जब मुझे पता चला कि मैं आपसे बात करने आ रही हूँ, तो मैंने सोचा, "मुझे अपनी माँ से बात करनी चाहिए." मेरी छोटी सी माँ क्यूबा से हैं -- वो बस इतनी सी हैं. चार फुट लम्बी -- उनके साकार रूप के सारे भागों को जोड़ कर भी इससे ज्यादा नहीं. आप सुन तो रहे हैं न? (हंसी) मैंने उन्हें फ़ोन लगाया, "हल्लो, कैसी हो, बिटिया?" "अरे माँ, मुझे आपसे बात करनी है." "वो तो तुम कर ही रही हो. क्या हुआ?" मैंने कहा, "मुझे कुछ भले लोगों से बात करनी है." "तुम हमेशा ही भले लोगों से बात करती हो, सिवाय उस बार जब तुम व्हाईट हाउस गयी थीं ---" "माँ, फिर से मत शुरू करो!" फिर मैंने उन्हें बताया कि मैं टेड के लिए आ रही थी, और वो बोलीं, "तो मुसीबत क्या है?" और मैंने कहा, "बस, मुझे समझ नहीं आ रहा." मैंने कहा, " मुझे उनसे कहानियों के बारे में बात करनी है. टेड का मतलब है तकनीक, मनोरंजन और डिज़ाइन." और वो बोलीं, " अच्छा,जब तुम कहानी बनाती हो, तो वो उसका डिज़ाइन हुआ, जब उसे लोगों को सुनाती हो, तो वो मनोरंजन है और माइक तो तुम इस्तेमाल करोगी ही." (हंसी) मैंने कहा," माँ, आप तो लाजवाब हैं. पापा वहाँ हैं क्या?" "क्यों क्या हुआ? मेरी इतनी बढ़िया राय के मोती जो मेरे होंठों से बारिश की तरह टपक रहे हैं, तुम्हारे लिए काफी नहीं क्या?" (हंसी) फिर मेरे पिताजी फ़ोन पर आये. मेरे पापा -- वो पुराने लोगों में से हैं, आप जानते हैं -- कामागुए के पुराने क्यूबन पुरुष. कामागुए क्यूबा का एक प्रदेश है. वो फ्लोरिडा के रहने वाले हैं. १९२४ में वहां पैदा हुए थे. वो कच्चे फर्शों वाले एक झोपड़े में बड़े हुए, जिसकी बनावट वैसी थी जैसी तैनोस इस्तेमाल करते थे, तैनोस, यानि हमारे अरावाक पूर्वज. मेरे पिताजी हाजिरजवाब हैं, और साथ में थोड़े बदमाश भी, और फिर वो कुछ ऐसी मर्मस्पर्शी बात कह देते हैं कि आप अचानक अवाक रह जाएँ. "पापा, कुछ करिए." "मैंने तुम्हारी माँ की बात सुनी. वो सही तो कह रही है." (हंसी) "और मैंने जो कहा, उसके बाद भी?" मेरे पूरे जीवन में, पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया है. तो हमने कुछ मिनटों के लिए बातें कीं, और वो बोले, "तुम उन्हें वो सब क्यों नहीं बतातीं जिस में तुम विश्वास करती हो?" बढ़िया ख़याल है, पर हमारे पास इतना वक़्त नहीं है. कहानी सुनाने की अच्छी कला का मतलब है ऐसी कहानी गढ़ना जिसे कोई सुनना चाहे. पर बेहतरीन कहानी का मतलब है रिहाई देना -- मुक्त करना. तो मैं आपको एक छोटी-सी कहानी सुनाऊँगी. मत भूलिए, यह परंपरा हमारे पास आयी है पुराने समय में अवालौन से उठते कोहरों से नहीं, बल्कि उससे भी पहले के समय से, जब हम यह कहानियाँ भोजपत्रों पर लिख रहे थे, उससे भी पहले, या जब हम गीली, सीलन-भरी गुफाओं की दीवारों पर चित्रकथाएं बना रहे थे, उससे पहले. तब भी हमारे अन्दर एक उत्तेजना थी, एक ज़रुरत, कहानी सुनाने की. जब लेक्सस कंपनी आपको कार बेचना चाहती है, तो वो आपको कहानियाँ सुनाते हैं. क्या आप विज्ञापन देखते रहे हैं? क्योंकि हम सबके अन्दर यह इच्छा है, एक बार -- सिर्फ एक बार -- कि हम अपनी कहानी सुनाएं और लोग उसे सुनें. अब वो कहानियाँ हैं जिन्हें हम अलग-अलग अवस्थाओं में सुनाते हैं. या फिर वो कहानियाँ हैं जिन्हें हम सुनाते हैं अच्छी सी मदिरा के साथ, एक छोटे से समूह में. और वो कहानियाँ हैं जिन्हें हम देर रात तक एक दोस्त को सुनाते हैं, जीवन में शायद एक बार. और फिर वो कहानियाँ हैं जिन्हें हम नर्क जैसे अँधेरे में बहुत हलके से सुनाते हैं. वो कहानी मैं आपको नहीं सुना रही हूँ. मैं आपको ये वाली सुना रही हूँ. इसका नाम है, "तुम मुझे भुला न पाओगी." ये मानवीय संबंधों के बारे में है. मेरी क्यूबन माँ, जिनसे मैंने आपका संक्षिप्त परिचय कराया था उस छोटे से पात्र विवरण में, वो कोई १००० साल पहले अमरीका आई थीं. मैं पैदा हुई कोई १९ -- अब मुझे याद नहीं, और इस देश में आयी अपने माँ-बाप के साथ, क्यूबा में हुई क्रांति के बाद. हम हवाना, क्यूबा से डेकाटूर, जॉर्जिया, में आ गए. और डेकाटूर, जॉर्जिया एक छोटा सा दक्षिणी शहर है और उस छोटे से दक्षिणी शहर में, मैं बड़ी हुई, इन कहानियों को सुनते सुनते बड़ी हुई. पर यह कहानी अभी कुछ साल पहले की ही है. मैंने अपनी माँ को फ़ोन किया. शनिवार की एक सुबह थी. और मैं फ़ोन इसलिए कर रही थी क्योंकि मुझे अजियाको बनाने की विधि सीखनी थी. वो एक क्यूबन व्यंजन है. बहुत स्वादिष्ट. बहुत चटपटा. मुंह के कोनों से लार की फुहारें बरसा देता है. आपकी बगलों को रसीला बना देता है, समझे क्या? कुछ उस तरह का खाना, हाँ. यह इस प्रोग्राम का रसीला भाग है, लोगों. तो मैंने अपनी माँ को फ़ोन किया, और वो बोलीं, "कारमेन, जल्दी यहाँ आओ, प्लीज़. मुझे मॉल जाना है, और तुम तो अपने पिताजी को जानती ही हो, वे दोपहर में सोते हैं, और मुझे ज़रूरी जाना है. एक काम निपटाना है." यहाँ पर मुझे रुक कर, कोष्ठकों में, आपको बताना है -- मेरी माँ, एस्थर, ने कई साल पहले गाडी चलाना बंद कर दिया था जिससे अटलांटा के समूचे शहर ने राहत की सांस ली थी. जब से मैं छोटी सी बच्ची थी, उन महोदया के साथ ली गयी कोई भी वाहन-सम्बन्धी सैर -- भाइयों, अंत होती थी चमकती नीली रौशनियों में. मगर वो भी नीली वर्दी वाले लड़कों को चकमा देने में उस्ताद हो गयी थीं, और जब उन्हें मिलतीं भी, तो वाह, उनके साथ अद्भुत -- तारतम्य ही कहिये -- बिठा लेती थीं. "श्रीमती जी, क्या आप को पता है कि अभी आपने ट्रैफिक लाइट का उल्लंघन किया?" (तेजी से बोली गयी स्पैनिश) "आप अंग्रेजी नहीं जानतीं?" "नहीं." (हंसी) पर आखिर हर चोर का दिन आता है, और वो भी ट्रैफिक कोर्ट में पहुँच ही गयीं, जहाँ उन्होंने जज के साथ कम चालान लगाने के लिए भाव-ताव किया. यह एक ऐतिहासिक वारदात है. पर अब वो सत्तर से ऊपर की थीं, और गाडी चलाना बंद कर चुकी थीं. और इसका मतलब था कि परिवार के हर सदस्य का फ़र्ज़ बनता था कि उन्हें अपने बाल रंगने के लिए ले कर जाए, जी हाँ, उस अजीब से नीले रंग में, जो उनके पॉलीएस्टर पैंटसूट से एकदम मेल खाता है, आप जानते हैं न, एकदम ब्विक जैसा रंग. बेशक? ठीक. जाँघों पर उसी जगह छोटे-छोटे छेद जहाँ वो अपनी कढ़ाई करती हैं और छोटे-छोटे फंदे छोडती हैं. रौकपोर्ट के जूते -- इसीलिए बने हैं. तभी तो उन्हें यह नाम मिला है. (हंसी) तो यह है मेरी माँ का एढ़ी से चोटी तक का परिधान. और यही वो औरत है जो मुझे शनिवार की सुबह आने के लिए कह रही है जब मुझे और भी कई काम हैं, पर बहुत देर नहीं लगती क्योंकि क्यूबन अपराध-बोध बहुत वज़नदार होता है. अब आप को क्या बताऊँ -- और मैं अपनी माँ के घर चली जाती हूँ. मैं पहुँचती हूँ. वो कार की जगह पर खड़ी हैं. जी हाँ, उनके पास कार की जगह -- यानि कारपोर्ट -- है. वही, लहरदार छत वाला, आप जानते हैं न? ब्विक उसके बाहर खड़ी है, और वे चाबियों का एक गुच्छा लहरा, घुमा रही हैं. "तुम्हारे लिए एक आश्चर्य है, बिटिया!" "हम आपकी गाडी ले जा रहे हैं?" "हम नहीं, मैं." और वो अपनी जेब में हाथ डालती हैं और एक बड़ी बला निकालती हैं. यह कहानी चल रही है. आदान-प्रदान की कला.आप मुझ से बात कर सकते हैं. तो वो बला है लाइसेंस -- पूरी तरह से कानूनी ड्राइविंग लाइसेंस. उनके अपने प्रांत के मोटरगाड़ी विभाग द्वारा जारी किया गया लाइसेंस. साले उल्लू के पट्ठे सब के सब. (हंसी) मैंने पूछा, " क्या यह असली है?" "लगता तो है." "क्या आप देख भी सकती हैं?" "देखना तो पड़ेगा शायद." "हे भगवान्." वो कार में घुसती हैं, वो दो फ़ोन की किताबों के ऊपर बैठती हैं. मैं बिलकुल गप्पें नहीं मार रही क्योंकि वो वाकई इतनी छोटी-सी हैं. उन्होंने एक छाते का भी प्रबंध कर रखा है ताकि वो -- धड़ाम -- दरवाज़ा बंद कर सकें. उनकी बेटी, मैं -- गाँव की गंवार जिसका दिमाग पिघल कर आइसक्रीम बन चुका है -- अभी भी वहां जबड़ा लटकाए खड़ी है. "तुम आ रही हो? कि नहीं आ रही हो?" "हे भगवान." मैंने कहा, "ठीक है, क्या पापा जानते हैं कि आप गाडी चला रही हैं?" "पागल तो नहीं हो गयीं तुम?" "तो फिर कैसे निकल रही हैं आप?" "उन्हें सोना भी तो होता है." और इस तरह हम पापा को सोता छोड़ कर निकले, क्योंकि मुझे पता था वो मुझे मार डालेंगे अगर मैंने माँ को अकेले जाने दिया, और हम गाडी में बैठ गए. वो गाडी रिवर्स में डालती हैं. गेट से निकलते निकलते ५५ कि रफ़्तार, वो भी रिवर्स में. मैं आगे से सीटबेल्ट कस रही हूँ, पीछे से झटक कर खींच रही हूँ, मैं दोहरी गांठें बाँध रही हूँ. मतलब यह, कि मेरा मुंह सूख कर कालाहारी रेगिस्तान जैसा हो गया है. मैंने एक हाथ से पूरी तरह कस कर दरवाज़े को पकड़ा हुआ है. आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रही हूँ? और वो आराम से सीटी बजा रही हैं, और आखिर मैं उस तरह की प्रसव-काल की सांसें लेना शुरू कर देती हूँ -- जानते हैं न, वही वाली? बस कुछ ही औरतें शुरू हो गयी हैं उह-ऊह, उह-ऊह, उह-ऊह. सही है. और मैंने कहा, "माँ, आप धीरे चलाएंगी क्या?" क्योंकि अब उन्होनें हाईवे २८५ पकड़ ली है, जो अटलांटा के चारों ओर की परिधि बांधती है -- उसमें अब सात लेन हैं -- वो सातों पर चला रही हैं, लोगों. मैंने कहा, "माँ, एक लेन चुनिए!" "अब वो सात लेन देते हैं, तो उम्मीद रखते हैं कि सब का इस्तेमाल होगा." और वो बढ़ती जाती हैं, वाकई. मैं मिनट भर के लिए भी विश्वास नहीं करती कि वो बाहर निकली हैं और अब तक रोकी नहीं गयीं. तो मुझे लगता है, अरे, हम बात कर सकते हैं. उनका दिमाग दूसरी तरफ लग जाएगा. मेरी साँसों को आराम मिलेगा. मेरी नब्ज़ भी काबू में आ जायेगी, शायद. "मम्मी, मुझे पता है आप रोकी गयी हैं." "नहीं, नहीं, क्या बात कर रही हो तुम?" "आपके पास लाइसेंस है. कब से चला रही हैं आप?" "चार या पांच दिनों से." "अच्छा. और आप रोकी नहीं गयी हैं?" "मुझे टिकट नहीं मिला है." मैंने कहा, "हाँ, हाँ, हाँ, हां, मगर बताइए, बताइए, बताइए." "अच्छा चलो, तो मैं एक बत्ती पर रुकी तो देखा कि एक आदमी है, तुम जानती हो, मेरे पीछे." "क्या इस आदमी के पास नीली वर्दी और बुरी तरह डरा हुआ चेहरा तो नहीं था?" "तुम वहां थीं भी नहीं, अब शुरू मत करो." "बताइए भी. टिकट मिला क्या?" "नहीं." उन्होंने समझाया -- "वो आदमी" -- मुझे उन्हीं के तरीके से बताना है क्योंकि अगर मैं ऐसा न करूँ तो मज़ा नहीं आता, है न? -- "वो खिड़की पे आया, और उसने बस ऐसे किया -- इससे मुझे पता चलता है कि वह काफी बुड्ढा है, वाकई. तो मैं ऊपर देखती हूँ और मैं सोच रही हूँ, शायद इसे अभी भी मैं थोड़ी प्यारी सी लग सकती हूँ." "माँ, आप अभी भी ये सब करती हैं?" "अगर तुक्का लगता है, तो लगता है, बेटी." तो, मैं कहती हूँ (स्पैनिश) "अब सोचो, क्या हुआ, वो होंडुरास में शांति पलटन में काम कर चुका था -- उसे स्पैनिश आती थी." (हंसी) तो वह उनसे बात कर रहा है, और बीच में वो अचानक कहती हैं, "फिर, पता है, वही हुआ. बस वही. सब हो गया." "हाँ? क्या? उसने आपको टिकट दिया? या नहीं दिया? क्या?" नहीं. मैंने ऊपर देखा, और वो बत्ती, वो बदल गयी." (हंसी) आपको आतंकित हो जाना चाहिए. अब मुझे नहीं पता कि वो मेरे साथ खिलवाड़ कर रही हैं या नहीं, जैसे एक बिल्ली चूहे के साथ लगी रहती है, लगी रहती है -- बाँया पंजा, दाँया पंजा, बाँया पंजा, दाँया पंजा. पर तब तक हम मॉल पहुँच गए हैं. अब आप सब छुट्टियों में मॉल जा चुके हैं, है न? मुझ से बात करिए. हाँ. हाँ. आप हाँ कह सकते हैं. दर्शक: हाँ. ठीक है, तब आप को पता है कि अब आप पार्किंग लौट के यातनास्थल पर पहुँच गए हैं, जहाँ आप अनवरत उपलब्धता के भगवान् से प्रार्थना कर रहे हैं कि जैसे ही आप कारों की उस रेंगती हुई लम्बी सर्पीली कतार में घुसें, तभी कोई बन्दा ब्रेक की बत्तियां जला दे उसी वक़्त, जब आप उसके पीछे रुकें. पर ऐसा ज़्यादातर नहीं होता, है न? तो, पहले मैं कहती हूँ, "माँ, हम यहाँ क्यों आये हैं?" "तुम्हारा मतलब, इस कार में?" नहीं, रुकिए -- हम यहाँ आज किसलिए आये हैं? आज तो शनिवार है. छुट्टी का दिन है." "क्योंकि मुझे तुम्हारे पापा के कच्छे बदलने हैं." अब देखिये, निकल आई, कुछ चाणक्य-जैसी सोच जो करनी पड़ती है -- आप जानते हैं, मेरे हिसाब से एक खरगोश के बाढ़े जैसा है इस औरत का दिमाग. क्या मैं उसमें घुसना चाहती हूँ, क्योंकि अगर मेरे पास ऐरियादने का धागा नहीं है जिसे -- बहुत सी उपमाएं हो गयीं न? -- कहीं गाढ़ सकूं, तो मैं बाहर नहीं निकल पाऊँगी. पर आप तो जानते हैं -- (हंसी) "हमें पापा के कच्छे आज ही क्यों लौटाने हैं ? और किसलिए? क्या खराबी है उनके कच्छों में?" "तुम बिना बात परेशान हो जाओगी." "नहीं परेशान होऊंगी. क्यों? क्या? क्या तकलीफ है उन्हें?" "नहीं, नहीं, नहीं. तकलीफ बस यह है कि वो मूर्ख हैं. मैंने उन्हें दुकान भेजा -- वो मेरी पहली गलती थी -- और वो गए कच्छे खरीदने, और उठा लाये बिलकुल कसे हुए कच्छे, जबकि उन्हें लाने थे जांघिये." "क्यों?" "मैंने इन्टरनेट पर पढ़ा था. आप बच्चे नहीं पैदा कर सकते." "हे भगवान्!" (हंसी) ओलिविया? हुंह? हुंह? अब तक हम और चार फुट की दूरी तक सरक चुके हैं, और मेरी माँ आखिरकार मुझसे कहती हैं, "मैं जानती थी, मैं जानती थी. मैं परदेसी हूँ. हम अपने लिए जगह बना ही लेते हैं. मैंने क्या कहा था तुमसे? वो देखो, वहाँ." और वो अपनी खिड़की से इशारा करती हैं, और मैं बाहर देखती हूँ, और तीन -- तीन -- गलियों के बाद -- "वो देखो, वो शेवी." आप हँसना चाह रहे हैं , पर नहीं जानते कैसे -- यहाँ पर आप इतने 'सही' रहते हैं -- आपको नहीं लगता? दूसरी दिशा में जा कर देखिये, कुछ नहीं होगा. "वो देखो, वो शेवी -- इसी तरफ आ रहा है." "मामा, मामा, मामा, रुको, रुको, रुको. शेवी वाला अभी तीन गली दूर है." वो मुझे ऐसे देखती हैं जैसे मैं उनकी मंदबुद्धि बच्ची हूँ, समझ गए न -- महामूर्ख, जिससे उन्हें बहुत धीरे धीरे, कुछ अलग तरीके से बात करनी है. "मैं जानती हूँ, प्यारी बेटी. कार से निकलो और जब तक मैं वहां आऊँ, तब तक उस पार्किंग की जगह पर खड़ी हो जाओ." अच्छा, अब मुझे वोट लेना है. बताइए, बताइए. नहीं, नहीं. आप में से कितने लोग एक बार -- जब आप बच्चे थे, या बड़े थे -- पार्किंग की जगह किसी के लिए रोकने के लिए वहां जा कर खड़े हुए हैं? देखा, हम किसी ख़ुफ़िया क्लब से कम नहीं हैं जिसका अपना ख़ुफ़िया संकेत होता है. (हंसी) और बरसों की मनश्चिकित्सा के बाद, हम बहुत दुरुस्त चल रहे हैं. हम बहुत दुरुस्त हैं. बहुत बढ़िया हैं. खैर, मैं उनका सामना करती रही. ऐसा है -- पता है, आपको लगेगा अब तक तो मैं -- और -- अभी भी बची हूँ? मैंने कहा, " बिलकुल नहीं, माँ, आपने सारी उम्र मुझे शर्मिंदा किया है." निस्संदेह, उनका जवाब हमेशा रहता है, "मैंने कब तुम्हें शर्मिंदा किया है?" (तेजी से स्पनिश) और वो बातें करते करते कार पार्किंग गियर में डालती हैं, फिर इमरजेंसी ब्रेक लगाती हैं, दरवाज़ा खोलती हैं, और अपनी उम्र की औरत के हिसाब से बड़ी ही फुर्ती से, कार से छलांग मारती हैं, फ़ोन की किताबों को एक झटके से गिराती हैं, और फिर वो चलती हैं -- वो अपना सस्ता-सा के-मार्ट का पर्स हाथ में उठाये हैं -- कार के आगे से हो कर. अपनी उम्र की औरत के हिसाब से उनकी थल-गति भी बड़ी प्रभावशाली है. मेरे समझने से पहले ही, वो पार्किंग स्थल के पार सरक गयी हैं कारों के बीच में से, और मेरे पीछे के लोग कुछ उस तरह की सामान्य धार्मिक उदारता के साथ जो छुट्टियों में हम सब में आ जाती है, वाँ-वाँ वाँ-वाँ कर रहे हैं. "मैं आ रही हूँ." इटली के हस्त-संकेत मिलते हैं. मैं दूसरी ओर भागती हूँ. दरवाज़ा बंद करती हूँ. मैं फ़ोन की किताबों को छोड़ देती हूँ. यह नया और तेज़ अनुभव है, ताकि आप -- आप मेरे साथ हैं न? हम मंद गति वालों के लिए रुकेंगे. ठीक है. मैं गाड़ी स्टार्ट करती हूँ -- और तभी एक बच्ची मेरे से कहती है -- और कहानी का मज़ा तभी है जब मैं उसके बारे में यहाँ तक आपको कुछ न बताऊँ. क्योंकि यह मेरी अल्प-भाषी (कम बोलने वाली) बच्ची है. इस बच्ची के साथ सब कुछ छोटा, संक्षिप्त होता है -- कम कम. आप समझते हैं न, ये खाना कम मात्रा में खाती है. भाषा भी इसके अनुसार बोली जाती है छोटे छोटे ध्वनिग्रामों में -- बस छोटे हूं, हूं-हूं-हूं-हूं ये एक स्पाइरल कॉपी और एक पेन ले कर चलती है. बहुत क्षमता रखती है ये. ये ध्यान से सुनती है, क्योंकि कहानीकार सबसे पहले ऐसा ही करते हैं. पर ये बीच बीच में रुक कर पूछती है, "इसे कैसे लिखते हैं? किस साल में हुआ? ठीक." जब ये करीब २० साल बाद अपनी कलई खोलने वाली किताब लिखेगी, तो उसके एक शब्द पर भी विश्वास मत करियेगा. पर ये है लौरेन, मेरी असाधारण बच्ची, इसमें बहुत हलके तौर से ऐस्पर्गर के लक्षण हैं. भला हो आपका, डॉक्टर वॉटसन. वो कहती है," माँ, ज़रा देखिये तो सही!" अब जब ये बच्ची कहती है कि मुझे देखना चाहिए, तो आप जानते ही हैं. पर ऐसा तो नहीं है कि मैंने यह हंगामा कभी देखा ही नहीं है. आखिर मैं इस महिला के साथ बड़ी हुई हूँ. मैंने कहा, "लौरेन, देखो बेटी, मुझे दृश्य-ब-दृश्य बयान करती जाओ. मैं नहीं --" "नहीं, मामा, यह तो आपको देखना ही पड़ेगा." तो मैंने देखा. देखना ही पड़ा. आप भी देखना चाहेंगे? वो खड़ी हैं वहाँ. मैं हक्के-बक्के विस्मय के साथ देख रही हूँ -- वो खड़ी हैं, उनके रौकपोर्ट जूते एक-दूसरे से थोड़े दूर, पर ज़मीन पर अच्छी तरह जमे हुए. वो अपने सस्ते के-मार्ट पर्स को आगे बढ़ाये हैं, और उसका इस्तेमाल कर रही हैं. वो कई-टन स्टील को पीछे धकेल रही हैं सिर्फ अपने छोटे-से व्यक्तित्व के जोर से, उस बूढी आवाज़ में, कुछ इस तरह की बातें कहते हुए, "पीछे हटो, दोस्त! नहीं, यह जगह ली जा चुकी है!" (हंसी) आप तैयार हैं? मजबूती से पकडिये. ये आया तूफ़ान. "नहीं, मेरी बेटी, वो आ रही है उस ब्विक में. रानी, ठीक से बैठो ताकि ये तुम्हें देख सकें." हे यीशु. हे यीशु. मैं आखिरकार पहुँचती हूँ, और अब यह तो (अमरीका का) दक्षिण है. मुझे नहीं पता आप देश के किस भाग में रहते हैं. मेरा ख्याल है हम सब को कहानियां पसंद हैं. गुप-चुप रूप से हम सब अपना कम्बल और अपना खिलौना चाहते हैं. हम सब आलथी-पालथी मार कर कहना चाहते हैं, "मुझे सुनाओ, मुझे सुनाओ. आओ, रानी, मुझे सुनाओ कहानी." पर दक्षिण में तो, हम अच्छी कहानी पर जान देते हैं. लोग बगल में खड़े हो गए हैं. मेरा मतलब, वो उस कतार में से निकल आये हैं, उन्होनें अपनी गाड़ियों के ट्रंक खोल लिए हैं, फोल्डिंग कुर्सियां निकाल ली हैं और ठन्डे पेय भी. शर्तें लग रही हैं. "मैं तो देवी जी के पक्ष में हूँ. साला." (हंसी) और वे मुझे अन्दर ला रही हैं, सालसा नृत्य जैसी लय के साथ. वो -- आखिर -- क्यूबन हैं. मैं सोच रही हूँ, "ऐकसिलरेटर ब्रेक. ऐकसिलरेटर ब्रेक." जैसे आपने तो कभी अपनी ज़िन्दगी में यह सोचा ही नहीं है? ठीक? अच्छा. मैं अन्दर आती हूँ, गाड़ी को पार्क करती हूँ. इंजन अभी भी दौड़ रहा है -- मेरा, कार का नहीं. मैं कूद कर उनके पास कहते हुए उतरती हूँ "हिलिएगा नहीं आप!" "मैं कहीं नहीं जा रही हूँ." उन्हें तो ग्रीक त्रासदी (ड्रामे) में सबसे आगे की सीट मिली है, वो क्यों जायेंगी. मैं बाहर आती हूँ, और वो खड़ी हैं एस्थर. वो अपने पर्स को गले लगाए हैं. "क्वे?" जिसका मतलब है, "क्या?" -- और भी बहुत कुछ. (हंसी) "माँ, आपको ज़रा भी शर्म नहीं है? लोग चारों ओर से हमें देख रहे हैं, ठीक?" अब, इन में से कुछ -- हमें बनानी पड़ती हैं, भाइयों. इस पेशे का राज़ है. अंदाज़ लगाइए? इनमें से कुछ कहानियां मैं थोड़ी-बहुत तराशती हूँ कुछ, एकदम तैयार होती हैं, एकदम. उन्हें सीधे परोस सकते हैं. वो मुझसे यह कहती हैं. मेरे आरोप के बाद -- मैं आपकी याददाश्त ताज़ा कर दूं -- "आपको ज़रा भी शर्म नहीं है? "नहीं, वो मैंने लम्बे मोजों के साथ ही छोड़ दी -- दोनों बहुत दबाव डालते हैं." (हंसी) (तालियाँ) जी हाँ, आप तालियाँ बजा सकते हैं, पर आप कहानी के अंत से करीब ३० सेकण्ड दूर हैं. मैं सूखी टहनी की तरह चरमराने को तैयार हो ही रही हूँ, जब अचानक कोई मेरे कंधे पर हाथ रखता है. बहादुर आत्मा है कोई. मैं सोच रही हूँ, "यह मेरी लड़की है. उसकी हिम्मत कैसे हुई? वो कार से कूद गयी." ठीक है, क्योंकि मेरी माँ मुझ पर चिल्लाती हैं, मैं उस पर चिल्लाती हूँ. सुन्दर तारतम्य है, और प्रभावशाली भी. (हंसी) मैं मुड़ती हूँ, पर वो मेरी बच्ची नहीं है. एक युवा स्त्री है. मेरे से थोड़ी लम्बी. हलकी हरी प्रसन्न आँखें. उसके साथ एक युवक भी है -- पति, भाई, प्रेमी -- मुझे क्या लेना-देना. और वो कहती है, "माफ़ कीजिये, देवीजी" -- यहाँ दक्षिण में हम इसी तरह बात करते हैं -- "क्या ये आपकी माँ हैं?" मैंने कहा, " नहीं, मैं पार्किंग लौट में बूढी औरतों का पीछा करती हूँ यह देखने के लिए कि वो रुकेंगी या नहीं. हाँ, वो मेरी माँ हैं." फिर वो लड़का, वो कहता है, "जी, मेरी बहन का मतलब था" -- वे एक दूसरे की तरफ देखते हैं -- एक अनुभवी निगाह से -- " हे भगवान, वो तो पागल हैं!" मैंने कहा, (तेजी से स्पैनिश), और युवक और युवती कहते हैं "न, न, रानी, हम तो बस एक बात और जानना चाहते हैं." मैंने कहा, "देखिये, प्लीज़, मुझे उनको सँभालने दीजिये, ठीक है, क्योंकि मैं उन्हें जानती हूँ, और विश्वास कीजिये, वो एक छोटे परमाणु अस्त्र की तरह हैं आप जानते हैं न, उन्हें तो बड़ी सावधानी से सँभालने की ज़रुरत है." और युवती कहती है, "मैं जानती हूँ, पर, मेरा मतलब है, मैं कसम खाती हूँ, वो हमें अपनी माँ की याद दिलाती हैं." मैं मुश्किल से सुन पाती हूँ. वो अपनी एढ़ी के बल घूम कर उनकी ओर मुड़ता है. उसकी आवाज़ एकदम हलकी है, "हे भगवान, मैं उन्हें भुला नहीं पाता." और फिर वो दोनों घूमते हैं, कंधे से कन्धा मिलाये, और चले जाते हैं, अपने ही ख्यालों में खोये. किसी बावली औरत की यादों में खोये, जो उनकी आनुवंशिक लौटरी का नतीजा थी. और मैं एस्थर की ओर मुड़ती हूँ, जो उन जूतों पर झूल रही हैं, और कहती हैं, "तुम जानती हो, रानी?" "क्या, माँ?" "मैं तुम्हें पागल बनाती रहूंगी शायद अगले १४, १५ सालों तक, अगर तुम्हारा नसीब अच्छा रहा, पर उसके बाद, रानी, तुम मुझे भुला न पाओगी." (तालियाँ)
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कहानीकार कारमेन आगरा डीडी माँ-बाप और बच्चों के बारे में एक मजेदार, विवेकपूर्ण और दमकती कहानी बता रही हैं, जिसकी मुख्य पात्र हैं उनकी क्यूबन माँ. आराम से बैठ कर आनंद उठाइए -- माँ गाड़ी चला रही हैं !
Carmen Agra Deedy's luminous, funny, digressive tales of childhood and adulthood bring out the starry-eyed listener in us all. Full bio »
Translated into Hindi by alka puri
Reviewed by Anshul Tyagi
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23:05 Posted: Feb 2007
Views 373,901 | Comments 94
04:07 Posted: Dec 2006
Views 586,371 | Comments 77
16:32 Posted: Jul 2006
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