मैं आज आपसे कुछ कहना चाहता हूँ जो उन महानतम साहसिक कार्यो में से एक है जिसे मनुष्य जाति ने प्रारम्भ किया, वह जिज्ञासा है ब्रह्माण्ड को समझने की और उसमे हमारी अवस्थिति को जानने की। इस विषय मे मेरी रुचि, और मेरी दिवानगी, अकस्मात घटित हुई। मैने यह पुस्तक खरीदी, "यह ब्रह्माण्ड और डाक्टर आइंस्टाइन" -- वह पतली जिल्द वाली सिएटल की एक पुरानी पुस्तको की की दुकान से थी। उसके कई वर्षो बाद, बैंगलोर में, एक रात मुझे नींद नहीं आ रही थी, तब मैने उस पुस्तक को उठाया, यह सोचते हुए की वह १० मिनेट में मुझे निंद्रा की गोद में पहुंचा देगी। मगर हुआ यह की, मैने आधी रात से सुवह ५ बजे तक एक झटके में उसे पढ डाला। वह मेरे अंदर यह तीव्र भाव छोड़ गई जो उतेजना और आनन्द से भरी हुइ थी ब्रह्माण्ड के विषय में और हमारी अपनी समझने की क्षमता जो आज है। और उस भावना से मैं अभी तक मुक्त नही हो पाया हूँ।
वह भावना मेरे लिए कारण बनी अपने पेशे को परिवर्तन करने की -- एक सॉफ्टवेयर इन्जीनीयर से मैं विज्ञान लेखक बन गया -- ताकि मैं विज्ञान के आनन्द में सम्मलित हो सकूँ, तथा औरों को बताने के आनन्द प्राप्त कर सकूँ। इसी भावना ने मुझे अभिप्रेरित भी किया एक अलग प्रकार की तीर्थ यात्रा के लिए, अक्षरसः कहे तो दुनिया के किनारो तक जाना देखने के लिए दुरबीन, अन्वेषणयन्त्र, एवं उपकरण जो लोग बना रहे हैं या बना चुके थें, ब्रह्माण्ड के अन्वेषण के लिए अधिक से अधिक व्यापकता के साथ । यह खोज मुझे चीली जैसी जगह ले गई -- चीली देश की आटाकामा मरुभूमि से -- साइवेरिया तक, भूमिगत खदानों मे, जापान की एल्प पर्वतमाला से उत्तरी अमेरिका तक, अंटार्कटिका तक और फिर दक्षिणी ध्रुव तक ।
और आज मैं आपसे कुछ बाँटना चाहता हूँ कुछ छाया-चित्र, तथा उन यात्राओं कि कहानियाँ । वस्तुतः पिछले कुछ वर्षो से मैं व्यस्त था उन प्रयासो के अभिलेखन में जो कुछ अति वीर पुरुष एवं महिलाएँ अंजाम तक पहुँचा रहे थे, कभी कभी, अपनी जान पर खेलकर वह दुर्गम एवं कठिनाई भरे स्थानों पर काम कर रहे थें ताकि वह बह्माण्ड से प्राप्त होने वाले सूक्ष्मत्तम संकेतो को ग्रहण कर सके जिससे हम ब्रह्माण्ड को समझ सके ।
प्रारम्भ में मैं एक वृतखण्ड रेखा चित्र प्रस्तुत करुंगा। विश्वास दिलाना चाहूँगा कि यह एक मात्र रेखा चित्र है पूरे प्रस्तुतीकरण में । लेकिन यह हमारे मानस को ब्रह्माण्ड का विषय समझने कि स्थिति में ले आएगा । भौतिकी के सम्पूर्ण सिद्धान्त जो हमारे पास हैं ठीक ढंग से व्याख्या करते है कि "सामान्य पदार्थ" किसे कहते है -- जिस चीज से हम बने हैं -- और उसकी मात्रा ब्रह्माण्ड मे सिर्फ ४ प्रतिशत हैं। खगोलज्ञ, ब्रह्माण्डज्ञ तथा भौतिकीज्ञ सोचते है कि इस ब्रह्माण्ड में कुछ ऐसा है जिसे वे श्याम (डार्क) पदार्थ कहते हैं, उसकी मात्रा ब्रह्माण्ड में २३ प्रतिशत है, और ऐसा कुछ जिसे श्याम ऊर्जा कहते हैं, और जो समय-स्थान की संरचना मे व्याप्त हैं, वह शेष ७३% मात्रा में है । तो आप इस वृतखण्ड रेखा-चित्र में, ब्रहृमाण्ड के ९६% हिस्से को आज तक हम खोज रहे हैं, वह अज्ञात एवं हमारी समझ के परे है । और अधिकांश प्रयोग, दुरबीन जो मै देखने गया था वह किसी रुप मे इसी प्रश्न को संबोधन करते हैं, इन दो रहस्यों को, श्याम पदार्थ तथा श्याम उर्जा को।
अब मै आपको एक भूमिगत खदान की ओर ले चलता हूँ उत्तरी मिनेसोटा में जहां लोग खोज रहे है उसे जिसे श्याम पदार्थ कहा गया । और उद्देश्य है उस संकेत को पकड़ना जब श्याम पदार्थ का एक कण उनके संसूचक से टकराएगा । और भूमिगत होने का कारण यह है कि, यदि यह प्रयोग पृथ्वी पर किया जाए तो, यह प्रयोग उन संकेतो से गडमड हो जाएगा जो ब्रह्माण्डीय किरणो जैसी चीज के कारण होता है, या फिर वातावरणीय रेडियो विकिरण से, या फिर हमारे शरीर की वजह से । आप मानेंगें नही, लेकिन हमारे शरीर में यथेष्ट रेडियो विकिरण है जो इस प्रयोग में विघ्न डाल सकता है । इस लिए वह भूमि के अन्दर गहरे उतरते है एक प्रकार का वातावरणीय मौन हासिल करने के लिए जिससे वे सुन पाएँगे संसूचको पर श्याम पदार्थ के कण की छोटी सी टकराहट ।
और मैं एक ऐसा प्रयोग देखने गया, और वास्तव में - इसे देखना न हो पाएगा और उसका कारण है की वहां धुप्प अंधकार है। वह एक बडी गुफा है जिसे खनिको ने त्याग दिया सन १९६० मे खदान छोड़ते समय । और तब भौतिज्ञ यहां आए और इसका प्रयोग करने लगे सन १९८० के साल में पिछली सदी के शुरु मे खनिक यहां मोमवती के प्रकाश में काम करते थें । और आज, आप इस खदान के अन्दर देख सकते है, जो आधा मील भूमि के अन्दर है । यह विश्व की अधिकत्तम गहराइ की भूमिगत प्रयोगशालाओं में से एक है । और, अन्य चीजो के साथ वह यहां श्याम पदार्थ की खोज कर रहे हैं ।
एक और तरीका है श्याम पदार्थ को खोजने का, जो अप्रत्यक्ष है । यदि श्याम पदार्थ का अस्तित्व हमारे ब्रहृमाण्ड में है, हमारी आकाशगंगा में है, तो उसके कण आपस मे टकराते होंगे और अन्य कणो की रचना करेंगें जिसे हम पहचानते हैं -- वैसा एक है जिसे न्युट्रोनो कहते है । और न्युट्रोनो की आप टोह ले सकते है उस हस्ताक्षर द्धारा जिसे वह छोड जाते है जब वह पानी के अणुकणिकाओं से टकराते हैं । जब न्युट्रोनो पानी के अणुकणिका से टकराता है तो एक तरह का नीला प्रकाश निकलता है, नीले प्रकाश की एक चमक, और इस नीले प्रकाश को देख कर, तो आप अनिवार्य रुप से न्युट्रानो के बारे में कुछ जान पाएगें और फिर, अप्रत्यक्षतः, कुछ श्याम पदार्थ के बारे में जिसमें सम्भवतः इस न्युट्रोनो को सृजन हुआ होगा । लेकिन आपको अत्याधिक परिमाण में पानी की आवश्यकता पडेगी इस प्रयोग के लिए -- आपको आवश्यक पड़ेगी कई करोड़ टन पानी की -- लगभग एक अरब टन पानी -- न्युट्रान को पकड़्ने के लिए किसी भी अवसर को पाने के लिए। इस विश्व में आपको इतना पानी कहाँ मिलेगा - हाँ रुस के पिछवाडे में ऐसा एक भण्डार है ।
यह बेकाल झील है । यह विश्व की सब से बडी झील है । यह ८०० किलोमीटर लम्बी है । यह ४० से ५० कि.मि. चौडी है कई स्थानों पर, और १-२ कि.मि. गहरी है । और रुस के लोग यहां संसूचको का निर्माण कर रहे हैं और उसे झील की सतह से १ कि.मि. गहरे में डुबाते है ताकि उन्हें नीले प्रकाश के चमक की झलक मिल जाए । और जब मैं वहां पहुँचा तो मैनें यह दृश्य देखा । यह बेकाल झील है साइबेरीयाई ठण्ड के उच्चत्तम बिन्दु पर । यह झील पूरी तरह जमी हुई है । और वह काली बिन्दुओं की पंक्ति जो आप पार्श्व में देख रहे है, वह बर्फ-तम्बू है जहाँ भौतिकीज्ञ काम कर रहे हैं । उन्हें जाड़े में इसलिए काम करना होता है क्योंकि गर्मी और बसन्त ऋतु में काम करने के लिए उनके पास यथेष्ट पैसा नहीं होता है, अगर, वे ऐसा करे तो, उन्हें जहाज और पनडुब्बियों की आवश्यकता होगी । अतः वे जाडे का इन्तजार करते हैं-- जब वह झील पूरी तरह जम जाती है -- और वे इस मीटर चौडाई वाले बर्फ की परत का प्रयोग करते हैं एक प्लेटफारम की तरह, जिस पर अपना बर्फ-तम्बु निर्माण कर वे अपना काम कर सकते है ।
तो यहाँ रुस के लोग बर्फ पर काम कर रहे हैं साइबेरियाई ठण्ड के उच्चत्तम बिन्दु पर । उन्हें बर्फमें छेद करना पड़ता है, फिर उस ठण्डे, ठण्डे पानी में डूबकी लगाते हैं -- अपने उपकरणो को पकड़ कर बाहर निकालते हैं, आवश्यक मरम्मत सम्भार करने के लिए, बर्फ पिघलने के पूर्व वापस डाल कर बाहर आते। क्योकि ठोस बर्फ का चरण दो महीने ठहरता है और वह दरारों से भरा है । आप कल्पना करें, एक सागर के समान झील है पैरों के नीचे, चलायमान मेरी समझ के परे है कि क्यो वह रुसी नंगी छाती काम कर रहा है, इससे ज्ञात होता है कि वह कितनी मेहनत कर रहा है । और यह, मुट्ठी भर लोग, बीस वर्षो से काम कर रहे है, उन कणों को खोजते जिनका अस्तित्व हो भी सकता है और नहीं भी। और उन्होंने इसमें अपना जीवन समर्पित कर दिया है। केवल एक धारणा के लिए, उन्होने बीस वर्षों में २० करोड़ खर्च किया है । यह बेहद कठोर स्थिति है । वे नगण्य आय-व्यय पर काम कर रहे है । वहां शौचालय के नाम पर भूमि मे छेद है, जो काठ की पटरी से ढकी है । और यह उतनी बुनियादी भर है, लेकिन वे प्रत्येक वर्ष यह करते है ।
साइबेरिया से ले कर चीली की अटाकामा मरुभूमि तक, देखने के लिए जिसे बहत विशाल दुरवीन कहते हैं । एक बहत विशाल दुरवीन यह एक काम है जो ये खगोलज्ञ करते है -- वे बगैर कल्पनाशीलता के अपनी दुरवीन का नामाकरण करते हैं । मैं आपको एक तथ्य बताता हूं, वह जो अगली की योजना बना रहे हैं । उसे अति विशाल दुरवीन कहते हैं । (हंसी) और आप विश्वास नहीं करेंगें, लेकिन इसके बाद वाले का जबरदस्त विशाल दुरवीन कहेंगें । लेकिन जो भी हो, यह इन्जीनियरींग का असाधारण नमूना हैं। वहां चार ८.२ मीटर की दुरवीनें हैं । और ये दुरबीनें, अन्य चीजों के साथ, उनका प्रयोग इस अध्ययन के लिए हो रहा है कि ब्रह्माण्ड का विस्तार समय के साथ कैसे परिवर्तित हो रहा है। और आप जितना अधिक उसे समझते हैं, उतना ही बेहतर आप समझेंगें श्याम पदार्थ क्या है -- ब्रह्माण्ड जिससे बना -- उस सम्बन्ध में
इन्जीनियरींग का एक नमूना जो आपसे कहूँगा इस दुरबीन के बारे में वह दर्पण है । प्रत्येक दर्पण, जो कुल चार हैं, वे एक ही दर्पण के टुकडे से बने हैं, उच्च तकनीकी मृतिका की एक अखण्ड रचना, जिसे इतनी विशुद्धता के साथ घिसा और पालिस किया गया है एक हीं तरीका है उसे समझने का आप कल्पना करें पेरिस शहर का, उसकी उँची अट्टलाकिओं और एफील मिनार के साथ, अगर आप उसे इतनी विशुद्धता के साथ घिसे, आपके पास सिर्फ एक मिलीमिटर उंचाई का उभार बच जाए वैसी घिसाई इन दर्पणों को झेलनी पडी है । ऐसी असाधारण दुरबीनों का समूह। यहां उसका एक अन्य दृश्य। आपको ऐसी दुरबीनें बनानी पड़ती है अटाकामा मरुभूमि जैसी जगह में क्योंकी वह है उँचे स्थान की मरुभुमि। यहां की खुश्क हवा दुरबीनों के लिए अच्छी है, और साथ हीं, बादलों का ढकना पर्वत शिखर के नीचे है जिससे दुरबीनों को लगभग ३०० दिन खुला आकाश मिलता है ।
अन्ततः, मै आपको अंटार्कटिका लिए चलता हूँ । मैं अपना अधिकत्तम समय विश्व के इस भाग में बिताना चाहता हूँ। यह ब्रह्माण्ड शास्त्र की अन्तिम छोर है। कुछ अत्यन्त विस्मयकारी प्रयोग, कुछ अत्यन्त गहन प्रयोग, यहां अंटार्कटिका में किए जा रहे हैं । मैं वहा लम्बी-अवधि वाले गुब्बारे की उड़ान के अवलोकन के लिए था, जो मूलतः दुरबीन एवं उपकरणो को ले जाता है वायुमण्डल के ऊपरी भाग तक, ऊपरी समतापमण्डल, ४० किलोमिटर ऊपर। और वही जगह है, जहाँ वे अपने प्रयोग करते हैं, और तब उस गुब्बारे, उस अंतरिक्ष उपकरण, को नीचे लाया जाता है । तो हम अंटार्कटिका के रॉस हिम परत पर अवतरण कर रहे हैं । यह एक अमेरिकी सि-१७ खेप विमान है जिसने हमें न्यूज़ीलैण्ड से उडान भराई अंटार्कटिका के मैक्मुर्डो प्रांत की ओर । और यहाँ हम अपने बस में सवार होने की तैयारी में हैं। और मुझे पत्ता नहीं कि आप अंकित अक्षरो को पढ सकते हैं, लेकिन, यहां लिखा है "इभान द टेरीबस"। और यह हमे मैक्मुर्डो ले जा रही है।
और यह वह दृश्य है जो मेक्मुर्डो में आपका स्वागत करता है । और आपको अनुमान लगाना कठिन होगा यहां की कुटिया के सम्बन्ध में । यह कुटीया रोबर्ट मैलकन और उनके आदमियों द्वारा बनाई गई थी जब वह पहली बार अंटार्कटिका आए थे दक्षिण ध्रुब की ओर जाने वाले उनके प्रथम अभियान में। क्योंकि यहाँ इतनी ठण्डी है, कुटीया की सभी वस्तुएं बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसा उन्होनें छोड़ी थी, उनके द्वारा बनाए गए अंतिम भोजन का अवशेष भी अभी तक वहां पडा है यह असाधारण स्थान है। मैक्मुर्डो यही है। ग्रीष्म ऋतु में यहां करीब हजार लोग काम करते हैं, और सर्दी मे तकरीबन 200 जब यहां पूर्ण अन्धकार होता है, छः महीने के लिए।
मैं यहां उड़ान देखने के लिए आया था इस विशेष प्रकार के उपकरण की यह एक अन्तरिक्ष किरण सम्बन्धी प्रयोग है जिसे उच्चतर समतापमण्डल मे प्रक्षेपित किया गया है ४० किलोमिटर की ऊँचाई पर । मैं आपको कल्पना कराना चाहता हूँ की इसका भार 2 टन है। और आप एक गुब्बारे का प्रयोग कर रहे हैं दो सौ टन भार वहन के लिए वह भी 40 किलोमीटर की ऊँचाई तक। इंजीनीयर, तकनीशियन, भौतिकीज्ञगण सभी को रॉस हिम परत पर एकत्र होना पड़ता है क्योंकि यह अंटार्कटिका है -- मै कारणो मे नही जाऊँगा -- लेकिन यह गुब्बारों की उड़ान के लिए सर्वाधिक अनुकुल स्थान है, सर्दी के मौसम के अतिरिक्त। मौसम, जैसा की आप कल्पना कर सकते हैं, यह ग्रीष्म ऋतु है, और आप 200 फीट बर्फ पर खडे हैं। और पीछे एक ज्वालामुखी है, उसके शिखर पर हिमनदीयां हैं। उनको क्या करना है कि उस गुब्बारे के सभी पुर्जो को आपस मे जोड़ना है -- कपडा, अवतरण छतरी तथा अन्य सभी सामाग्री -- बर्फ पर और फिर उसमें हिलीयम भरना। इस प्रक्रिया में करीब 2 घण्टे लगते हैं।
और जब वे पुर्जो को जोड़ रहे होते है तब मौसम बदल सकता हैं उदाहरणस्वरूप, यहां वह पीछे की और गुब्बारे के कपडे को बिछा रहे हैं, जिसमे अन्ततः हीलियम भरा जाएगा । वो जो दो ट्रक आप सबसे अंत मे देख रहे हैं वह प्रत्येक 12 टंकी संकुचित हिलीयम का भार लिए हुए है। अब, यदि उडान से पूर्व मौसम परिवर्तन हो जाए तो, उन्हें सब कुछ वापस बक्सो मे डालना होगा और वापस मैक्मुर्डो स्टेशन ले जाना होगा। और यह खास गुब्बारा, क्योंकि इसे 2 टन भार वहन के साथ उडान भरनी है, एक अत्यंत विशाल गुब्बारा है । इसके कपडे मात्र का वजन 2 टन है। भार घटाने के लिए, यह बेहद पतला है, भोजन लपेटने वाले कागज जितना पतला। और यदि उन्हें इसे वापस गठरी बनानी पडे, उन्हे वापस बक्सो मे डालना होगा और पतर चढानी होगी ताकि वह बक्सो मे ठीक से बैठ जाए -- अपवाद यह है कि, जब यह प्रथम बार किया गया, यह टेक्सास राज्य मे किया जाना था। यहां, उन जूत्तो को पहन कर नहीं किया जा सकता जो वे पहने हैं, अतः उन्हे जूत्ते निकालने पड़ते हैं, इतनी ठंड में नंगे पैर बक्सो मे उतरना होता है और इस प्रकार का काम करना पड़ता है। ऐसी निष्ठा है इन व्यक्तियों में ।
यहां गुब्बारे मे हीलियम भरा जा रहा है, इस भव्य द्दश्य को आप देख सकते हैं। यह है वह द्दश्य जहां से आप गुब्बारे को उसके भार के साथ शुरु से अंत तक देख सकते हैं। तो दायीं तरफ गुब्बारे मे हिलियम भरी जा रही है, और वह कपडा बिल्कुल मध्य तक फैला है जहां इलेक्ट्रोनिक सामाग्री तथा विस्फोटक रखे हैं अवतरण छतरी से जोडी जा रही है, और वह अवतरण छतरी भार के साथ जोडी जा रही है । और स्मरण रहे, सम्पूर्ण तारो को जोडा जा रहा है लोगो द्वारा चरम ठंड मे, शून्य से नीचे के तापक्रम में। वे खुद 15 किलो के वस्त्र पहने हैं, और यह सब करने के लिए उन्हे अपने पंजे उतारने पड़ते हैं। और मै आपको सहभागी बनाउंगा एक उडान के अनुभव में
(चलचित्र) आकाशवाणी : ठीक है, गुब्बारा छोड़ो, गुब्बारा छोड़ो, गुब्बारा छोड़ो ।
अनिल अनंथस्वामी : और अंततः दो दृश्य आपके समक्ष रखना चाहूँगा । यह हिमालय मे स्थित एक वेधशाला है, भारत के लद्दाख में एक चीज की ओर आप देखिए उपर बांयी तरफ एक दुरबीन है और बिल्कुल दायीं तरफ वहां एक ४०० वर्ष प्राचीन बौद्ध विहार है । बौद्ध विहार के एकदम समीप का दृश्य है यह । मै विस्मित हो गया यह निकटता देख कर मानव जाति की दो विपुल विधाओ के बीच एक बाह्य अंतरिक्ष मे खोज रही है, और दूसरी हमारे भीतर के अस्तित्व को और दोनो को एक प्रकार का मौन चाहिए
और मुझे इसने विस्मित किया कि प्रत्येक स्थान में जहाँ मै दुरबीन देखने गया, खगोलज्ञ तथा ब्रह्माणडज्ञ विशेष प्रकार का मौन खोज रहे है, चाहे वह विकिरण प्रदूषण से मौन हीं क्यो न हो अथवा प्रकाश प्रदूषण से या जिस किसी से। यह सुस्पष्ट था यदि पृथ्वी पर इन मौनता वाले स्थानो को हम नष्ट कर देंगे तो, हमे ऐसे ग्रह पर रहना होगा जहां हमारे पास बाह्य पक्ष को देखने की क्षमता न होगी, क्योंकि हम बाह्य अन्तरिक्ष से आने वाले संकेतो को नहीं समझ पाएँगे।
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सम्पुर्ण पृथ्वी पर, विशाल दुरबीन एवम संसुचक इस ब्रह्माण्ड की गतिविधी के सूत्रो को देख (एवम सुन) रहे हैं। आई.एन.के. गोष्ठी में, विज्ञान लेखक अनिल अनंथस्वामी हमे इन अदभुत स्थापनाओं की यात्रा कराते हुए, हमे इस पृथ्वी के अनेक अति दुर्गम और शांत स्थानो पर ले जाते हैं।
Anil Ananthaswamy is the author of "The Edge of Physics." A former software engineer, he was inspired to become a science writer by his passionate curiosity about the world. Full bio »
Translated into Hindi by Omprakash Sikaria
Reviewed by Kumar Sachidananda
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15:52 Posted: Oct 2009
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16:09 Posted: Aug 2008
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06:42 Posted: Feb 2008
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