मैं बहुत बहुत खुश हूँ ऎसे लोगों के बीच आकर -- इस रोशनी से मेरे आँखों में तक़लीफ़ हो रही है और ये मेरे चश्मे में भी बुरी तरह पड़ रही है. मैं बहुत ही ख़ुश और सम्मानित अनुभव कर रहा हूँ इतने सारे अनूठे और बुद्धिमान लोगों के बीच आकर. पहले के तीन वक्ताओं की बातें मैंने सुनी, और जानते हैं क्या हुआ? हर वो बात जो मैं कहना चाहता था, वो पहले ही कह चुके हैं, और ऎसा लगता है कि मेरे पास कहने को कुछ नहीं बचा.
पर मेरे यहाँ एक कहावत है कि अगर कोई कली पेड़ से बिना कुछ कहे कर गिर जाए, तो वो कली कच्ची है. इसलिए मैं -- चूँकि मैं कच्ची उमर का नहीं हूँ और मेरी काफी उमर हो गई है, मैं कुछ ज़रुर कहूँगा.
हम इस सम्मेलन का आयोजन बहुत ही सटीक समय पर कर रहे हैं क्योंकि बर्लिन में एक और सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है. जी-8 शिखर सम्मेलन. जी-8 शिखर सम्मेलन ने प्रस्ताव दिया है कि अफ़्रीका की समस्याओं का समाधान बड़ी मात्रा मे अनुदान देने में है, कुछ कुछ मार्शल प्लान जैसा ही. दुर्भाग्य से व्यक्तिगत तौर पर मेरा मार्शल प्लान में विश्वास नहीं है. पहले तो इसलिए कि मार्शल प्लान के फायदों को बढ़ा-चढ़ा कर आँका गया. इसका सबसे ज़्यादा लाभ उठाने वाले देश जर्मनी और फ्राँस थे, और ये उनके सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.5 प्रतिशत था. एक औसत अफ्रिकी देश को मिला विदेशी अनुदान उसके सकल घरेलू उत्पाद का 13 से 15 प्रतिशत तक होता है, जो कि धनी से ग़रीब देशों को सौंपे गये वित्तीय संसाधनों की अभूतपूर्व मात्रा है.
मैं कहना चाहूँगा कि यहाँ हमें दो चीज़ें जोड़ कर देखनी होंगी. किस तरह से पश्चिमी मीडिया वहाँ अफ़्रीका को प्रस्तुत करती है, और उसके परिणाम. हताशा, बेबसी और निराशा दिखाकर मीडिया अफ़्रीका का सच ही बता रही है, और ये सच ही है. लेकिन, मीडिया पूरा सच नहीं बता रही है. क्योंकि हताशा, गृ्हयुद्ध, भूख और अकाल, जहाँ अफ़्रीकी वास्तविकता का हिस्सा हैं, वहीं, केवल यही अफ्रिका की वास्तविकता नहीं है. और दूसरे, ये वास्तविकता का सबसे छोटा भाग हैं.
अफ्रिका में 53 देश हैं. इनमें से केवल 6 गृ्हयुद्ध पीड़ित हैं, जिसका मतलब है कि मीडिया केवल छह देशों की ही सूचना दे रही है. अफ्रिका में अपार संभावनाएँ हैं, जो उस हताशा और बेबसी के जाल से बाहर नहीं पहुँच पातीं जिसे पश्चिमी मीडिया अपने दर्शकों को परोसती है. ऐसी प्रस्तुति का असर यही होता है कि ये संवेदना मांगती है. ये दया मांगती हे, ये दान मांगती है. नतीज़ा - अफ़्रीका की आर्थिक समस्याओं का पश्चिमी मानस पटल में ग़लत चित्रण होता है. यह ग़लत छवि इस सोच का परिणाम है कि अफ़्रीका एक हताशा भरी जगह है. हम उसका क्या करें? हमें भूखों को खाना देना चाहिए. हमें बीमारों के लिए दवाई मुहैया करानी चाहिए. हमें शान्ति सेना भेजनी चाहिए गृ्हयुद्ध से जूझ रहे लोगों की मदद के लिए. और इस पूरी प्रक्रिया में अफ़्रीका से 'स्वंयं करो' वाली भावना छिन्न-भिन्न हो गई है.
मैं कहना चाहूँगा कि इस बात को पहचानना ज़रूरी है कि अफ़्रीका की कुछ आधारभूत कमज़ोरियाँ हैं. पर साथ ही, उसमें संभावनाएँ भी हैं और अवसर भी. अफ़्रीका आज जिस चुनौति का सामना कर रहा है, उसे हमें नए सिरे से समझने की ज़रुरत है, एक हताशाभरी चुनौती से हटकर, वो हताशा जिसे हम ग़रीबी उन्मूलन का नाम देते हैं, उसे एक आशावादी चुनौती में बदलना होगा. यह आशावादी चुनौती होगी संपद निर्माण की, और इसे बनाना अति-आवश्यक है. अफ़्रीका में रुचि रखने वाले हर शख्स के आगे सवाल ग़रीबी मिटाने का नहीं है बल्कि संपदा सृ्ष्टि का है.
एक बार हम इन दो चीज़ों को बदल दें -- अगर आप ये कहें कि अफ्रिकी लोग ग़रीब हैं और उन्हें ग़रीबी से मुक्ति चाहिए, तो सद्भावनाओं का अंतर्राष्ट्रिय समुदाय इस महाद्वीप में घुस पड़ेगा, साथ में क्या लेकर? ग़रीबों के लिए दवाईयाँ, भूखों के लिए खाना, गृ्हयुद्ध से जूझ रहे लोगों के लिए शान्ति सेना. और इस पूरी प्रक्रिया की किसी भी चीज़ की उपयोगिता सचमुच में नहीं है क्योंकि आप लक्षणों का उपचार कर रहे हैं, अफ्रिका के मूल समस्याओं का नहीं. किसी को स्कूल भेजने से या दवाईयाँ देने से, देवियों और सज्जनों, उनके लिए संपत्ति सृष्टि नहीं होती. संपत्ति आय से पनपति है, और आय आती है किसी लाभजनक व्यवसायिक अवसर या किसी अच्छी तन्ख्वाह की नौकरी से.
अब जब हम अफ्रिका में संपत्ति सृ्ष्टि के बारे में बात करने लगे हैं तो हमारी दूसरी चुनौति है, किसी समाज मे संपत्ति निर्माण करने वाले कौन होते हैं? वो हैं उद्यमी. [अस्पष्ट] ने कहा है कि उद्यमी हमेशा जनसंख्या का लगभग चार प्रतिशत होतें हैं, पर इनमें से 16 प्रतिशत अनुकरणकारी हैं. पर इन लोगों को भी उद्यमिता में सफलता मिल जाती है. तो हमें पैसे कहाँ डालने चाहिए? हमें निवेश वहाँ करना चाहिए जहाँ ये लाभजनक रूप से बढ़ सके. अफ्रिका में घरेलू और विदेशी, दोनों ज़रीयों से निजी निवेश का समर्थन करें. शोध संस्थाओं का समर्थन करें, क्योंकि संपत्ति के निर्माण में ज्ञान की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है.
पर आज अंतर्राष्ट्रिय अनुदान समुदाय अफ्रिका के साथ क्या कर रही है? ये बड़ी बड़ी धन राशियाँ फेंक रहे हैं प्राथमिक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, खाद्य सहायता के लिए. पूरे महाद्वीप को एक हताश जगह में तब्दील कर लिया गया है, जिसे दान की ज़रूरत है. देवियों और सज्जनों, क्या आप ऎसे किसी के बारे में बता सकते हैं जिसे आप जानते हैं, कोई पड़ौसी, दोस्त, या रिश्तेदार जो अचानक दान लेकर रईस हो गए हों? भीख के कटोरे में दान लेकर? क्या आप दर्शकों में से कोई ऎसे किसी को जानते हैं? क्या आप ऎसे किसी देश के बारे में जानते हैं जो दूसरे देशों की उदारता और दान पर आगे बढ़ा हो? चूँकि मुझे कोई हाथ उठा नहीं दिख रहा है, तो लगता है कि मैंने सही बात कही.
एन्ड्र्यू मवेन्डा : मैं देख रहा हूँ बोनो कह रहा है कि वो उस देश को जानता है. कौनसा देश है वो?
धन्यवाद. पर मैं आपसे कुछ कहना चाहूँगा. बाहरी कारण आपके लिए अवसर तैयार कर सकते हैं. लेकिन उस मौके को काम में लगाकर इसका लाभ उठाना आपकी आंतरिक क्षमताओं पर निर्भर करता है. अफ्रिका को काफी अवसर मिले हैं, जिनमें से बहुतों से हमें ज़्यादा लाभ नहीं हुआ है. क्यों? क्योंकि हमारे पास वो आंतरिक व्यवस्था या नीतियों की रुपरेखा नहीं है जिससे हम इन विदेशी संबंधों का लाभ उठा सकें. मैं एक उदाहरण देता हूँ.
कोटुनो समझौता जिसे पहले लोमे आचार कहा जाता था, के अंतर्गत युरोप ने अफ्रिकी देशों को युरोपियन युनियन बाज़ारों में बिना कर के माल निर्यात का मौका दिया है. मेरे देश युगान्डा को 50,000 मेट्रिक टन चीनी युरोपियन युनियन के बाज़ारों में निर्यात करने का कोटा मिला है. हम लोगों ने अब तक एक किलो का निर्यात भी नहीं किया है. हम ब्राज़ील और क्यूबा से 50,000 मेट्रिक टन चीनी का आयात करते हैं. दूसरी तरफ, उसी समझौते के बीफ प्रोटोकॉल के अंतर्गत बीफ (गो-मांस) उत्पादन करने वाले अफ्रिकी देशों को बीफ के युरोपियन युनियन बाज़ारों में कर रहित निर्यात के लिए कोटे दिए गए हैं. अफ्रिका के सबसे समृ्द्ध देश बोत्स्वाना सहित एक भी अफ्रिकी देश कभी भी अपना कोटा पूरा नहींकर पाया है.
मैं आज पूरे दावे के साथ ये कहना चाहूँगा कि अफ्रिका के बाकी विश्व के साथ सकरात्मक संबंध न बना पाने का कारण उसकी व्यवस्था और नीतियों की कमज़ोरी है. किसी भी तरह के हस्तक्षेप को समर्थन की ज़रूरत होती है, ऎसी संस्थाओं का विकास जो संपत्ति सृ्ष्टि कर सकें, ऎसी संस्थाओं का विस्तार जो उत्पादकता बढ़ा सके. हम शुरुवात कहाँ से करें और अनुदान इसके लिए बुरा क्यों है? अनुदान का तरीक़ा बुरा है, जानते हैं क्यों? क्योंकि विश्व की हर सरकार को गुज़ारे के लिए धन की आवश्यकता है. क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने जैसे साधारण कामों के लिए धन की आवश्यकता है. कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना तथा पुलिस को धन देने की आवश्यकता होती है. चूँकि हमारी ज़्यादातर सरकारें तानाशाह हैं, उन्हें अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सेना की आवश्यकता होती है. दूसरे तो आपको अपने राजनैतिक चमचों को भी पैसे देने पड़ते हैं. लोग सरकार का समर्थन क्यों करे? इसलिए क्योंकि ये उन्हें अच्छी तन्ख्वाह वाली नौकरियां दिलाती हैं. या फिर भ्रष्टाचार से लाभ उठाने के अनुचित मौके.
तथ्य यह है, कि दुनिया की कोई भी सरकार, ईदी अमीन जैसों को छोड़कर, केवल ताक़त के दम पर शासन नहीं कर सकती. [अस्पष्ट] के बहुत सारे राष्ट्रों को मान्यता चाहिए. मान्यता पाने के लिए शासकों को प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, सड़क जैसी चीज़ें मुहैया करानी होती हैं, अस्पताल और दवाखाने बनाने होते हैं. अगर किसी सरकार का आर्थिक अस्तित्व अपने देश के लोगों से ही अर्थ संग्रहण पर निर्भर करता है, तो एसी सरकार अपने आत्महित में ही अधिक सचेतनता के साथ शासन करने का प्रयास करेगी. वो उन लोगों के साथ बैठेगी जो संपद सृ्ष्टि करते हैं. उनसे पूछेगी कि उन्हे किस तरह की नीतियों और संस्थाओं की आवश्यकता है जिससे वो अपने व्यवसाय की परिधी और अनुपात को विस्तार दे सकें ताकि उनसे अधिक कर की आमदनी हो सके. अफ्रिकी महाद्वीप की समस्या और अनुदान उद्योग की समस्या यही है कि उसने अफ्रिकी सरकारों के आगे आनुपातिक प्रतिफल की संभावनाओं को ही बिगाड़ के रख दिया है. हमारे सरकार के लिए आय की संभावनाओं में लाभ के अवसर घरेलू अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रिय दान-दाताओं से हैं.
बजाय इसके कि युगान्डाई लोगों से बैठक की जाए--
बजाय इसके कि बैठक की जाए युगान्डाई उद्योगपतियों से, या फिर घाना के व्यवसायियों से या दक्षिण अफ्रिका के उद्योगों में अग्रणी भूमिका निभाने वालों से, हमारी सरकारें ज़्यादा फ़ायदेमंद पाती हैं IMF(अंतर्राष्ट्रिय मुद्रा कोष) या वर्ल्ड बैंक से बात करने में. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर आपके पास दस पी.एच.डी हो, तो भी आप कंप्युटर उद्योग की समझ में बिल गेट्स का मुक़ाबला नहीं कर सकते. क्यों? क्योंकि जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है किसी उद्योग के विस्तार के लिए ज़रूरी क़दमों को समझने के लिए, उसके लिए आपको उन लोगों की राय लेनी पड़ेगी, जो उस उद्योग के निजी क्षेत्र से जुड़े हों.
अफ्रिकी सरकारों को मौका दिया गया है अंतर्राष्ट्रिय समुदाय द्वारा, कि वे अपने ही नागरिकों से सकरात्मक संबंध बनाने से बचे, और बजाय उसके, IMF एवं वर्ल्ड बैंक से अनगिनत समझौते करते रहें और फिर IMF एवं वर्ल्ड बैंक ही उन्हे बताए कि उनके नागरिकों की ज़रूरतें क्या हैं. इस तरह हम, अफ्रिका के साधारण लोग, दरकिनार कर दिए गए हैं हर तरह हे नीति निर्धारण, दिशा निर्णयन और नीतियों के कार्यान्वयन की सारी प्रक्रियाओं से. हमारी क्षमता सीमित है, क्योंकि धन देने वाला नियम भी बनाता है. IMF, वर्ल्ड बैंक एवं विश्व भर की सद्भावना समुदाय ने हमसे हमारे नागरिक अधिकार छीन लिए हैं, और इस कारण हमारी सरकारें अनुदान निर्भर होने के कारण यही कर रहीं हैं कि अपने नागरिकों के बजाए अंतर्राष्ट्रिय देनदारों की बातों को तवज्जो दे.
पर यहाँ मैं एक चेतावनी भी जोड़ना चाहूँगा, वो यह है कि यह सच नहीं कि अनुदान का नतीजा हमेशा नकरात्मक होता है. कुछ अनुदानों से अस्पताल बने होंगे, या किसी गाँव की भूख मिटी होगी. उससे सड़कें बनी होंगी जिसकी बहुत उपयोगिता रही होगी. अंतर्राष्ट्रिय अनुदान उद्योग की चूक यह है कि सफलता के ऎसे छिट-पुट घटनाओं को ही नियम मानकर इनमें पहले तो करोड़ों - अरबों डॉलर झोंक दे और फिर इन नक्शों को विश्व भर मैं दोहराने लगें, ये सोचे बग़ैर कि हर गाँव की अपनी अनोखी और विशिष्ट परिस्थिति होती है, उनके हुनर, रिवाज, मान्यताएँ और आदतें, जो किसी छोटे अनुदान प्रोजेक्ट को सफल बनाते हैं -- जैसे की कीन्या के साओरी गाँव में जहाँ जेफरी साक़ काम कर रहे हैं -- और इस तरह के एक-आध अनुभवों को ही सामान्य मानकर हर किसी का अनुभव मान लेना.
अनुदान किसी सरकार को उपलब्द्ध संसाधन बढ़ाता है, जिससे सरकार में काम करना, बतौर पेशा किसी भी अफ्रिकी व्यक्ति के लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है. किसी राष्ट्र के राजनैतिक आकर्षण बढ़्ने से, वो भी हमारे जैसे जातियों में विभाजित अफ्रिकी समाजों में, अनुदान जातिगत तनावों को बढ़ा देता है. क्योंकि हर एक जाति का गुट सरकार में शामिल होने की कोशिश करेगा ताकि उसे विदेशी अनुदान में हिस्सा मिल सके. देवियों और सज्जनों, अफ्रिका के सबसे उद्यमी लोगों को व्यापार और रोज़गार के अवसर नहीं मिल पाते क्योंकि व्यवस्था और नीतियों का माहौल व्यापार विरोधी है. सरकार उनमें बदलाव नहीं ला रही है. क्यों? क्योंकि उन्हें अपने नगरिकों से बात करने की ज़रूरत नहीं पढ़ती. वे अंतर्राष्ट्रिय दान-दाताओं से बात करते हैं. तो सबसे उद्यमी अफ्रिकी अंततः सरकार के लिए ही काम करते पाए जाते हैं, जिसने हमारे देशों में राजनैतिक तनाव बढ़ा दिए हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि हम अनुदान पर आश्रित हैं.
मैं यह भी कहना चाहूँगा कि ज़रूरी है कि हम इस बात पर भी ग़ौर करें कि पिछले 50 सालों से अफ्रिका को अनुदान मिलता आया है अंतर्राष्ट्रिय समुदाय से तकनीकि या वित्तीय सहायता के रूप में, और अनुदान के और सभी प्रकारों से. 1960 और 2003 के बीच हमारे महाद्वीप को 60,000 करोड़ डॉलर की राशि अनुदान में मिली, और तब भी हमें आज भी ये कहा जाता है कि अफ्रिका में बहुत ग़रीबी है. ये सारा अनुदान आखिर गया कहाँ?
मैं अपने देश युगान्डा का ही उदाहरण देना चाहूँगा और बताना चाहूँगा अनुदान ने वहाँ किस तरह के प्रतिफल दिए हैं. 2006-2007 के बजट में, अनुमानित आय 2,50,000 करोड़ शिलींग. अनुमानित विदेशी अनुदान : 1,90,000 करोड़. युगान्डा के पुनर्रावर्ती (बार बार होने वाले) ख़र्च -- पुनर्रावर्ती से मैं क्या कहना चाहता हूँ? सिर्फ़ गुज़ारे के लिए -- 2,60,000 करोड़ है. युगान्डा सरकार अपने बजट में अपने आय का 110 प्रतिशत क्यों ख़र्च कर देती है? क्योंकि विदेशी अनुदान के नाम पर कोई है जो इसकी भरपाई करती है. पर ये इस बात को ज़रूर दिखाती है कि युगान्डा की सरकार अपनी आय को उत्पादन-सक्षम निवेशों मैं खर्च करने को समर्पित नहीं है, बल्कि इस आय को वह सरकारी तंत्र चलाने में ही ख़र्च कर देती है. सरकारी व्यवस्था, जो ज़्यादातर प्रश्रय-पालन पर चलता है, 69,000 करोड़ लेती है. सेना, 38,000 करोड़. कृ्षि में, जो 18 प्रतिशत ग़रीब नागरिकों की जीविका है, सिर्फ़ 18,000 करोड़ लगते हैं. व्यापार और उद्योग में 4,300 करोड़ लगते हैं. अब मैं दिखाना चाहूँगा कि सरकारी ख़र्चों में -- बल्कि युहान्डा में सरकारी व्यवस्था चलाने के ख़्रर्चों में -- क्या शामिल है? तो देखिए. 70 केन्द्रीय मंत्री, 114 राष्ट्रपति सलाहकार -- जो कि, राष्ट्रपति को कभी नहीं देख पाते, सिवाय टेलिविज़न पे.
और जब वो उन्हे साक्षात देख पाते हैं, ऎसे ही किसी सार्वजनिक सभाओं में, तब भी, सलाह तो राष्ट्रपति ही उन्हें देते हैं.
हमारे स्थानीय सरकार में 81 खन्ड हैं, और हर स्थानीय सरकार केन्द्रीय सरकार की तर्ज़ पर गठित है -- अधिकारी-वर्ग, मंत्री-मण्डल, संसद, और राजनैतिक पिछ-लग्गुओं के लिए ढेर सारा काम. ऎसे 56 खण्ड थे, और जब हमारे राष्ट्रपति ने संविधान संशोधन कर इनके कार्य काल की सीमा हटानी चाही, उन्हें 25 नए ज़िले बनाने पड़े, जिससे अभी खन्ड कुल मिलाकर 81 हो गए हैं. 333 संसद सदस्य. हमारे संसद की सभा के लिए वेम्ब्ली स्टेडियम की ज़रूरत पड़ेगी. 134 आयोग और अर्ध-शासित सरकारी संस्थाएँ, जिनमें से हर किसी में निर्देशक हैं, और गाड़ियाँ -- और ये आख़िरी बात मैं बोनो महाशय को बताना चाहूँगा. इस पर अपने काम के ज़रीए वो हमारी मदद कर सकते हैं.
युगान्डा सरकार पर हाल ही में किए एक जाँच में पाया गया कि 3,000 चार-पहिए की मोटर गाड़ियाँ स्वास्थ्य मंत्रालय के मुख्यालय में हैं. युगान्डा में 961 उप-ज़िले हैं, हर एक में एक दवाखाना है, जिनमें से एक के पास भी एम्ब्युलेन्स नहीं है. मुख्यालय के ये चार पहिए वाहन मंत्रियों को, स्थायी सचिवों को, अधिकारियों को और अनुदान प्रोजेक्ट पर काम करने वाले अंतर्राष्ट्रिय अनुदान अधिकारियों को लाने-ले जाने के काम आता है, जबकि बिना एम्ब्युलेन्स और दवाईयों के ग़रीब मर रहे हैं.
अंत में, मैं कहना चाहूँगा कि यहाँ बोलने आने से पहले मुझे बताया गया था कि टेड ग्लोबल का सिद्धांत ये है कि एक अच्छा भाषण मिनी स्कर्ट की तरह होना चाहिए -- उतना ही छोटा जिससे कौतूहल जगे, पर उतना लम्बा जिससे विषय को समेटा जा सके. मैं उम्मीद करता हूँ कि में ऎसा कर पाया.
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अपने प्रेरक भाषण में पत्रकार एन्ड्र्यु मवेन्डा 'अफ्रिकी सवाल' को नए सिरे से देखने को कहते हैं -- मीडीया द्वारा प्रचारित ग़रीबी, गृहयुद्ध और बेबसी की कहानियों के परे, इस पूरे महाद्वीप में संपद और खुशियाँ फैलाने के मौके ढूँढ निकालने का आह्वान करते हैं.
Journalist Andrew Mwenda has spent his career fighting for free speech and economic empowerment throughout Africa. He argues that aid makes objects of the poor -- they become passive recipients of charity rather than active participants in their own economic betterment. Full bio »
Translated into Hindi by Arpita Bhattacharjee
Reviewed by Swapnil Dixit
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22:10 Posted: Jul 2007
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18:23 Posted: Aug 2007
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17:50 Posted: Jul 2007
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