१८ मिनट की समय सीमा बहुत निर्दयी है, इस लिये मै सिधे मुद्दे पर आता हूँ. जैसे ही मै इसे काम करा सकूँ. आइये चलें. मैं ५ अलग चीज़ों के बारे में बात करूंगा. मैं बताऊंगा कि उम्र को हराना क्यों जरूरी हैं. मैं बताऊंगा कि क्यों हमें सावधान होना होगा, और इसके बारे में और अधिक बातें करनी चाहिये. निसंदेह मैं सम्भावनाऒं के बारे में भी बोलूँगा. मैं बताऊंगा कि क्यॊं हम इतने भाग्य्वादी कयों हैं जहां तक उम्र के बारे मे कुछ करने का प्रश्न है. और फिर शायद मैं वार्ता का दूसरा भाग ये बताने मे लगाऊं कि कैसे हम शायद भाग्यवाद को गलत साबित कर सकें, वास्तव में इसके बारे में कुछ कर के.
इसे मैं दो भागों में करूंगा. पहले मैं इस बारे में बात करूंगा कि कैसे जीवन काल में छोटी सी व्रिधी से शुरू कर के -- जिसे मैं उन लॊगॊं के संदर्भ में ३० साल की अवधी मानता हूं जो शुरुआत में पहले से ही अधेडावस्था में हॊं -- ऐसी स्थीति में पहूंचा जा सकता है जिसे वास्तव में बुढापे को पराजित करना समझा जा सकता है. मूलत:, इसका मतलब उस रिशत॓ को समाप्त करना है जो आपकी उम्र और अगले साल आपकी संभावित मर्त्यु के बीच है -- या बीमार होने के. और आखिर में मैं बात करूंगा कि कैसे उस माध्यमिक कदम तक पहूंचा जा सकता है, ३० साल उम्र में वृधि के.
तो मैं इस बात से शुरु करूंगा कि हमें यह क्यों करना चाहिय॑. अब मैं एक सवाल पूछना चाहत्ता हूं. श्रोताओं में कोई हैं जो मलरिया के ह्क मे हैं तो अपने हाथ खडे करें. यह तो आसान था. ठीक है. अच्छा हाथ उठाएं श्रोताओं में से कोई जो यह नहीं जानते कि मलेरिआ एक अच्छी चीज़ है या बुरी? अच्छा. तो हम सब ये सोचते हैं कि मलेरिया एक बुरी चीज़ है. यह तो बहुत अच्छी खबर है, क्योंकि मैंने सोचा था कि जवाब यही होना चाहिए. अब जो मैं आपको बताना चाह्ता हूं कि हमारे द्वारा मलेरिया को बुरे समझे जाने का मुख्य कारण मलेरिया की वो विशेषता के कारण है जो बूढे होने से मिलती जुलती है. और वह विशेषता यह है. अंतर मात्र ये है कि उम्र का बढ्ना मलेरिया से कहीं ज्यादा लोगों की जान लेता है.
मैं श्रोताओं के बीच, खास तौर से ब्रिटेन में, लोमडी के शिकार से तुलना के बारे में बात करना पसंद करता हूं. जिसे एक लंबे संघर्ष के बाद प्रतिबंधित किया गया था, सरकार के द्वारा, कुछ ही महीने पहले. मैं जानता हूं दर्शकों मे सहानुभूति है, लेकिन, जैसा कि हमें पता है, बहुत से लोग इस तर्क से सहमत नहीं हैं. और मुझे लगता है यह काफ़ि अच्छी तुलना है. काफ़ी लोगों नें कहा, "ऐसा है, शहरी लोग कौन होते हैं हम ग्रामीण लोगों को बताने बाले कि अपने समय के साथ क्या करें. यह हमारी जीवन शैली का एक परंपरागत हिस्सा है, और हमें यह करते रहने देना चाहिये. यह वातावर्ण के लिये अच्छा है; यह लोमडियों की संख्या को अधिक बढ्ने से रोकता है." लेकिन अंत में चली तो सरकार की ही, क्योंकि अधिकांश ब्रिटिश जनता, और निसंदेह सांसदों का बहुमत, इस निष्कर्ष पर पहूंचा कि यह ऐसी चीज़ है जो सभ्य समाज में सहन नहीं करी जा सकती.
और मैं समझता हूं कि इन्सान का बूढा होना इन सभी विशेशताओं के काफी समान है. इसमें से कौनसी बात लोग नहीं समझ पाते ? निसंदेह यह केवल जीवन के बारे में नहीं है -- (ठ्हाके) यह स्वस्थ जीवन के बारे में है -- कमज़ोर, दयनीय और आश्रित होने में कोई आनंद नहीं है, चाहे मरने में आनंद हो या न हो. इसका वर्णन मैं ऐसे करना चाहूंगा. यह एक वैश्विक भ्रम है. ये वैसे ही अविश्वसनीय तर्क हैं जैसे लोग बूढे होने के संदर्भ में देते हैं. मैं यह नहीं कह रहा कि यह तर्क पूरी तरह से बेकार हैं. इन में कुछ अच्छे तर्क भी हैं. जिनके बारे में हमें सोचना चाहिए, प्रायोजन करना चाहिए जिससे कुछ भी बेकार न जाए, और जब हम बूढे होने का इलाज ढूंढ लें तो कम से कम उथल पुथल हो.
लेकिन ये उस समय पागलपन लगता है, जब आप अनुपात की भावना का ध्यान रखते हैं. यह तर्क, ये वह चीज़ें हैं जिनके बारे में चिंतित होना जायज़ है. लेकिन सवाल यह है, क्या ये इतने खतरनाक हैं -- बूढे होने के बारे में कुछ करने के जोखिम -- कि इससे विपरीत करने के नुक्सान को नज़रअंदाज़ किया जा सके, यानि, बूढे होने को एसे ही छोड दिया जाए? क्या ये इतने बुरे हैं कि इनसे बेहतर है १००,००० लोगों को हर रोज़ बेवजह अकस्मात मर्त्युद्ण्ड दिया जाए. यदि आपके पास इससे बडा कोई तर्क नहीं है, तो मैं कहता हूं कि मेरा समय बर्बाद न करें. (ठहाके)
हां एक तर्क है जो कुछ लोगों के विचार में सचमुच प्रबल है, और वह ये है. लोग जनसंख्या व्रिधी के बारे में चिंता करते हैं; वे कहते हैं, "अगर हम बूढे होने का इलाज निकाल लेते हैं, तो शायद ही कोई मरेगा, या कम से कम मरने वालॊं की संख्या बहुत कम होगी, सिर्फ़ यमराज से पंगा लेने पर. और इसकी वजह से हम ज्यादा बच्चे पैदा नहीं कर पाएंगे, और ज्यादातर लोगों के लिये बच्चे बहुत मायने रखते हैं." और यह सच है. और मालूम है, बहुत से लोग जान कर भी इस सवाल का गलत जवाब देते हैं, कुछ इस तरह से. मैं इन जवाबों से सहमत नहीं हूं. मेरे ख्याल से ये बुनियादी तौर से काम नहीं करते. मैं समझता हूं, हमें इस संबंध में दुविधा का सामना करना पडेगा. हमें यह तय करना हॊगा कि हमें जन्म दर कम चाहिये, या मर्त्यु दर ज्यादा. उच्च मर्त्यु दर, निसंदेह, केवल इन उपचारों को नकार के बहुत से बच्चे पैदा को स्वीकारने से ही हो जाएगा.
और, मैं कहता हूं यह ठीक है -- मानवता के भविष्य को यह निर्णय लेने का हक है.™ लेकिन भविष्य की ओर से हमारे द्वारा यह तय करना ठीक नहीं है. अगर हम संकोच करेंगे या डोलेंगे, और दरअसल इन उपचारों का विकास नहीं करेंगे, तो हम लोगों की एक बडी संख्या कॊ सज़ा दे रहे हैं -- जो इन इलाज के तरीकों से फ़ायदा उठाने के लिये जवान और स्वस्थ होते लेकिन नहीं होंगे, क्योंकि हमने इन्हें संभावित तेज़ी से विकसित नहीं किया -- हम इन लोगों को अनिश्चित तौर से लम्बे जीवनकाल से वंचित रख रहे हैं, और मैं समझता हूं कि यह अनुचित है. अधिक जनसंख्या के सवाल का यह मेरा ज़वाब है.
अच्छा. तो अगली चीज़ है, कि हमें इस पर थोडा और सक्रीय क्यों होना चाहिए? और बुनियादी ज़वाब यह है कि बुढापे के हित में लोगों का भ्रम इतना मूर्खतापूर्ण नहीं है जितना दिखता है. यह असल में बूढे होने का सामना करने का एक समझदारीपूर्ण तरीका है. उम्र का बढ्ना भयानाक किन्तु निश्चित है, इस लिए, हमें इसे अपने दिमाग से निकालने का कोई तरीका ढूंढना है, और एसा करने के लिए हमें जो भी करना पडे वह सही है. जैसे, उदाहरण के लिए, ये हास्यासपद तर्क देना कि क्यों उम्र का बढ्ना असल में अच्छी बात है. लेकिन यह तभी काम कर सकता है जब हमारे पास ये दोनों भाग हों. और जैसे ही अपरिहार्यता वाला भाग कुछ साफ़ होता है, और हम बढ्ती उम्र के बारे में कुछ करने की स्थिती में हो सकते हैं, यह समस्या का एक हिस्सा बन जाता है. बुढापे के हित में लोगों का भ्रम ही है जो हमें इन चीज़ों के बारे में आन्दोलन करने से रोकता है. और इसलिए हमें इस के बारे में काफ़ी चर्चा करनी है -- मैं तो यहां तक कहूंगा इसका प्रचार करना है -- जिस से हम लोगों का ध्यान आकर्शित कर सकें, और उन्हें यह आभास दिला सकें कि वे इस मामले में भ्रम में हैं. तो इसके बारे में मैं इतना ही कहूंगा.
अब मैं बात करूगा व्यवहार्यता की और हमारे यह सोचने का कि उम्र का बढ्ना निश्चित है का बुनियादी कारण अभी मेरे द्वारा दिये जाने वाली उम्र के बढ्ने की परिभाशा मे संक्षिप्त है. एक बहुत ही सरल परिभाशा. उम्र का बढना जीवित होने का एक अतिरिक्त असर है, कहा जाए तो चयापचय, या हमारे शरीर के विभिन्न अंगों का अपना अपना काम करना. यह केवल शब्दॊं का खेल नहीं है; यह एक उचित कथन है. उम्र का बढ्ना एक ऐसी प्रक्रिया है जो गाडियों जैसी निर्जीव वस्तुओं के साथ होता है, और यह हमारे साथ भी होता है, बावज़ूद इसके कि हमारे शरीर के पास बहुत से चतुर तंत्र हैं जिन से वह स्वयं की मरम्म्त कर सकता है, क्योंकि ये तंत्र परीपूर्ण नहीं हैं.
तो बुनियादी तौर पे चयापचय, जिसकी परिभाशा है हर चीज़ जो हमें दिन प्रतिदिन जीवित रखती है, के कुछ अतिरिक्त असर होते हैं. ये असर एकत्रित होते रहते हैं और अंततः बीमारी पैदा करते हैं. यह अच्छी परिभाशा है. तो हम इन शब्दों में कह सकते हैं: हम कह सकते हैं, ये घटनाओं की श्रृंखला है. और प्रायः दो मत हैं, अधिकतर लॊगॊं के, उम्र के बढ्ने को टालने को लेकर. ये हैं जिन्हें मैं ग्रेंटोलॊजी दृष्टिकोण और जेरिऎट्रिक्स या जराचिकित्सा दृष्टिकोण कहूंगा. जराचिकित्सक की बारी बाद में आएगी, जब बीमारी जाहिर हो रही होगी, और जराचिकित्सक वक्त के बढ्ते हुए कदमों को रोकने का प्रयास करेगा, और अतिरिक्त प्रभावों को इतनी जल्दी बीमारी पैदा करने से रोकने का. निसंदेह, यह एक अल्प-कालीन रणनीति है, एक हारी हुई लडाई, क्योंकि बीमारी पैदा करने वाले कारण वक्त के साथ अधिक होते जा रहे हैं.
ऊपरी तौर पर ग्रेंटोलोज़ि का रास्ता अधिक आशाजनाक लगता है, क्योंकि, जैसा आप जानते हैं, बचाव उपचार से बेहतर है. दुर्भाग्यतापूर्ण बात यह है कि हम चयापचय को बहुत अच्छी तरह समझते नहीं हैं. बल्कि जीवों की कार्यशौली के बारे में हमारी समझ काफ़ी कमज़ोर है - कोशिकाओं के बारे में भी हम अभी बहुत अच्छे नहीं हैं. उदाहरण के तौर पे हमनें आर एन ए हस्तक्षेप जैसी चीज़ों के बारे में कुछ साल पहले ही जाना है, और ये तो कोशिकाऒं के काम काज का बुनियादी भाग है. अंतत:, ग्रेन्टोलोजी एक अच्छा रास्ता है, पर वह सामयिक नहीं है जब हम हस्तक्षेप के बारे में बात करते हैं. तो हमें इसके बारे में क्या करना चाहिए? मेरा मतलब है, यह तर्क अच्छा है, और काफ़ी पक्का है, है ना?
किन्तु ऐसा नहीं है. इससे पहले कि मैं आपको बताऊं कि यह क्यों नहीं है, मै कुछ बात करूंगा उस बारे मे जिसको मैं दूसरा कदम कह रहा हूं. कल्पना करिये, जैसे कि-- आज, केवल उदाहरण के लिये -- हमें ३०साल अतिरिक्त सेहतमंद जीवन प्रदान करने की क्षमता मिल जाती है उन लोगॊं कॊ जॊ पहले ही अ्धेडावस्था में हैं, मसलन ५५ साल के. मैं उसे मजबूत मानव कायाकल्प कहुंगा. ठीक है. इसका असली मतलब क्या होगा आज विभिन्न आयु वाले लोग कितनी देर तक -- या यों कहें, विभिन्न आयु के उस समय जब ये उपचार उपलब्ध हो जाती हैं वास्तव में जियेंगे? इस सवाल का जवाब देने के लिए -- आप भले ही सोचें कि ये आसान है, किन्तु ये आसान नहीं है.. हम यह नहीं कह सकते, "अगर वे इन उपचारॊं का लाभ उठाने लायक उम्र में है, तो वे ३० साल अधिक जियेंगे." यह गलत जवाब है. और इसके गलत जवाब होने का कारण प्रगति है.
दॊ तरह की तकनीकि प्रगति हैं इस मायने में. बुनियादी, बडी सफ़लताएं, और इन सफ़लताऒं का वृद्धिशील शोधन. और इन में काफ़ी अंतर है समय काल के अनुमान लगाए जाने कॊ लेकर. बुनियादी सफ़लताएं: अनुमान लगाना बहुत मुशकिल है कि कितना समय लगेगा बुनियादि सफ़लता पाने में. हमनें यह बहुत समय पहले तय कर लिया था कि उडने में मज़ा आयेगा, और हमें १९०३ तक का समय लगा पता लगाने के लिए कि यह कैसे किया जाए. लेकिन उसके बाद यह काफ़ी संतुलित और सामान्य हो गया. मैं समझता हूं कि यह उस घटनाक्रम का जायज़ ब्य़ॊरा है जो संचालित उडान की प्रगति में हुआ. यह भी सोचा जा सकता है कि इन में हर एक पिछले चरण के आविश्कारक की कल्पना के परे है. वृद्धिशील विकास का नतीजा इस तरह का है जो वृद्धिशील नहिं रहा.
आप इस तरह की चिज़ किसी बुनियादी सफ़लता के बाद देख सकते हैं. आप इन्हें कई तरह की तकनीकों में देख सकते हैं. क्म्पयूटर के मामले में भी आप को सामान्तर समय रेखा देखने को मिलेगी, अपितु कुछ देर बाद. आप चिकित्सा संभाल को देख सकते हैं. मेरा मतलब है स्वच्छता, टीके, एंटीबायोटिक -- यानि कि, उसी तरह का समय सीमा इस लिये मै सोचता हूं, असल में दूसरा कदम, जिसे मैंने अभी अभी कदम बॊला था, कदम नहीं है. वॊ लॊग जिन की उम्र इतनी कम है कि वे इन चिकित्साऒं से लाभ उठा सकें जो यह थॊडा सा जीवन काल को बढा सकते हैं, यद्य्पि जब ये चिकित्साएं आएं तो वे अधेडावस्था में पहुंच चुके हों, एक तरह से बीच की स्थीति में होंगे. वे आम तौर पे उन्न्त उपचार पाने तक बच जाएंगे जो उन्हें ३०या५० साल और दे देगा. यानि कि वे इस खेल में आगे रहेंगे. चिकित्सा में इस गति से तेजी से सुधार हो जाएगा जिस गति से चिकित्सा में शेष खामियां उभर रही हैं.
यह बहुत महत्वपुर्ण मुद्दा है जो मैं समझाना चाहता हूं.♫ क्यॊंकि अधिकतर लोग जब यह सुनते हैं कि मैं यह भविश्यवाणी करता हूं कि आज जीवित बहुत से लॊग १,००० साल या अधिक जियेंगे, वॊ सोचते हैं मैं कह रहा हुं कि हम अगले कुछ दशकॊं में उपचारों का आविश्कार करने जा रहे हैं जो उम्र के बढ्ने को पूरी तरह से समाप्त कर देंगे और ये उपचार हमें १,००० साल या अधिक जीवित रहने देंगे. मैं यह बिलकुल भी नहीं कह रहा हुं. मैं कह रहा हूं कि इन उपचारॊं में सुधार की दर पर्याप्त होगी. ये कभी भी परिपूर्ण नहीं हॊंगी, लेकिन हम उन चीज़ॊं को ठीक कर पाएंगे जिन से २०० साल के लॊग मरते हैं, इससे पहले कोई २०० साल के हों. और इसी तरह से ३००, ४०० और अधिक . मैंने इसे यह छोटा सा नाम दिया है, "दीर्घायु escape velocity." (ठहाके) लगता है बात समझ में आती है इससे.
तो यह पथ रेखाएं दर्शाती हैं कि हमारी अपेक्षा में लोग कैसे जियेंगे, शेष जिवन प्र्त्याशा के संदर्भ में, जैसा कि उन के स्वस्थ से नापा जा सकता है, दी गयी आयु के लिये जब ये उपचार आये जो उनकी थी. अगर आप पहले से १०० साल, या ८० साल के भी हैं -- एक औसत ८० वर्षीय व्यक्ति, तो शायद हम इन उपचारो से आप के लिए कुछ अधिक ना कर पाएं, क्योंकि आप मौत के दरवाज़े के बहुत करीब हैं और यह प्रयॊग के तौर पे किये गए शुरुआती उपचार आप के लिए काफी नहीं होंगे. आप उन्हें सह नहीं पाऎंगे. लेकिन यदि आप केवल ५० साल के हैं, तो संभावना है कि आप को लुड्कने से बचाया जा सके -- (ठहाके) बाहर निकाला जा सके. और सही मायने में जैविक तौर से जवान बनने लगें, शारीरिक और मानसिक तौर से जवान, और उम्र संबंधी कारणॊं से मरने के आपके खतरे के मायने में. अवश्य, अगर आप उससे कुछ छॊटे हैं, तो आप कभी भी सचमुच उम्र संबंधी कारणों से मरने लायक कमज़ॊर अवस्था में भी नहीं होंगे.
तो मैं इस सच्चे निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, कि पहला १५० साल का व्यक्ति - हम नहीं जानते कि वह इन्सान आज कितने साल का है, क्योंकि हमें नहीं पता कि कितना समय लगेगा इन पहली पीढ़ी के उपचार पाने में. लेकिन चाहे वह उम्र कितनी भी हो, मैं यह दावा कर रहा हूं कि १,००० साल तक जीवित रहने वाला पहला व्यक्ति - वैष्विक आपदाओं को ध्यान में रखते हुए - वास्त्व में पहले १५० साल के व्यक्ति से शायद केवल १० वर्ष कम आयु का है. और यह सोचने लायक है.
अच्छा तो अंत में मैं बाकी की वार्ता मेरे अंतिम साढे सात मिनट, पहले कदम पर बिताऊंगा; यानि कि, वास्तव में हम जीवन में यह मामूली सी व्र्धी कैसे पा सकते हैं जो हमें मनचाही गति प्राप्त करने देगा? और यह करने के लिये, मुझे कुछ देर चूहों के बारे में बात करने की आव्श्य्क्ता है. मेरे पास मजबूत मानव कायाकल्प से मिलता जुलता मानक है. मैं उसे मजबूत चूहा कायाकल्प बुला रहा हूं, जो ज्यादा कल्पनाशील नहीं है. और वह ये है. मैं कहता हूं कि हम एक लंबे जीवन वाले चूहे का प्रकार लेंगे, जिसका मूलतः अर्थ है चूहे जॊ औसतन तीन साल तक जीते हैं. जब तक वो दॊ साल के हों हम उनको कुछ ना करें. और फ़िर हम उन के साथ काफ़ी कुछ करें, और इन उपचारों के साथ, हम उन्हें जीवित रखें, औसतन, उनके पांचवे जन्म दिन तक. तो, अन्य शब्दों में. हम दो वर्ष बढा दें -- हम उनके बाकि जीवन काल को तीन गुना कर दें, उस समय से शुरू कर के जब से हमनें उपचार शुरू करा.
प्र्शन यह है कि, इसका समय संद्र्भ के लिए क्या अभिप्राय है जब तक कि हम मनुषयों के मानक तक पहुंच सकें जिसके बारे में मैंने बात की थी? जिसे कि, जैसा मैंने समझाया, मजबूत मानव कायाकल्प या मनचाही गति बराबरी से कहा जा सकता है. दूसरा, इसका आम धारणा के लिये क्या अभिप्राय है इस बारे में कि हमें इन चीज़ॊं तक पहुंचने में कितनी देर लगेगी, चूहे मिलने से शुरू कर के? और तीसरे, सवाल यह है, यह क्या करेगा लॊगॊं की इसके लिये चाह के लिये? और मुभे यह लगता है कि पहला सवाल केवल जीव विग्यान का है और इसका जवाब देना बहुत मुशकिल है. इन्सान को सॊचना पड़ता है, और मेरे कई मित्र कहेंगे कि हमें इस प्रकार सोचना नहीं चाहिए, कि हमें अधिक जानकारी प्राप्त करने तक सब्र करना चाहिए.
मैं कहता हूं यह बकवास है. मैं कहता हूं कि अगर हम इस पर चुप रहें तो यह गैर जिम्मेदाराना होगा. हमें इस समय के संदर्भ के बारे मे बेहतरीन अनुमान लगाना चाहिए, लोगों को अनुपात की भावना देने के लिये जिससे वे अपनी प्राथमिकताऒं का आंकलन कर सकें. तो मैं कहता हूं कि हमारे पास ५०/५० मौका है इस पडाव पर पहुंचने का, मजबूत मानव कायाकल्प, १५ साल के अन्दर उस समय से जब हम मजबूत चूहा कायाकल्प तक पहुंच जाएं. १५ साल चूहे के बाद. लोगों का दृषिटकॊण शायद उससे कुछ बेहतर होगा. लोग विग्य़ान की मुश्किलों का पूरी तरह से आंकलन नहीं कर पाते. तो वो सोचते हैं वो पांच साल दूर है. वे गलत होंगे, लेकिन असल में उसका ज्यादा फ़रक नहीं पड़ेगा. आखिरकार, निसंदेह, मैं सोचता हूं यह कहना जायज़ होगा कि लोग उम्र के बढ़्ने के बारे में दोहरे विचार क्यों रखते हैं का बड़ा कारण है वैश्विक भ्रम जिसके बारे में मैंने पहले बात करी थी, मुकाबला करने की रणनीति. वो यहां इतिहास बन जाएगी, क्योंकि अब यह विशवास करना मुमकिन नहीं होगा कि उम्र का बढ़्ना इन्सानों के लिए अपरिहार्य है, चूंकि चूहों मे उसे कुशलता से टाला गया है. तो हम लोगों के स्वभाव में एक मज़बूत बदलाव देख सकते हैं, निसंदेह इसके काफ़ी बडे़ परिणाम हो सकते हैं.
तो आपको यह बताने के लिए कि हम उन चूहॊं तक कैसे पहुंचेंगे, मै अपने द्वारा दिए गए उम्र के बढ़्ने के विवर्ण की कुछ व्याख्या करूंगा. मैं "नुक़्सान" श़ब्द का प्रयोग करूंगा उन माध्यमिक चीज़ॊं को जाहिर करने के लिए जो चयापचय के कारण होती हैं, और अंततः विकृति पैदा करती हैं. क्यॊंकि इसमें ज़रूरी बात यह है कि चाहे नुक्सान अंत में विकृति को जन्म देता है, यह नुक्सान खुद अपनेआप लगातार जिंदगी भर चलता रहता है, पैदा होते ही शुरू होकर. पर यह चयपचय का हिस्सा नहीं है. और यह बात बहुत काम आ सकती है. क्योंकि इस तरह से हम मूल चित्रों को दुबारा बना सकते हैं. हम कह सकते हैं, मूलतः, कि ग्रेंटालाजी और जेरियाट्रिक्स में अंतर यह है कि ग्रेंटालाजी उस गति को कम करने की कोशिश करता है जिस गति से चयपचय इस नुक्सान को करता है. और मैं समझाता हूं कि यह नुक्सान दरअसल क्या है स्पष्ट जैविक तौर पे, एक मिनट में. और जेरियाट्रिक्स वक्त के प्रवाह को रोकने की कोशिश करता है इस नुक्सान को विकृति बनने से रोक कर. और यह एक हारी हुई लडा़ई है क्योंकि नुक्सान जमा होता जाता है.
तो एक तीसरा रास्ता है, अगर हम इस तरह से देखें. हम इसे यात्रिकि रास्ता कह सकते हैं. और मैं दावा करता हूं कि यांत्रिकि रास्ता सीमा के अन्दर है. यांत्रिकि रास्ता किसी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता. वो इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता, य़ा इस में. और यह अच्छा है क्यॊंकि इसका मतलब है कि यह हारी हुई लडा़ई नहीं है, और यह एसा कुछ है जो कि हमारे द्वारा करे जाने कि सीमा में है, क्योंकि इसमें बेहतरी या विकास शामिल नहीं होते. यांत्रिकि रास्ता सिर्फ़ कहता है, "हमें थोडी़ थोडी़ देर में सभी प्रकार के नुक्सानों की मरम्मत करनी चाहिये -- जरूरी नहीं पूरी तरह से, पर काफ़ी हद तक उनकी मरम्मत, जिससे हम नुक्सान का स्तर उस दहलीज़ के नीचे रहे जिसका होना ज़रूरी है, जो इसे रोगजनक बना देता है." हमें पता है कि यह दहलीज़ मौज़ूद है, क्योंकि मध्यम आयु में पहुंचने तक हमें उम्र संबंधी बिमारियां नहीं होती, यद्यपि पैदा होने के समय से ही नुकसान इकट्ठा हो रहा है.
मैं क्यों कहता हूं कि हम सीमा के अंदर हैं? वो मूलतः इसलिए. इस स्लाइड का सार नीचे है. अगर हम यह कहने की को्शश करें कि चयपचय के कौनसे भाग उम्र बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण हैं, तो हमे सारी रात यहां रहना पडे़गा, क्योंकि मूलतः पूरा चयपचय किसी न किसी तरह से उम्र बढ़्ने के लिए महत्वपूर्ण है, यह केवल उदाहर्ण के लिए है, यह अधूरा है. दाहिने तरफ़ वाली सूची भी अधूरी है. यह सूची उम्र संबंधी अलग अलग विकृतियों की है, और यह सिर्फ़ एक अधूरी सूची है. लेकिन मैं आप से यह दावा करना चाहूंगा कि ये बीच वाली सूची पूर्ण है, ये उन चीज़ों की सूची है जो नुक्सान होने के काबिल कहे जा सकते हैं, चयपचय के दुष्प्रभाव जो अंत में विकृतियं पैदा करते हैं. या जो विकृतियां पैदा कर सकते हैं. और ये केवल सात हैं. ये चीज़ों की श्रेणियां हैं, पर सिर्फ़ सात हैं. कोषिकाओं का नुक्सान, गुणसूत्रों में उत्परिवर्तन, माइटोकॊंड्रिया में उत्परिवर्त,न आदि.
सबसे पहले, मैं तर्क देना चाहूंगा कि ये सूची पूर्ण क्यों है. हां, निश्च्य ही हम जैविक बहस कर सकते हैं. हम कह सकते हैं, ठीक है, हम किन चीज़ों के बने हैं? हम कोशिकाओं और उनके बीच के सामान के बने हैं. नुक्सान किन में जमा हो सकता है? जवाब है, दीर्घायु अणु, क्योंकि अगर लघु आयु वाले अणु को नुक्सान होता है, लेकिन अणु बरबाद हो जाता है -- जैसे प्रोटीन प्रोटेओलाइसिस से ध्वस्त हो रहा है -- तो नुक्सान भी खत्म हो जाता है. वह निश्चित ही दीर्घायु अणु होंगे. तो, यह सात चीज़ें ग्रेंटॊलॊजी में काफ़ी समय से चर्चित रही हैं और यह काफ़ी अच्छी खबर है, क्योंकि इसका मतलब है, कि हम इन २० सालों में जीव विज्ञान में काफ़ी प्रगति कर चुके हैं, तो ये बात कि हमनें इस सूची को बढ़ाया नहीं है इस बात का अच्छा सबूत है कि इसे बढ़ाया जाने लायक कुछ नहीं है. बल्कि, इस से भी बेहतर है, हमे असल में पता है कि इन सब को ठीक कैसे करना है चूहों में, सिद्धांत के तौर पे - और सिद्धांत से मेरा मतलब है, कि शायद हम वास्तव में इन उपचारों को एक दशक में लागू कर सकते हैं. इनमें से कुछ, ऊपर वाले, आंशिक तौर पे लागू हो चुके हैं.
मेरे पास सब के बारे मे बताने का वक्त नहीं है, लेकिन मेरा निषकर्श यह है कि, अगर हमें इसके लिए उपयुक्त धन मिल जाए, तो शायद हम १० साल में ही मजबूत जन कायाकल्प का विकास कर सकते हैं, लेकिन हमें इसके बारे में गंभीर होना पड़ेगा. हमें कोशिश करनी शुरू कर देनी चाहिए. नि:संदेह, दर्शकों में कुछ जीवशास्त्री हैं, और मैं आपके कुछ संभावित सवालों का जवाब देना चाहूंगा. आप इस वार्ता से असंतुष्ट हुए हो सकते हैं, लेकिन मौलिक तौर पे आप को जाकर इस चीज़ को पढ़ना है. मैने इसपर काफ़ी कुछ लिखा है; मैं उन प्रयोगिक कार्यों का हवाला देता हूं, जिन पर मेरा आशावाद आधारित है, और इन में काफ़ी विस्तृत ब्यौरा है. ये ब्यौरा ही मुझ में आत्मविश्वास जगाता है इन आक्र्मक समय संदर्भों का जिनकी मैं भविष्य वाणी कर रहा हूं. तो अगर आप सोचते हैं कि मैं गलत हूं, तो बेहतर हो आप जाकर पता लगाएं कि आप ऎसा क्यॊं सोचते हैं.
नि:सेदेह, मुख्य बात यह है कि आपको उन लोगों पर विश्ववास नहीं करना चाहिए जो अपने आप को ग्रेन्टोलोजिस्ट कह्ते हैं क्योंकि, जैसा कि किसी भी क्षेत्र में पहले की सोच से घोर प्रस्थान में होता है, आप मुख्र्य धारा में लोगों से अपेक्षा करते हैं कि वो अवरोध करेंगे और इसे गंभीरता से नहीं लेंगे. तो, पता है, आप को वास्त्व में अपनी तैयारी करनी पड़ती है, यह समझने के लिए कि क्या यह सच है.
और हम कुछ चीज़ों के साथ समापन करेंगे. एक, पता है, अगले सत्र में आप एक शक्स को सुनेंगे जिसने कुछ समय पहले कहा था कि वह मानव जीनोम को कुछ ही समय में अनुक्रम कर सकता है, और सब ने कहा, "ज़ाहिर है यह मुमकिन नहीं है." और आप को पता है क्या हुआ. तो, पता है, एसा होता है. हमारे पास अलग अलग रणनितियां हैं - मतूशेलह माउस पुरुस्कार है, जो मूलतः कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहन है, और वो करने के लिए जो आप सोचते हैं काम करेगा, और अगर आप जीत जाते हैं तो आपको उसके लिए पैसे मिलते हैं. एक प्रस्ताव है वास्तव में एक संस्थान तैयार करने का. यही है जिसमें थोडा़ पैसा लगेगा. पर, मेरा मतलब है, देखिए -- इराक युद्द में इतना खर्च करने में कितना समय लगता है? ज़्यादा समय नहीं. ठीक है. ठहाके और यह परोपकारी होना चाहिए, क्योंकि मुनाफ़ा जीवन शास्त्र से ध्यान बंटाता है, पर इसे सफ़ल होने की ९० प्रतिशत संभावना है, मेरे ख्याल से. और मैं सोचता हूं हमें पता है कि यह कैसे करना है. और मैं यहीं रुकता हूं. धन्यवाद. तालियां
क्रिस एन्डरसन: अच्छा, मुझे पता नहीं कि कोई सवाल होंगे कि नहीं पर मैने सोचा मैं लोगों को मौका दूं. दर्शक: आपने बढ़ती उम्र और उसे हराने की बात की, पर ऎसा क्यॊं है कि आप अपने आप को एक वृद्ध व्यक्ति की तरह जता रहे हैं? ठहाके
ए जी: क्योंकि मैं वृद्ध हूं. मैं दर असल १५८ साल का हूं. ठहाके तालियां
दर्शक: नस्लें इस ग्रह पर प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ विकसित हुई हैं बिमारियों से लड़ने के लिए जिससे लोग प्रज्न्न हेतु जीवित रह सकें. लेकिन, जहां तक मैं जानता हूं, सभी नस्लें अस्ली में मरने के लिए ही विकसित हुई हैं, तो जब कोषाणुं विभाजित होते हैं, तो तेलोमेरेज़ छोटे होते हैं, और अंततः नस्लें मर जाती हैं. तो क्यों - विकास नें - लगता है अमरता के खिलाफ़ चुनाव किया है, जब कि यह इतनी फ़ायदेमंद है, या विकास अभी अधूरा है?
ए जी: उत्तम. एसा सवाल पूछने के लिये शुक्रिया जिसका ज़वाब मैं गैर-विवादास्पद रूप में दे सकता हूं. मैं आपके सवाल का असली मुख्य धारा वाला जवाब देने जा रहा हूं, जिस से मैं भी सहमत हूं. जॊ कि यह है कि, नहीं, उम्र का बढ़ना चुनाव का हिस्सा नहीं है; विकास केवल विकासीय उपेक्षा का परिणाम है. अन्य शब्दो में, हमारी उम्र बढ़ती है क्योंकि उसका न बढ़ने में मेहनत लगती है; आप को अधिक आनुवंशिक राहें चाहिए होती हैं, आप के आनुवंश में अधिक परिषकार अगर उम्र को और धीरे बढ़ना हो तो, और यह सच रहता है जितनी देर तक आप यह चाहें. तो, उस मामले में विकास से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, परवाह नहीं करता चाहे आनुवंश व्यक्तियों द्वारा पारित हों, जो लंबे समय तक जीवित रहें, या उत्पत्ति द्वारा, इसमें कुछ मात्रा में समता है, इसलिए अलग नस्लों के अलग जीवनकाल होते हैं, और इसलिए कोई अमर नस्लें नहीं हैं.
सी ए: आनुवंश परवा नहीं करते पर हम करते हैं?
दर्शक: मैंने कहीं पढा़ था कि पिछ्ले २० सालों में, धरती पे किसी का भी औसत जीवनकाल १० साल बढ़ गया है. अगर मैं इसका व्याख्यान करूं, तो मैं सोचता हूं कि अगर मैं अपनी मोटरसाइकल पे टक्कर ना मारूं, तो मैं १२० साल तक जीवित रहूंगा. इसका मतलब है कि मैं आपके उन लोगों में से हूं जो १००० साल के हो सकते हैं?
ए जी: अगर आप अपना वजन थोडा़ कम कर लेते हैं तो. ठहाके आपके अंक कुछ गलत हैं. मानक आंकडे़ कहते हैं कि जीवनकाल हर दश्क में एक से दो साल तक बढ़ रहे हैं. तो, यह वैसा नहीं है जैसा आप सोचें - आप उम्मीद करें. पर मेरा इरादा जल्द से जल्द इसे बढा़ कर एक साल प्रति साल करना है.
दर्शक: मुझे बताया गया था कि दिमाग के कई कोषाणु जो हमारे पास व्यस्क्ता में होते हैं वो वास्तव में मानव भ्रूण में होते हैं, और दिमाग के कोषाणु ८० साल तक चलते हैं. अगर यह सच है तो, क्या जीवन शास्त्र में इसके कायाकल्प की दुनिया में निहितार्थ हैं? अगर मेरे शरीर में कोषाणु हैं जो पूरे ८० साल जीते हैं, बनिस्प्त साधारण तौर पे, पता है, कुछ महीने?
ए जी: इसके तकनीकि निहितार्थ ज़रूर हैं. बुनियादि तौर पे हमें कोषाणु बदलने हैं दिमाग के उन कुछ हिस्सों में जो इन्हे जायज़ दर से खोते हैं, खास तौर से न्युरान, लेकिन हम उन्हें इस से तेज़ बदली नहीं करना चाह्ते या बहुत ज्यादा तेज़ तो नहीं, क्योंकि इन्हे बहुत तेज़ बदलने से संज्ञानात्मक कार्य पर दुष्प्र्भाव पडेगा. पहले मैंने जो कोई बूढ़े न होने वाली नस्ल न होने की बात करी थी वो कुछ ज्यादा ही सरलीकरण था. कुछ नस्लों की उम्र नहीं बढ़्ती - जैसे कि हाइड्रा - पर वे ऎसा करते हैं क्योंकि उनमें नरवस सिस्ट्म नहीं होता - और कोई ऊतक नहीं होती जो अपने कार्य के लिये आश्रित हो लंबे समय तक जीवित रहने वाले कोषाणुओं पर.
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कैंब्रिज शोधकर्ता औब्रे दे ग्रेय का यह तर्क है कि बुढापा एक बिमारी मात्र है - और वह भी साधक. इन्सान मूल रूप से सात तरह से बूढे होते हैं, और सभी सातों से बचा जा सकता है.
Aubrey de Grey, British researcher on aging, claims he has drawn a roadmap to defeat biological aging. He provocatively proposes that the first human beings who will live to 1,000 years old have already been born. Full bio »
Translated into Hindi by Rohit Agarwal
Reviewed by Anshul Tyagi
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03:12 Posted: Jun 2008
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