीत के निर्माण में अच्छी नहीं है. अगर आप बातचीत करना चाहते हैं तो इस दुनिया में आप को ये किसी एक और व्यक्ति के साथ करनी पड़ेगी. अगर आप एक समूह को संबॊधित करना चाहते हैं, तो आप वही संदेश लेते हैं और समूह में सब को दे देते हैं. चाहे आप ये प्रसारण टावर के माध्यम से कर रहे हैं या मुद्र्ण यंत्र के. यह था मीडिया का परिदृश्य जैसा बीसवीं सदी में हमारे पास था.
और ये है वो जो बदल गया. ये चीज़, जो गाड़ी के शीशे से टकराया हुआ मोर लगता है दरअसल बिल चेसविक द्वारा इन्टरनेट का मानचित्र है. वो व्यक्तिगत नेटवर्क के किनारों को दिखाते हुए उनको अलग रंगों से दर्शाता है. इन्टरनेट इतिहास का पहला माध्यम है जिस में समूहों के लिए जन्मजात समर्थन है और साथ साथ वार्तालाप के लिए. जब कि दूर्भाष नें हमें एक से एक का खा़का दिया. और टेलिविज़न, रेडियो, पत्रिकाओं और किताबों नें हमें एक से अनेक का खा़का दिया. इन्टरनेट हमें अनेक से अनेक का खा़का देता है. पहली बार मीडिया जन्मजात रुप से इस तरह की वार्तालाप के समर्थन में अच्छा है. ये बड़े बद्लावों में से एक है.
दूसरा बड़ा बदलाव है कि सभी मीडिया का डिजिकरण हो जाता है इन्टरनेट वाहन भी बन जाता है बाकि सभी मीडिया के लिए. मतलब कि फ़ोन की कौलें इन्टरनेट को विस्थापित हो जाती हैं. पत्रिकाएं इन्टरनेट को विस्थापित हो जाती हैं. फ़िल्में इन्टरनेट को विस्थापित हो जाती हैं. और इसका मतलब है कि हर माध्यम हर दूसरे माध्यम के ठीक बराबर है. दूसरी तरह कहा जाए तो, मीडिया तेजी से सूचना का स्रोत कम और समन्वय का स्थान ज्यादा बनता जा रहा है. क्योंकि समूह जो किसी चीज़ को सुनते या देखते हैं अब एकत्रित हो कर एक दूसरे से बात भी कर सकते हैं.
और तीसरा बड़ा बदलाव है कि भूतपूर्व दर्शक, जैसा कि डैन गिलमोर उन्हें बुलाते हैं, अब निर्माता भी हो सकते हैं उपभोगता नहीं. हर बार एक नया ग्राहक मीडिया के इस परिदृश्य से जुड़्ता है तो एक नया निर्माता भी जुड़्ता है. क्योंकि वही उपकर्ण, फ़ोन, कंप्यूटर, आप को उपभोग और निर्माण करने देते हैं. ये ऎसा है जैसे आपने एक किताब ख़रीदी हो, और उन्हॊंने साथ में मुद्र्ण यंत्र मुफ़्त में दे दिया हो. जैसे कि आप के पास फ़ोन हो जिसे आप रेडियो में बदल सकें अगर आप सही बटन दबा सकें. ये एक बहुत बड़ा बदलाव है मीडिया परिदृश्य में जिसकी हमें आदत है. और यह सिर्फ़ इन्टरनेट के होने या न होने कि बात नहीं है. हमारे पास इन्टरनेट उसके सार्वजनिक रूप में तकरीबन २० साल से है. और वह अभी भी बदल रहा है जैसे मीडिया और सामाजिक बन रहा है. वह अभी भी अपने ख़ाके बदल रहा है उन समूहॊं में भी जो इन्टरनेट का इस्तेमाल अच्छे से जानते हैं.
दूसरी कहानी. पिछली मई, चीन के शिचुआन राज्य में ७.९ तीव्रता का भयंकर भूचाल आया, बड़े इलाके में भारी तबाही, रिक्टर पैमाने के मुताबिक. और भूचाल के आने के दौरान ही उसकी ख़बर दी जा रही थी. लोग अपने फोन से संदेश भेज रहे थे. वो ईमारतों की तस्वीरे ले रहे थे. वो हिलती हुई ईमारतों के विडियो बना रहे थे. और उन्हें क्यू क्यू पर अपलोड कर रहे थे, जो चीन की सबसे बड़ी इन्टरनेट सेवा है. और उसको ट्विटर कर रहे थे. तो, जैसे भूचाल आ रहा था ख़बर दी जा रही थी. और सामाजिक रिश्तों की वजह से चीनी छात्र दूसरी जगह आ कर स्कूल जा रहे थे. या बाकि दुनिया के व्यापार चीन में दफ़्तर खोल रहे थे. पूरी दुनिया में लोग सुन रहे थे, और समाचार पा रहे थे. बी बी सी को चीनी भूकंम की पहली ख़बर ट्विटर से मिली. ट्विटर नें भूकंप की घॊशणा कर दी थी इस से कुछ मिनिट पहले अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण नें इसके बारे में कुछ ओनलाइन डाला जो कोई पढ सके. पिछली बार जब चीन में इस तीव्रता का भूकंप आया था तो उन्हें ये मानने में तीन महीने लगे थे कि एसा कुछ हुआ है.
अब यहां वो ये करना चाहते होंगे, इन तस्वीरों को औनलाइन जाते देखने के बजाए. पर उन्हें यह विकल्प नही दिया गया. क्योंकि उनके नागरिक उन से तेज़ निकले. सरकार नें भी भुकंप के बारे में अपने नागरिकों से सुना, बजाए ज़िनहुआ समाचार एजेंसि के. और यह जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी. कुछ देर के लिए वहाँ पे १० सबसे ज्यादा क्लिक होने वाले लिंक ट्विटर पे , जो कि दुनिया की सरल संदेश सेवा है, १० मे से नौ लिंक भूकंप के बारे में थे. लोग सूचना एकत्रित कर रहे थे, लोगों को समाचार के स्रॊतों की तरफ़ इशारा कर रहे थे, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की ऒर इशारा कर रहे थे. १०वीं लिंक एक बिल्ली के बच्चे के बारे में थी, जो एक ट्रेड्मिल पर चढी हुई थी, पर इन्टरनेट ऐसा ही है.
लेकिन उन पहले घण्टॊं में १० में से नौ. और आधे दिन के अंदर दान लेने की वेब्साइट तैयार हो गई थीं. और दुनिया में चारों तरफ़ से दान आ रहे थे. यह एक अविश्वसनीय, समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया थी. और फ़िर चीनिओं नें, मीडिया के खुलेपन की एक अवधि के दौरान यह फ़ैसला कर लिआ कि वो इसे जाने देंगे. और वो नागरिकों द्वारा इस तरह से ख़बरें दिए जाने देंगे. और यही हुआ. शिचुआन प्राँत में लोगों नें यह अनुमान लगाया, कि इसका कारण कि इतनी सारे स्कूलों की ईमारतें गिर गईं, क्योंकि दुर्भाग्य से भूकंप एक स्कूल के दिन के दौरान हुआ इसका कारण कि इतनी सारे स्कूलों की ईमारतें गिर गईं यह है कि भ्रष्ट कर्मचारियों नें रिश्व्त ली थी उन ईमारतों को निर्देशों से घटिया मापद्ण्ड पे बनने देने के लिए. और इस तरह उन्होंने, नागरिक पत्रकारों नें
इसकी भी सूचना देनी शुरू कर दी. और वहँ एक विचित्र तस्वीर थी. आपनें न्यू यार्क टाइम्स के मुख्य पृश्ठ पर एक देखी होगी. एक स्थानीय अधिकारी सचमुच सड़्क पर लेट गया, इन प्रदृशनकारियों के सामने. जिससे वो चले जाएं. अनिवार्य रूप से कहने के लिए, "हम कुछ भी करने के लिए तैयार हैं आप को शांत करने के लिए. बस क्रृपा कर के सार्वजनिक प्रदृशन रोक दो."
लेकिन ये वो लोग थे जो कट्टरपंथी बन गए थे. क्योंकि इकलौते बच्चे वाली नीति की वजह से उन्होंने अपनी अगली पीढी में सब को खो दिया. किसीने जब अपने इकलौते बच्चे की मौत देखी हो उसके पास अब खोने को कुछ नहीं रह जाता. तो अवरोध जारी रहे. और आखिर चीनी सरकार उन पर टूट पडी. नागरिक मीडिया काफ़ी हो गई थी. तो उन्होंनें आन्दोलनकारियों को पकड्ना शुरू कर दिया. उन्होंने वो माध्यम बंद करने शुरु कर दिए जिन पर विरोध हो रहे थे.
चीन शायद सबसे सफ़ल प्रबंधक है इन्टरनेट पे सेंसर का, दुनिया में, उसके इस्तेमाल के द्वारा, जिसे चीन की महान फ़ायरवौल कहा जाता है. और चीन की महान फ़ायरवौल अवलोकन बिंदुओं का समूह है जो यह मान के चलता है कि मीडिया का निर्माण पेशेवरों द्वारा होता है, वो ज्यादातर बाहर की दुनिया से अंदर आती है, वो अपेक्षाकृत छोटे हिस्सों में आती है, और अपेक्षाकृत धीरे आती है. और इन चार विषेश्ताओं कि वजह से वो सक्षम हैं इसको छानने में जैसे यह देश के अंदर आती है. लेकिन मैगिनौट रेखा की तरह, चीन की महान फ़ायरवौल गलत दिशा कि तरफ़ मुख कर रही थी इस चुनौति के लिए. क्योंकि इन चारों चीज़ों में से इस परिवेश में कोई भी सही नहीं था. मीडिया का न्रिर्माण स्थानीय तौर पे हो रहा था. उसका निर्माण नौसिखियों द्वारा हो रहा था. निर्माण तेज़ी से हो रहा था. और निर्माण अविश्वसनीय बहुतायत से हो रहा था और कोई तरीका नहीं था कि उसके बनते ही उसे छाना जा सके. तो अब चीनी सरकार, जो १२ साल से सफ़लता के साथ वेब को छान रहे थे, अब अवस्था में है यह फ़ैसला करने की कि क्या पूरी सेवाएं चलने दें या बंद कर दें. क्योंकि शौकिया मीडिया के लिए परिवर्तन इतना विशाल है कि वे इसके साथ किसी भी अन्य तरीके से निपटा नहीं कर सकता है.
और बलकि यह इस हफ़्ते हो रहा है. टिआनामेन की २० वीं वर्षगांठ पर दो ही दिन पहले उन्होंनें घोषणा की कि वह ट्विटर का उपयोग बाध्य कर रहे हैं. क्योंकि कोई तरीका नहीं है कि इसे फ़िल्टर किया जा सके. उन्हें नल्का बिल्कुल बंद करना पडा. अब ये परिवर्तन सिर्फ़ उन लोगों को प्रभावित नहिं करते जो संदेशों को सेंसर करना चाहते हैं. ये उन्हें भी प्रभावित करते हैं जो संदेश भेजना चाहते हैं.
क्योंकि यह दरअसल पारिस्थितिकी तंत्र का पूर्णतः परिवर्तन है. केवल एक विशेष रणनीति नहीं. बीसवीं सदी की ठेठ मीडिया समस्या यह है कि किस तरह एक संस्था जिस के पास एक संदेश है जो वे देना चाहते हैं लोगों के समूह को जो एक तानाबाने के किनारों में फ़ैले हुए हैं. और यह रहा बीसवीं सदी का जवाब. संदेश को एकत्रित कर दो. वही संदेश सब को भेज दो. राषट्रीय संदेश. लक्षित व्यक्ति. अपेक्षाकृत विरल उत्पादकों की संख्या. करने में बहुत महंगा. तो ज्यादा प्रतियोगिता नहीं है. एसे आप लोगों तक पहुँच सकते हैं. वह सब ख़त्म हो गया है.
हम तेज़ी से एसे परिदृश्य में जा रहे हैं जहाँ मीडिया वैश्विक है. सामाजिक, सर्वस्व और सस्ता. अब ज्यादातर संगठन जो संदेश भेजने की कोशिश कर रहे हैं बाहर की दुनिया को, दर्शकों के विस्तृत समूह को, अब इस बदलाव को इस्तेमाल कर रहे हैं. दर्शक वापस बात कर सकते हैं. और यह थोड़ा अजीब है. पर आपको कुछ देर में इसकी आदत पड़ सकती है, जैसे लोगों को हो जाती है.
पर यह वह उन्मादी बदलाव नहीं है जिस के बीचों बीच हम रह रहे हैं. असली उन्मादी बदलाव यहां है. वह यह तथ्य है कि वे अब आपस में बेजोड़ नहीं हैं. ये तथ्य कि भूतपूर्व उपभोगक्ता अब उत्पादक हैं. ये तथ्य कि दर्शक अब सीधे आपस में बात कर सकते हैं. क्योंकि पेशेवरों कि तुलना में शौकिया लोग ज्यादा हैं. और नेटवर्क के आकार की वजह से, नेटवर्क की जड़िलता दरअसल गुनिया है भाग लेने वालों कि संख्या का. मतलब कि जब नेटवर्क बड़ा हो जाता है, तो बहुत बहुत बड़ा हो जाता है.
अभी पिछले दशक तक, ज्यादातर मीडिया जो आम जनता के लिए उपल्बध थी पेशेवरों के द्वारा उत्पादित थी. वो दिन अब ख़त्म हो गए हैं और कभी वापस नहीं आएंगे. अब तो हरी रेखाएं हैं, जो मुफ़्त सामग्रि के स्रोत हैं. जो कि मुझे अपनी आखिरी कहानी पर ले आती है. हम कुछ कल्पनाशील प्रयोग देखा सामाजिक मीडिया का ओबामा के चुनाव प्रचार के दौरान.
और मेरा मतलब राजनीति में कल्पनाशील प्रयोग नहीं है. मेरा मतलब है सबसे कल्पनाशील कहीं भी. और एक चीज़ जो ऒबामा नें करी, कि मशहूर तौर पे, ओबामा प्रचार नें, महशूर तौर पे, माए बराक ऒबामा डोट कौम, माएबीओ.कौम और लाखों नागरिक भाग लेने के लिए उमड पड़े, और यह समझने के लिए कि वे किस तरह से मदद कर सकते हैं. और वहाँ एक अविश्व्स्नीय वार्ता उभर के आई. और फ़िर, पिछ्ले साल इसी समय, ओबामा नें घोषणा करी कि वो फ़ीसा पे अपना मत बदलने जा रहे थे, विदेशी खु़फ़िया निगरानी एक्ट. उन्होंने जनवरी में कहा कि वो एक बिल पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे जो दूरसंचार को बिना वारंट के जासूसी करने के लिए प्रतिरक्षा दे अमरीकी लोगों पर. गर्मीयों तक, आम चुनाव प्रचार के बीच में, उन्होंने कहा, "मैंने इस विषय में और सोचा हैए. मैंने अपना मत बदल लिया है. मैं इस बिल को अपना मत दूंगा." और उनके कई समर्थक उनकी ही साइट पर सार्वजनिक रूप से बेलगाम हो गए.
जब उन्होंने इसे बनाया तो वह सेनेटर ऒबामा था. बाद में उन्होंने नाम बदल दिया. कृप्या फ़िसा को सही तरह से लें. इस समूह के बनने के कुछ ही दिनों बाद वह मायबीऒ.कौम पर सबसे तेज़ी से बढ़्ता हुआ समूह था. बनने के कुछ ही हफ़्तों बाद यह सबसे बड़ा समूह था. ओबामा को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करनी पड़ी. उन्हें ज़वाब देना पड़ा. और उन्होंने मूलतः कहा, " मैने इस विषय के बारे में सोचा है. मैं समझता हूँ आप के विचारों का आधार क्या है. लेकिन इस सब के बारे में सोचने के बाद, मैं अभी भी अपना मत उसी तरह ड़ालूँगा. लेकिन मैं आप तक पहूंचना चाहता था यह कहने के लिए, मैं समझता हूं कि आप मुझ से सहमत नहीं हैं, और इसे मैं झेल लूँगा."
इस से कोई खुश़ नहीं हुआ. पर फ़िर इस वार्तालाप में एक मज़ेदार बात हुई. उस समूह में लोगों को यह एहसास हो गया कि ओबामा नें उन्हें कभी बंद नहीं किया. ओबामा प्रचार में किसी नें कभी इस समूह को छिपाने की कोशिश नहीं करी या इसमें मिलना मुशकिल बनाया, या इसके अस्तित्व को नकारा, या मिटाने की कोशिश करी, उस को साइट से निकालने की. वो ये समझ गये थे कि उनकी भूमिका माएबीओ.कौम के साथ उनके समर्थकॊं को एकत्रित करना था पर उनके समर्थकों को नियंत्रित करना नहीं.
और यह वो अनुशासन है जो लगता है सुलझा हुआ इस्तेमाल करने का इस मीडिया का. मीडिया, मीडिया का परिदृश्य जो हम जानते थे, जो जाना पहचाना था, संकल्पित तौर पे आसान था इस विचार से निपटना कि पेशेवार प्रसारण संदेशों का गैर पेशेवार लोगों को हाथ से निकलता जा रहा है. एक दुनिया में जहां मीडिया वैश्विक, सामजिक, सर्वत्र और सस्ती है, एक दुनिया में जहां पहले के दर्शक अब तेज़ी से पूरे प्रतिभागी बन रहे हैं, उस दुनिया में, मीडिया कम से कम एक अकेले संदेश के बनाने के बारे मे है जो अकेले व्यक्तियों द्वारा उपभोग किया जाए. ये ज्यादा से ज्यादा एक तरीका है आयोजन के लिए एक माहौल बनाने का और समूहों को सहायता देने के लिए.
और जो विकल्प हमारे सामने हैं, मेरा मतलब कोई भी जिसके पास कोई संदेश है जो वे सुनाना चाहते हैं दुनिया में कहीं भी, यह नहीं है कि क्या यह मीडिया का परिवेश है जिस में हम काम करना चाहते हैं. यही मीडिया का परिवेश है जो हमारे पास है. सवाल जो हमारे सामने है वो ये है, "हम इस मीडिया का सर्वोत्म इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? य्द्यपि इसका मतलब हमें अपना पुराना तरीका बदलना हो." बहुत बहुत धन्यवाद.
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जब ईरान के समाचार दुनिया को प्रसारित हो रहे हैं, क्लेय शिर्की यह दिखा रहे हैं कि किस तरह से फ़ेसबुक, ट्विटर और मोबाइल संदेश दमनकारी शासनों में (चाहे कुछ समय के लिए) सेंसर को दरकिनार कर के असली समाचार प्रसारित करते हैं. समाचारों पर ऊपरी नियंत्नण का अंत राजनीति के स्वभाव को बदल रहा है.
Clay Shirky argues that the history of the modern world could be rendered as the history of ways of arguing, where changes in media change what sort of arguments are possible -- with deep social and political implications. Full bio »
Translated into Hindi by Rohit Agarwal
Reviewed by Anshul Tyagi
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20:46 Posted: Jul 2008
Views 466,678 | Comments 57
03:56 Posted: Apr 2009
Views 240,272 | Comments 31
08:00 Posted: Feb 2009
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