मैं आपके लिये लाया हूँ एक संदेश दसियों हज़ार लोगों का, गाँवों और झुग्गियों से, देश के ह्रदय से, जिन्होंने समस्याओं को सुलझाया है अपनी खुद की बेमिसाल सोच से, बिना किसी बाहरी मदद के । हमारे गृह-मंत्री ने अभी कुछ हफ़्ते पहले ही लडाई छेड दी करीब एक-तिहाई भारत के साथ, लगभग २०० ऐसे ज़िलों के नाम ले कर, जिन्हें वो शाषन के काबिल ही नही समझते, वो सच्चाई को बिलकुल भूल ही गये । ऐसी सच्चाई जिसे हम सामने ला रहे हैं पिछले २१ वर्षों से और वो सच्चाई है कि लोग भले ही रूप से गरीब हों, वो दिमागी रूप से गरीब नहीं हैं । दूसरे शब्दों में, गरीबी में गुज़र-बसर करने वाला मष्तिश्क सोच से गरीब नहीं होता है । यही वो संदेश है, जिसका प्रसारण हमने ३१ साल पहले शुरु किया था । और इससे हुआ क्या ?
चलिये, मैं आपको अपनी जीवन-यात्रा के बारे में बताता हूँ, जो मुझे यहाँ तक ले कर आई है । ८५ से ८६ तक मैं बाँगलादेश में था वहाँ की सरकार और शोध-समिति के सलाहकार के रूप में कैसे वैज्ञानिक काम करें ज़मीन से जुड कर, गरीब लोगों के साथ मिल कर और कैसे शोध-आधारित तकनीकें विकसित की जायें, जो कि आम लोगों के ज्ञान पर आधारित हों । मैं ८६ में वापस आ गया । मुझ में एक शक्तिशाली नव-चेतना का संचार हो चुका था उस देश में मौजूद ज्ञान और रचनात्मक्ता को देख कर, जहाँ कि ६० प्रतिशत लोगों के पास ज़मीन तक नहीं है । लेकिन अद्भुत रचनात्मकता की कोई कमी नहीं है । मैने अपने काम पर गौर करना शुरु किया । वो सारा काम जो कि मैनें पिछले दस वर्षो में किया था, लगभग हर बार, मैनें लोगों के पारम्परिक ज्ञान का इस्तेमाल किया था जो के लोगों ने बेझिझक बाँटा था ।
और तो और, मुझे सलाहकार के रूप में, बहुत पैसे मिलते थे, फिर मैनें अपने आयकर पर ध्यान दिया और स्वयं से ये सवाल पूछा - "मेरे आयकर में से कितना हिस्सा उन लोगों के भले के लिये खर्च हुआ है जिन्होंने मुझसे अपना ज्ञान बाँटा था, और मेरे काम को संभव बनाया था ?" क्या मैं इतना होनहार था कि मुझे ये पुरस्कार मिल रहा था ? या कि मैं बहुत अच्छा लिखता था इसलिये ? या फ़िर इसलिये कि मैं अपनी बात ढँग से कह पाता था ? हो सकता है इसलिये कि मैं आँकलन में माहिर था ? या फिर केवल इसलिये कि मैं एक प्रोफ़ेसर था, और इस नाते मेरे प्रति समाज की कुछ ज़िम्मेदारियाँ थीं ? मैनें स्वयं को समझाने का प्रयत्न किया, "नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, मैंने नीति-परिवर्तन के लिये कार्य किया है। जिससे कि नीति ऐसे हो जायेगी कि गरीबों के प्रति संवेदनशीलता बढेगी, और इसलिये , मैने सोचा कि सब ठीक है ।" मगर साथ ही मुझे ये भी आभास हुआ कि इतने सालों से मैं शोषण के खिलाफ़ ही तो काम कर रहा था, जमींदारों द्वारा शोषण, साहूकारों द्वारा, व्यापारियों द्वारा, इससे मुझे ये लगा कि कहीं ना कहीं मैं भी एक शोषणकर्ता ही हूँ, क्योंकि मेरी आय का कोई भी भाग उन लोगों तक नहीं पहुँच रहा था जिनके ज्ञान के फलस्वरूप ये आय हुई थी, उन लोगों तक जिन्होंने अपने ज्ञान के भंडार को, और अपने विश्वास को मुझे सौंप दिया था, कुछ भी उन लोगों तक वापस नहीं पहुँचा । यहाँ तक कि, मेरे काम का ज्यादातर भाग उस समय तक अँग्रेज़ी भाषा में था ।
जिन लोगों से मैने सीखा था, उनमे से अधिकांश अँग्रेज़ी नहीं जानते थे । तो मै किस प्रकार से अपना योगदान दे रहा था ? मैं समाजिक न्याय की बात कर रहा था, और वास्तव में , मैं एक पेशेवर था जो कि हद दर्ज़े का अन्यायपूर्ण काम कर रहा था, भले-पूरे लोगों के ज्ञान को ले कर उनका वज़ूद ख्त्म कर के, उस ज्ञान के सहारे पैसे कमा कर, उसे बाँट के, सलाह दे कर, ज्ञातपत्र लिख कर, छपवा कर, बढिया सम्मेलनों मे आमंत्रित हो कर, और पैसा और नये कामों को पा कर, और भगवान जाने क्या क्या कर के । ये सोच कर मेरे दिमाग में एक दुविधा उठ खडी हुई, कि यदि मैं शोषण ही कर रहा हूँ, तो ये ठीक नहीं है; जीवन ऐसे नहीं चल सकता । और ये क्षण मेरे लिये पीडादायक था क्योंकि मैं उस तरह, शोषणकर्ता का जीवन नहीं बिता सकता था । तो मैंने फिर से समझना शुरु किया, सामाजिक-विज्ञान में निहित मूल्यों की लडाई और नैतिक विरोधाभासों को, और करीब १०० से भी अधिक ज्ञातपत्र पढे और लिखे । और मैं इस नतीज़े पर पहुँचा कि, मेरी दुविधा मुझे अकेले की नहीं है, लकिन इस दुविधा का समाधान खास होना चाहिये ।
और एक दिन - ना जाने क्या हुआ कि - दफ़्तर से वापस आते समय मैनें एक मधुमक्खी देखी, और तत्क्षण मुझे लगा, कि क्यों न मैं इस मधुमक्खी जैसा बन जाऊँ, जीवन कितना खुशनुमा हो जाएगा । मधुमक्खी क्या करती है : परागण की प्रक्रिया में मदद, एक फूल का पराग ले कर, दूसरे फूल तक पहुँचाना, जिससे परागण हो सके । और जब वो पराग लेती है, फूलों को ठगा हुआ सा महसूस नहीं होता । बल्कि, फूल उल्टा मधुमक्खी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं । और मधुमक्खियाँ सारा शहद भी सिर्फ़ अपने लिये ही बचा कर नहीं रखती हैं । "हनी बी नेटवर्क" के तीन मूल सिद्धान्त हैं -- कि जब भी हम लोगों से कुछ सीखेंगे, उसे उनके साथ उनकी ही भाषा में बाँटेंगे । उनके वजूद को गुप्त नहीं रखेंगे ।
और मैं आपको बताऊँ, कि बीस साल बाद भी, मैनें एक प्रतिशत भी इस सिद्धान्त को कार्यान्वित नहीं कर पाया है । ये एक दुखद सत्य है जिसे मैं आज भी ढो रहा हूँ, और मैं चाहूँगा कि आप सब इस बात को फैलायें, कि हमारा पेशा आज भी इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि लोगों का ज्ञान बिना उन्हें कोई पहचान दिये इस्तेमाल होता है, और उनके वजूद का खात्मा करता है । अमरीकी राष्ट्रीय साइंस अकादमी के दिशा-निर्देश या ब्रिटिश शोध समिति के, या कि भारतीय विज्ञान शोध समिति के, ये मुकम्मल नहीं करते हैं कि जब भी आप लोगों से सीखें, आप उनके साथ वापस बाँटें । और हम बात कर रहें हैं जिम्मेदार समाज की, जो कि न्यायपूर्ण और बराबरी पर आधारित है । और ज्ञान-क्षेत्र में न्याय नहीं करते हैं । भारत ज्ञान-आधारित समाज के रूप में अपने पहचान बनना चाहता है। कैसे भारत ऐसा कर पायेगा ? ज़ाहिर है, कि आप न्याय के दो सिद्धान्त नहीं अपना सकते, एक अपने लिये और एक बाकी सब के लिये । एक ही सिद्धान्त बनाना होगा । आप पक्षपात नहीं कर सकते हैं । आप केवल अपने मूल्यों के पक्ष में नहीं सोच सकते हैं, जो कि उन सिद्धान्तों से दूर है, जिनका पालन दूसरे लोग करते हैं । न्यायपूर्णता एक के लिये कुछ और, और दूसरे के लिये कुछ और नहीं हो सकती है ।
इस तस्वीर को देखिये । क्या आप बता सकते है कि ये कहाँ से ली गयी है, या इसे क्यों लिया गया है, कोई बताना चाहेगा ? देखिये मैं एक शिक्षक हूँ, मुझे पूछ्ने का पूरा अधिकार है । कोई भी? कोई तीर-तुक्का ? माफ़ कीजिये ? (दर्शक: राजस्थान ) । अनिल गुप्ता: मगर इसे किसलिये इस्तेमाल किया गया है ? (फुसफुसाहट) माफ़ कीजिये ? शायद आपका जवाब पूरी तरह से ठीक नहीं है । इनका अभिवादन करना चाहिये । क्योंकि इन्हें पता है कि हमारी सरकार कितनी संवेदनाहीन है । देखिये इसे । ये भारत सरकार का साइट है । और ये पर्यटकों को आमंत्रित कर रहा है हमारे देश के शर्मनाक पहलुओं को देखने के लिये । मैं ऐसा कहने के लिये माफ़ी चाहता हूँ । ये एक सुंदर चित्र है -- या फ़िर ये एक बेहद खराब चित्र है ? ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप लोगों के जीवन पर क्या नज़रिया रखते हैं । इस औरत को अपने सर पर पानी ढोना पडता है मीलों तक, दूर दूर तक, और ये बात उत्साहित हो कर बताने लायक नहीं है। हमें इसके लिये कुछ करना होगा । और मैं आपको बता दूँ, कि विज्ञान और तकनीक के इतने विकास के बावजूद, दसियों लाख औरतें आज भी सर पर इसी तरह पाने ढो रही हैं । और हम ये प्रश्न ही नहीं उठाते ।
आपने आज सुबह चाय तो पी ही होगी । एक मिनट के लिये सोचिये । चाय की पत्तियाँ, झाडियों से तोडी गयी पत्तियाँ । आपको पता है कि यहाँ क्या हो रहा है ? एक औरत कुछ पत्तियोँ को तोड कर, उन्हें अपनी पीठ पर टँगी डलिया में डालती है । केवल इसे काम को दस बार कर के देखिये; और आपको अपने कंधे में दर्द महसूस होगा । और वो औरत हजारों हजार बार यही दोहराती है हर दिन जो चावल आपने आज खाया, या खायेंगे उसे औरतें ही रोपित करती है एक बेहद अजीब ढँग से झुक कर, दसियों लाख औरतें, हर साल धान के मौसम में, जब वो धान रोप रही होती है, अपने पाँव पाने में डाल कर, तो उनके पाँवों में फफूँदी लग जाती है, संक्रमण हो जाता है । और उसमें दर्द होता है क्योंकि कीडे खास वहीं पर काटते हैं । और हर साल, ९९.९ प्रतिशत धान हाथ से ही लगाया जाता है । कोई मशीन नहीं बनाई गयी है इस काम के लिये ।
और इस बारे में वैज्ञानिकों की चुप्पी, तकनीशियनों और नीति बनाने वालों का दम साध लेना, बदलाव जिन्हें लाना है, उनके चुप रहने ने हमारा ध्यान आकर्षित किया कि समाज का ये ढँग बिलकुल सरासर गलत है । देखिय, हमारा संसद ऐसा नहीं कर सकता । हमारे पास रोजगार के लिये एक योजना है । इसके तहत २५ करोड लोगों को साल में १०० दिन का रोजगार देने के लिये हमारा देश वचनबद्ध है । लेकिन कैसा रोजगार? पत्थर तोडना, गड्ढे खोदना । तो हमने अपनी सरकार से एक सवाल पूछा, कि, क्या गरीब लोगों के पास दिमाग नहीं होता है? क्या गरीब लोगों के पास सिर्फ़ मुँह और हाथ होते है, मगर दिमाग गायब होता है?
इसलिये हनी बी नेटवर्क उन संसाधनों को बढावा देता है जिनमें गरीब जनता सक्षम है । और इससे क्या हुआ ? अन्जान, अनाम व्यक्ति नेटवर्क से जुडा और उसने एक पहचान पाई । यही हनी बी नेटवर्क का काम है । और ये नेटवर्क स्वेच्छा से आगे बढा है, स्वेच्छा पर ही आगे बढ रहा है, और इसने करोडों लोगों के दिमाग को पढा है , अपने देश में और विश्व के अनेक भागों मे, जहाँ भी रचनात्मक्ता है । ये रचनात्कमक्ता शिक्षा के संदर्भ में हो सकती है; या फिर संस्कृति से जुडी हो सकता है कि ये संस्थानों से जुडी हो, पर काफ़ी सारा काम तकनीकी रचनात्मक्ता से जुडा मिला है, नये प्रयोगों से, चाहे वो आज के प्रयोग हों, या फिर पारंपरिक ज्ञान पर आधारित । और ये सब शुरु होता है जिज्ञासा से । केवल जिज्ञासा से ।
एक व्यक्ति, जो हमें मिले, और जिन्हें देख सकेंगे वेबसाइट www.sristi.org पर, ये एक जनजातीय व्यक्ति हैं, उनकी एक इच्छा थी । और उन्होंने कहा, "यदि मेरी इच्छा पूर्ण होती है" -- कोई वहाँ बीमार था, और ये उसकी देखभाल कर रहे थे -- "ईश्वर, इन्हें अच्छा कर दो ।" और यदि ये अच्छे हो गये, तो मैं अपनी दीवार रँग दूँगा ।" और एसे उन्होंने अपनी दीवार पर रोगन किया । कल किसी व्यक्ति ने मास्लोवियन वर्गीकरण की बात की थी । उससे ज्यादा गलत कुछ हो ही नहीं सकता है । उससे ज्यादा गलत कुछ हो ही नहीं सकता है । क्योंकि इस देश में गरीब लोगों के लिये ज्ञान के द्वार खुले हैं । कालवी, रहीम, और सारे महान सूफ़ी संत, सब गरीब थे, मगर उनके पास सुलझी हुई सोच थी । कृपया ऐसा कभी मत सोचिये कि केवल जब आप अपनी शारीरिक और आर्थिक ज़रूरतें पूरे कर लेंगे, तब ही जा कर आप अपनी आध्यातमक ज़रूरतों के बारे में सोचेंगे । कोई भी व्यक्ति कहीं भी इस काबिल है कि वो अपनी उपलब्धियों के चरम पर पहुँचे, केवल यदि वो ठान ले कि उसे कुछ पाना है ।
इस पर ध्यान दीजिये । हमें शोध यात्रा में ये देख्ने को मिला। हर छठे महीने हम पदयात्रा करते हैं देश के विभिन्न भागों में। मैने पिछले १२ सालों में करीब ४४०० कि.मी. की यात्रा पद-यात्रा की है । और इस दौरान, हमने गोबर के उपले देखे, जो कि ईंधन की तरह इस्तेमाल होते है । इस स्त्री ने, उपलों के ढेर की दीवार पर चित्रकारी की है । इसके पास यही इकलौती जगह है जहाँ ये अपनी रचनात्मक्ता को अभिव्यक्त कर सके । और ये स्त्री बेहतरीन कलाकार है । एक और स्त्री, राम तिमारी देवी, अनाज़ के ढेर पर, चम्पारन में शोध-यात्रा के दौरान वहाँ चलते समय, उस भूमि पर जहाँ गाँधीजी गये थे दुख, दर्द सुनने नील की खेती करने वालों का भाभी महतो, पुरिलिया, बनकुरा से । देखिये इन्होंने क्या किया है । ये पूरी दीवार इनका चित्रपटल है । और ये वहाँ एक झाडू ले कर बैठी हैं । ये कारीगर हैं या कि एक कलाकार ? बिलकुल ये एक कारीगर हैं, एक रचनात्मक व्यक्ति । यदि हम इन कलाकारों के लिये बाज़ार बना सकें, तो हमें इनसे गड्ढे खुदवाने और पत्थर तोडने के काम नहीं करवाने होंगे । उन्हें उस चीज़ के लिये पैसे दिये जाएँगे जिसमें वो पारंगत है, उसके लिये नहीं जो उन्हें नहीं आता । अभिवादन
देखिये, रोज़ादीन ने क्या किया है । मोतिहारी, चम्पारन में, कई लोग हैं जो छोटे-मोटे ढेलों पर चाय बेचते हैं और ज़ाहिर है, कि चाय की बाज़ार सीमित है, हर सुबह आप चाय पीते है, और कॉफ़ी भी । तो उसने सोचा, कि क्यों न मैं एक प्रेशर-कुकर को कॉफ़ी मशीन में बदल दूँ । तो ये रही आपकी कॉफ़ी मशीन, जो कि सिर्फ़ कुछ सौ रुपये में उलपब्ध है । लोग अपना कुकर ले कर आते हैं, रोज़ादीन उसमें एक वाल्व और भाप की एक नली जोड देता है, और अब वो आपको एस्प्रेसो कॉफ़ी मुहैया करवाता है । और देखिये, ये सब वास्तविक है, और जेब-खर्च के भीतर कॉफ़ी मशीन जो कि गैस पर काम करती है । अभिवादन देखिये शेख़ जहाँगीर का कमाल । कई गरीब लोगों के पास इतना अनाज़ नहीं होता है कि वो उसे पिसवाने जायें । तो जहाँगीर क्या करते हैं कि आटा पीसने की एक चक्की को एक दुपहिया वाहन पर ले कर आते हैं । अगर आपके पास ५०० ग्राम, या एक किलो अनाज़ है, तो वो आपके लिये उसे पीस देगा; चक्कीवाला इतने कम अनाज़ को नहीं पीसेगा।
कृपया गरीब लोगों के समस्या को समझिये । उनकी आवश्यकताएँ हैं जिन्हें रूप से पूरा करना है बिजली, कीमत, गुणवत्ता आदि को ध्यान में रख कर । उन्हें खराब स्तर के उत्पाद नहीं चाहिये । लेकिन अच्छी क्वालिटी के उत्पाद बनाने के लिये आपको अपनी तकनीक को उनके अनुसार बदलना होगा । और यही शेख़ जहाँगीर ने किया । पर ये काफ़ी नहीं है । यहाँ देखिये क्या हुआ है । अगर आपके पास कपडे हैं, मगर उन्हें धोने का समय नहीं है, तो वो आपके लिये वाशिंग-मशीन लाये हैं ठीक आपके दरवाजे पर, दुपहिया वाहन पर लगी हुई । ये एक ढाँचा है जो कि दुपहिया वाहन पर... वो आपके दरवाजे पर आपके कपडे धो और सुखा रहा है । (अभिवादन) आप अपना पानी लाइये, साबुन दीजिये । मैं आपके कपडे धो देता हूँ, पचास पैसे या एक रुपये में एक गट्ठर । व्यवसाय का एक नया प्रारूप निकल सकता है । और ये ही हमें चाहिये । और इसके आगे, वो लोग जो कि इसे कई गुना बडे स्तर पर कर सकें ।
आगे देखिये । ये एक सुंदर तस्वीर है । पर ये क्या है ? कोई पहचान सकता है ? भारतीयों को तो पता ही होगा । ये एक तवा है । मिट्टी से बना हुआ तवा । देखिये, इसकी खासियत क्या है ? जब आप नॉन-स्टिक तवा लेते हैं, तो उसकी कीमत आती है, करीब २५० रुपये, पाँच, छः डॉलर । और ये एक डॉलर से कम का है । और ये भी 'नॉन-स्टिक' है । इस पर परत चढाई गयी है खाद्य-स्तर के पदार्थ की । और सबसे बढिया बात ये है कि, जब आप महँगा नॉन-स्टिक तवा इस्तेमाल करते हैं, तो आप टेफ़्लान या टेफ़्लान जैसे पदार्थ को खाते हैं । क्योंकि कुछ दिन बाद वो गायब हो जाता है. और वो कहाँ जाता है ? आपके पेट में । वो आपके पेट में जाने लायक नहीं है । और देखिये, इस मिट्टी के तवे में, वो कभी भी आपके पेट में नहीं जाएगा, तो बेहतर है, सुरक्षित है; जेब-खर्च के भीतर है; और सीमित ऊर्जा से बनता है । दूसरे शब्दों में, ज़रूरी नहीं कि गरीबों के लिये बनाये गये उत्पाद घटिया हों, या फ़िर सिर्फ़ जुगाड कर के किसी तरह बना दिये गये हों ।
उन्हें तो बेहतर होना होगा, और ज्यादा गुण्वत्ता परक होना होगा, उन्हें सस्ता होना होगा । और बिलकुल यही मनसुख प्रजापति ने कर दिखाया है । उन्होंने ये हत्था-लगी प्लेट बनाई है । और अब आप एक डॉलर में एक बेहतर चीज पा सकते हैं बाज़ार में उपलब्ध चीज़ों से बेहतर । इन महिला को देखिये, इन्होंने वनस्पति पर आधारित कीटनाशक बनाया है। हमने इस के लिये पेटेंट की अर्ज़ी दी है, नेशनल इन्नोवेशन फ़ाउन्डेशन में । और क्या पता एक दिन, कोई इस तकनीक का लाइसेंस ले कर बाजार के लायक उत्पाद बनाये, और इस महिला को पैसे मिलें। एक बात कहनी यहाँ बहुत ज़रूरी है । मेरे हिसाब से हमें विकास का बहु-केन्द्रीय ढाँचा बनाना होगा, जहाँ कई प्रयास देश के विभिन्न भागों में और विश्व के विभिन्न भागों में, स्थानीय समस्याओं का निदान कर रहे हों सुचारु और अनुकूलित तरीकों से। जितना ही स्थानीय जुडाव होगा, उतना ही ज्यादा संभव होगा इसे आगे बढाना ।
और आगे बढने में एक स्वाभाविक विशिष्टता है कि वो स्थानीय स्वाद से परे होती जाती है, धीरे धीरे जैसे जैसे आप अपनी पूर्ति बढाते हैं । तो लोग इस बात को स्वीकार करने को तैयार क्यों हैं ? देखिये चीज़ें आगे बढ सकती हैं, और बढी भी हैं । मिसाल के तौर पर, मोबाइल फोन: हमारे देश में ४० करोड मोबाइल फ़ोन हैं । हो सकता है कि मैं अपने फोन के सिर्फ़ दो ही बटन इस्तेमाल करता हूँ, और फोन की सिर्फ़ तीन ही सुविधाएँ इस्तेमाल करता हूँ । उसमें ३०० सुविधाएँ हैं; मैं ३०० सुविधाओं की कीमत चुकाता हूँ, लेकिन सिर्फ़ तीन इस्तेमाल करता हूँ । लेकिन मैं इसके लिये तैयार हूँ, और इसलिये, ये आगे बढ सका है । लेकिन अगर मुझे खास अपने लिये एक फोन चाहिये होता, तो जाहिर है, कि मुझे एक अलग नमूने का फोन लेना पडता । तो हम ये कहना चाह रहे हैं कि विशाल बनने के चक्कर में चीज़ें ख्त्म नहीं हो जानी चाहियें । दुनिया में एक स्थान होना चाहिये सिर्फ़ स्थानीय-संदर्भ के समाधानों के लिये, फ़िर भी, उन पर पैसा लगाया जा सके ।
हमने एक बडे परीक्षण में पाया कि कई बार निवेशक ये सवाल पूछते हैं -- "इस युक्ति के विशाल हो पाने की संभावना क्या है? " जैसे कि समाज की वो ज़रूरतें जो कि खास समय और जगह के लिये है< और केवल स्थानीय ज़रूरतें हैं, उन्हे मुफ़्त पाने का किसी को कोई अधिकार ही नहीं है, बस इसलिये कि वो प्रचुर मात्रा में विशालता प्राप्त नहीं कर सकते । तो या तो आप अपनी ज़रूरतों को बदल डालिये या चुपचाप खेल से बाहर खडे रहिये । लेकिन प्रतिष्ठित ढाँचा (लाँग-टेल मॉडल) ये बताता है कि थोडा विक्रय, उदाहरण के लिये, कई सारी किताबें अगर थोडी थोडी बिकें, भी व्यावसायिक रूप से साध्य होगा । और हमें वो तरीका ढूँढना होगा जिसमें कि लोग एक साथ मिल कर आगे आयें, और निवेश कर पायें, जहाँ अलग अलग नये प्रयोग कम लोगों के पास उनके अपने स्थानों पर जाएँ, और तब भी, ये सब व्यावसायिक रूप से सुकर रहे ।
देखिये यहाँ क्या हो रहा है । सैदुल्ला साहिब गजब के व्यक्ति हैं । ७० बरस की उम्र में, ये कुछ बेहद रचनात्मक कर रहे हैं ।
सैदुल्लासाहिब: मुझसे नाव का इंतज़ार नहीं होता था । मुझे अपनी माशूका से मिलना ही था । इस इश्क ने ही मुझे अविष्कारक बना डाला । मोहब्बत को भी तकनीक से सहारा चाहिये । ये नये प्रयोग मेरी बेग़म नूर का हक़ है । नये अविष्कार मेरे जीवन की साथ हैं । मेरी तकनीक ।
अनिल गुप्ता: सैदुल्लासाहिब भी चम्पारन, मोतिहारी के ही गजब के इंसान हैं, और आज भी, उम्र की इस दहलीज़ पर, साइकिल पर शहद बेच कर गुज़ारा करते हैं क्योंकि हम ये वाटर-पार्क वालों, झील वालों इत्यादि को ये समझा नहीं सके । और हम अग्निशमन विभाग के लोगों को ये समझा नहीं सके मुम्बई में, जहाँ कुछ साल पहले बाढ आयी थी, और लोगों को बीस बीस कि.मी. तक पानी में चल कर जाना पडा था, कि, देखिये, आपके अग्निशमन केंद्र में ये साइकिल होनी चाहिये, क्योंकि ये आपको उन गलियों मे ले जाएगी जहाँ आपकी बसें और बडे वाहन नहीं जा पाएँगे । तो हमने अभी तक इस समस्या को नहीं सुलझाया है कि कैसे इसे हम बचाव-कार्य के उपयुक्त बनायें, या फ़िर फेरी लगाने के लिये इस्तेमाल करें पूर्वी भारत की बाढों के दौरान, जब आपको चीज़ें पहुँचानी होती है, अलग अलग टापुओं पर, जहाँ लोग अटके पडे होते हैं । मगर इस अविष्कार में दम है: बिलकुल दम है ।
देखिये अप्पचन ने क्या किया है! अप्पचन, दुर्भाग्यवश, इस दुनिया में नहीं हैं, मगर अपना संदेश छोड कर गये हैं, एक शक्तिशाली संदेश
अप्पचन: मैं रोज़ इस दुनिया को जगते हुए देखता हूँ ।
ऐसा नहीं है कि मेरे सर पर एक नारियल गिरा, और मुझे ये निदान समझ आ गया । पढाई के पैसे नहीं होने की वजह से, मैं नई ऊँचाइयों पर चढा । अब सब मुझे स्थानीय स्पाइडरमैन कहते हैं । मेरी तकनीक ।
अनिल गुप्ता: आप में से कई लोगों के ये विश्वास नहीं होगा कि हमने इन उत्पादों को अंतर्रष्ट्रीय बाज़ारों में भी बेचा है -- इसे हम G2G कहते हैं, grassroot to global (गाँव से विश्व-भर में) और मेसेच्यूसेट्स विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने, जीव विज्ञान विभाग के, ये मशीन खरीगी क्योंकि वो चाहती थीं कीटों की विविधता का अध्ध्यन करना पेड के ऊपर और इस उत्पाद से ये संभव हुआ कि वो अपने नमूने ऊँचे खजूर के पेडों से ले सकें, कुछ नमूनों के मुकाबले ज्यादा नमूने, इसके बिना उन्हे ईंटों से मचान बनानी होती थी और फिर उनके शोध-छात्रों को उस पर चढना होता था । तो, देखिये, हम लोग विज्ञान को भी बढावा दे रहे हैं ।
रेम्या जोस ने --- आप यूट्यूब पर जा कर 'इन्डिया इन्नोवेट्स' देखिये, और वहाँ आपको ये सब विडियो मिल जाएँगे । उस लडकी ने अद्भुत अविष्कार किया जब वो दसवीं में थी: वाशिंग-मशीन और कसरत की मशीन एक साथ । श्री खरारी जो कि विकलांग हैं, केवल एक फ़ुट छः इन्च ऊँचाई के है, पर उन्होंने एक दुपहिये वाहन को ऐसे बदना कि वो खुद को आज़ादी, इधर-उधर जाने की क्षमता दे सकें । ये अविष्कार रायो (ब्राज़ील) की झूग्गियों से आया है । और ये व्यक्ति, श्री उबिराजरा, मेरे ब्राजील के दोस्त हैं. प्रश्न है कि इसे ढाँचे को चीन और ब्राज़ील में कैसे बडा किया जाये । और हमारे पास बडा गतिशील नेटवर्क है, खासकर चीन में, पर हम ब्राजील और दुनिया के और भी भागों में काम कर रहे हैं । अगले पहियों पर लगा ये स्टैण्ड, आपको किसी साइकिल पर नहीं मिलेगा । भारत और चीन में सबसे ज्यादा संख्या में साइकिलें हैं । मगर ये ईज़ाद हुई है ब्राजील में ।
मुद्दा ये है कि हम से किसी को भी देश और राष्ट्रीयता को ले कर इतना कडा नहीं होना चाहिये कि हम चाहें कि सारे अच्छी योजनायें हमारे ही देश से आयें । बल्कि, हमें तो सीखने के सर झुका कर खडा होना चाहिये, सबसे, गरीबों से, जहाँ से भी हो । और यहाँ साइकलों पर आधारित एक पूरा जमावडा है अविष्कारों का: साइकिल जिससे छिडकाव होता है, साइकिल जो कि सडक पर लगने वाले झटकों से बिजली पैदा करती है । मैं रोड की स्थिति नहीं सुधार सकता; लिहाजा, मैं अपनी साइकिल को ही तेज़ दौडाउँगा । यही कनक दास ने कर दिखाया है । और दक्षिणी अफ़्रीका मे, हमने अपने अविष्कारकों को वहाँ के अविष्कारकों के साथ ज्ञान बाँटने के लिये मिलवाया कि कैसे अविष्कार बन सकता है एक ज़रिया आज़ादी का खराब ज़िन्दगी से, जो लोग जी रहे हैं । ये एक गधा-गाडी है जिसे विकसित किया है । इस में एक एक्सल लगा है, करीब, ३० से ४० किलोग्राम का, जो कि किसी काम का नहीं था । उसे हटाया, और अब गाडी को केवल एक ही मवेशी की ज़रूरत है ।
ये चीन है । यहाँ इस लडकी को साँस लेने के लिये मशीन चाहिये । गाँव के इन तीन लोगों ने मिल-बैठ कर सोचने का फ़ैसला किया कि, "कैसे हम इस बच्ची की ज़िन्दगी को और लम्बा बना सकेंगे?" वो उस बच्ची से जुडे हुए नहीं थे, मगर उन्होने ये फ़ैसला लिया, कि वाशिंग-मशीन का पाइप किस तरह से, एक साइकिल के साथ, साँस लेने के मशीन में तब्दील हो सकता है । और इस मशीन ने जानें बचाई हैं, और वो बहुत मानी जाती है।
यहाँ अविष्कारों का मेला लगा हुआ है । ऐसे कार जो कि हवा के दबाव से चलती है छः पैसे प्रति किलोमीटर । असम, कनक गोगोई । और आपको ये कार अमरीका या यूरोप में नहीं दिखेगी, मगर भारत में ये मौज़ूद है । और ये स्त्री, जो कि कताई का काम करती थी पोचमपल्ली साडी के लिये । एक दिन में, १८००० बार, इसे ये लपेटना पडता था दो साडियाँ बनाने के लिये । ये उसके बेटे ने किया है सात साल की कोशिशों के बाद । स्त्री ने कहा, "अपना पेशा बदल लो ।" और बेटे ने कहा, "नहीं बदल सकता हूँ, मैं यही जानता हूँ मगर मैं इसे करने के लिये एक मशीन बनाऊँगा ।" जिस से कि तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी ।" और देखिये उसने ये किया, ये सिलाई मशीन, उत्तर-प्रदेश में सो, सृष्टि ये कहना चाहते है कि, "मु्झे खडे होने की एक जगह दे दो, मैं धरती को ही हिला दूँगा ।"
मैं आपको एक प्रतियोगिता के बारे में बताता हूँ जो कि हम बच्चों के बीच करवा रहे हैं रचनात्मक्ता के लिये । हमने उत्पादो को विश्व भर में बेचा है, यूथोपिया से ले कर के अमरीका तक । कुछ उत्पाद बाज़ार तक पहुँचे हैं । ये वो लोग हैं जिनके ज्ञान के कारण हरबावेट क्रीम का निर्माण सँभव हुआ । और यहाँ एक कम्प्नी है जिसने इस कीटनाशक का लाइसेन्स लिया, और अविष्कारक का चित्र उत्पाद के पैकेट पर लगाया जिसे से कि जब भी कोई उसे इस्तेमाल करे, उसे लगे कि वो खुद भी अविष्कारक बन सकता है । अगर आपके पास कोई अविष्कार है, तो हमें उसे के बार में बताइये ।" इसलिये, रचनात्मक्ता का मूल्य है, ज्ञान क महत्व है, अविष्कारों से बदलाव आते है, और शाबासी हौसला-अफ्ज़ाई करती है । और शाबासी, सिर्फ़ रुपये पैसे के रूप में ही नहीं , बल्कि उसके अलावा भी ।
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अनिल गुप्ता का लक्ष्य है विकासशील देशों के छोटे आविष्कारकों का विकास - वे स्वदेशी उद्यमी जिनकी कार्यकुशलता , जो की गरीबी से ढकी है, कई लोगों की ज़िन्दगी बदल सकती है . वे दिखाते है की कैसे हनी बी नेटवर्क उन्हें मदद करता है सम्बन्ध बनाने में -- और वह मान्यता पाने में जिसके वोह हकदार हैं
Anil Gupta created the Honey Bee Network to support grassroots innovators who are rich in knowledge, but not in resources. Full bio »
Translated into Hindi by Swapnil Dixit
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17:14 Posted: Dec 2009
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05:59 Posted: Sep 2009
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