मेरा नाम अरविंद गुप्ता है, और मैं एक खिलौने-वाला हूँ। मैं पिछले ३० सालों से खिलौने बना रहा हूँ। सत्तर के दशक की शुरुवात में, मैं कॉलेज में था। वो बडा ही क्रांतिकारी समय था। राजनैतिक अस्थिरता का समय -- पेरिस की गलियों में विद्यार्थी क्रान्ति कर रहे थे, सत्ता के खिलाफ़ बगावत। अमरीका हिला हुआ था वियतनाम-खिलाफ़त आंदोलन से, नागरिक अधिकारों के लिये आंदोलन से। भारत में, नक्सलवादी आंदोलन चल रहा था, जय प्रकाश नारायण आंदोलन। पर जैसा कि आपको पता है, जब भी समाज का राजनैतिक मंथन होता है, तो बहुत ऊर्जा निकलती है। भारत का राष्ट्रीय आंदोलन इस बात का खडा सबूत था। कई लोगों नें अपनी बडी तनख्वाह वाली नौकरियाँ छोड दीं, और राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बन गये। इधर सत्तर के दशक के पूर्वार्ध में, भारत में एक महान कार्यक्रम चला, प्राण-वायु फ़ूँकने का, गाँव के स्कूलों में प्राथमिक विज्ञान शिक्षा में।
एक व्यक्ति थे, अनिल सदगोपाल, कैलटेक विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. कर के, एक मोलिक्यूलर बायोलोजिस्ट की रूप में भारत के तेज-तर्रार शोध संस्थान, टी. आई. एक. आर. लौटे। ३१ साल की उम्र में उन्होंने स्वयं को असमर्थ पाया अपनी शोध को जोड पाने में, जो वो कर रहे थे, आम आदमी के जीवन से। तो उन्होंने एक ग्रामीण विज्ञान कार्यक्रम का नमूना बनाया और उसे शुरु किया। इस से कई लोग उत्साहित हुये। सत्तर के शुरुवाती सालों का नारा था "लोगों के पास जाओ। उनके साथ रहो, उनसे दिल मिलाओ। जो तुम्हें आता है, वहाँ से शुरुवात करो। जो उन्हें पता है, उसे आगे बढाओ।" ये नारा जीवन की दिशा परिभाषित करने वाला था।
खैर, मैनें एक साल खपाया। मैने टेल्को कंपनी में भर्ती ली, टाटा के ट्रक बनाये, पुणे से नज़दीक ही। वहाँ मैने दो साल काम किया, और फ़िर मैने महसूस किया कि मेरा जन्म ट्रक बनाने के लिये नहीं हुआ था। अक्सर लोगों को पता नहीं होता कि वो क्या करना चाहते हैं, मगर इतना भी पर्याप्त है कि पता हो कि आप क्या करना नहीं चाहते। तो मैनें एक साल की छुट्टी ली, और मैं एक गाँव के विज्ञान कार्यक्रम में शरीक हुआ। और वहीं से मेरी दिशा बदल गयी। वो एक छोटा सा गाँव था -- एक साप्ताहिक हाट बाज़ार जहाँ लोग, बस हफ़्ते में एक बार, अपने सारे सामान इकट्ठा करते हैं। तो मैने कहा, "मै यहीं पर एक साल बिताऊँगा।" तो मैनें एक एक नमूना खरीदा हर उस चीज़ का, जो कि सडक के किनारे मिल रही थी। और एक चीज जो मुझे मिली वो थी ये काली रबड।
इसे साइकिल का वाल्व ट्यूब कहते हैं। जब आप साइकिल में हवा भरते है, तो इसका कुछ इस्तेमाल होता है। और इन ढाँचों में से कुछ -- आप बस थोडे से साइकिल वाल्व ट्यूब लें, और उस में दो दियासलाइयाँ ऐसे लगा दें, और आपने एक लचकदार जोड बना दिया। ये ट्यूबों का जोड है। इस से आप कोणों के बारें में पढाना शुरु कर सकते हैं -- ये न्यून कोण (अक्यूट एंगल), ये समकोण (राइट एंगल), ये अधिक कोण (आबट्यूस एंगल), और ये रेखा कोण (स्ट्रेट एंगल)। इनका अपना खुद का जोड-तोड भी है। अगर आपके पास ऐसे तीन है, तो उन्हें जोड दीजिये, और ये बना त्रिभुज (ट्रायंगल)। चार मिला कर, आप एक वर्गाकार (स्कवायर) बना सकते है, ऐसे पँचकोण (पेंटागन), और फ़िर, षठकोण (हेक्सागन), और आप हर तरह की बहुभुजीय आकृतियाँ (पॉलीगन) बना सकते हैं। और इन सब की मजेदार खासियतें है। अगर आप षठकोण (हेक्सागन) को देखें, मिसाल के तौर पर, ये एक अमीबा की तरह है, जो लगातार अपनी रूपरेखा बदलता है। इसे थोडा खींच दीजिये, ये आयताकार (रेक्टेंगल) हो गया। इसे थोडा धक्का दीजिये, और ये बन गया समानांतर चतुर्भुज (पैरालैलोग्राम)। मगर इसमें बहुत झोल है। पँचकोण (पेंटागन) का उदाहरण लेते हैं, इसे बाहर खेंचिये --- ये एक नौका के आकार का असमांतर चतुर्भुज बन (ट्रेपीज़ियम) गया। इसे थोडा धकेल दीजिये, और ये झोपडी जैसा हो गया। ये बन गया समद्धिबाहु त्रिभुज (आइसोसेलेस ट्रायंगल) -- फ़िर से, इसमें भी बहुत झोल है। और ये वर्गाकार (स्क्वायर) लगता है बहुत ठोस। इसे थोडा स धक्का दो - ये समचतुर्भुज (रोम्बस) में बदल जाता है। ये पतंग जैसा लगने लगता है। मगर किसी बच्चे को एक त्रिभुज (ट्रायंगल) पकडा दीजिये, उसके साथ तोड-मरोड करना मुश्किल है।
तो त्रिभुज (ट्रायंगल) का इस्तेमाल क्यों करें? क्योंकि त्रिभुज (ट्रायंगल) ही एकमात्र ठोस आकार है। हम वर्गाकार (स्क्वायर) से पुल नहीं बना सकते, क्योंकि जैसे ही रेलगाडी आयेगी, वो नाचने लगेगा। साधारण लोगों को ये ज्ञान है, क्योंकि जब आप भारत के गाँवों में जायेंगे, तो शायद वो इंजीनियरिंग न पढे हों, मगर कोई भी इस तरह की छत नहीं बनाता है। क्योंकि जब वो इस पर खपरैल डालेंगे, ये टूट जायेगी। वो हमेशा त्रिकोण (ट्रायंगल) के आकार की छत बनाते हैं। देखिये, ये लोक-विज्ञान है।
अगर आप यहाँ छेद कर दें और एक तीसरी दियासलाई भी लगा दें, तो आपको टी-जोड मिल गया। और अगर इसकी तीनों टाँगों में छेद करूँ इनके तीन कोनों में, तो मैनें चतुष्फ़लक (टेट्राहेड्रन) बना दिया। तो आप हर प्रकार के त्रिआयामी आकार बना सकते हैं। आप ऐसा चतुष्फ़लक (टेट्राहेड्रन) बना सकते हैं। और एक बार आप ये बना लें, तो आप एक छोटा सा घर भी बना सकते हैं। इसे ऊपर रख दीजिये। आप चार का जोड भी बना सकते हैं। आप छः का जोड भी बना सकते हैं। आपको बस एक काँटा चाहिये। और ये -- आप छः का जोड बनाइये, आप ने समद्धिबाहु चतुष्फ़लक (आइकोसहेड्रन) बना डाला। अब इस के साथ जो चाहे करिये। ये तो इग्लू बन गया। और ये सब हो रहा है १९७८ में। मैं २४ वर्षीय युवा इंजीनियर था। और मैने सोचा कि ये सब ट्रक बनाने के मुकाबले बेहतर है। (अभिवादन) और, असल में, आप चार कंचे डाल दीजिये, आपने मिथेन का रासायनिक ढाँचा, बना लियी , सी.एच.४ हाइड्रोजन के चार अणु, चतुष्फ़लक के चार कोनों पर, जो कि कार्बन अणु को दर्शा रहे हैं।
और तब से ही, मैने ये सोचा कि मैं बडा किस्मती हूँ कि मुझे २००० स्कूलों में जाने का मौका मिला -- गाँव के स्कूल, सरकारी विद्यालय, नगर निगम के स्कूलों में, आईवी लीग स्कूलों मे भी -- उनमें से ज्यादातर मुझे बुला चुके हैं। जब भी मैं किसी स्कूल में जाता हूँ, मुझे बच्चों की आँखों में एक चमक दिखती है। मुझे आशा दिखती है। मुझे उनके चेहरों में खुशी दिखती है। बच्चे चीज़ें बनाना चाहते हैं। बच्चे कुछ करना चाहते हैं।
और ये देखिये, हम बहुत से पम्प बनाते हैं। ये एक छोटा सा पम्प है जिससे कि आप गुब्बारा फ़ुला सकते हैं। ये असली है। इस से सच में गुब्बारा फ़ूल जाता है। और हमारा एक नारा है कि खिलौने के साथ बच्च सबसे अच्छा काम उसे तोड कर ही करता है। तो क्या करना है --- ये असल में थोडा सा चुनौती भरा वक्तव्य है --- ये पुराना साइकिल का ट्यूब, और ये पुरान प्लास्टिक का पाइप ये टोपी बडे आराम से पुराने साइकिल के ट्यूब पर फ़िट हो जायेगी। और ऐसे हे तो वाल्व बनता है। थोडा सा चिपकने वाला टेप। बस एक दिशा वाला ट्रफ़िक हो गया। हम बहुत सारे पम्प बनाते हैं। और ये भी पम्प है -- बस एक नली लीजिये, और उसमें एक लकडी डाल दीजिये, और दो जगह आधा काट दीजिये। और फ़िर क्या कीजिये, इन्हें मोड कर त्रिभुज में बदल दीजिये, और फ़िर थोडा सा टेप लगा दीजिये। बस बन गया पम्प। और अगर ये पम्प आपके पास है, तो ये एक छिडकाव की मशीन बन गयी। जैसे कि बडी से मथनी। अगर आप किसी चीज को घुमायेंगे, तो वो बाहर की तरफ़ उडेगी।
देखिये, अगर आप आंध्र प्रदेश में हो, तो आप पाल्मैरा की पत्तियों से इसे बनायेंगे। हमारे अधिकांश ग्रामीण खिलौने विज्ञान के मूल सिद्धांतो पर ही काम करते हैं। अगर आप कुछ घुमायेंगे, तो वो बाहर की तरफ़ भागेगा। दोनो हाथों से करने में बडा मज़ा आता है, मिस्टर उडाकू को देखिये। ठीक? ये एक खिलौना है जो कागज से बना है। मज़ेदार है । इस में चार चित्र हैं। देखिये ये कीट-पतंगे, फ़िर मेढक, साँप, चील, तितली, मेंढक, साँप, चील। इस कागज के टुकडें को हार्वाड के एक गणितज्ञ ने १९२८ मे डिजाइन किया था, आर्थर स्टोन, मार्टिन गार्डनर ने इसका उल्लेख अपनी कई किताबों में किया है। मगर बच्चों को इसमें बहुत मज़ा आता है। वो उस से भोजन-व्यवस्था के बारे में सीख सकते है। कीटों को मेंढक खाते है, उन्हें साँप खा जाते हैं; साँपों को चीलें खा जाती हैं। और ये हो सकता है, अगर आपके पार फ़ोटोकॉपी का कागज हो, ए फ़ोर (A 4) कागज हो -- आप एक नगर निगम के या कि सरकारी स्कूल में हो सकते है -- एक कागज, एक स्केल, एक पेंसिल, न गोंद, न कैंची। तीन मिनट में आप इसे मोड लेंगे। और आप इस का क्या उपयोग करें, ये आपकी रचनात्मकता पर है। अगर आप छोटा कागज लें, तो आप छोटा वाला बनायेंगे। बडे कागज से बडा बन जायेगा।
ये एक पेंसिल है जिसमें कुछ खाँचे बने हैं। यहाँ छोटा सा पँखा लगा देते हैं। और ये करीब सौ साल पुराना खिलौना है। इस पर शोध के छः बडे दस्तावेज लिखे जा चुके हैं। देखिये, यहाँ कुछ खाँचे हैं। और अगर मैं एक टुकडा लूँ, और इसे घिसूँ, तो कुछ अद्बुत होता है। इस पर शोध के छः दस्तावेज? असल में, बचपन में, फ़ेन्मेन इस से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इस पर एक दस्तावेज लिखा है। और ये करने के लिये तीन अरब लागत का हाड्र्न कोलाइडर नहीं चाहिये और ये करने के लिये तीन अरब लागत का हाड्र्न कोलाइडर नहीं चाहिये ये हर बच्चे के लिये है, हर बच्च इस का लुत्फ़ उठा सकता है। अगर आप रंग-बिरंगा चक्का लगा दे, तो ये सातों रंग मिल कर दिखते हैं। और इस के बारे में न्यूटन ने चार सौ साल पहले बात की थी, कि सफ़ेद रोशनी में सात रंग होते हैं, बस इसे घुमा कर समझ आ जाता है।
ये प्लास्टिक का पतला पाइप है। हमने क्या किया, हमने इस के दोनो किनारे टेप से सील कर दिये, दायें किनारे को काट दिया, और निचले बायें किनारे को भी, तो इसमे उल्टे कोनों पर छेद हैं, और यहाँ छोटा सा छेद है। ये एक तरह का फ़ूँकने वाला पाइप है। और मैनें इसे ऐसे अंदर डाल दिया। अब यहाँ एक छेद है, और मैं इसे बंद कर देता हूँ। और इसे बनाने में बहुत कम पैसे लगते हैं -- बच्चों के लिये बहुत मजेदार है।
हम क्या करते हैं कि हम एक साधारण सा बिजली का मोटर बनायेंगे। ये शायद दुनिया का सबसे साधारण मोटर है। इसमें सबसे महँगी चीज है इसकी बैटरी। अगर आपके पास बैटरी है, तो इसे बनाने में करीब दो रुपये का खर्च आता है। ये साइकिल का ट्यूब है, जो कि आपको एक चौडा रबड बैंड देता है, और दो सेफ़्टी पिन. ये है चुंबक। जब भी इस कौइल से करंट बहता है, ये एक चुंबक बन जाती है। और इन दोनों चुंबकों के आपस की खींचतान से ही ये मोटर चलता है। हमने ऐसे ३०,००० मोटर बनाए।
शिक्षक सालों से मानों जानवरों को साइंस पढा रहे हों, बस परिभाषा रटो, और उगल दो। जब शिक्षक इसे बनाते हैं, तो बच्चे भी इसे बनाते है, और आपको उनकी आँखों में एक चमक दिखेगी। उन्हें रोमांच होता है साइंस के बारे में जानने में। और ये वाली साइंस सिर्फ़ किसी रईस आदमी के लिये नहीं है। एक लोकतांत्रिक देश में, विज्ञान सबसे दबे-कुचले लोगों तक पहुँचना चाहिए, उन बच्चों तक जो दूर-दराज इलाकों में हैं। ये कार्यक्रम १६ विद्यालयों से शुरु हुआ और जल्दी ही करीब १५०० सरकारी स्कूलों में फ़ैल गया। करीब एक लाख बच्चे इस तरीके से विज्ञान सीखते हैं। और हम लोग सिर्फ़ ये देखना चाह रहे है कि क्या क्या संभव हो सकता है।
देखिये, ये टेट्रा-पैक है -- पर्यावरण के लिहाज से बहुत ही खराब चीज। इसमें छः सतहें हैं --- तीन प्लास्टिक की, और अलम्यूनियम की -- जिन्हें एक साथ सीलबंद कर दिया गया है। इन्हें ऐसा चिपकाया गया है, कि आप इन्हें अलग नहीं कर सकते। अब आप ऐसा एक जाल बना सकते हैं और उन्हें मोड कर चिपका सकते हैं और इस से एक आप ने समद्धिबाहु चतुष्फ़लक (आइकोसहेड्रन) बना सकते हैं। तो जो कि कूडा था, समुद्री पक्षियों के लिये जहर था, उसे आपने बहुत ही खुशी देने वाले --- साइंस संबंधी सारे आकार इस प्रकार बनाये जा सकते हैं।
ये एक छोटा सा पाइप है, और आप इसके दो कोनों को थोडा सा काट दीजिये, और ये मगरमच्छ के बच्चे क मुँह बन गया। इसे आप अपने मुँह में रखिये, और फ़ूंकिये। (बाजे की आवाज) ये एक बच्चे का खजाना, और एक शिक्षक का सरदर्द बन सकता है। आप देख नहीं सकते कि आवाज कहाँ से आ रगी है, क्योंकि वो चीज तो आपके मुँह के भीतर है। अब मै इसे बाहर रखूँगा, बाहर फ़ूंकने के लिये। और मैं हवा भीतर खीचूंगा। (बाजे की आवाज) तो किसी को भी ये रटने की ज़रूरत नहीं कि ध्वनि कैसे बनती है कंपन क्या होता है। और आप फ़ूँकते रहिये, और आवाज निकालते रहिये, और इसे काटते जाइये। और कुछ बहुत ही मजेदार होता है। (आवाज) (अभिवादन) और जब ये एकदम ज़रा सा बचे -- (आवाज) ये सब आपको बच्चे सिखा सकते हैं। आप भी ये कर सकते हैं।
और आगे कुछ भी कहने से पहले, आपको कुछ दिखाता हूँ। ये नेत्रहीन बच्चों की स्लेट है। ये वल्क्रों की पट्टियाँ है, ये मेरी ड्राइंग स्लेट है, और ये मेरा पेन है, जो कि एक फ़िल्म का डिब्बा है। ये मछली पकडने के काँटे जैसा है, मछुआरे के काँटे सा। और थोडी सी ऊन है। अगर मैं ये हैन्डल घुमाऊँ, तो ये ऊन अंदर चली जायेगी। और एक नेत्रहीन बालक इस तरह से कुछ चित्रकारी कर सकता है। ऊन वेल्क्रो पर चिपक जाती है। हमारे देश में एक करोड २० लाख बच्चे देख नहीं सकते -- (अभिवादन) जो कि अंधकार में रहते हैं। और ये उनके लिये वरदान हो सकता है। मानो कोई फ़ैक्ट्री सी है जो हमारे बच्चों को अंधा बना रही है, उन्हें खाना पूरा न दे कर, उन्हें विटामिन ए न दे कर। लेकिन ये उन बच्चों के लिये वरदान है। कोई पेटैन्ट नहीं है। चाहे जो इसे बनाये।
ये बहुत साधारण है। ये देखिये, ये एक जेनेरेटर है। ये दो चुंबकें हैं। एक बडी सा चक्का बनाया गया है दो पुरानी सीडियों के बीच रबर फ़ँसा कर। छोटी से चक्की और दो ताकतवर चुंबकें। और ये धागा एक एल.ई.डी. से जुडे तार को घुमाता है। अगर मैं इस चक्की को घुमाऊं, तो छोटा वाला तेज़ी से घूमेगा। और यहाँ एक घूमता हुआ विद्युत क्षेत्र बन जाएगा। उस विद्युत क्षेत्र में ये तार दखल देखा, बल पैदा होगा। और जैसा आप देख रहे है, ये एल.ई.डी. जल उठेगी। तो ये एक छोटा सा जेनेरेटर है।
ये देखिये, फ़िर से, एक छोटा सा स्टील का गोला है, और स्टील के नट भी। और आप क्या करिये कि बस इसे हल्का स घुम दीजिये, और ये चलते ही जायेंगे। और ज़रा कुछ बच्चो के बारे में सोचिये, जो गोले में खडे हो कर इस रिंग के उन तक आने का इंतजार कर रहे हों। और वो ये करते समय सौ प्रतिशत प्रसन्न होंगे।
और आखिर में, हम ये भी कर सकते हैं, कि हम पुराने अखबारों का इस्तेमाल करें टोपियाँ बनाने के लिये। इस वाली को तो सचिन तेंदुलकर पहन सकता है। ये गजब की क्रिकेट टोपी है। जब आप पहले नेहरू या फ़िर गाँधी को देखते हैं, तो ये रही नेहरू टोपी - बस आधे अखबार से बनी। हम अखबारों से बहुत से खिलौने बना सकते हैं, और ये उन में से एक है। ये देखिये, जैसा कि स्पष्ठ है -- ये एक पँख फ़डफ़डाती चिडिया है। अब हम सारे पुराने अखबारों , को छोटे छोटे वर्गाकारों मे काट देंगे। और अब आपके पास ये चिडिया आ गयी -- जापान में बच्चे सदियों से ये चिडिया बना रहे हैं। और जैसा कि आप देख रहे हैं, ये पँखेनुमा पूँछ वाली चिडिया है।
और मैं अब एक कहानी के साथ ख्त्म करना चाहूँगा। इसे कहते है "कप्तान के हैट की कहानी" ये कप्तान एक समुद्री जहाज का कप्तान था। वो बहुत धीरे धीरे चलता है। और जहाज पर बहुत सारे यात्री थे, और वो बोर हो रहे थे, तो कप्तान नें उन्हें डेक पर बुलाया। "अपने रंग-बिरंगे कपडे पहनिये, और नाचिये, गाइये, और मैं आपको बढिया खानपान करवाऊँगा।" और कप्तान भी हर रोज एक टोपी पहन कर उत्सव में शामिल होने लगा। ठीक पहले दिन, उसने छतरी जैसी बडी टोपी पहनी, जैसे एक कप्तान की टोपी होती है। उस रात, जब सारे यात्री सो जाते थे, तो वो उसे एक बार और मोडता था, और फ़िर दूसरे दिन, वो अग्निशमक की टोपी पहना नज़र आता -- जिस में से ये पूँछ निकली होती, फ़ैशनेबल टोपी की तरह, क्योंकि इस से रीढ की हड्डी सुरक्षित रहती है। और दूसरी रात, वो उसे टोपी को लेता था, और फ़िर से मोड देता था। और तीसरे दिन, वो शिकारी-टोप पहन कर आता --- जैसे किसी साहसिक कार्यक्रम पर जाने वाले की टोपी होती है। और तीसरी रात, फ़िर वो उसे दो बार मोड देता था -- और ये बहुत बहुत ही प्रसिद्ध टोपी बन जाती है, अगर आपने बालीवुड की पिक्चरें देखी हों, तो यही टोपी पुलिस वाले पहनते है, इसे पान्डु टोपी कहते हैं। और इसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो चुकी है।
और हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि वो एक जहाज का कप्तान था। तो ये रहा उसका जहाज। और अब अंत आ गया था। सब लोगों ने यात्रा का बहुत आनंद उठाया था। वो सब नाच गा रहे थे। तभी वहाँ एक तूफ़ान आ गया, और बडी बडी लहरें आ गयीं। और जहान बस लहरों के साथ हिचकोले खाने लगा। और तभी एक भयानक लहर ने जहाज के सामने से प्रहार किया और उसे हिला दिया। और फ़िर एक और लहर आयी, और उसने पीछे से प्रहार किया। और फ़िर तीसरी लहर आयी। उसने पूरे जहाज पर ऊपर से वार किया और उसे गिरा दिया। और अब जहाज डूब रहा था, और कप्तान का सब कुछ खो चुका था, मगर बस एक लाइफ़-जैकेट ही बची थी।
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इन्क कान्फ़्रेंस में, अरविंद गुप्ता बताते हैं कबाड को बेहतरीन, मनोरंजक खिलौनों में तबदील करना, जो कि बच्चे खुद भी बना सकते हैं - विज्ञान और डिज़ाइन के मूल सिद्धांतों को सीखते हुए।
Science educator Arvind Gupta uses simple toys to teach. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
Reviewed by Vatsala Shrivastava
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17:57 Posted: Mar 2008
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15:14 Posted: Dec 2007
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20:27 Posted: Apr 2011
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