अगर संसार को बांटे तो सबसे सामान्य विभाजन है एक जो ईश्वर को मानते हैं और दूसरे जो नहीं मानते-- यानि कि आस्तिक और नास्तिक! और पिछ्ले कुछ दशको से ये साफ़ है कि नास्तिक होने का मतलब क्या है। कुछ काफ़ी स्पष्टवादी नास्तिक हुए हैं जो ये कहते हैं कि धर्म केवल गलत ही नहीं बल्कि बेतुका भी है। ये लोग, जिनमे से कई उत्तरी ओ़क्स्फ़ोर्ड मे रहे हैं ये तर्क देते हैं कि ईश्वर मे विश्वास करना परियों की कहानियों को सच मानने जैसा है और सही मायने मे ये सब एक बचकाने खेल जैसा है।
अब मेरे हिसाब से ये कुछ ज्यादा ही सरल है. मेरे विचार से इस तरह से धर्म की पूरी तरह से उपेक्षा करना बहुत आसान है. ये इतना आसान है जितना गंजे के सर के जुयें मारना. और आज मै जिसका उदघाटन करने जा रहा हूं वो है नास्तिक बनने का एक नया तरीका -- और अगर आप चाहें तो अनीश्वरवाद के इस नये रूप को अनीश्वर्वाद २.० कह सकते हैं। अब ये अनीश्वरवाद २.० है क्या? वैसे तो ये बहुत सीधी सी बात से शुरु होता है. ये माना कि कोई भगवान नही है. माना कि कोई देवता या अलौकिक शक्ति नही है और ना ही फरिश्ते वगैरा। तो ठीक है पर अब इससे आगे बढा जाये, क्योंकि कहानी यहां खतम नही हुई है, बल्कि ये तो एकदम शुरुआत है।
अब मै खासकर उन लोगो के बारे मे कहना चाहूंगा जो कुछ इस तरह सोचते हैं: जैसे, "मैं ये सब कुछ नहीं मानता. मै किसी सिद्दान्त को नहीं मानता. मुझे नही लगता कि ये सिद्धान्त सही हैं. लेकिन, एक बात है, "मुझे त्योहार मनाना बहुत पसन्द है. मुझे रंगोली की सजावाट बहुत अच्छी लगती है और पुराने मन्दिर और चर्च भी बहुत सुहावने लगते है मुझे गीता/बाइबल के उपदेश भी अच्छे लगते है" या जो भी ऐसा कुछ, आप समझ गये ना मै क्या कहना चाह रहा हूं-- लोगो को धर्म का सांस्कृतिक, नैतिक और सामजिक पहलू तो आकर्षित लगता है लेकिन वो सिद्दान्तो को नही झेल सकते. अब तक इन लोगो के पास बहुत ही अप्रिय विकल्प रहा है. और ये ऐसा है कि या तो आप सिद्दान्तों को माने और तब आप इन सारी कलात्मक चीजों का आनन्द ले सकते है, या फ़िर आप इन सिद्धान्तों को अस्वीकार करें और एक आध्यात्मिक तौर पर बंजर जैसी जगह मे रहें जिसे सी एन एन और वालमार्ट चलाते हैं.
तो ये वाकई एक कठिन चुनाव है. मेरे विचार से हमे चुनाव करने की जरूरत ही नही है. एक दूसरा रास्ता है. मेरे खयाल से धर्म से कुछ (अच्छा) चुराने के-- अब मैं एक साथ बहुत भद्र भी बन रहा हूं और पापी भी-- कई तरीके हैं. और अगर आप धर्म मे विश्वास नही करते तो धर्म के अच्छे गुण चुनकर कुछ अपने विचारों से मिलाने मे कुछ गलत नही है. और मेरे लिये, ये नया अनीश्वरवाद दोनो पहलुओ के लिये है, जैसा कि मैने कहा, एक आदरपूर्ण और अभद्र तरीके से, धर्म की जांच करना और सोचना," यहां हमारे काम की कोइ चीज है क्या?" इस लौकिक दुनिया मे कई कमियां हैं. और मेरे हिसाब से हम बहुत बुरी तरह से सांसारिक हो गये हैं। और यदि हम धर्म का बारीकी से अध्ययन करें तो हमे जीवन के कई उलझे हुये पहलुओं के बारे में काफ़ी ज्ञान मिलेगा. और आज मै उनमे से कुछ के बारे मे बात करूंगा.
चलिये शुरुआत शिक्षा से करते हैं. शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे लौकिक दुनिया बहुत आस्था रखती है. जब भी हम दुनिया को बेहतर बनाने की सोचते है, हम शिक्षा के बारे मे ही सोचते हैं और उसपे बहुत खर्चा भी करते हैं. शिक्षा से हमें वाणिच्यिक, औद्योगिक योग्यता तो मिलेगी ही, ये हमे बेहतर इन्सान भी बनायेगी. आप तो जानते ही है किसी उदघाटन समारोह या दीक्षान्त समारोह मे, कितने काव्यात्मक ढंग से शिक्षा और पूरी शैक्षिक पद्धति -- खासकर उच्च शिक्षा की-- हमे बेहतर और महान इन्सान बनाने की क्षमता का गुणगान किया जाता है. ये कितना सुन्दर विचार है. और इस विचार की शुरुआत भी काफ़ी रोचक है.
19वीं शताब्दी की शुरुआत में पश्चिमी युरोप में चर्च मे आने वालों की संख्या बडी तेज़ी से घटना शुरु हो गयी, इतनी कि लोग घबरा गये. उन्होने अपने आप से ये सवाल पूछे. उन्होने कहा, कि अब लोग नैतिकता कहां से सीखेंगे, उन्हें मार्गदर्शन कहां से मिलेगा, और वो सांत्वना की खोज मे कहां जायेंगे? और फ़िर एक प्रभावशाली आवाज़ में उत्तर आया. उत्तर था : संस्कृति. हमें मार्गदर्शन, सांत्वना और नैतिकता के लिये अपनी संस्कृति का सहारा लेना चाहिये. आप शेक्सपीयर के नाटक देख लीजिये या प्लूटो के संवाद या जेन आस्टिन के उपन्यास. इन सबमें आपको वो सारा सत्य मिलेगा जो पहले हमने सेंट जोन के उपदेशों मे पाया था. अब मुझे लगता है कि ये बहुत ही सुन्दर और सच्चा विचार है. वे ग्रन्थों को संस्कृति से प्रतिस्थापित करना चाहते थे. और ये वाकई बहुत ही यथार्थवादी विचार है. और हम इसी विचार को भूल गये हैं
यदि आप एक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय मे पढे हैं मान लो, हार्वार्ड या ओक्सफ़ोर्ड या केम्ब्रिज -- और ये कहते हैं, "मैं यहां नैतिकता, मार्गदर्शन और सान्त्वना की खोज मे आया हूं; मै जीने का सही तरीका जानना चाहता हूं." तो लोग आपको पागलखाने का रास्ता दिखायेंगे! हमारे सबसे भव्य और श्रेष्ठ संस्थान भी ये बताना जरूरी नहीं समझते. क्यॊं? उन्हें लगता है कि हमे इसकी जरूरत ही नही है. उन्हें नही लगता कि हमे तुरन्त मदद की जरुरत है. उनके हिसाब से हम सब वयस्क हैं, बुद्धिमान वयस्क! हमें तो बस सूचना चाहिये. और कोइ सहायता नहीं, बस आंकडे.
जबकि धर्म एकदम अलग जगह से शुरु होता है. सभी धर्म, सारे बड़े धर्म, अनेक बार हमे "बच्चा" कहकर संबोधित करते हैं. और ये मानते हैं कि बच्चों की तरह ही हमे भी मदद की गंभीर जरुरत है. हम बस किसी तरह काम चला रहे हैं. शायद सिर्फ़ मैं ही या शायद आप भी. पर जो भी हो बस किसी तरह सब काम चला रहे हैं. और हम सबको सहायता चाहिये. वाकई हमें मदद चाहिये. और इसलिये हमे मार्गदर्शन और उपदेशों की जरुरत है.
18वीं शताब्दी मे U.K. में जोन वेस्ले नामक बहुत महान धार्मिक उपदेशक हुआ जो पूरे देश मे घूम घूम कर लोगों को उपदेश देता और उन्हें जीने का सही तरीका बताता. उसने माता-पिता के बच्चों के प्रति और बच्चों के माता-पिता के प्रति क्या कर्तव्य है, अमीर का गरीब और निर्धन का धनवान के प्रति क्या कर्तव्य है इन सब का उपदेश दिया. उसने लोगों को धर्म प्रचार के पारम्परिक तरीके यानि कि अपने उपदेशों के माध्यम से जीने का सही तरीका बताने की कोशिश की.
अब हमने उपदेश देने वाला विचार तो छोड ही दिया है. अगर आप एक आधुनिक, उदारतावादी व्यक्ति से कहेंगे, "अरे सुनिये, मैं आपको एक उपदेश देना चाहता हूं?" वो कहेंगे, " नहीं नहीं, मुझे उपदेश-वुपदेश नही चाहिये. मैं एक स्वतन्त्र व्यक्ति-विशेष हूं." एक उपदेश और व्याख्यान, जो कि हमारा आधुनिक धर्मनिरपेक्ष तरीका है मे क्या अन्तर है? एक उपदेश आपका जीवन बदलना चाहता है और एक व्याख्यान आपको बस थोडी जानकारी देना चाहता है. और मुझे लगता है कि हमें उपदेश की प्रथा को वापस लाना चाहिये. उपदेश की प्रथा अत्यधिक मूल्यवान है, क्यों कि हमें मार्गदर्शन, नैतिकता और सांत्वना की सख्त जरूरत है -- और धर्म ये बात जानते हैं.
शिक्षा के बारे मे एक और बात: इस आधुनिक लौकिक दुनिया मे हमें ऐसा लगता है कि यदि हम एक बात किसी को एक बार बतायेंगे तो वो उसे याद रखेगा. कक्षा मे बिठा के, बीस साल की आयु मे उन्हें, आप प्लूटो के बारे मे बताइये, फ़िर 40 साल की आयु मे उन्हें प्रबंधन सलाहकर बनने भेज दीजिये और तब भी वो पाठ उन्हें याद रहेगा. धर्म कहते हैं, "बकवास. तुम्हे दिन मे 10 बार अपने पाठ को दोहराने की जरूरत है. तो अपने घुटनों पे बैठो और अपना पाठ दोहराओ." सारे धर्म हमें यही करने को कहते हैं: तो झुको और रोज़ 10, या 20 या 15 बार अपना पाठ दोहराओ." नही तो हमारे छ्लनी जैसे दिमाग से सब निकल जायेगा.
तो धर्म मे पुनरावृत्ति का चलन है. वो वही महासत्य बार बार घुमा फ़िरा के कहते रहते हैं. पर पुनरावृत्ति से हमें बोरियत होती है. हमे हमेशा कुछ नया चाहिये. नया हमेशा पुराने से अच्छा है. अगर मै आपसे कहूं," ठीक है भाई, आज से नया TED नही होगा. हम बस वही पुराने TED TALK बार बार दोहरायेंगे और और उसे पांच बार देखेंगे क्यूंकि कि वो सब कितने सच्चे हैं. हम एलिज़ाबेथ गिल्बर्ट को पांच बार देखेंगे क्योंकि वो जो कहतीं हैं वो बहुत अच्छा है," आप छला हुआ महसूस करेंगे. लेकिन अगर आप धार्मिक विचारधारा अपनायेंगे तो ऐसा नही होगा.
धर्म एक और काम करता है, और वो है समय व्यवस्था. सभी बडे धर्मों ने हमे केलेन्डर दिये है. केलेन्डर क्या है? केलेन्डर यह निश्चित करने का एक तरीका है कि आपको पूरे साल के दौरान कुछ महत्वपूर्ण विचारों का ध्यान रखें. केथोलिक केलेन्डर मे, हर मार्च के अन्त मे आप सन्त जेरोमी के बारे मे सोचेंगे और उनके सद्गुणों, सदाचरण और गरीबों के प्रति दयाभाव के बारे मे सोचेंगे. और ये कोइ इत्तेफ़ाक से नहीं होगा, बल्कि इसलिये होगा क्यों कि आपको ऐसा करने को कहा गया है. पर अब हम ऐसा नही सोचते. धर्मनिरपेक्ष संसार मे हम मानते हैं, "अगर कोई बात जरूरी है तो हम उस पर अमल करेंगे. हम इसे खुद ही समझने की कोशिश करेंगे." लेकिन धार्मिक लोग इसे बकवास मानेंगे. धार्मिक मत के हिसाब से हमें कलेन्डर चाहिये, समयबद्धता चाहिये, और इसी के हिसाब से हम किसी बात पर विचार करेंगे. और ये तब भी दिखता है जब धर्म मे रीति रिवाजों को खास भावनाओं से जोडा जाता है.
अब चन्द्रमा को ही ले लीजिये. इसे देख्नना महत्वपूर्ण है. और आप जानते हैं कि जब आप चांद देखते है, तो सोचते है, "मै कितना तुच्छ हूं, मेरी समस्यायें क्या है?" इससे चीजों का एक नजरिया बनता है. हमें चांद को कई बार देखना चाहिये, पर हम नही देखते. क्यों नहीं? क्यों कि हमसे कोई ये कहने वाला ही नही है,"चांद को देखो". लेकिन अगर आप एक जेन बुद्ध है तो सितम्बर के बीच मे आपको एक खास मंच पे खडे होना पडेगा, और आप सुकिमी का त्योहार मनायेंगे, जिसमे आपको चांद के सम्मान और समय के चक्र और जीवन की भंगुरता के बारे मे याद दिलाने के लिये कवितायें पढने को दी जायेगी. फ़िर आपको चावल का केक दिया जायेगा. और चांद और उसका प्रतिबिम्ब आपके दिल मे हमेशा के लिये बस जायेगा. ये वाकई बहुत अच्छी बात है.
दुसरी बात जो धर्म अच्छी तरह समझते हैं वो है : अच्छी वाणी -- जो मै यहां बहुत अच्छा नही कर पा रहा हूं -- वाक्पटुता तो वाकई धर्म का मूल है. इस भौतिकतावादी दुनिया मे, आप विश्वविद्यालय पद्धति मे पढ के, अच्छे वक्ता न होने के बावजूद एक अच्छा जीवन बना सकते हैं. लेकिन धार्मिक दुनिया ऐसा नही सोचती आप जो भी कहें उसे अच्छे विश्वसनीय तरीके से कहना बहुत जरूरी है
तो यदि आप दक्षिण अमेरिका के किसी अफ़्रीकी अमेरिकी पेन्टेकोस्टल चर्च मे जायेंगे और उनकी बातें सुनेगे तो जान जायेगें कि वे वाकई बहुत ही अच्छे से बात करते हैं. हर निश्चयात्मक बात के बाद सब "आमीन आमीन आमीन" कहते हैं. और हर उत्साहपूर्ण बात के बाद सब खडे होके कहेंगे. "शुक्रिया जीजस, शुक्रिया क्राइस्ट, शुक्रिया तारणहार". अगर हम भी ऐसे ही करें जैसे वो करते हैं -- हम ऐसा करते नही हैं पर बस सोचिये अगर हम ऐसे करें -- मैं आपसे ऐसा कुछ कहूं जैसे "ग्रन्थों को संस्कृति से प्रतिस्थापित कर देना चाहिये". और आप सब कहें, "आमीन, आमीन, आमीन." और मेरी बात के अन्त मे सब खडे होकर कहें "शुक्रिया प्लूटो, शुक्रिया शेक्सपीयर, शुक्रिया जेन औस्टिन." और हमे लगे कि हम वाकई सुर मे सुर मिला रहे हैं. तो कैसा लगेगा!
एक और चीज जो धर्म जानते है कि हमारे अन्दर सिर्फ़ एक मन ही नही एक शरीर भी हैं और जब वो कोइ पाठ पढायेंगे तो वो शरीर से ही होके जायेगा. जैसे कि उदाहरण के लिये यहूदी लोगों का क्षमादान. यहूदी क्षमा करने मे और नयी शुरुआत करने मे बहुत विश्वास करते हैं. और इसका केवल उपदेश नही देते. वो केवल किताबो या बातो मे ये करने को नही कहते. वो हमे स्नान करने को कहते है. एक कट्टर यहूदी समाज मे आप हर शुक्रवार एक मिक्वे मे जाते हैं. आप पानी मे डुबकी लगाते है और ये भौतिक कर्म एक दार्शनिक विचार को बल देता है. लेकिन हम ऐसा नही करते. हमारे विचार एक जगह पे है और हमारा व्यवहार हमारे शरीर के साथ कहीं और है. धर्म इन दोनो को बडे अद्भुत तरीके से मिलाने की कोशिश करते हैं.
आईये अब कला के बारे मे बात करते हैं कला को इस लौकिक दुनिया मे हम बहुत श्रेष्ठ मानते हैं. हमारे खयाल से कला वाकई बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. हमारा बहुत सारा अतिरिक्त धन संग्रहालयों को दिया जाता है. हमें कई बार तो ये सुनने को भी मिलता है कि सन्ग्रहालय हमारे नये चर्च हैं. आपने कई बार ये सुना होगा. मेरे हिसाब से वहां कोई बात तो है, लेकिन हमने खुद को पुरी तरह निराश किया है. और निराशा की वजह ये है कि हमने इस बात को ठीक से जाना ही नही है कि धर्म कला को कैसे चलाते हैं.
दो बहुत बडी गलतफ़हमियां दुनिया मे प्रचलित हैं जो कला से शक्ति पाने की हमारी क्षमता को रोक रही हैं: एक तो ये कि कला सिर्फ़ कला मात्र के लिये ही होनी चहिये -- जो कि एकदम बेहूदा खयाल है -- और ये कि कला को तो सन्यासियों की दुनिया मे रहना चाहिये और इस दुखी सन्सार के लिये कुछ नही करना चाहिये. मैं ये बिल्कुल नही मानता. एक और बात ये है कि हम मानते हैं कि कला को खुद को व्यक्त नही करना चाहिये, कि कलाकार को अपनी कला के बारे मे कुछ नही कहना चाहिए, क्योंकि अगर उन्होंने बता दिया तो उसका सारा रहस्य खुल जायेगा और हमे वो बहुत आसान लगने लगेगा. इसीलिये जब भी हम सन्ग्रहालय मे होते है तो हमे ऐसा लगता है -- आज मान ही लेते हैं -- कि " मुझे कुछ समझ मे नही आता कि ये सब क्या है" लेकिन कोइ गम्भीर व्यक्ति ये स्वीकार नही करता है. लेकिन ये भावना समकालीन कला का संरचनात्मक हिस्सा बन गयी है.
धर्मों का कला के प्रति काफ़ी साफ़ नज़रिया है. उन्हें ये बताने मे कोइ परेशानी नही है कि कला किस बारे मे है. कला के सभी मुख्य मतो मे दो उद्देश्य हैं. पहला,ये आपको याद दिलाने की कोशिश करती है कि दुनिया मे कुछ प्यार करने के लिये भी है. और दूसरा, हमे ये बताने के लिये कि हमे किससे डरना चाहिये और बचना चाहिये. और यही कला का उद्देश्य है. कला हमारी आस्था के विचारो का शारीरिक रूप है. तो जब आप किसी चर्च , मस्जिद या गिरिजाघर के पास से गुजरते हैं, तो आप क्या सीखते हैं, आप वही सीखते हैं जो आप अपनी आंखों से देखते हैं, महसूस करते है, वो सच जो अन्यथा आपके पास दिमाग के रास्ते से आता है, शरीर के नहीं.
ये वस्तुत: एक तरह का प्रचार है. रेम्ब्रान्ट ईसाईयों की नज़र मे एक प्रचारक है. प्रचार शब्द सुनते ही हम सतर्क हो जाते हैं. हम हिटलर और स्टालिन के बारे मे सोचते हैं. पर ये जरूरी नही है. प्रचार किसी चीज के बारे मे ज्ञान देने का तरीका है. और अगर वो चीज अच्छी है तो इसमे कुछ गलत नही है.
मेरे हिसाब से संग्रहालयों को धर्म से इस बारे मे सीखना चाहिये. और इस बात का ध्यान रख्नना चाहिये कि जब भी आप संग्रहालय मे जायें -- अगर मै वहां का अध्यक्ष होता, तो मै प्रेम के लिये एक अलग कक्ष बनाता और एक उदारता के लिये. सभी कलाकृतियां हमे कुछ सिखाती हैं. यदि हम अपने आस पास की दुनिया को इस तरह से व्यवस्थित कर सकें जहां हमे कई कलाकृतियां देखने मिलें और हमे ये सिखाया जाये कि हम अपने विचारों को और प्रगाढ करने मे इन कलाकृतियों का प्रयोग करें, तो हम कला से बहुत कुछ पा सकते हैं. कला पहले की तरह ही अपना काम खुद कर लेगी, पर हमने अपनी गलतफ़हमियों के कारण इस बात की उपेक्षा की है. कला समाज मे सुधार लाने का एक साधन है. कला निर्देशात्मक होनी चाहिये
चलिये किसी और चीज के बारे मे सोचते है. इस आधुनिक लौकिक संसार मे, जो लोग आत्मा, मन और ऐसे उच्च आत्मीय विषयों मे रुचि लेते है, अक्सर वो अकेले ही होते है. जैसे कि कवि, दार्शनिक, फ़ोटोग्राफ़र और फ़िल्मकार. और वो अक्सर स्वावलम्बी होते है. वो हमारे लघु उद्योगो की तरह अकेले और असुरक्षित है. और वे खुद ही दुखी और उदास होते रहते है और वो ज्यादा बदलते भी नही है.
अब आप धर्म के बारे मे सोचिये, संगठित धर्म के बारे मे. धार्मिक संगठन क्या करते है? वो समूह बनाकर संस्थान बनाते हैं. और इसके बहुत सारे फ़ायदे हैं सर्वप्रथम विशालता और शक्ति. वालस्ट्रीट के अनुसार केथोलिक चर्च ने गत वर्ष 97 बिलियन डालर एकत्रित किये. ये विशालकाय तन्त्र है. वे सहयोगिक हैं, ब्रान्डेड हैं और बहुराष्ट्रीय हैं. और वो बहुत ही अनुशासित हैं.
ये सब बहुत अच्छे गुण हैं. हम उन्हें एक निगम की तरह मानते हैं. और निगम बहुत कुछ धर्मों की तरह ही है, बस इतना फ़र्क है कि वो आवश्यकता के पिरामिड मे सबसे नीचे हैं वे हमें जूते और कार बेच रहे है. जबकि जो लोग हमे उच्च श्रेणी की चीजें बेच रहे हैं -- जैसे कि योगाचार्य या कवि -- बस खुद पर ही चल रहे है और उनके पास कोइ शक्ति नही है, उनके पास कोइ बल नही है. तो धर्म ऐसी संस्था का सबसे बडा उदाहरण है जो मन मे चलने वाली चीजों के लिये लड़ रही है. अब हो सकता है हम वो ना माने जो धर्म हमें सिखाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन हम उनके इस संस्थागत तरीके की सराहना तो कर ही सकते हैं.
केवल किताबों से, एकाकी व्यक्तियों द्वारा लिखी गयी किताबों से कुछ नही बदलने वाला. हम सबको एक साथ इकट्ठा होने की जरुरत है. अगर आप दुनिया को बदलना चाहते हैन तो आपको एक साथ मिल कर संगठित होना पडेगा. और यही काम धर्म करते है. जैसा कि मैने कहा, वे बहुराष्ट्रीय हैं ब्रान्डेड हैं और उनकी एक साफ़ पहचान है. इसलिये वो इस व्यस्त दुनिया मे खो नही जाते. और ये चीज हम उनसे सीख सकते हैं.
मैं अब निष्कर्ष पर आता हूं. वस्तुत: मैं जो कहना चाहता हूं, वो आप मे से जो लोग विभिन्न क्षेत्रो मे काम कर रहे हैं, उनके लिये है, कुछ ऐसा है जो आप धर्म से सीख सकते हैं -- भले ही आप उसकी किसी बात पर विश्वास नही करते हैं , फ़िर भी. अगर आप कोइ ऐसा काम करते है जो सामुदायिक है, जिसमे बहुत सारे लोग मिलके काम करते हैं, तो धर्म मे आपके लिये कई चीजे हैं. अगर आप किसी तरह से एक पर्यटन उद्योग से जुड़े हैं, तो तीर्थस्थानों को देखिये. ध्यान से देखिये. अभी तो हमे हलका सा भी अन्दाजा नही हुआ है कि पर्यटन क्या बन सकता है, क्योंकि अभी तक हमने इस बात पर ध्यान ही नही दिया कि धर्म पर्यटन को कैसे प्रभावित करता है. यदि आप कला की दुनिया मे हैं तो उन उदाहरणो को देखिये तो धर्म के कला पर प्रभाव को दिखाते हैं. अगर आप शिक्षक है तो देखिये कि धर्म किस तरह से विचारों का प्रसार करते हैं. आप भले ही विचारों से सहमत ना हों, पर ये कुछ करने की वाकई बहुत ही प्रभावशाली विधियां हैं.
तो मेरा निष्कर्ष आखिर मे ये है कि भले ही आप धर्म से सहमत ना हों, परन्तु आखिरकार, धर्म इतने सूक्ष्म और जटिल हैं और बहुत सी बातों मे इतने आगे हैं कि उन्हें यह कहकर कि ये सिर्फ़ धार्मिक लोगों के लिये हैं, नही छोडा जा सकता वो हम सबके लिए हैं.
क्रिस एन्डरसन: ये वाकई बडी साहसिक बात है, क्योंकि आप एक तरह से खुद मज़ाक बनवाने का इन्तज़ाम कर रहे हैं.
ए. बो.: आप दोनो तरफ़ से मारे जायेंगे. आपको कोइ कट्टर नास्तिक भी मार सकता है, और कोई पूर्ण आस्तिक भी.
क्रिस ए.: उत्तरी ओक्सफ़ोर्ड से कभी भी मिसाइल आ सकती है.
क्रि़स ए.: लेकिन आपने धर्म का एक पहलू छोड दिया जो कि कई लोग कहना चाहेंगे आपका अजेन्डा उससे कुछ ले सकता है, जो कि एक खास भाव है - जो कि वास्तव मे किसी भी धार्मिक व्यक्ति के लिये सबसे महत्वपूर्ण चीज है -- और वो है आत्मिक अनुभव, एक विशेष बन्धन, जो कि खुद से भी बढकर है. उस अनुभव के लिये अनीश्वर्वाद 2.0 मे कोई स्थान है?
ए. बो.: अवश्य. मै, आपकी तरह ही, कई लोगों से मिलता हूं जो कहते हैं, "लेकिन कोई चीज तो है जो हम सबसे बडी है. कुछ और?" और मै कहता हूं, "अवश्य." और वो कहते हैं, "तो फ़िर आप भी एक तरह से धार्मिक नहीं हुये?" और मै कहता हूं, "नहीं". ये जरूरी तो नही है कि ये रहस्य, ये अनन्त ब्रह्मांड कि विशालता का एकसास, किसी आध्यात्मिक भावना से जोडा जाये? विज्ञान और सही अवलोकन हमे बिना इसके ही ये एहसास दिला सकते हैं, तो मुझे तो किसी आध्यात्मिकता की जरूरत नही लगती. संसार बहुत विशाल है और हम बहुत तुच्छ, तो हमे और किसी धार्मिक महासंरचना की जरूरत नही है. हमे आत्मिक अनुभूति तो आत्मा मे विश्वास किये बिना भी मिल सकती है.
क्रिस ए.: मै एक सवाल पूछ्ना चाहूगा. यहां बैठे कितने लोग ये कहेंगे कि धर्म उनके लिये महत्वपूर्ण है? क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे आप जो कह रहे हैं और जो आप उनसे कहना चाहेंगे, के बीच कोइ सम्बन्ध स्थापित हो सके?
ऐ. बो.: मेरे खयाल से ऐसे बहुत तरीके हैं, लौकिक जीवन मे बहुत कमियां है जो कि पूरी की जा सकती हैं. और ,जैसा कि मैने कहा, ऐसा भी नही कि या तो आप धार्मिक हो और आपको सारी तरह की बातें माननी पड़ेंगी, या अगर आप नास्तिक हैं तो आपको सभी अच्छी चीजों से वंचित होना पडेगा. ये बहुत दुख की बात है कि हम हमेशा कहते रहते हैं कि "मै नास्तिक हूं इसलिये मै किसी समुदाय का हिस्सा नही बन सकता, मै नैतिकता से दूर हूं, और इसलिये मै तीर्थयात्रा पर नही जा सकता." लोग कहना चहते हैं, "बकवास. क्यों नही?" और यही मेरी बात का सार है. यहां हमारे सीखने के लिये कितना कुछ है! अनीश्वरवाद को खुद को धर्म की अच्छी चीजो से अलग नही रखना चाहिये.
क्रिस. ए.: मुझे ऐसा लगता है कि TED समुदाय मे काफ़ी लोग ऐसे हैं जो नास्तिक हैं. लेकिन उनमे से ज्यदातर निश्चित तौर पर ये मानते हैं कि धर्म निकट भविष्य में तो कहीं नही जाने वाला और वो एक ऐसी भाषा चाहते हैं जिससे वो एक रचनात्मक संवाद कर सकें और एक दूसरे से बात भी कर सकें और कम से कम वो चीजें जो समान हैं उन्हें बांट सकें. क्या ये आशा करना कि एक ऐसी दुनिया हो जिसमे धर्म लोगो को बांटने और युद्ध करवाने के, बजाय एक दुसरे से जोडने का माध्यम बनेगा, मूर्खतापूर्ण है?
ए. बो.: नहीं, हमे बस अपने मतभेदों का आदर करना चाहिये. विनम्रता जैसे महत्वपूर्ण गुण की लोग उपेक्षा कर देते है और इसे ढोंग समझते हैं. लेकिन हमें एक ऐसे स्तर पर आने की जरुरत है जहां आप एक नास्तिक हैं और अगर कोइ कहे "पता है, मैने तो उस दिन प्रार्थना की थी," और आप उसे विनम्रता पूर्वक टाल देते हैं. और आगे बढ जाते हैं. क्योंकि आपने 90 प्रतिशत बातें मान ली हैं, और आप कितनी बातों पर एकमत हैं, और आप विनम्रतापूर्वक अपनी असहमति भी व्यक्त कर देते हैं. और मेरे खयाल से यही चीज धर्मयुद्धों ने नही समझी है. उन्होने सद्भावपूर्ण असहमति की सम्भवना को पूरी तरह से नकार दिया है.
क्रिस. ए.: और अन्त मे, ये जो नयी चीज आप सुझा रहे हैं जो कि धर्म नही बल्कि कुछ और ही है, क्या इसे किसी नेता की जरुरत है, या आप खुद ही पोप बनने वाले हैं?
ए.बो.: एक तो ये बात है कि हम अकेले नेताओं को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं. इसे इसकी जरुरत नही है. मैं सिर्फ़ एक ढांचा बनाने की कोशिश कर रहा हूं और आशा करता हूं कि लोग इस पर कुछ बनायें. मैने तो एक विस्तृत रुपरेखा तैयार की है. लेकिन आप जहां भी हों, जैसा कि मैने कहा, अगर आप पर्यटन मे हैं तो थोडा घूमें. अगर आप किसी सामुदायिक उद्योग मे हैं तो धर्म को देखें और कुछ सामुदायिक करें. तो ये एक विकी परियोज़ना की तरह है.
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धर्म के किन पहलुओं को नास्तिक (ससम्मान ) अपना सकते हैं? एलेन डे बोटन नास्तिको के लिए एक धर्म प्रस्तुत करते हैं और उसे कहते हैं "अनीश्वरवाद २.०" जो कि धार्मिक रूप को संजोते हुए रिश्तों , रीति रिवाज़ और मोक्ष की हमारी मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करता है.
Through his witty and literate books -- and his new School of Life -- Alain de Botton helps others find fulfillment in the everyday. Full bio »
Translated into Hindi by Pradeep Singh
Reviewed by Aviral Goel
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16:51 Posted: Jul 2009
Views 2,007,409 | Comments 367
24:45 Posted: Jul 2006
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21:28 Posted: Mar 2008
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