मैं इस बात पर शर्त लगा सकता हूँ कि मैं इस कमरे में मौजूद सबसे मूर्ख व्यक्ति हूँ क्योंकि मैं स्कूल में पास ही नहीं होता था । पर मुझे बहुत छोटी उम्र में ही ये पता लग गया था कि मैं पैसे से प्यार करता था, और व्यापार से प्यार करता था और मैं ये उद्यमिता वगैरह से भी प्यार करता था । और मुझे उद्यमी बनने के लिये ही पाला गया था । और तब से आज तक मुझे एक बात का जुनून सवार है -- और मैनें आज से पहले इसके बारे में कभी बात नहीं की -- और इसलिये आप सब ये सुनने वाले पहले हैं, मेरी पत्नी के अलावा, तीन दिन पहले, क्योंकि उन्होनें मुझसे पूछा, "तुम किस बारे मे बात करने वाले हो?" और मैने उन्हें बताया -- कि मुझे लगता है कि हम सुनहरा अवसर खो देते हैं ऐसे बच्चों को ढूँढने का जिनमें उद्यमी बनने के लक्षण होते है, और उन्हें तैयार करने का, और उन्हें ये दिखा पाने का कि असल में उद्यमी बनना एक मज़ेदार और महान चीज़ है । इसमें कुछ खराब नहीं है, और इसे खराब कहा भी नहीं जाना चाहिये, जैसा कि अक्सर समाज में होता है ।
जब हम बच्चे होते है, हमारे पास सपनों का भन्डार होता है । और हमारे अपने जुनून, और अपनी योजनाएँ होती हैं । और हम किसी न किसी तरह से उन सब का कत्ल कर देते हैं । हमें सिखाया जाता है कि हमें पढाई पर और ध्यान देना चाहिये या हमें अपना ध्यान और केंद्रित करना चाहिये, या फ़िर ट्यूशन ले लेनी चाहिये । और मेरे माता-पिता ने मेरे लिये फ़्रेंच के ट्यूटर भी लगवाये थे, और मेरी फ़्रेंच आज भी एकदम बदतर है । दो साल पहले, मुझे सबसे उम्दा लेक्चरर का खिताब मिला एम.आई.टी. के उद्यमिता के स्नातकोत्तर कोर्स में । और इस कार्यक्रम में दुनिया भर के उद्यमियों के सामने भाषण देना था । जब मैं दूसरी में पढता था, मैनें अपने शहर के स्तर पर बोलने की प्रतियोगिता जीती थी, पर किसी ने ये नहीं कहा, "देखो, ये बच्चा अच्छा वक्ता है ।" ये अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता है, मगर इसे आसपास घूमने और, लोगों को प्रोत्साहिते करनें में कितना मज़ा आता है ।" किसी ने नहीं कहा, "इसे बोलना सिखाओ ।" उन्होंने कहा, इसे वो चीज और सिखाओ जिसमें ये अच्छा नहीं है ।
तो बच्चे ये लक्षण प्रदर्शित करते हैं । और हमें इन्हें पकडने के लिये तैयार रहना चाहिये । मैं यह मानता हूँ कि हमें बच्चों को उद्यमी बनाने के लिये तैयार करना चाहिये, न कि वकील-इन्जीनियर । बदकिस्मती ये है कि हमारी स्कूल - व्यवस्था इस पूरे संसार को सिर्फ़ ये सिखा रही है कि बोलो, " चलो, या तो वकील बन जाते हैं, या फ़िर डॉक्टर ।" और हम सब यहाँ एक सुनहरा मौका खो रहे हैं क्योंकि कोई कभी ये नहीं कहता, "चलो यार, उद्यमी बनते हैं ।" उद्यमी वो लोग होते है --और ऐसे कई लोग हमारे साथ आज इस कमरे में है -- जिनके पास तमाम आयडिया और तमाम जुनून होते हैं, और जो दुनिया की ज़रूरतों को देख कर उन्हें पूरा करने का बीडा उठाते है, और पूरा भी करते हैं । और जो सोचा वो करने के लिये अपना सारा कुछ दाँव पर लगाने को तैयार होते हैं । और हमारे पास ये काबलियत होती है कि हम अपने आसपास के लोगों को जोडे जो हमारा सपना साकार करने के लिये साथ आना चाहते हैं । और मैं समझता हूँ कि अगर हम बच्चों को छोटी उम्र में ही उद्यमशीलता को गले लगाने दें, तो हम दुनिया में वो सब बदल सकते हैं जो कि समस्यापूर्ण है । हर एक समस्या जो कि विश्व में है, किसी न किसी के पास उसका हल है । और जब आप छोटे होते हैं, आप ये कही नहीं सकते कि 'होगा नहीं या असंभव' क्योंकि आपमें ये सब कह पाने की समझ ही नहीं होती है ।
मेरे ख्याल से, अभिभावक और समाज होने के नाते, ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों को मछ्ली पकडना सिखायें, बजाय उन्हें मछली दे देने के । पुरानी कहावत है, " यदि किसी को मछली दोगे, तो उसका पेट एक दिन के लिये भरेगा । यदि किसी को मछली पकडना सिखा दोगे, तो जीवन भर वो पेर भर सकेगा ।" अगर हम अपने बच्चों को उद्यमी होना सिखा सकें, खासकर वो जो कि सही लक्षण प्रदर्शित करते हैं, जैसे कि हम विज्ञान में तेज़ बच्चों को वैज्ञानिक बनने के लिये कहते है। सोचिये यदि हम उद्यमी होने के लक्षण दिखाने वाले बच्चों को उद्यमी बनना सिखा सकें ? इतने सारे बच्चे व्यवसाय और उद्यमी गतिविधियों को आगे बढा रहे होंगे, बजाय सरकारी मदद का इंतज़ार करने के ।
हम असल में क्या कर रहे हैं कि हम अपने बच्चों को सिखा रहे है कि वो क्या न करें । मारो मत; काटो मत; गाली मत दो । और हम अपने बच्चों को बडी से बडी नौकरी पाने की सलाह देते हैं, और स्कूल-व्यवस्था उन्हे ऐसे लक्ष्य देती है जैसे कि डॉक्टर बनो, या फ़िर वकील बनो या फिर अकाउंटेण्ट बनो, या फ़िर डेन्टिस्ट या फ़िर अध्यापक या फ़िर पायलट । और मीडिया कहता है कि अगर आप मॉडल बन सकें या गायक बन सकें तो बहुत सही रहेगा, या फ़िर कोई बडे खिलाडी जैसे कि सिड्नी क्रोसबी हमारे एम.बी.ए. की पढाई तक बच्चों को उद्यमी बनना नहीं सिखाती है । मेरे एम.बी.ए. नहीं करने के पीछे यही कारण था -- वैसे मेरा कहीं हुआ भी नहीं था क्योंकि मेरे स्कूल में सिर्फ़ ६१ प्रतिशत नंबर थे और ६१ प्रतिशत पर उस समय सिर्फ़ एक ही जगह मुझे स्वीकार किया गया था - कार्ल्टन -- मगर हमारे एम.बी.ए. पाठ्यक्रम भी बच्चों को उद्यमी बनना नहीं सिखाते । वो उन्हें सिखाते है बडे बडे निगमों में काम करना ।
लेकिन ये बडी कम्पनियाँ शुरु किसने कीं ? उन्ही लक्षण दिखाने वाले कुछ लोगों ने । यहाँ तक कि प्रसिद्ध साहित्य तक मे भी सिर्फ़ एक ही किताब मुझे मिला -- और आप सब को ये पढनी चाहिये -- एक ही किताब मुझे मिली जो कि उद्यमी को नायक के रूप में पेश करती है - "एटलस श्रग्ड ।" इसके अलावा संपूर्ण विश्व मानो उद्यमियों को बुरे व्यक्तियों के रूप में देखता और दिखाता है । मैं अपने ही परिवार की बात करता हूँ । मेरे दादा और नाना, दोनो ही उद्यमी थे । मेरे पिता उद्यमी थे । मेरा भाई और मेरी बहन और मैं - हम तीनो की अपनी कम्पनियाँ हैं । और हमने ये सब शुरु करने का निर्णय इसलिये लिया क्योंकि शायद हम केवल यही करने के लायक थे । हम सामान्य काम कर ही नहीं पाते थे । हम किसी और के लिये काम कर ही नहीं पाते थे क्योंकि हम बहुत अकडू थे, और हम वो सारे लक्षण दिखाते थे ।
मगर हमारे बच्चे भी उद्यमी बन सकते हैं । मैं कुछ संगठनों से जुडा हुआ हूँ जो कि विश्व-स्तर पर एन्टरप्रिन्योर्स ओर्गेनाइज़ेशन और यंग प्रेसिडेंट ओर्गेनाइज़ेशन के नाम से जाने जाते हैं । मैं अभी बार्सिलोना से लौटा हूँ वाई.पी.ओ. की वैश्विक गोष्ठी में वक्तव्य दे कर, और वहाँ मैं जितने भी ऐसे लोगों से मिला जो कि उद्यमी हैं, उन सब को स्कूली पढाई में दिक्कतें हुई थीं । मुझमें डाक्टरी तौर पर ध्यान नहीं लगा पाने की बीमारी (अटेंशन डेफ़िसिट डिसार्डर) के १९ लक्षणों में से १८ पाये गये हैं । और इसलिये ये तमाम ताम-झाम मुझे बहुत कष्ट दे रहा है । (हँसी) शायद इसीलिये मैं इस वक्त थोडा सा घबराया हुआ भी हूँ -- शायद मैंने बहुत कॉफ़ी और शक्कर भी ले ली है -- मगर ये एक उद्यमी के लिये काफ़ी गडबड चीज़ है । अटेंशन डेफ़िसिट डिसार्डर, बाईपोलर डिसार्डर । क्या आपको पता है कि बाईपोलर डिसार्डर को सी.ई.ओ. बीमारी भी कहते हैं ? टेड टर्नर को ये बीमारी है । स्टीव जॉब को भी यही है । नेटस्केप के तीनो प्रतिष्ठाताओं को भी यही है । मैं पूरी लिस्ट बना सकता हूँ । बच्चों को देखिये -- ये लक्षण आपको उनमें दिखेंगे । और हम क्या करते है - हम उठा के उन्हें रीटालीन खिला देते हैं, ये कहते हुए, "उद्यमी मत बनो ये दूसर सिस्टम में ढल जाओ, और बढिया विद्यार्थी बनो ।" माफ़ कीजिये, मगर उद्यमी विद्यार्थी नहीं होते । हम फ़टाफ़ट चलना चाहते हैं । हम सारा खेल समझ सकते हैं । मैनें निबंधों की चोरी की है । परीक्षाओं में खूब नकल की है । मैनें दूसरे बच्चों को पैसा दे कर अपना काम करवाया विश्वविद्यालय के स्तर पर लगातार तेरह बार । पर एक उद्यमी हिसाब-किताब नहीं करता है, वो अकाउंटेंट को नौकरी पर रखता है । और मैनें ये थोडा पहले ही सीख लिया ।
कम से कम मैं यह बात स्वीकार कर सकता हूँ कि मैने नकल की; आपमें से ज्यादातर नहीं कर सकते । और अब तो मैं पाठ्य-पुस्तकों में उद्धृत किया जाने लगा हूँ -- मेरी कही पंक्ति उसी विश्वविद्यालय पाठ्य-पुस्तक में मौजूद है हर कनीडियन विश्व-विद्यालय और कॉलेज में । प्रबंधनीय लेखाविधि में, मैं पाठ नं आठ हूँ । वो पाठ मेरे द्वार बजट पर दिये गये एक वक्तव्य से आरंभ होता है। और मैने लेखक को अपने साक्षातकार के बाद बताया था, कि मै उस पाठ्य-क्रम में नकल से पास हुआ था । उसे लगा कि मैं मजाकिया हूँ, और इसीलिये इस बात को शामिल नहीं किया गया।
मगर बच्चों मे आप ये गुण देख सकते हैं । उद्यमी की परिभाषा है - "ऐस व्यक्ति जो कि संगठित करता है, चलाता है और व्यवसाय आगे बढाने के लिये खतरा मोल लेता है ।" इसका ये मतलब बिलकुल भी नहीं है कि आपको एम.बी.ए. करना पडेगा । इसमें ये भी नहीं लिखा है कि आपको मगज मार कर स्कूल में जाना ही पडेगा । इसका केवल इतना मतलब है कि कुछ बातें आपको अपने अंदर महसूस करनी होंगी । और हमने उन कुछ बातों के बारे में सुना है कि - क्या वो प्राकृतिक रूप से मौजूद होती हैं, या उन्हें सिखाया जा सकता है, सुना है ना? तो ये, ये चीज है या फ़िर वो चीज है? क्या है ये? देखिये, मुझे लगता है ये कोई भी एक चीज नहीं है । मेरे ख्याल से दोनों ही हो सकती है । मुझे उद्यमी बनने के लिये बाकयदा तैयार किया गया था ।
जब मैं बडा हो रहा था, मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि मुझे हर मोड पर, बचपन से यही सिखाया गया था -- जब मेरे पिता ने ये महसूस किया कि मैं उस सब के लायक नहीं जो स्कूल में पढाया-सिखाया जा रहा था -- और ये कि वो मुझे छोटी उम्र में ही व्यवसाय सिखा सकते थे । उन्होंने हमें तराशना शुरु किया, हम तीनों बच्चों को, हमें नौकरी के ख्याल से घृणा करना सिखा दिया गया और इस बात से प्यार कि हम ऐसी कंपनियाँ खडी करेंगे जो और लोगों को नौकरी देंगी ।
व्यवसाय में मेरी पहली कोशिश, जब मैं सात साल का था, और विन्नीपेग में था, और अपने बिस्तर पर पडा हुआ था एक लम्बे तार वाला फ़ोन ले कर । और मैं सारे ड्राई-क्लीनरओं को कॉल कर रहा था ये पता करने के लिये कि वो लोग मुझे कोट हेंगरों के कितने पैसे दे सकते थे । और मेरे माँ कमरे में आईं और उन्होनें पूछा, "तुम इन्हें बेचने के लिये इतने सारे हेंगर कहाँ से लाओगे?" और मैने कहा, "चलिये, तहखाने में देखते हैं ।" और फ़िर हम तहखाने में गये और मैनें एक अलमारी खोली । और उसमें करीब करीब एक हज़ार कोट हेंगर थे जो मैनें इकट्ठे किये थे । क्योंकि जब मैं उन्हे ये बता कर निकलता था कि मैं खेलने जा रहा हूँ, मै दरवाजे-दरवाजे जा कर पडोसियों से हेंगर इकट्ठा करता था और तहखाने में, बेचने के लिये जमा करता था । क्योंकि मैने कुछ हफ़्तों पहले ये देखा था कि -- इस से पैसे बन सकते थे । वो लोग एक हेंगर के लगभग दो पैसे देते थे । तो मैने सोचा, कि चलो तमाम तरह के हेंगर होते है । मैं उन्हें ले लूंगा । और मुझे पता था कि माँ को ये पसंद नहीं आयेगा, तो मैने बिना बताये ही कर डाला । और मुझे पता लगा कि आप असल में लोगों के साथ मोल-भाव कर सकते थे । एक व्यक्ति ने मुझे तीन पैसे का प्रस्ताव दिया, और मै उसे साढे तीन तक ले गया । मुझे सात साल की उम्र में ही पता था कि मुझे एक पैसे का केवल कुछ भाग ही मिलेगा, और लोग ये पैसा देंगे, क्योंकि उन्हें आगे इस से फ़ायदा होगा । साता साल की उम्र में मैं ये सोच सका कि मुझे कोट हेंगर के लिये साढे तीन पैसे मिल सकते हैं ।
मैनें नंबर प्लेट का कवर भी दरवाजे-दरवाजे बेचा है । मेरे पिता ने मुझे ऐसे किसी व्यक्ति को ढूँढने भेजा जो कि मुझे होलसेल रेट पर माल बेचे । और नौ वर्ष की उम्र में मैं सडबरी शहर में घूम रहा था घर-घर नंबर प्लेट कवर बेचते हुए । और अपना एक ग्राहक तो मुझे पूरी तरह से याद है क्योंकि मैने उसके लिये और भी काम किया था । मैने अखबार भी बेचे । और ये आदमी मुझसे कभी अखबार नहीं खरीदता था । पर मुझे विश्वास था कि उसे मैं नंबर प्लेट कवर तो बेच ही डालूँगा । और उसने कहा, ""देखो, मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है ।" तो मैने कहा, "पर आपके पास तो दो कारें है..." -- और मैं केवल नौं वर्ष का था । और मैनें ये भी कहा, "मगर आपके पास दो कारें है, और दोनो पे कवर नहीं हैं। " तो उसने कहा, "मैं जानता हूँ ।" तो मैने कहा, "ये देखिये, इस कार की नंबर प्लेट एकदम खराब हो चुकी है ।" तो उसने कहा, "हाँ, ये मेरी पत्नी की कार है ।" तो मैने कहा, "एक बार लगा कर देखते है आपकी पत्नी की कार पर, और देखते है कि क्या वो ज्यादा चलेगी ।" मुझे पता था कि वहाँ दो कारें थी, और उन पर दो-दो प्लेटें लगी थीं । अगर मैं चार कवर नहीं बेच सका, तो कम से कम एक तो बेच सकूँगा । ये मैनें बहुत छोटी उम्र में सीख लिया था ।
मैनें कॉमिक्स की अदला-बदली भी की । जब मैं करीब दस साल का था, मैं कॉमिक्स बेचता था जार्जियन खाडी की हमारी झोपडी से । और मैं साइकिल से समुद्र-तट के एक सिरे पर जाता था और गरीब बच्चों से कॉमिक्स खरीद लेता था । और फिर मैं तट के दूसरे सिरे पर जा कर रईस बच्चों को वो बेच देता था । ये मुझे प्राकृतिक रूप से पता था - सस्ता खरीदो, महँगा बेचो । और यहाँ माँग भी थी, और पैसा भी था । गरीब बच्चों को बेचने की कोशिश मत करो; उनके पास पैसा नहीं है । रईसों के पास है - थोडा तुम ले लो । तो ये बहुत स्वाभाविक है न । ये कुछ मंदी जैसा है - मंदी में क्या है ? अभी भी १३ बिलियन डॉलर अमरीकी बाज़ारों में घूम रहे हैं । उसमें से कुछ अपने लिये ले लो । ये मैनें बचपन में ही सीख लिया था । मैनें ये भी सीख लिया था कि अपने स्रोत के बारे में किसी को मत बताओ, क्योंकि ये धँधा शुरु करने के चार हफ़्तों के भीतर ही मेरी पिटाई हो गयी क्योंकि एक रईस बच्चे को ये पता लग गया था कि मैं कॉमिक्स कहाँ से खरीदता हूँ, और उसे ये बात अच्छी नहीं लगी कि वो मुझे अतिरिक्त पैसे दे रहा था ।
दस साल की उम्र में मुझे जबरदस्ती अखबार बेचना भेज दिया गया । मेरा बिलकुल भी मन नहीं था, पर दस साल की उम्र में, मेरे पिता ने कहा, "अखबार बेचना तुम्हारा अगला धँधा होगा ।" न सिर्फ़ मुझे एक इलाका दिया गया, बल्कि मुझे दो और इलाके लेने पडे, और फ़िर उन्होनें कहा कि मैं आधे अखबार बेचने के लिये किसी को नौकरी पर रखूँ, जो कि मैने किया, और तब मुझे पता लगा कि सारा पैसा तो असल में टिप्स में था । तो मैं टिप्स और भुगतान लेने जाता था । और सारे अखबारों के लिये खुद ही पैसा लेने जाने लगा । मेरा कर्मचारी सिर्फ़ अखबार बाँटने जाता था । क्योंकि तब तक मुझे पता लग गया था कि मैं पैसे बना सकता था । अब तक मुझे ये बात साफ़ हो चुकी थी कि मैं किसी और के लिये काम नहीं करने वाला था ।
मेरे पिता की एक गाडी सम्हालने और मशीन सम्हालने की दुकान थी । और उसमें बहुत सारे पुर्जे इधर-उधर पडे रहते थे । और उसमें पुराना पीतल और ताँबा भी पडा था । तो मैनें उनसे पूछा कि उसका क्या होगा । और उन्होनें बताया कि वो उसे फेंक देते थी । तो मैने कहा, "मगर इसके तो पैसे मिल सकते है ?" तो उन्होंने कहा, " हाँ, शायद ।" ये याद रखिये कि मैं दस साल का - ३४ साल पहले की बात है और मुझे उस कबाड में एक मौका दिख रहा था । उस कबाड से पैसा बनाया जा सकता था । तो मैनें अपनी साइकिल पर और भी दुकानों से ये कबाड इकट्ठा करना शुरु कर दिया । और शनिवाद को मेरे पिता मुझे ले कर जाते थे एक कबाडी के दुकान पर, जहाँ मुझे पैसे मिल जाते थे । मुझे ये बडा ही महान काम लगता था । और क्या विडंबना है कि, तीस साल बाद आज हम 1-800-GOT-JUNK बना रहे हैं ? और उस से पैसा भी बना रहे हैं ।
११ साल की उम्र में मैने पिन रखने के लिये तकिया बनाया, और उन्हें अपनी माँ के लिये मदर-डे के लिये बनाया । और ये छोटे छोटे लकडी के टुकडों से बनता था -- जब हम घर के बाहर कपडे सुखा रहे होते थे । और हम कुछ कुर्सियाँ बनाते थी । और छोटे तकिये जो मैं सिलता था । और आप उस में अपनी पिनों को खोंस सकते थे । क्योंकि लोग सिलाई किया करते थे, और उन्हें ऐसे तकियों की ज़रूरत थी । पर मुझे लगा कि आपके पास विकल्प होने चाहिये । तो मैने उनमें से कुछ को भूर पेंट कर दिय । और जब मैं किसी के दरवाजे जाता था, तो ये नहीं कहता था, "क्या आपको चाहिये ?" मैं कहता था, "आपको कौन से रँग का चाहिये ?" देखिये आप दस साल के बच्चे को मना नहीं कर सकते हैं, खासकर, जब वो आपसे पूछता हो कि भूर वाल दूँ या सफ़ेद । तो पाठ भी मैने बचपन में ही सीख लिया था ।
और मैनें ये भी सीखा कि मजदूरी बहुत ही खराब काम है । जैसे कि लॉन की घास काटना घनघोर यातना है । पर क्योंकि मुझे गर्मियों में अपने सारे पडोसियों के लिये घास काटनी होती थी, और उसके लिये पैसे मिलते थे । मुझे लगा कि बार-बार आने वाली आमदनी एक ही ग्राहक से, बहुत मज़ेदार होती है । तो मैनें सोचा कि अगर मैं किसी ग्राहक की एक बार मदद कर दूँ, और हर हफ़्ते के लिये मुझे उससे पैसे मिले, तो ये बहुत बेहतर होगा बजाय पिनों के तकिये को एक व्यक्ति को बेचने के । क्योंकि वो बार बार नहीं बिक सकता है । तो मुझे ये बार-बार आमदनी वाली बात ही बचपन में ही सीखने को मिल गयी ।
देखिये, मुझे इन सब चीजों के लिये तैयार किया जा रहा था । मुझे कहीं भी नौकरी करना मना था । मैं लोगों के गोल्फ़-किट को ढोता था । मगर मुझे पता लगा कि गोल्फ़-कोर्स पर एक टीला है, तेरहवें छेद के पास, एक बडा टीला था । और लोग कभी भी अपना बैग खुद वहाँ ढोना नहीं चाहते थे । तो मैं वहीं एक कुर्सी डाल कर बैठ जाता था और सिर्फ़ उन लोगों का सामान ढोता था जिनके पास ढोने के लिये और कोई नहीं था । और मैं उनकी किटों को उस टीले के ऊपर तक ले जाता था, और एक डॉलर की कमाई करता था । जबकि मेरे दोस्त पाँच घण्टों तक काम करके किसी का सामान ढोते थे, और पाँच डॉलर कमाते थे । और मैं कहता था, "ये मूर्खता है क्योंकि तुमने पाँच घण्टे काम किया है ।" मुझे इसका कोई मतलब नहीं समझ आता था । "आपको पैसा बनाने की तेज तरकीब ढूँढनी चाहिये ।"
हर हफ़्ते मैं कोने की दुकान से कुछ सामान लेता था । और फ़िर ७० साल के लगभग उम्र की ब्रिज खेलने में मशगूल महिलाओं के पास जा कर बेच देता था । और वो मुझे अगले हफ़्ते का आर्डर दे देती थीं । और मैं सिर्फ़ सामन पहुँचाता और दोगुना पैसा बटोरता था । और मैने इस बाज़ार पर कब्जा जमा लिया था । इसमें किसी लिखा-पढी की ज़रूरत नहीं होती है । बस कहीं माँग होनी चाहिये, और कहीं से आपूर्ति होनी चाहिये और कुछ लोग जो आपकी बात सुनने को तैयार हों । ये औरतें कभी किसी और से सामान नहीं लेती थीं क्योंकि मैं उन्हें पसंद था, और मुझे ये पता था ।
मैं गोल्फ़-कोर्स से गोल्फ़-बॉल ले आता था । हर कोई झाडियों में बॉल ढूँढ रहा होता था और गड्ढों में। और मैं कहता था कि ये क्या बकवास है । सारी बॉलें तो तालाब में हैं और कोई भी तालाब में जाने को तैयार नहीं था । तो मैं तालाब में घुस कर, इधर-उधर रेंग कर, अपने पैर से उन्हें उठाता था । उन्हें दोनो पैरों से उठाना पडता है । स्टेज पर नहीं किया जा सकता । और आप ये बॉल ले कर, बस उन्हें अपने बाथिंग-सूट के कच्छे में डाल लेते थे और जब आप काम खत्म करते थी, आपके पास कुछ सौ बॉलें होती थीं । मगर दिक्कत ये थी कि लोगों को पुराने बॉल नहीं चाहिये थे । तो मैनें उन्हें पकैट-बंद करना शुरु किया । और मैं १२ साल का था । उन्हें मैंने तीन तरह के पैकेजों में बाँटा । मेरे पास पिनैकल्स और डी.डी.एच ब्रांड की बॉलें थी, और वो बहुत मशहूर थीं । हर बॉल दो डॉलर की बिकती थी । तो मैं उन सारी बॉलों को एक साथ रखता था जो गन्दी नहीं दिखती थीं, और ५० सेन्ट की बेचता था । और मैं खराब बॉलों को पचास के पैकेट में बेचता था । और उन्हें लोग प्रैक्टिस के लिये इस्तेमाल कर सकते थे ।
स्कूल में मैनें धूप के चश्में भी बेचे हैं, उन सारे बच्चों को जो कि हाई-स्कूल में थे । और इस तरह की चीजों की वजह से लोग आपसे घृणा करने लगते है, क्योंकि आप हमेशा दोस्तों से पैसा निकलवाने के चक्कर में रहते हो । लेकिन इस से पैसा बनता है । और मैनें बहुत ही सारे धूप के चश्में बेचे । और जब मेरे स्कूल ने मुझे ये करने से मना कर दिया -- असल में एक दिन मुझे ऑफ़िस में बुला कर कहा गया कि मुझे ये करना बंद होगा -- तो मैं पैट्रोल-पंप गया और उन पंप वालों को कई कई चश्में बेचने लगा और फ़िर वो लोग अपने ग्राहको को बेच देते थे । और ये भी मस्त था क्योको अब मेरे पास रिटेल दुकानें थीं । उस समय शायद मैं चौदह साल का रहा हूँगा ।
मैने अपनी कार्ल्टन यूनिवर्सिटी की पहले साल की पूरी फ़ीस खुद ही भरी, वाइन का कवर बेच बेच कर । देखिये उसमें करीब ४० ओज़. की रम की बोतल आ जाती है और साथ में कोक की दो बोतलें? तो बढिया है न? और होता क्या था? लोग उसे अपने क्च्छों मे छुपा लेते थे, और जब आप फ़ुट्बाल का मैच देखने जाते, आप फ़्री में शराब अंदर ले जा सकते थे, और हर कोई उसे खरीदता था । माँग, आपूर्ति, मौका । मैनें उसकी ब्रांडिग भी की, और फ़िर उसे उसकी कीमत से पाँच गुना पर बेचा । उस पर मैनें अपनी यूनिवर्सिटी का चिन्ह बना दिया था ।
देखिए, हम अपने बच्चों को पढाते है, और उनके लिये खेल खरीदते हैं, पर अगर वो उद्यमी बच्चे हैं, तो हम ऐसे खेल क्यों नहीं खरीदते, जिससे कि उनकी उद्यमिता आगे बढे ? उन्हें आप पैसा नहीं बरबाद करना क्यों नहीं सिखाते ? मुझे याद है कि मुझे पैदल चलने के लिये छोड दिया गया था बान्फ़, अल्बर्टा में क्योंकि मैने एक सिक्का ज़मीन पर फेंक दिया था, और मेरे पिता ने कहा, "जा कर उसे उठाओ ।" उन्होंने कहा, "मैं पैसे कमाने के लिये बहुत मेहनत करता हूँ । मैं तुम्हें कभी भी एक पैसा भी बरबाद नहीं करने दूँगा ।" और मुझे उनका वो पाठ आज तक याद है ।
बँधा हुआ, घर से मिलने वाला पैसा बच्चों को खराब आदतें सिखाता है । पॉकिट-मनी, स्वाभाविक रूप से, बच्चों को नौकरी-पेशा होना सिखाती है । एक उद्यमी कभी भी तनख्वाह की अपेक्षा नहीं रखता है । और बचपन में मिलने वाला बँधा-बँधाया पैसा तनख्वाह की आदत डालता है । ये गलत है, मेरे हिसाब से, अगर आप उद्यमियों को पैदा करना चाहते हैं । मैं अपने बच्चों के साथ क्या करता हूँ -- मेरे दो बच्चे है, सात और नौ साल के -- कि मैं उन्हे ले कर घर भर में घूमता हूँ, ऐसी चीजें ढूँढने के लिये, जिन्हे किया जाना है । वो आ कर मुझे बताते है कि क्या करना है । या फ़िर मैं जा कर उन्हें बताता हूँ , " देखो, ये करने की ज़्रूरत है ।" और फ़िर हम क्या करते है? हम सौदा तय करते हैं । वो काम ढूँढ कर लाते हैं । और हम मोल-भाव करके ये तय करते हैं कि कितना पैसा दिया जाएगा । लेकिन उन्हें कोई भी बँधी-बँधायी पॉकिट-मनी नहीं मिलती, मगर उन्हें मौका मिलता है और ज्यादा काम ढूँढने का, और वो मोल-भाव करना भी सीखते हैं, और मौके ढूँढना भी ।
ऐसी चीजें सिखानी पडती हैं । मेरे हर बच्चे के पास एक गुल्लक है । उनकी कमाई का आधा हिस्सा घर के खर्च में जाता है, और आधा उनके खिलौनों के खाते में । और जो भी उनके खिलौनों के घाते में जाता है, उसे वो चाहे जैसे खर्च कर सकते हैं । और जो आधा भाग घर-खर्च में जाता है, हर छः महीने पर, उसे बैंक में जमा करते हैं । वो मेरे साथ चल कर जाते हैं । हर साल जितना पैसा इकट्ठा होता है, वो उनके ब्रोकर के पास जाताहै । जी हाँ, मेरे दोनो बच्चों के पास अपने स्टॉक-ब्रोकर भी हैं । पर मैं उन्हें पैसा बचाने की आदत जबरदस्ती डाल रहा हूँ । मुझे ये बात अजीब लगती है कि ३० साल उम्र के लोग कहते हैं, "हाँ, शायद अब मैं रिटायरमेंट के लिये पैसा जोडना शुरु करूँ ।" तुम पहले ही २५ साल बरबाद कर चुके हो । आप इन आदतों को बच्चों को सिखा सकते है क्योंकि उन्हें इस से कुछ खास फ़र्क नहीं पडता है ।
उन्हें हर रात को कहानी मत सुनाइये । हफ़्ते में चार दिन उन्हें सोते समय कहानी सुनाइये और बाकी तीन रात, उनसे कहानियाँ सुनिये । अपने बच्चों के साथ बैठ जायिये, और उन्हें चार चीजें दीजिये, एक लाल कमीज़, एक नीली टाई, एक कँगारू, और एक लैपटॉप, और उन्हें इन चारो के बारे में एक कहानी सुनाने के लिये कहिये । मेरे बच्चे खूब ऐसा करते हैं । इससे उन्हें अपनी योजनाओं को बेचना आयेगा; वो और रचनात्मक बनेंगे; उन्हें इस से अपने पाँवों पर खडा होना आयेगा । इस तरह का कुछ कर के देखिये, और उसका आनंद लीजिये ।
बच्चों को लोगों के समूहों के सामने खडा कर दीजिये, और उन्हें बोलने को कहिये, भले ही वो अपने परिवारजनों के सामने ही क्यों न हो और छोटे-छोटे नाटक, और भाषण देने के लिये कहिये । ये उद्यमी के लिये आवश्यक ऐसे कुछ गुण हैं जो कि आप चाहेंगे कि आपके बच्चे सीखें । बच्चों को बताइये कि खराब ग्राहक, और खराब कर्मचारी कैसे होते हैं । उन्हें घटिया कर्मचारियों को दिखाइए । जब आप घटिया ग्राहक-सेवा देखें, तो उसे खुल कर बच्चों को समझाइये । कहिये, ""देखो, ये घटिया कर्मचारी है ।" और कहिये, " देखो, ये वाल बढिया कर्मचारी है ।" (हँसी) अगर आप एक रेस्टोरेंट में जाते है, और आपको घटिया सेवा मिलती है, तो बच्चो को दिखाइये कि घटिया सेवा कैसी लगती है । (हँसी) हमारे सामने ये सब पाठ पडे हैं, मगर हम कभी इन मौकों का इस्तेमाल नहीं करते है; हम बच्चों की ट्यूशन लगवा देते हैं ।
सोचिये यदि आप बच्चों का सारा फालतू सामान और सारे खिलौने जो कि वो इस्तेमाल नहीं करते है, ले और कहें, "चलो इन्हें क्रेगलिस्ट और किजिजि पर बेच देते हैं ?" और बच्चे सच में इन्हें बेचें और सीखें कि कैसे तमाम ईमेलों में असल खरीदने वालों को कैसे ढूँढा जाये । ये ईमेल आपके अकाउंट में आ सकती है, या कुछ और इंतज़ाम हो सकता है । मगर उन्हें कीमत लगाना, कीमत का अंदाज़ा लगाना, और फोटो निकालना वगैरह सीखने का मौका मिलेगा । उन्हें सिखाइये कि कैसे इस तरह से पैसे बनाये जा सकते हैं । फ़िर जो पैसा उन्होने कमाया, उसमें से आधा घर के खाते में, और आधा उनके खिलौनों के खाते में । मेरे बच्चों के ये बहुत पसंद है ।
कुछ उद्यमिता के लक्षण जो कि आप बच्चों को सिखा सकते है: दक्षता, लगन, नेतृत्व, आत्म-चिंतन, सहकार्यता, नैतिक मूल्य । ये सारे लक्षण आपको बच्चों में मिलेंगे, और आप उन्हें विकसित कर सकते है । इस तरह की बातों पर ध्यान दीजिये । और दो ऐसे लक्षण हैं जिन पर मैं चाहता हूँ कि आप गौर करें कि उन्हें आप भुलवा न दें । पहले तो उन्हें ध्यान नहीं लगा पाने के लिये (अटेन्शन डेफ़िसिट डिसार्डर के लिये) दवाइयाँ मत खिलाइये जब तक कि बहुत ही खराब स्थिति न हो । (तालियों सहित अभिवादन) और यही बात धुनीपर, और तनाव, और उदासी पर भी लागू होती है, जब तक कि स्थिति बिल्कुल ही खराब न हो । बाईपोलर डिसार्डर को सी.ई.ओ. बीमारी के नाम से भी जाना जता है । स्टीव जर्वेटसन और जिम क्लार्क और जिम बार्क्स्डेल तीनों को ये है, और उन्होंने नेट-स्केप बनाया था । सोचिये, अगर उन्हें बचपन से ही रीटालीन की खुराक दी जाने लगती । ये सब कुछ नहीं होता हमारे पार, है न? अल गोर को इंटरनेट खुद ही बनाना पडता ।
ये ऐसी योग्यताएँ हैं जिन्हें हमें क्लास-रूम में पढाना चाहिये जैसे कि हम बाकी सब कुछ पढाते हैं । मैं ये बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि उन्हें वकील बनने से रोक दीजिये । मगर सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि उद्यमिता को भी उसी महत्व से देख जाये जैसे कि हम बाकी सारे उत्तम पेशों को देखते हैं । क्योंकि उद्यमिता में बहुत बहुत ताकत है ।
अंत में, मैं एक छोटा सा विडियो दिखाना चाहता हूँ । ये विडियो एक ऐसी कंपनी ने बनाया जिन्हें मैं सलाह देता हूँ । इन्हें ग्रास-होपर कहते हैं । ये बच्चों के बारे में है । ये उद्यमिता के बारे में है । आशा है कि इस से आप जो कुछ आपने सुना, उस पर ध्यान देने के लिये प्रोत्साहित होंगे और इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिये कुछ करेंगे । [बच्चा..."और तुम्हें लगता था कि तुम जो चाहे कर सकते थे"?] [तुम आज भी कर सकते हो ।] [क्योंकि ऐसा बहुत कुछ जो हमें असंभव लगता है...] [वास्तव में बहुत ही आसानी से किया जा सकता है] [क्योंकि हम ऐसी जगह रहते हैं जहाँ] [कोई एक अकेला व्यक्ति भी बहुत कुछ बदल सकता है] [इसका सबूत चाहिये ?] [ज़रा उन लोगों के बारे में सोचो जिन्होने हमारा देश बनाया;] [हमारे माता-पिता, अंकल-आंटी, दादा-दादी...] [वो सब प्रवासी थे, नये लोग जिन्हें अपने लिये एक जगह बनानी थी] [वो अपने साथ बहुत थोडा कुछ ले कर आये थे] [या शायद कुछ भी नहीं सिवाय] [कुछ अच्छी योजनाओं के] [ये लोग विचारक थे, कर्मयोगी थे,,,] [...नया सोचने वाले लोग थे...] [जब तक कि उनके लिये एक नाम नहीं सोचा गया...] [...उद्यमी.. इंटर-प्रिन्योर ! ] [उन्होंने संभव की परिभाषा ही बदल डाली ।] [उन्हें साफ़ दिखता था कि कैसे वो जीवन को बेहतर बना सकते हैं] [सबके लिये, तब भी जब कि कठिन समय चल रहा हो ।] [आज, ये समझना मुश्किल है..] [...जबकि हमारे सामने तमाम कठिनाइयाँ हैं ।] [लेकिन कठिनाइयों से ही मौके निकलते हैं] [सफ़लताओं के, उप्लब्धियों के, और कठिनाई ही हमें मजबूर करती है...] [नये रास्ते खोजने के लिये] [तो आप क्या करेंगे और क्यों?] [यदि आप खुद को उद्यमी मानते हैं] [आप जानते हैं कि सिर्फ़ खतरा मोल लेना ही पुरस्कार नहीं है ।] [लेकिन पुरस्कार ही नवीनता को आगे बढा रहे हैं...] [...लोगों का जीवन बदल रहे हैं । रोजगार के अवसर बना रहे हैं ।] [तरक्की का ईंधन बन रहे हैं ।] [और दुनिया को बेहतर बना रहे है ।] [हमारे चारों तरफ़ उद्यमी हैं ।] [वो छोटेछोटे व्यवसाय करके हमारी अर्थ-व्यवस्था को सहारा दे रहे हैं,] [आपकी मदद के लिये नये औजार बना रहे हैं] [..आपको परिवार, दोस्तों से दुनिया के आर-पार जोड रहे हैं] [और समाज की पुरानी और कठिन समस्याओं के नये इलाज ढूँढ रहे हैं ।] [क्या आप किसी उद्यमी को जानते हैं ?] [कोई भी उद्यमी हो सकते हैं...] [आप भी! ] [इसलिये मौके को इस्तेमाल कर के रोजगार पैदा कीजिये,जो आपने हमेशा से सोचा था] [अर्थ-व्यवस्था को सुधारने में मदद कीजिये] [बदलाव लाने का ज़रिया बनिये ।] [अपने व्यवसाय को नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाइये ।] [मगर सबसे ज़रूरी,] [याद कीजिये जब आप छोटे थे...] [और जब सब कुछ अपनी पहुँच के भीतर जान पडता था,] [और फ़िर खुद से चुपचाप कहिये, मगर ठोस भरोसे के साथ:] ["आज भी सब मेरी पहुँच के भीतर है ।"]
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Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Anshul Tyagi
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